फेसबुक पर फेस को नहीं, बुक को प्राथमिकता मिलनी चाहिए

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वरिष्ठ लेखक-पत्रकार राजकिशोर वाद-विवाद बनाए रहते हैं. अब आभासी दुनिया को लेकर लिखा गया उनका यह लेख ही ले लीजिये. बहरहाल, यह तो तय है कि सारे वाद-विवाद के बावजूद वे संवाद बनाए रखते हैं. आभासी दुनिया के मित्रों के नाम उनका यह लेख- जानकी पुल.
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मैं यह दावा करने की स्थिति में नहीं हूँ कि मुझे फेसबुक की लत नहीं लग पाई है। यह आज की सब से बड़ी चौपाल है। यह मित्र मंडल की ऐसी बैठक है, जो घड़ी की तरह अनवरत चलती रहती है। यह बंधुत्व का स्वयंवर है जहाँ कोई भी किसी के गले में माला डाल सकता है। यह लचीलेपन का प्रशिक्षण स्थल है जहाँ किसी भी किए को अनकिया भी किया जा सकता है। आप चाहें तो अपनी टिप्पणी को हटा दें। आप का मन बदल गया तो कल आपने जिसे मित्र बनाया था उसे अमित्र की कोटि में डाल दें। यह संसद नहीं है जहाँ उपस्थिति और अनुपस्थिति के नियम बने हुए हैं। मन करे तो फेसबुक पर आइए, न मन करे तो महीनों मत आइए। यह आप की डायरी भी है। अपना क्षण-क्षण का वृत्तांत लिखते रहिए। इसकी परवाह करने की जरूरत नहीं है कि दूसरे क्या सोचेंगे। फेसबुक पर आप आते ही दूसरों के लिए हैं। दूसरे भी आप के लिए आते हैं। दुनिया में बहुत कम चीजें हैं जो सिर्फ अपने आप से शेअर की जा सकती हैं। उन्हें छोड़ कर फेसबुक पर आप जो चाहें शेअर कर सकते हैं। इसमें कर सकती हैं शामिल हैं।

      आखिरी वाक्य मैंने जान-बूझ कर लिखा है। आदमी अधिकांश काम जान-बूझ कर ही करता है। पुण्य भी और पाप भी। पता नहीं मैं पुण्य करने जा रहा हूँ या पाप। या, पुण्य के पीछे पाप की भावना है या पाप के पीछे पुण्य की संभावना है। यह भूमिका बाँधने की जरूरत इसलिए महसूस हुई कि आजकल स्त्रियों के बारे में कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं है। आप की किस बात का क्या अर्थ ले लिया जाएगा, यह व्याकरण, निरुक्त या अर्थविज्ञान से नहीं जाना जा सकता। अमेरिकी सरकार का मनोविज्ञान यह है कि जो हमारे साथ नहीं है, वह हमारा दुश्मन है। अब स्त्रियों ने भी इसे अपना लिया है। स्त्रियों ने मतलब स्त्रीवादियों ने। वे आप से सहमत हैं या असहमत हैं, इसका कोई मोल नहीं है। मतलब की बात यह है कि आप उनसे सहमत हैं या असहमत। असहमत हैं तो आप स्त्री-विरोधी हैं।

      फेसबुक पर इतनी सारी स्त्रियों को देख कर बहुत खुशी होती है। मैं नहीं समझता कि फेसबुक और ब्लॉगिंग के अलावा कोई ऐसा मंच है जहाँ स्त्रियों की मुखरता इस परिमाण में लक्षित होती हो। फेसबुक स्त्री मुक्ति की एक खिड़की है। दूसरी खिड़कियाँ बंद हो जाएँ, तब भी यह खिड़की खुली रहती है। यह बहुत-सी स्त्रियों के लिए अपना कमरा है जो ऐसे ही अनेक कमरों से जुड़ कर एक हॉल बन जाता है। यह स्त्रियों का कोना या आधी दुनिया मार्का कोई चीज नहीं है। इस हॉल में स्त्री-पुरुष समान अधिकार से मौजूद होते हैं और आवश्यकता होने पर वाद, विवाद और संवाद तीनों करते हैं। यहाँ कोई अध्यक्ष नहीं होता, जिसकी अनुमति लेनी पड़े। बस बंदूक उठाइए और शूट कर दीजिए। यह निर्बंध लोकतंत्र पूँजीवाद ने बिना किसी के माँगे और बिना किसी शुल्क के सुलभ कर दी है। तो क्या पूँजीवाद स्त्रियों का मित्र है? माँग अब यह होनी चाहिए कि कंप्यूटर और इंटरनेट को मानव अधिकारों में शामिल किया जाए। इनके बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह गया है।

      वैसे तो स्त्रियों का कोई ऐसा गुण या अवगुण नहीं है जो पुरुषों में न पाया जाता हो। इसलिए कुछ पुरुष भी वैसा करते हैं जैसा स्त्रियाँ। लेकिन स्त्रियों में यह कुछ ज्यादा ही दिखाई पड़ता है। कुछ में तो बहुत ज्यादा। ये कुछ इसलिए रेखांकित करने की माँग करती हैं कि इनमें अधिकतर लेखक, कवि, पत्रकार, प्रोफेसर, अध्यापक, ब्लॉगर आदि शामिल हैं। इनके संदर्भ में जो चकित करनेवाली बात मुझे जान पड़ती है, वह है अपने सौंदर्य और ड्रेस सेंस का प्रदर्शन। कम सुंदर स्त्रियों को सुंदर और सुंदर स्त्रियों को अधिक सुंदर दिखने का नैसर्गिक अधिकार है, लेकिन जिस दौर में वे बार-बार पुरुषों को बता रही हैं कि हम देह मात्र नहीं हैं, उसी दौर में ये समझदार और बौद्धिक स्त्रियाँ क्यों बार-बार फेसबुक पर अपनी तसवीर बदलती रहती हैं? एक ही तसवीर या एक ही पोज से बोरियत हो सकती है दूसरों को ही नहीं, खुद को भी। लेकिन तीन-तीन, चार-चार दिन पर कभी-कभी तो रोज नए पोज या नई ड्रेस में अपने को पेश  करने के सुधीर कक्कड़ी मायने क्या हैं? कुछ स्त्रीवादियों का कहना है, हमारा मुँह मत देखो, हम जो बोल रही हैं, उसे सुनो। इसके बावजूद अगर ये घंटे-घंटे पर अपना चेहरा बदलती रहें, तो इनके बारे में क्या धारणा बनेगी?

            मुझे इस देह-प्रदर्शन पर एतराज नहीं है। किसी भी व्यक्तिगत चीज पर एतराज नहीं है। मैं तो बस अपना यह आश्चर्य प्रगट करना चाहता हूँ कि प्रगतिशील स्त्रियों के सिर्फ विचार  बदले हैं या प्रवृत्तियाँ भी। फेसबुक पर फेस को नहीं, बुक को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। 

‘जनसत्ता’ से साभार 

7 COMMENTS

  1. बिलकुल सही आकलन है।
    हर स्त्री के बारे में नहीं कहा है। पुरुषों के पास सौंदर्य नहीं है तो वे दूसरे हथकंडे अपना रहे हैं।

  2. राजकिशोर जी को लगता है, हर हफ्ते कुछ लिखने की लत लग गई है। इस बार कुछ नहीं मिला तो यह वाहियात विचार यहां फैला दिया। कोई इसे गंभीरता से भी ले रहा है क्या?

  3. देखने देखने का फर्क है । तरह तरह
    की मुद्राओं में फोटो तो हम
    भी लगाते हैं अब आपके सोचे ऐसा हम
    भी नारीवादी होने के कारण ही कर
    जाते होंगे !
    बार बार एक ही पोज में फोटो डालने वालों से चिढ मच सकती है,हमें भी हुआ करती है
    कयी बार , लेकिन इसका तार
    वैसी जगह पहुंचा देना सिवाए
    मर्दवादी गर्विताबोध के और कुछ
    नहीं, जो निश्चित रूप से 'मिसोग्नी'
    से ही पैदा होती है!

  4. शीर्षक, लेखक और जानकीपुल का नाम देखकर उम्मीदें बढ़ गयीं थीं. सोशल मीडिया पर कितना कुछ लिखा जा सकता है- किस तरह ये पुराने साथियों से मिलने का माध्यम बन रहा है, मशहूर या मशहूर होने की कोशिश में लगे लोगों को सीधे जनता से जुड़ने का मौका दे रहा है और साथ ही आभासी दुनिया को ही सबकुछ मान लेने का खतरा पैदा कर रहा है. लेकिन लेख औरतों पर आकर अटक गया. उसमें भी वही ढाक के तीन पात! स्त्री और स्त्रीवादियों की उथली निंदा करने वाला लेख बन कर रह गया. किसी भी व्यवहार को सामाजिकीकरण की प्रक्रिया के सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए न की स्त्री या पुरुष व्यवहार के एकतरफा कोण से. स्त्रियों की सुन्दरता को हमेशा से समाज में उनके अन्य गुणों से ज्यादा महत्त्व दिया गया है, यही बात उनमें सुन्दर दिखने और इसका प्रदर्शन करने की ललक पैदा करती है. लड़के ऐसा इसलिए नहीं करते क्यूंकि उन्हें पता है की उका ऐसा करना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं है, उनका मजाक बनेगा.
    समाज पूरी तरह से नहीं बदला है इसलिए सारी स्त्रियाँ भी नहीं बदली हैं. ज्यादा नहीं तो वैवाहिक विज्ञापन उठा कर देख लीजिये और बताइये की कितने लोग अपने लड़कों के लिए बौद्धिक बहू की चाहत रखते हैं? शुरुआत में ही आपने लिखा है की 'स्त्री मतलब स्त्रीवादी', बस सारी तार्किक ग़लती वहीं पर है. न ही स्त्रीवादी का मतलब सिर्फ स्त्री है और ना ही हर स्त्री स्त्रीवादी है. वैसे भी फोटो बार- बार बदलने का मतलब बुद्धिहीन होना नहीं है.
    फेसबुक पर हम सब अपनी- अपनी सामाजिक ट्रेनिंग साथ लेकर आते हैं. समाज में 'फेस' का महत्त्व 'बुक' से ज्यादा है तो फिर 'फेसबुक' इसे उलट कैसे देगा?

  5. सोशल मीडिया की वर्तमान स्थिति और इसकी उपादेयता से अनजान बनते हुए राजकिशोर जी ने इसे बेहद हल्के ढंग से लिया है…! स्त्रीवादी लेखक कहलाने वाले राजकिशोर जी को अभी थोड़ा सा मानव-मनोविज्ञान व समाज शास्त्र फिर से उलटना चाहिये..! 🙂 तकनीक की उपलब्धि पर विस्मित होने और आभारी होने के बजाय बेवजह की बात है ये…!

  6. राजकिशोर जी, मैं स्त्री होने के बावजूद आपकी इस बात से सहमत हूँ कि स्त्रियाँ अपने सौन्दर्य प्रदर्शन के लिए अधिक तत्पर रहती हैं… मैं तो सुन्दरता को कोई गुण मानती ही नहीं… परन्तु हमारे समाज ने इसे सर्वोच्च स्थान पर स्थापित कर दिया है… यही वजह है कि आज शारीरिक और मानसिक रूप से अपंग लोगों के प्रति समाज का व्यवहार बहुत ही गंदा है,क्योंकि उनका शरीर और चेहरा विकृत हो जाता है जिससे वे इनकी SO CALLED सुन्दरता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते…भले ही वो कितने ही गुणवान क्यों ना हो…

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