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ब्रह्मन! अब मैथुनी सृष्टिकी रचना करो!

प्रियंका नारायण बीएचयू की शोध छात्रा हैं। किन्नर समुदाय के ऊपर उन्होंने उल्लेखनीय काम किया है। उनका यह लेख पुराणों के आधार पर भारतीय परम्परा में लैंगिकता की अवधारणा पर है। शोधपूर्ण और साहसिक। पढ़िएगा-

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त्रिदेवों के आलिंगन में ‘बलात्कार’ ( पुराण आधारित )

*** भारतीय संदर्भो में देखें तो संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होते हुए भी सामान्य रूप से वेदों को भारतीय दर्शन और ज्ञान परम्परा का निकष माना जाता रहा है और सामान्य लोकोक्ति परक सी पंक्ति रही है – वैदिक परम्परा यानि भारतीय ज्ञान परम्परा। आज भी कुरान शरीफ़ या हदीस को इस तरह की स्वीकृति नहीं ही मिल पाती है। हालाँकि यह एक अलग चर्चा का विषय है। कह सकते हैं कि वेद  भारतीय ज्ञान परम्परा का सूत्रात्मक रूप है और पुराण उन सूत्र व्यवहार को समझने के लिए तैयार किया गया कथात्मक रूप। इन कथाओं के माध्यम से न केवल समाज के सामने वैदिक सूत्रों और दर्शन की व्याख्या की गयी बल्कि समाज को शिक्षित करने के लिए भी इनका इस्तेमाल किया गया। जीवन के प्रत्येक पक्ष की व्याख्या करते हुए इन पुराणों में वर्तमान लैंगिक अवधारणाओं के पीछे की बारीकियों को तलाशा जा सकता है।

पुराणों की शृंखला में ब्रह्म पुराण पहला पुराण है जिसे ‘आदि पुराण’ के नाम से भी जाना जाता रहा है। इसका वाचन नैमिषारण्य में लोमहर्षण नाम के ऋषि ने किया था। द्वादश वार्षिक यज्ञ (बारह वर्षों तक चलने वाला यज्ञ ) के अवसर पर लोमहर्ष नैमिषारण्य में आते हैं और अन्य ऋषिजनों और वहाँ एकत्रित लोगों के अनुरोध पर पुराण वाचन करते हैं। यह पुराण मूलत: सृष्टि, मनु की उत्पत्ति, उनके वंश का वर्णन देवों और प्राणियों के वर्णन पर केन्द्रित है। बीच में राम और कृष्ण की कथाओं का भी वर्णन मिलता है। संभवतः सांख्य  को आधार बनाकर सृष्टि के आरम्भ की कथा दी गयी है। जो नित्य, सदसत्स्वरूप तथा कारणभूत अव्यक्त प्रकृति है , उसी को प्रधान कहते हैं। उसी से पुरुष ने इस विश्व का निर्माण किया है।…प्रकृति से महत्ततत्व , महत्ततत्व से अहंकार तथा अहंकार से सब सूक्ष्म भूत उत्पन्न हुए। भूतों के जो भेद हैं वे भी उन सूक्ष्म भूतों से ही प्रकट हुए हैं। 1. अब आगे लैंगिक उत्पत्ति की कहानी आगे बढ़ती है । इस सृष्टि की उपत्ति का भार भगवान नारायण  पर आता है। नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से उन्होंने सबसे पहले जल का निर्माण किया  और फिर जल में ही अपनी शक्ति को अधिष्ठित किया। पुराणों में उल्लेख आता है कि भगवान नर से उत्पन्न होने के कारण ही जल का दूसरा नाम ‘नार’ पड़ा। और यही जल पूर्व काल में भगवान का ‘अयन’ था, इसलिए वे नारायण कहलाए। भगवान ने जो जल में अपनी शक्ति का आधान किया, उससे एक बहुत विशाल सुवर्णमय अंड प्रकट हुआ और इस सुवर्णमय अंड से ही स्वयंभू ब्रह्मा जी का जन्म हुआ। सुवर्ण के समान कान्तिमान ब्रह्मा ने एक वर्ष तक उस विशाल सुवर्णमयी अंडे में वास किया और फिर उसके दो टुकड़े कर दिए। एक टुकड़े से द्युलोक का निर्माण किया और दूसरे से भूलोक का। उन दोनों के बीच में आकाश रखा। जल के ऊपर तैरती हुई पृथ्वी को स्थापित किया। …और इस प्रकार दसों दिशाएं , काल, मन , वाणी, काम, क्रोध और रति की सृष्टि की। फिर  इन भावों के अनुरूप सृष्टि करने की इच्छा से ब्रह्मा जी ने सात प्रजापतियों को अपने मन से उत्पन्न किया। उनके नाम इस प्रकार है – मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलत्स्य, पुलह, क्रतु तथा वसिष्ठ। पुराणों में ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं।2.

 हालांकि हम इन तथ्यों की जीव वैज्ञानिक व्याख्या में चाहें तो प्रवेश कर  सकते हैं लेकिन यहाँ यह विषयांतर हो जाएगा। 3.

इसके बाद ब्रह्मा जी ने रोष से रूद्र को प्रकट किया, फिर सनत्कुमार,  ग्यारह रूद्रों, उपरोक्त सप्त ऋषियों के बड़े – बड़े दिव्य वंशों को बनाया। फिर विद्युत, वज्र, मेघ, रोहित,  इन्द्रधनुष पक्षी तथा मेघों की सृष्टि की । फिर यज्ञों की सिद्धि के लिए उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद प्रकट किये। इसके बाद साध्य देवताओं व भूतों की उत्पत्ति का जन्म उनके विभिन्न अंगों से हुआ। इतने निर्माण के बाद भी प्रजा की वृद्धि नहीं हुई तब प्रजापति अपने शरीर के दो भाग करके आधे से पुरुष और आधे से स्त्री हो गये। पुरुष का नाम मनु हुआ। उन्हीं के नाम पर ‘मन्वन्तर’ काल माना गया है। स्त्री अयोनिजा शतरूपा थी, जो मनु को पत्नी रूप में प्राप्त हुई। उसने दस हजार वर्षों तक अत्यंत दुष्कर तपस्या करके परम तेजस्वी पुरुष को पति  रूप में प्राप्त किया। वे ही पुरुष स्वयम्भू मनु कहे गये। 4.  और आगे स्त्री पुरुष संयोग और प्रजनन प्रक्रिया चलती है हालांकि शतरूपा अयोनिजा हैं।

शिव पुराण के ‘शतरुद्र संहिता’ के अंतर्गत ‘शिवजी की अष्टमूर्तियों तथा अर्द्धनारीनररूपका सविस्तार वर्णन’ किया गया है और शिव पुराण के ही ‘कैलास संहिता’ खण्ड के अंतर्गत ‘ब्रह्माजीके द्वारा अर्द्धनारीश्वररूप की स्तुति तथा उस स्तोत्र की महिमा’ गायी गई है।

सामान्य रूप से अर्द्धनारीश्वर शिव की पूजा हिजड़ा या किन्नर समुदाय में की जाती रही है लेकिन इसके संबंध में यहाँ विस्तार से जाना उचित नहीं है। चर्चा किये गये दोनों अध्यायों में कथा एक ही है। सिर्फ़ वाचक बदल गये हैं। एक स्थान पर नन्दीश्वर कथा कह रहे हैं दूसरे स्थान पर वायुदेव। जो भी हो कथा में यह आया है कि जब ब्रह्मा की रची हुई प्रजा से सृष्टि का विस्तार नहीं हो पाता तब ब्रह्मा दु:खी और चिंताकुल हो जाते हैं और उस समय आकाशवाणी होती है – “ ब्रह्मन! अब मैथुनी सृष्टिकी रचना करो।” 5. तब ब्रह्मा शिव के लिए तप करते हैं। तपोनुष्ठान में लगे हुए ब्रह्मा के तीव्र तप से थोड़े ही समय में शिवजी प्रसन्न हो गये। तब कष्टहारी शंकर पूर्णसच्चिदानंद की कामदा मूर्ति में प्रविष्ट होकर अर्धनारीश्वर के रूप में ब्रह्मा के निकट प्रकट हो गये और ब्रह्मा की स्तुति पर “यों स्वभाव से ही मधुर तथा परम उदार वचन कहकर शिवजी ने अपने अर्धभाग से शिवादेवीको पृथक कर दिया। और यहाँ ब्रह्मा कहते हैं – “ शिवे ! तब मैंने देवता आदि समस्त प्रजाओंकी मानसिक सृष्टि की; परन्तु बारम्बार रचना करने पर भी उनकी वृद्धि नहीं हो रही है, अत: अब मैं स्त्री – पुरुष के समागमसे उत्पन्न होने वाली सृष्टि का निर्माण करके अपनी सारी प्रजाओं की वृद्धि करना चाहता हूँ। किन्तु अभी तक तुमसे अक्षय नारीकुल का प्राकट्य नहीं हुआ है , इस कारण नारीकुल की सृष्टि करना मेरी शक्ति से बाहर है।” 6.   इसके बाद शिव दक्ष की पुत्री के रूप में जन्म लेने के लिए प्रस्थान करती हैं।

पुराणों में स्त्री पुरुष की उत्पत्ति की ये मिथकीय कथाएं बार – बार आती हैं। अट्ठारह पुराणों में भारतीय मिथकों के रूपों को ही बार – बार रखकर मानवीय घटनाओं को कथात्मक रूप में कहने की कोशिश की गयी है और इनकी पृष्ठभूमि दार्शनिक रही है। यहाँ एक अन्य तथ्य की ओर भी ध्यान जाता है कि जैसे वर्तमान समाज में तृतीय लिंग की चर्चा गौण रही है या उनके आंतरिक जीवन के बारे में विशेष जानकारी नहीं मिल पाती है वैसे ही पुराणों में भी इनकी चर्चा गौण ही रही है। हल्की झलक ज़रूर मिलती है।

लेकिन दिलचस्प ये है कि जिस स्त्री पुरुष के जीवन की व्यावहारिक समानता की बात हम करते हैं उसकी विकृति के बीज यहाँ बिखरे पड़े हैं जो पिछले दो हजार वर्षों से भारतीय मानस की रचना कर रहे है और आज यह विकृति की जिस अवस्था में है कि स्त्रियों के असितत्व और उनमें ‘मस्तष्कीय जीवन’ होने के तर्क पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देता है। ‘सतीत्व’(पद्मपुराण) की अवधारणा और पुरुष की वर्चस्ववादी व अहंवादी स्थितियां पुराणों में बिखरी पड़ी है। हालांकि वहाँ कई उदाहरण ऐसे भी हैं जिनमें किसी की पत्नी ने समागम किसी और से किया हो लेकिन पति उसे वस्तु के रूप में नहीं बल्कि पूरक के रूप में ससम्मान स्वीकार करता है।

वेदव्यास द्वारा प्रणित ‘नरसिंह पुराण’ में ‘अष्टाक्षर – मन्त्र के प्रभाव से इन्द्र का स्त्रीयोनिसे उद्धार’ अध्याय पारम्परिक रूप से तो इन्द्र ( पुरुष ) की रसिकता और परस्त्री गमन ( जो अवधारणा रची गयी है जैसे स्त्री कोई संपत्ति हो, हालांकि परपुरुष शब्द भी असितत्व में है  लेकिन इसका मनोविज्ञान ठीक विपरीत है और वह भी स्त्री को नियंत्रित करने के अर्थ में ही है ), द्वेष और श्राप या प्रतिशोध की कहानी है। स्वर्ग के सुखों और अधिकार की शून्यता से उबकर इन्द्र वैराग्य के उद्देश्य से जब कैलास पर्वत पर पहुंचे तो मानसरोवर के तट पर पार्वती के युगल चरणों की पूजा करती हुई यक्षराज कुबेर की प्राणवल्लभा चित्रसेना को देखा। “ जो कामदेव के महान रथ की ध्वजा – सी जान पड़ती थी। उत्तम ‘जाम्बूनद’ नामक सुवर्णके समान उसके अंगों की दिव्य कान्ति थी। आँखें बड़ी – बड़ी और मनोहर थीं, जो कान के पास तक पहुंच गयी थीं। महीन साड़ीके भीतर से उसके मनोहर अंग इस प्रकार झलक रहे थे , मानो कुहासेके भीतर से चन्द्रलेखा दृष्टिगोचर हो रही हो। अपने हजार नेत्रों से उस देवी को इच्छानुसार निहारते ही इन्द्र का ह्रदय काम से मोहित हो गया। उस समय वे दूर के रस्ते पर स्थित अपने आश्रम पर नहीं गये और सम्पूर्ण मनोरथों को मन में लिए देवराज इन्द्र विषयाभिलाषी हो खड़े हो गये।” 7. इसके बाद मिथकीय सांचों में कहानी को इस प्रकार ढाला जाता है कि कुबेर पत्नी चित्रसेना के व्यव्हार से भारतीय ‘पातिव्रत्य’ और ‘सतीत्व’ जैसी विशिष्ट लैंगिक अवधारणाओं पर कोई प्रश्न न खड़ा हो। चित्रसेना के मन में इन्द्र के प्रति उठने वाले आकर्षण व प्रेम को कामदेव के पुष्पमय धनुषबाण और मोहन – मन्त्र का दोष बता दिया जाता है। यहाँ सीधे- सीधे प्रेम को स्वीकारोक्ति प्राप्त नहीं है। यद्यपि कामदेव के बाणों का उल्लेख प्राय: साहित्यकारों के बीच होता रहा है लेकिन यहाँ कथा निर्वाह में इसका प्रयोग इस प्रकार किया गया है कि प्रेम या सम्मोहित होना एक दोष है और वह दोष चित्रसेना का नहीं बल्कि कामदेव का है –   ‘तब कामदेवद्वारा पुष्पबाण से मोहित की हुई वह बाला अपने सम्पूर्ण अंगमें मदके उद्रेक से विह्वल हो गयी और पूजा छोड़ इन्द्रकी ओर देखकर मुस्काने लगी। भला, कामदेवके धनुष की टंकार कौन सह  सकता है।’

“सम्मोहिता   पुष्पशरेण बाला

                                                   कामेन कामं मदविह्व्लान्ग्गी ।

                                विहाय पूजां हसते सुरेशं

                                                    क : कामकोदंडरवं सहेत ।। ”३२         8.

इसके बाद इन्द्र और चित्रसेना मंदराचल की ओर प्रस्थान कर जाते हैं और साथ में जीवन बिताने लगते हैं। यह सुनकर कुबेर कुपित होते हैं। मृत्यु तक का आवाहन करते हैं  और ढाढ़स बंधाने वाले श्री राम का उदाहरण देते हैं। हालांकि इस कहानी में कुबेर अंत में चित्रसेना को प्राप्त कर अपने को धन्य – धन्य महसूस करते हैं

                           “एतस्मिन्नन्तरे दूतोकाले लंका समागत : ।

                  धनेशं कथयामास चित्रसेनासमागमम । । (११०)

                            शच्या साकं समायाता त्व कांता धनाधिप ।

                       सखीं स्वाम्तुलां प्राप्य चरितार्था बभूव सा ।। (१११)

                          धनेशोपी कृक्तार्थोभूज्गाम निज्वेश्मनि ।                     9.

 कुबेर लंका के अधिपति हैं और आर्येत्तर संस्कृति के रावण के भाई हैं, लेकिन आर्य राम और सीता का प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। एक तरफ़ अनुरक्ति के बाद भी चित्रसेना की स्वीकृति है और दूसरी तरफ़ विराग के बाद भी सीता की आत्महत्या है। बावजूद इसके भारतीय मानस में आज भी स्त्रियों को बचपन से सीता जैसी बनने की नसीहत दी जाती है और आदर्श के रूप में उपस्थित किया जाता है। क्या सीता जैसी होना घुटन, त्याग, अपहरण और अंततः जीवन की खुशियों में ‘रामराज्य’ और अगर उसका भी निषेध कर दिया तो क्या आत्महत्या ही भारतीय स्त्रियों की नियति नहीं रही है? जीवन भर नैतिकता, मूल्य, सतीत्व, उसूलों के चक्रव्यूह को झेलना और उसी में उलझे रहना, क्या यहीं भारतीय स्त्रियों की नियति नहीं है। देश, राजनीति, समाज, अर्थ, विज्ञान के क्षेत्रो में क्या हो रहा है उससे अलग रहिए, पहले इन मिथकों से तो निपट लीजिए जो मानसिकता में गहरे धंसे हैं। और अगर आज लड़कियां इससे निकल भी रही हैं तो भारतीय पुरुष मानस में ‘गर्ल फ्रेंड’ ( जो प्रचलित अवधारणा है ) के लिए तो उपयुक्त हैं लेकिन पत्नी या घर बसाने के लिए नहीं। पत्नी के नाम पर सदियों पहले का रामायणी मानस फिर से जागृत होना शुरू हो जाता है। बदलते दौर में हो सकता है शुरूआत में स्वीकार भी हो जाएँ लेकिन जैसे ही ‘औरतों’ के खांचे में फ़िट बैठनी शुरू होती हैं सारी स्थितियों का सच सामने होता है। ऐसे में विश्वविद्यालीय और बुद्धिजीवी वर्ग की   लड़कियां थोड़ी बहुत स्वतंत्रता के भ्रम में भले जी ले क्योंकि सामने वाले को पता है कि स्वतंत्रता के नाम पर आप उनसे क्या मांगेंगी? थोड़े खुले कपड़ों की स्वतंत्रता, थोड़ी नौकरी कर लेने की स्वतंत्रता, थोड़े पुरुष मित्रों से बात कर लेने की स्वतंत्रता। लेकिन यक़ीनन आज भी दलित वर्ग की महिलाएं जो गांवों और खेतों में काम करती हैं मानसिक रूप से हमसे ज्यादा स्वतंत्र हैं। हम युवा वर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग क्या नौकरी छोड़ व्यवसाय के बारे में सोचती हैं, क्या अकेले सफ़र के बारे में सोच पाती हैं, क्या अपनी वैचारिकी और अपने अधिकारों की खुल कर बात और उसके लिए खड़े हो पाती हैं?  नहीं सब करके भी हम एक सुविधाजनक और सुरक्षित खाँचें में फ़िट हो जाना चाहती हैं स्वतंत्रता का भ्रम पाले हुए। हमारी बातचीत और सारी बहसों का केंद्र घूम फिर कर अंत में यहीं पहुंचता है। फ़िर पुरुषों की ही आँखों या गाड़ी की चढ़ी हुई शीशों से ही हम दुनिया देखने लगती हैं और इस बार ख़ुद मर्यादाओं व गरिमा का मिथ गढ़ने लगती हैं। और यह गरिमा और मर्यादा हमारी शक्ति के अहंकार को पोषित कर रहा होता है। और सबसे अंत में भारतीय मानस फिर ठहाके लगाता है – कर  लिया विचार?  दरअसल, हमारी सारी विचारधाराएँ, आधुनिकता और स्वतंत्रता कपड़ों, बूट, गाड़ियों, लक्सजरी फानूशों की चमचमाहट में सिमट कर रह जाती है। हम मिट्टी में उतर कर काम करने की आदी नहीं हैं , कुछ भी कहिए सौन्दर्य को बनाये रखने का प्रश्न होता है। हम चेत में तब आते हैं जब कोई दुर्घटना हो जाती है और तब हमारे सामने लैंगिक भेद भाव का अक्षय प्रश्न फिर से मुंह फाड़े आ खड़ा होता है।

 आधुनिकता के आने के बाद ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो हमारी सदियों से प्रशिक्षित मानसिक संरचना और लैंगिक ढांचों का मूल्यांकन दे रही है। खैर एक बार आंकड़ों पर आयें और     देखें । स्त्रियों के लैंगिक अपमान की घटनों का प्रतिशत २५.२ %, अपहरण के मामले में १८.१ %, और बलात्कार का प्रतिशत १०.६% है। सामान्य रूप से ये हमारे समाज की  ‘दैनिक’ घटनाएँ हैं और हम लेते भी बहुत सामान्य तरीके से हैं तब तक जब तक निर्भया जैसी कोई एकदम से झकझोर देने वाली कोई घटना न घटित हो जाये। अब तो हालत ये है कि मध्य वर्गीय बुद्धिजीवी समाज इंतजार करता है कि कोई घटना घटे ताकि न्यूज़ चैनल की टी. आर. पी बढ़े, कुछ सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देकर अपनी चर्चा बटोर सकें, कुछ कवितायें लिखी जा सके, कुछ गद्य लिखें जाएँ और फिर एक होड़ लगे कि किस – किसने प्रतिक्रिया दी, क्या प्रतिक्रिया दी, किसने नहीं दी, नहीं दी तो क्यों नहीं और दी तो किसकी पोस्ट सबसे उम्दा रही? बस मूल मुद्दा गायब हो जाता है इन सबके बीच में। नेताओं की तरह और मीडिया की तरह ख़ुद की टी. आर. पी सबसे बड़ी हो जाती है, फ़िर ‘घटना’ को पूछता कौन है , ‘दिनचर्या’ फिर शुरू हो जाती है।

लेकिन दिलचस्प यह है कि इस ‘घटना’ और ‘दिनचर्या’ की परम्परा भी आज से नहीं चली आ रही है बल्कि यह परम्परा भी “पौराणिक” है और “सांस्कृतिक” रूप से मजबूत और वीभत्स होती हुई हम तक पहुंची है। यहाँ आप सीता , द्रौपदी या अहिल्या का चर्चित उदाहरण न दें तो भी कोई बड़ी बात नहीं है । स्वर्ग के अधिपति इन्द्र के किस्से तो पुराणों में बिखरे पड़े हैं और इन विलासिता के पर्याय के अतिरिक्त शिव, ब्रह्मा और विष्णु भी पीछे नहीं हैं।

  लेकिन पुराण कर्ता भी कम चतुर नहीं थें जैसे ही ऐसी कोई घटना घटती है ख़ासकर इन्द्र को छोड़कर ( क्योंकि इन्द्र का पद ही विलासिता , सम्भोग व चारित्रिक रूप से पतनशील देव के पद का प्रतीक रहा है  ) त्रिदेवों के सन्दर्भ में वहाँ किन्तु परन्तु के साथ एक मिथकीय घटना का झीना आवरण डाल दिया जाता है ताकि उसका प्रभाव कम किया जा सके । उनकी आसक्ति और बलात्कार की घटना को जायज ठहराया जा सके। ‘मत्स्य पुराण’   जो कि आठ्रारह पुराणों में से बेहद महत्वपूर्ण है वहाँ ब्रह्मा द्वारा सृष्टि निर्माण की कथा आती   है। लगभग सभी पुराणों में ये कथाएं कुछ भिन्नताओं और कालानुसार कुछ नये तथ्यों के साथ कथाएं आगे बढ़ती ही रहती है। केवल बीच- बीच में उठने वाले देवता विशेष की भक्ति के साथ मूल पुराण देवता परिवर्तित हो जाते हैं। ( हालांकि देवताओं की शृंखला का भी अपना विस्तृत कांसेप्ट है लेकिन यहाँ विषयांतर हो जाएगा। )

मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि की गति को आगे बढ़ने के लिए सावित्री का ध्यान कर तप आरम्भ किया। उस समय जप करते हुए उनका निष्पाप शरीर दो भागों में बंट गया और ‘शतरूपा’ का जन्म हुआ। ये शतरूपा – सरस्वती, सावित्री, गायत्री, ब्रह्माणी भी कही जाती हैं। शरीर से उत्पन्न होने के कारण ब्रह्मा ने उन्हें पुत्री के रूप में स्वीकार किया लेकिन शतरूपा का  सौन्दर्य अगाध था और इस अगाध सौन्दर्य को देखकर ब्रह्मा उस पर मुग्ध हो गएं। इसके बाद सरस्वती जब पिता की परिक्रमा करने लगीं और परिक्रमा करती हुई उनके दाहिने पार्श्व में गईं तब उनका मुख देखने की इच्छा से उनके दाएं गाल पर एक मुख उग आया। जब वे पीछे की ओर गई तब पीछे, वाम आने पर बाएं गाल पर। ऐसे ब्रह्मा अपनी कामनाओं के वशीभूत होकर चतुर्मुख हो गए।

“ चतुर्थमभवत्  पश्चाद्  वामं कामशरातुम् ।

   ततोअन्यदभवत्तस्य  कामातुरतया   तथा ।। ३८.

   उत्पतन्त्यास्तदाकारा   आलोकनकुतूहलात् ।

   सृष्ट्यर्थं  यत्  कृतं  तेन तपः परमदारुणम् ।। ३९.

  तत्  सर्वं  नाशमगमत्   स्वसुतोपगमेच्छ्या ।”          10 .

ब्रह्मा से बचने के लिए शतरूपा ऊपर की तरफ गमन कीं तब  ब्रह्मा के सर पर जटायुक्त  पांचवां मुख उभर आया। अन्य पुराणों में भी यह कथा आती है। कहा गया है कि ब्रह्मा से बचने ने के लिए अंततः सरस्वती एक के बाद एक रूप बदलने लगीं। वे हंसिनी का रूप लेती हैं तो ब्रह्मा बत्तख बन जाते हैं। वो गाय बनती है तब वे सांढ , सरस्वती चिड़िया तब ब्रह्मा बाज । इस तरह लगातार रूप बदलने के कारण सरस्वती शतरूपा कहलाई।  ब्रह्मा के  इस तरह पथभ्रष्ट होने के कारण उनके द्वारा सृष्टि के निर्माण के लिए किये गये सारे  तप का फल नष्ट हो गया और अंत में शिव ने क्रुद्ध होकर उनका पांचवां सर काट दिया  और उन्हें  नियमित पूजा से वंचित  कर दिया। यद्यपि ब्रह्मा ने पुत्रों को सृष्टि की रचना के लिए पुत्रों को  बाहर भेजकर प्रणाम करने के लिए चरणों में पड़ी शतरूपा के साथ पाणिग्रहण किया।   11 .

सरस्वती का सौन्दर्य इतना ज्यादा था कि ब्रह्मा के मन में उसे देखते रहने की इच्छा स्थिर रूप से बैठ गयी। वे बार- बार यही कहने लगे –   “ कैसा मनोहर रूप है ! कैसा सौन्दर्यशाली रूप है! … कैसा अद्भुत रूप है! कैसी अनोखी सुन्दरता है!” क्या हमें अपने पिता का यह स्वरुप स्वीकार्य हो सकता है। यद्यपि ब्रह्मा को तो शिव ने दण्डित किया लेकिन आगे विष्णु और शिव को भी हम देखें।

  जगत के पालनकर्ता और त्रिदेवों में त्रिगुणातीत माने जाने वाले विष्णु की कथा शिव पुराण में आती है। शिव पुराण के ‘रूद्रसंहिता’ , पंचम ( युद्ध) खण्ड छठा और नवां अध्याय देखिए। छठे अध्याय के शीर्षक और उपशीर्षक “दम्भ की तपस्या और विष्णु द्वारा उसे पुत्र प्राप्तिका वरदान, शंखचूड़ का जन्म, तप और उसे वर प्राप्ति, ब्रह्मा जी की आज्ञा से उसका पुष्कर में तुलसी के पास आना और उसके साथ वार्तालाप, ब्रह्मा जी का पुन: वहाँ प्रकट होकर दोनों को आशीर्वाद देना और शंखचूड़ का गान्धर्व विवाह्की विधिसे तुलसीका पाणिग्रहण करना …”

इस पौराणिक कथा को संक्षेप में समझा जा सकता है। कश्यप ऋषि और दनु का पुत्र दम्भ बहुत बलशाली और विष्णु भक्त था। पुष्कर में गहन तप करके उसने विष्णु से  देवताओं को जीत लेने वाले पुत्र की मांग की। पुत्र हुआ भी। उसका नाम शंखचूड़ था। उसने भी तपस्या की और ब्रह्मा से अजेय और देवताओं पर विजयी होने की मांग की। ब्रह्मा ने वरदान दे  दिया और साथ में यह भी कहा कि “तुम बदरीवनको जाओ। वहीं धर्मध्वजकी कन्या तुलसी सकाम भाव से तपस्या कर रही है। तुम उसके साथ विवाह कर लो।” ब्रह्मा के आदेश पर शंखचूड़ उस वन में पहुंचते हैं और तुलसी से कहते हैं  “शोभाने! जगत में जितनी पतिव्रता नारियां हैं, उनमें तुम अग्रणी हो। मेरा तो ऐसा विचार है कि जैसे मैं पापबुद्धि कामी नहीं हूँ, उसी प्रकार तुम भी कामपराधीना नहीं हो। फिर भी इस समय मैं ब्रह्मा जी की आज्ञा से तुम्हारे समीप आया हूँ और गान्धर्व विवाह की विधि से तुम्हें ग्रहण करूँगा।” तुलसी उनसे शास्त्रार्थ करती हैं , विवाह की सम्मति देने को होती हैं कि ब्रह्मा पुन : आते हैं और कहते हैं –“ शंखचूड़!  तुम इसके साथ क्या व्यर्थ में वाद – विवाद कर रहे हो? तुम गान्धर्व विवाह की विधि से इसका पाणिग्रहण करो; क्योंकि निश्चय ही तुम पुरुषरत्न हो और यह सती – साध्वी नारियों में रत्न स्वरूपा है। ऐसी दशा में निपुणका निपुणके साथ समागम गुणकारी ही होगा। 12. तब दानव शंखचूड़ ने गान्धर्व विवाह की विधिसे तुलसी का पाणिग्रहण किया।

मूल कहानी यही से शुरू होती है। युद्ध में जब सारे देवता और भद्रकाली शंखचूड़ को जीतने

में असमर्थ होते हैं तब ये विष्णु और शिव के पास मदद के लिए जाते हैं। विचार – विमर्श के

बाद शिव रणभूमि में उतरते हैं और शंखचूड़ को मारने के लिए ज्यों ही अपना त्रिशूल हाथ में लेते हैं आकाशवाणी होती है“शंकर! मेरी प्रार्थना सुनिए और इस समय त्रिशूल को मत चलाइए।… आप उस मर्यादा को सुनिए और उसे सत्य एवं सफल बनाइये। ( वह देवमर्यादा

यह है कि ) जब तक इस शंखचूड़ के हाथ में श्रीहरि का परम उग्र कवच वर्तमान रहेगा और इसकी पतिव्रता पत्नी ( तुलसी) – का सतीत्व अखंडित रहेगा, तब तक इस पर जरा और मृत्यु अपना प्रभाव नहीं दल सकेंगे। अत: जगदीश्वर शंकर! ब्रह्मा के इस वचन को सत्य कीजिये।” 13. “ फिर तो शिवजी ने इच्छा की और विष्णु वहाँ से चल पड़े।  वे तो मायावियों में भी श्रेष्ठ मायावी ठहरे।” 14. इसके बाद वे शंखचूड़ से उसका कवच ब्राह्मण  याचक के रूप में मांग लेते हैं और फिर शंखचूड़ का रूप धारण करके वे तुलसी के पास पहुंचे। वहाँ जाकर सबके आत्मा एवं तुलसीके नित्य स्वामी श्रीहरिने शंखचूड़रूप से उसके शीलका हरण कर लिया।”15. इसके बाद वे शंखचूड़ का वध करने में सफल हो जाते हैं। स्वर्ग में दुदुम्भी बजने लगती है। गान्धर्व और किन्नर गान करने लगे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। सारे देवगण परमानंद को प्राप्त हुए और अपने – अपने लोक को प्रस्थान कर जाते हैं। शिव शिवलोक चले जाते हैं, विष्णु विष्णुलोक। उस समय जगतमें चारों ओर शन्ति छा जाती है और अगर कुछ शेष बचता है तो तुलसी का रूदन। वो घुटती है, क्रुद्ध होती है – “दुष्ट! मुझे शीघ्र बतला कि मायाद्वारा मेरा उपभोग करने वाला तू कौन है? तूने मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया है।” कोसने और श्राप देने के अतिरिक्त तुलसी कर भी क्या सकती थी? कहती हैं – “ हे विष्णो! तुम्हारा मन पत्थरके सदृश कठोर है। तुममें दया का लेशमात्र भी नहीं है । मेरे पतिधर्म के भंग हो जानेसे निश्चय ही मेरे स्वामी मारे गये। चूंकि तुम पाषाण – सदृश कठोर, दयारहित और दुष्ट हो, इसलिए अब मेरे शाप से पाषाणस्वरूप ही हो आओ।”16. इसके बाद तुलसी फूट – फूट कर रोने लगती हैं फिर शिव आते हैं और बीच का रास्ता निकलते हुए विष्णु के शालिग्राम रूप से तुलसी का व्याह संपन्न करवा आते हैं। और आशीर्वाद देते हैं कि “ भद्रे! जो शालग्रामशिलाके ऊपरसे तुलसीपत्रको दूर करेगा, उसे जन्मान्तर में स्त्रिवियोग की प्राप्ति होगी तथा जो शंख को दूर करके तुलसीपत्र को हटायेगा, वह भी भार्याहीन होगा और सात जन्मोंतक रोगी बना रहेगा। जो महाज्ञानी पुरुष शालग्रामशिला, तुलसी और शंखको एकत्र रखकर उनकी रक्षा करता है, वह श्रीहरि का प्यारा होता है।” 17.

अब प्रलयंकारी शिव की कथा देखिए। देवदत्त पट्टनायक ‘शिव से शंकर तक’ ( लिंग प्रतीक का रहस्य ) में लोककथाओं का जिक्र करते हुए ‘विश्वासघात’ शीर्षक से एक कथा का जिक्र करते हैं। पार्वती शिव से निरंतर लडती थी और एक बार शिव पार्वती की कलह से तंग आकर देवदार के वन में चले गये। कथा में मोड़ कुछ इस तरह आता है कि पार्वती भी एक आदिवासी कन्या का भेष बनाकर पीछे – पीछे जा पहुंची। वहाँ शिव को पार्वती की याद  बुरी तरह आने लगी और उनकी कमी खलने लगी।  अचानक उन्होंने पाया कि एक कन्या उन्हें ताक रही है और और इस वजह से उन्हें पार्वती की याद आ रही है। “कमाना के वशीभूत होकर उन्होंने उसका पीछा किया और उसे अपने साथ सम्भोग के लिए विवश किया। कन्या हंसी, फिर रोयी, फिर उसने अपनी असली पहचान उजागर की और शिव पर विश्वासघात का आरोप लगाया।” शिव के समझाने पर भी पार्वती नहीं मानी और शांति के लिए मानसरोवर में स्नान करने का निर्णय लिया। जब किनारे आई तब पाया कि उनकी चोली चूहों ने कुतर डाली है। इसी समय एक दर्जी पास से गुजरा और रफ़ू करने के लिए तैयार हो गया अगर इस कम के पैसे मिले । लेकिन पार्वती के पास पैसे नहीं थे। उन्होंने कहा   कि मैं तो एक दरिद्र तपस्वी की पत्नी हूँ, ‘पार्वती ने कहा। ‘ इस हालत में मुझे एक आलिंगन से भुगतान कर देना,’ दर्जी ने कहा। पार्वती मन गयी। प्रणय लीला के बाद दर्जी ठठा कर  हंसा। दर्जी शिव ही थे। ‘तुम मुझसे किसी भी तरह अलग नहीं हो,’ शिव ने कहा। ‘मैं हूँ,    ‘पार्वती चिल्लायी, ‘ अपने वासना के वशीभूत होकर विश्वास तोड़ा था। मैंने दरिद्रता के कारण।’ 18.

इस कथा का निष्कर्ष और इसका विश्लेषण आप ख़ुद ही कर सकते हैं।  ब्रह्माण्ड पुराण में एक अन्य कथा आती है जो शिव के विष्णु के मोहिनी रूप पर आसक्ति की है। मोहिनी के सुर – असुरों को जीत लिए जाने के बाद शिव जब विष्णु से क्षीरसागर में मिलते हैं तब उन्हें अपना मोहिनी रूप लेने का आग्रह करते हैं। शिव की बार – बार की प्रार्थना पर विष्णु मोहिनी का रूप लेते हैं तब शिव की मनोदशा ही बदल जाती है। साक्षात् शृंगार को सामने देखकर धैर्य शिव का साथ छोड़ देता है।

“  तामिमां       कन्दुकक्रीडालोलामलोलभूषणानां ।

   दृष्ट्वा  क्षिप्रमुमां     त्यक्त्वा     सोअन्वधावदथेश्वर : ।। ७१ ।।

   उमापि  तं    समावेक्ष्य   धावंतं    चात्मन:     प्रियम्   ।

   स्वात्मानं  स्वात्मसौन्दर्यम्  निन्दन्ती    चातिविस्मिता  ।

   तस्थाववाङ्मुखी !      तूष्णीं       लज्जासूयासमन्विता  ।। ७२ ।।

गृहीत्वा कथाम्प्येनामालिलिंग मुहुर्मुहुः । उद्धयोद्धय साप्येवं धावति स्म सुदूरत: ।।७३।।

पुनः गृहीत्वा  तामीश: कामं कामवशीकृत: । आश्लिष्टम्  चातिवेगेन तद्वीर्यम् प्रच्युतं तदा ।।७४।।

तत: समुत्थितो देवो महाशास्ता महाबलः । अनेककोटिदैत्येन्द्रगर्वनिर्वापणक्षम : ।। ७५।।” – 19.

उन कंदुक क्रीड़ामाला से भूषण वाली भुवनमोहिनी को देख कर भगवान शंकर उमा को छोड़कर शीघ्रता मोहिनी के पीछे दौड़ने लगे। उमा भी इस तरह प्रिय को विष्णु पर आसक्त देखकर अपने सौन्दर्य की निन्दा करती हुई अत्यंत विस्मित हो गयीं और लज्जा और असूया से चुपचाप मुख नीचे कर खड़ी हो गयीं। भगवान शंकर ने मोहिनी को किसी प्रकार बार- बार पकड़कर आलिंगन किया, परन्तु वे उठ- उठ कर दौड़ रही थीं। अंततः शिव की वासना शांत हुई । दूसरे पुराणों में भी यह कथा आती है जहाँ यह उल्लेख है कि दक्षिण भारत के अयप्पा का जन्म शिव और मोहिनी के इसी मिलन का परिणाम था।

सबरीमाला में जो देवता स्त्रियों के लिए वर्जित हैं उनके जन्म की कथा भी हमारे सामने है।

लेकिन अब तक के विश्लेषण से भारतीय लैंगिक अवधारणा ( स्त्री व पुरुष के विशेष सन्दर्भों में ) की वर्तमान स्थति की पीछे की समझ तो विकसित होती ही है। संस्कृति का दम्भ भरने वाले हम उसके पीछे के  सुसंस्कृत छिद्रों को तो देख ही सकते हैं। क्यों जब एक निर्भया सड़क पर पड़ी होती है तो उसकी मदद हम नहीं कर पाते बल्कि उल्टे बलात्कार की घटनाएँ और उसके तरीके और भी वीभत्स होते जा रहे हैं। कभी मंदिर में कोई घटना घटती है तो प्रतिक्रियास्वरूप मस्जिद का उदाहरण भी सामने आ जाता है। दिलचस्प तो यह है कि आज भी कस्बों और गांवों की तरफ़ चले जाइये तो जिनका व्याह नहीं हो रहा होता है या जो अच्छा पति पाने की इच्छा रखती हैं वे विष्णु ( वृहस्पतिवार का व्रत ) और शिव ( सोलह सोमवार ) का व्रत करते मिल जाती हैं। शिव चर्चा तो आजकल जोरों पर है। नहीं पता जब ये स्त्रियाँ उपरोक्त स्थितयों से वाकिफ़ होंगी तो विश्वास करने लायक तर्क भी जुटा पाएंगी या नहीं। उनकी आस्था, श्रद्धा और विश्वास उनके तर्क पर भारी पड़ेंगी। विडम्बना यह है कि एक बड़ा वर्ग चाहे वह स्त्री हो या पुरुष इन तर्कों की विश्वसनीयता स्वीकार ही नहीं कर पायेगा। बात – बात पर जुमले फेंकने वाले कि ‘हमारे वेदों में ये लिखा है, हमारे पुराणों में ये लिखा है, जितना कुछ भी शुभ और मंगल है वह सब इनमें लिखा है और जितना कुछ अशुभ और अमंगल है वह सब आयातित है,’ ‘हमारी भारतीय संस्कृति जो सिर्फ़ महान है वे इस महान संस्कृति के पौराणिक काले अध्यायों को कैसे लेंगे?’ कहते हैं इस महान संस्कृति का भार चंद ‘भक्तों’ पर  है जिनका सम्मोहनकारी प्रभाव बड़े जनसमूह पर है ऐसे में जब ‘महानता’ उनकी ‘विरासत’ है तो लैंगिक अपराधों व भेद–भावों का उत्तरदायी कौन    होगा?

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  1. 1. संक्षिप्त ब्रह्म पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, सं. २०७५, पन्द्रहवाँ पुनर्मुद्रण, पृष्ठ- ११,
  2. 2. संक्षिप्त ब्रह्म पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, सं. २०७५, पन्द्रहवाँ पुनर्मुद्रण, पृष्ठ- ११,
  3. 3. इसकी व्याख्या किन्नर : सेक्स और सामाजिक स्वीकार्यता पुस्तक में की गयी है जो कि अभी प्रकाशनाधीन है ।
  4. 4. संक्षिप्त ब्रह्म पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, सं. २०७५, पन्द्रहवाँ पुनर्मुद्रण, पृष्ठ- ११,
  5. शतरुद्र संहिता, संक्षिप्त शिव पुराण, छाछठवाँ पुनर्मुद्रण, गीताप्रेस गोरखपुर, पृष्ठ – ४४१
  6. 6. शतरुद्र संहिता, संक्षिप्त शिव पुराण,छाछठवाँ पुनर्मुद्रण, गीताप्रेस गोरखपुर, पृष्ठ – ४४२
  7. अष्टाक्षर- मन्त्र के प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार, श्रीनरसिंह पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, पृष्ठ – २७२
  8. 8. अष्टाक्षर- मन्त्र के प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार, श्रीनरसिंह पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर,  पृष्ठ – २७४
  9. अष्टाक्षर- मन्त्र के प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार, श्रीनरसिंह पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर,  पृष्ठ – २८०
  10. 10. तृतीय अध्याय, मत्स्यपुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, सं. २०७४, तेरहवां पुनर्मुद्रण, पृष्ठ – २२
  11. श्लोक ४२- ४४, मत्स्यपुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, सं. २०७४, तेरहवां पुनर्मुद्रण, पृष्ठ – २२
  12. ‘रूद्रसंहिता’ , पंचम ( युद्ध) खण्ड ,शिव पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, पृष्ठ – ३८९
  13. . ‘रूद्रसंहिता’ , पंचम ( युद्ध) खण्ड शिव पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, पृष्ठ -४००
  14. . ‘रूद्रसंहिता’ , पंचम ( युद्ध) खण्ड शिव पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, पृष्ठ -४००
  15. ‘रूद्रसंहिता’ , पंचम ( युद्ध) खण्ड शिव पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, पृष्ठ -४०१
  16. ‘रूद्रसंहिता’ , पंचम ( युद्ध) खण्ड शिव पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, पृष्ठ -४०२
  17.   ‘रूद्रसंहिता’ , पंचम ( युद्ध) खण्ड शिव पुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, पृष्ठ – ४०३
  18. शिव से शंकर तक, देवदत्त पटनायक, अनुवाद- नीलाभ, राजपाल, पृष्ठ  – ९५ )
  19. ब्रह्माण्डमहापुरणम्, उत्तरार्धम् संपादक एवं अनुवादक – प्रो. दलवीर सिंह चौहान,द्वितीय संस्करण, पृष्ठ – १०११, चौखम्बा प्रकाशन सिरीज़, वाराणसी,

 

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One comment

  1. परत दर परत मिथक कथाओं का सत्य उद्घाटित करता एक जरूरी लेख।बधाई प्रियंका और पढ़वाने के लिए आभार जानकीपुल

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