अखिलेश के पुरस्कृत उपन्यास ‘निर्वासन’ का अंश

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नब्बे के दशक के आखिरी वर्षों में लेखन शुरू करने वाले लेखकों के लिए अखिलेश बतौर लेखक-संपादक एक प्रतिमान की तरह रहे हैं। खुद मेरी आरंभिक रचनाओं पर अखिलेश का प्रभाव रहा है। उनकी पत्रिका ‘तद्भव’ में मेरी कई कहानियाँ उस दौर में प्रकाशित हुई। हालांकि अब अखिलेश से संवाद नहीं होता मगर उनकी रचनाओं से संवाद बना हुआ है। यह हर्ष का विषय है कि उनके उपन्यास ‘निर्वासन’ पर उनको इस वर्ष राजकमल प्रकाशन कृति सम्मान: ‘कसप’- मनोहर श्याम जोशी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है। उपन्यास पढ़कर बाद में उस पर लिखूंगा, फिलहाल उसका एक अंश पढ़कर अपने प्रिय लेखक को बधाई देना तो बनता है। चाहें तो आप भी दे सकते हैं- प्रभात रंजन। 
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सूर्यकांत घर जाने के लिए मानस बिहार परिसर के अंतिम छोर पर खड़ा था लेकिन घर पहुंचने की उसकी इच्छा नहीं हो रही थी।

चाचा के यहां उसे नींद आ गयी थी। यूं वह दिन में सोने का अभ्यस्त नहीं था लेकिन सफर की थकान थी, उससे भी अधिक दिमाग थकान से चूर था। लखनऊ से आने के इन चंद दिनों में इतने अलग अलग ढंग के लोगों, घटनाओं, भावनाओं, यादों और तनावों से वह रूबरू हुआ था कि सभी गडमड होकर एक भारी बोझ बन गया जिसका भार उसकी आत्मा और उसका शरीर ढोने में असमर्थ हो रहे थे। शायद शरीर और मन की थकान ही वजह हो, चाचा के यहां उसे गहरी नींद आ गयी थी।

सोकर उठने के बाद वह स्फूर्त और हल्का अनुभव कर रहा था। मगर जब मानस बिहार के प्रवेशद्वार जो अब लौटते समय निकासद्वार था, के समीप पहुंच गया तो उसने अपने को बहुत उदास पाया। ऐसा उसके साथ होता था : वह अगर दिन में सो जाता था तो जागने पर उदास और अकेला महसूस करने लगता था। एक शांति, सुस्ती और अवसाद का मिश्रण उसके भीतर घुल जाता था। ऐसा थोड़ी देर ही होता लेकिन होता था : किसी भी प्रकार की आसक्ति और विरक्ति से मुक्त वह उदासीनता की सत्ता के अधीन हो जाता था। इस व$क्त भी उसका यही हाल था। वह चाचा के यहां से घर प्रस्थान करने के इरादे से उठा था किंतु इस घड़ी उसका घर जाने का मन नहीं हो रहा था। उसने इसके बारे में भी विचार किया कि चाचा के पास वापस लौट जाये लेकिन इसे उसने यह सोच कर रद्द कर दिया कि चाचा के यहां बोलना पड़ेगा अथवा चाचा को सुनना पड़ेगा जबकि उसमें थोड़ी देर खामोश रहने और अकेले होने की तलब सुलग रही थी। इसका नतीजा यह था कि कुछ देर बाद वह नदी के घाट की सीढ़ियां उतर रहा था। उसने फैसला किया था कि घाट की आखिरी सीढ़ी पर बैठ कर वह पांव नदी में लटका कर का$फी देर तक बैठा रहेगा। तब तक जब तक आसमान में चांद नहीं उग जाता है। इसके बाद वह यहीं से सीधे नूपुर के यहां चला जायेगा। पर उसे धक्का पहुंचा जब नीचे उतर कर उसने देखा : सीढ़ियां खत्म हो गयीं किंतु नदी का पानी अभी दूरी पर था। अंतिम सीढ़ी से नदी तक बालू ही बालू था।

शाम दस्तक देने लगी थी। ऊपर आसमान में न जाने वह कटा हुआ चांद था कि आधा सूर्य था। एक दिशा में नदी थी दूसरी में घाट था। दोनों के बीचोबीच बालू ही बालू था जिसके बीच में सूर्यकांत खड़ा था। घाट के बायीं तर$फ मंदिर था जिसमें आरती हो रही थी और नदी से थोड़ी दूर जाकर दायीं ओर कोई शव जल रहा था। एक मल्लाह नदी के किनारे पर अपनी नाव बांध रहा था दूसरा नाव खोल कर उस पार जाने के लिए चप्पू चला रहा था। आसमान में कुछ परिन्दे कहीं से आ रहे थे या आसमान में वही परिन्दे कहीं जा रहे थे।

सूर्यकांत बालू के मध्य जहां खड़ा था वहीं बैठ गया फिर उसी जगह पर लेट गया। उसकी पीठ गर्म हुई, बालू में धूप की आंच बची थी। लेटने पर जिस पहले ख्याल ने उसके दिमाग में प्रवेश किया वह यह था : मैं बयालीस साल का हो चुका हूं। उसकी समझ में नहीं आया कि क्यों उसमें उम्र का यह ब्यौरा चमका है? यह नदी की सोहबत का कारनामा था या आसमान में उड़ते हुए परिन्दों का या लगातार सघन हो रही शाम का या जलते हुए शव या मंदिर में हो रही आरती का, या बालू से उसके पीठ के सम्पर्क की यह परिणति थी? जो भी हो, उम्र व्यतीत होने का अहसास उसमें उभरा था और सच यह था कि पहली बारअब तक के जीवन में पहली बारयह बोध इतना अकेले, इतना उज्ज्वल, इतना निष्कवच आया था कि वह अचकचा गया। शायद यही कारण रहा हो कि जहां पहले इस तरह की बातें उसमें डर, निराशा और उदासी को जन्म देती थीं वहीं आज वह अपने प्रति अद्भुत स्नेह से सराबोर हो गया था। वह जैसे $खुद अपनी ही संतान हो या अपना पिताउसने बड़े लगाव से अपना माथा सहलाया। इस स्पर्श में ऐसा नामालूम क्या करिश्मा था कि उसकी आंखें मुंद गयीं और आंसू की दो मोटी बूंदों ने दोनों पलकों की बरौनियों को गीला कर डाला। यह क्या, क्यों और कैसे हो रहा था इसका कतई एहसास नहीं था उसे। उसके साथ ऐसा कभी हुआ नहीं था। वह बयालीस साल का एक बच्चे में बदल गया था। बयालीस वर्ष की काया में एक बच्चा सांस लेने लगा था। अजूबा यहीं तक महदूद नहीं था, वह एक से बढ़ कर एक करतब दिखा रहा था : लग रहा था जैसे आ या जा रहे परिन्दों समेत आसमान बालू के बिस्तर पर लेट गया है जैसे सूर्यकांत की पीठ लेटी थी। नया और अगला खास था : सूर्यकांत को अनुभूति हुई जैसे वह जो बयालीस साल का, एक अथाह जलराशि हो जिसके किनारे पर एक नाविक अपनी नाव बांध रहा था और एक नाविक अपनी नाव खे रहा था…। इसी क्षण, यही वह क्षण था उसने सोचा : इस भूमंडल पर सब कुछ है। एक भरपूर गतिमान और जगमग दुनिया में सब कुछ, सब कोई है सि$र्फ मैं ही नहीं हूं। इसका विपर्यय भी उसमें फूटा : केवल मैं…केवल मैं हूं…और कहीं कुछ नहीं है। वह खुद को एक अदना सा बच्चा पा रहा था जो सोच रहा था : वह ही है जो शरीर पर ज़$ख्म लिये अमरत्व का अभिशाप भुगत रहा है। यहां हर कोई अपना लगता है और कोई भी नहीं जो अपना हो। उसने अपने से कहा—’मैं क्या हूं? मैं गोमती नदी के किनारे बालू पर बिछा हुआ एक निर्वासित, निष्कासित अदना। समुद्र में एक बुलबुला जो अभी अभी फूट जायेगा। वह फूट फूट कर रोने लगा। वह रो रहा था और याद करता जा रहा था कि गोसाईंगंज में एक रात मच्छरदानी के भीतर चाचा भी ऐसे ही अचानक फूट फूट कर रोये थे और तब उनका चेहरा तथा तकिया भीग गया था।

रोते रोते उसने सोचा : इस ढंग से नींद में या सपने में रोते हैं। तो क्या वह नींद अथवा सपने में रो रहा है? इस संशय के बाद आहिस्ता आहिस्ता उसकी रुलाई थमने लगी। उसने आंखें खोल दीं और रुलाई धीरे धीरे रुक गयी, गोया वह वाकई नींद में रो रहा था। फिलहाल अब जब वह चुप हुआ तो पाया : आसमान, चांद, मंदिर, शवदाह अपनी अपनी दूरी पर स्थित थे और जैसे जड़ पदार्थ होते हैं वैसे ही वे थे। वह चौंक सा गया : क्या अभी अभी जो विलक्षण अनुभव था वह मूलत: अन्य कुछ नहीं केवल उसके स्नायुतंत्र की दुर्बलता का उत्पाद था? क्या चाचा जो गोसाईंगंज में उस रात रोये थे वह भी मानसिक विक्षेप था? वह घबड़ा उठा और नदी की ओर मुंह करके पालथी मार कर इस तरह बैठा कि वह कोई तपस्वी हो जो दीर्घावधि से ध्यान लगाये बैठा है।

आखिर मैं इतने वर्षों बाद लौट कर इस शहर में क्यों आया? वह स्वयं से सम्बोधित था : मैं पांडे जी के परिवार को ढूंढ़ने आया था या अपने खो चुके परिवार को फिर से पाने? शायद दोनों ही अपने अपने ढंग से सच हों। मैंने पांडे जी के परिवार को गोसाईंगंज में कमोबेश ढूंढ़ा है लेकिन क्या मैं अपने बिछुड़े लोगों को पुन: पा सका हूं? उसमें भय की बिजली चमकी : जहां तक सुल्तानपुर में मेरे अपनों का मामला है, मुझे सब दूसरे लगते हैं। मां, पिता, भाई, बहन, दादी, चाचा से मिलती जुलती शक्ल वाले ये कोई दूसरे हैं। मेरा घर भी वह नहीं…। लेकिन कहीं मैं खुद तो नहीं इतना बदल गया हूं कि इन्हें पहचान नहीं रहा हूं…इन सबके लिए मैं अजनबी हो चुका हूं? क्या मैं बाबू मां को अपना ही वह बेटा लग रहा हूंगा? आगे सोचने की उसकी हिम्मत न हुई। अत: उसने दूसरी तरह से सोचना शुरू किया : जब मैं इतने वर्षों बाद यहां लौट रहा था तो मुझे किस चीज़ की सबसे ज़्यादा अपेक्षा थी? मैं अपने पुराने शहर में किस वरदान की तलाश में आया था? उसके माथे में खटका सा हुआ : यहां की जो चीज़ मुझे सर्वाधिक खींच रही थीपुकार रही थी, वह थीयाद।

पहले मुझे शब्द रट जाते थे किंतु मैं उनके मायने नहीं जानता था। इस कमी के कारण कभी हास्यास्पद कभी भयानक स्थितियां उत्पन्न होतीं। खैर…उम्र बढ़ने के साथ शब्द के अर्थों से भी मैं वाकिफ रहने लगा लेकिन और बाद में क्या हुआ कि कई वर्षों से मैं शब्दों और उनके अर्थ को जन्म देने वाले बिम्बों को भूल रहा हूं। अब वह मर्मान्तक समय आ पहुंचा है कि मेरे स्मृतिकोश में नाममात्र के बिम्ब बचे रह पाये हैं। केवल शब्द और शब्द और शब्द और शब्द और शब्द अपने अपने अर्थ के साथ संपूर्ण ब्रह्मांड में बस गये हैं। बिम्बों का बेरहम संहार करते हुए शब्दों का सर्वव्यापी टीला गोया स्वयं में एक हैरतअंगेज बिम्ब बन गया है। वैसे सही ढंग से अर्थ भी कहां बस उनकी छायाअर्थ की छाया अपने साथ चिपकाये हुए शब्द हर जगह कब्ज़ा किये हुए हैं। इस तरह हुआ है याद के खज़ाने का लोप। जब भी मैं लोगों से मिला वस्तुओं से रूबरू हुआ तो उन्हें उनके अर्थ नहीं, बिम्ब नहीं उनके नाम से उन्हें दिमाग में सुरक्षित रखा। मेरा दिमाग संज्ञाओं का कबाड़खाना बन चुका है। और यादें क्या हैं? बिम्ब हैं। बिम्ब ही याद बन कर हममें बस जाते हैं। बिम्बों की रुखसत का मतलब है यादों का खत्म हो जाना। कुछ दिन पहले की बात है : मुझे अकसर यह सोच कर दहशत होने लगती थी कि मेरी यादों का पिटारा गुम हो गया…। तब मेरा किसी चीज़ में मन नहीं लगता था। जि़न्दगानी फानी महसूस होने लगी थी। ये सब उसी पिटारे के खो जाने से पैदा बीमारियां थीं और इनका कोई इलाज तो हो नहीं सकता है। अत: मैंने स्वरचित उपाय किये : मैं अपने प्यारे मेफेयर रजिस्टर पर अपने बचपन के कुछ लफ्ज़ों को विस्मृति के तहखाने से निकाल कर नये रजिस्टर में लिखता और उनके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा सोचने की मशक्कत करता। इससे मुझको सचमुच फायदा हुआ। जैसे मैंने मेफेयर रजिस्टर में दर्ज किया एक भूला बिसरा ल$फ्ज़मजीरा। अब मैंने मजीरा के बारे विस्तार से सोचना शुरू किया : सबसे पहले मेरे कानों में इस वाद्ययंत्र की आवाज़ सुनायी पड़ी और फिर आंखों के भीतर मजीरा प्रकट हुआजैसे दो नन्हीं पीतल की प्यालियां या प्लेटें हों या जैसे पीतल के दो छोटे छोटे ढक्कन। उनके मिलाप से संगीत निकलता था। वैसे उनके ही मिलाप से क्यों दुनिया में हर मिलाप से कोई न कोई संगीत निर्मित होता है। बहरहाल…फिर उस मजीरे की याद से निकलीं संगीत की महफिलेंशादी ब्याह पर स्त्रियों की महफिल, कीर्तन और भजन की महफिल, मुजरे की महफिल, और और…आल्हा, ट्रेन में सूरदास का गाना…। ज़ाहिर है संगीत के बीच वे लोग भी जो संगीत में शामिल थे…। इस तरह था मेफेयर रजिस्टर में महफूज़ बिछुड़े हुए शब्दों की लिखत का प्रताप! लेकिन मैं अधिक कामयाब नहीं हो सकता था क्योंकि वहां सारा जगत तो लिपिबद्ध नहीं था और अधिकतर को मैं भूल चुका था। इतनी बुरी तरह कि उन्हें फिर से जि़न्दा करना असंभव हो गया था। मदद के लिए मैं बचपन के पार आया और पराजित हुआ : बचपन के बाद के जिन शब्दों को मैं ढूंढ़ कर लाता वे महज़ अक्षर होते जैसे पत्रहीन पेड़। बचपन की तरह यहां शब्दों के साथ बिम्बों का काफिला न था…। हालांकि उसी समय बड़ी तीव्रता से ऐसा भी महसूस हो रहा था कि अनगिनत यादें अपनी एक जनम भर जितनी लम्बी मूर्छा से बाहर निकलने के लिए फड़फड़ा रही हैं। जैसे एक विशाल जाल में असंख्य चिड़ियां कैद हों और जाल से आज़ादी के लिए उड़ान भरने के जतन कर रही हों। यह सब और विकट हो गया जब संपूर्णानंद वृहस्पति  के सौजन्य से मेरी नौकरी पर आफत आयी। उसके पहले कैंसर की बीमारी का आभासी ही सही, संकट। ऐसा लग रहा था कि जल्द ही इस दुनिया से कूच कर जाऊंगा। इसमें विचित्र बात यह कि जब भी मैं मरने की सोचता तो शव के रूप में मेरा वर्तमान चेहरा मेरी आंखों के सामने न आता। दुनिया से विदा लेने का ख्याल आने पर हाईस्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक की अपनी कोई काठी चिता पर दिखती। गौरी समझती थी कि मैं रात रात भर जाग कर इंटरनेट पर किसी नयी नौकरी के लिए सूचनाएं और संभावनाएं खोज रहा हूं। मैं निश्चय ही वह खोज रहा होता था लेकिन असल बात थी कि मैं एक मायालोक में दाखिल हो गया था। और शायद इस वक्त भी मैं नदी, रेत, चिता और मंदिर के बीच नहीं मायालोक में हूं।
प्रकाशक राजकमल प्रकाशन
सजिल्द संस्करण डिमाई आकार 
पृष्ठ संख्या: 359 | मूल्य: 600

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