डीयू का बिहार कनेक्शन और अंग्रेजी उपन्यास

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लोकप्रिय अंग्रेजी उपन्यासों का यह साल दिल्ली विश्वविद्यालय के नाम रहा. दिल्ली विश्वविद्यालय का बिहार कनेक्शन इस साल अंग्रेजी के लोकप्रिय उपन्यासों का सबसे कारगर मुहावरा रहा. रविंदर सिंह का उपन्यास ‘Your Dreams are Mine Now’(हिंदी अनुवाद: तुम्हारे सपने हुए अपने) इस श्रृंखला की आखिरी कड़ी है.

सबसे पहले आया था पंकज दुबे का उपन्यास, जो अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में था. अंग्रेजी में ‘what a looser’ जबकि हिंदी में ‘लूजर कहीं का’. यह अकेला ऐसा उपन्यास था जो एक इनसाइडर का लिखा हुआ था. इसके लेखक पंकज दुबे दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि यह उपन्यास उन लोगों को स्मृतियों के गलियारे में ले जाने में पूरी तरह सक्षम रहा जो डीयू के छात्र रहे हैं, यहाँ के होस्टल्स में रहे हैं. लेकिन जो डीयू के बाहर के लोग हैं, जो इस तरह के साहित्य का बड़ा पाठक वर्ग है शायद यह उपन्यास उनके साथ उतना कनेक्ट नहीं हो पाया. लेकिन जिस तरह से बिहार के विद्यार्थी, डीयू की पढ़ाई, प्यार-मोहब्बत का चक्कर इस उपन्यास से शुरू हुआ वह आगे इस साल की सबसे बड़ी परंपरा साबित हुई. अफ़सोस की बात है कि इस उपन्यास से डीयू कथा का एक नया दौर शुरू तो हुआ लेकिन इस उपन्यास को उस तरह ट्रेंडसेटर का दर्जा नहीं मिल पाया जिसका यह हकदार था.

बहरहाल, दिल्ली विश्वविद्यालय अपन इनसाइडर के लिए जिस तरह की है उसके बाहर वालों के लिए उसकी छवि कुछ और तरह की है. चेतन भगत ने जब बिहार से दिल्ली पढने आने वाले लड़के की कहानी को आधार बनाकर ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ उपन्यास लिखा तो मुझे लगा जैसे यह उपन्यास ‘लूजर कहीं का’ के आइडिया का ही विस्तार है. लेकिन डीयू, बिहार के बाद न्युयोर्क का एंगल जोड़कर चेतन भगत ने इस उपन्यास को 100 करोड़ क्लब की फिल्मों की तरह भरपूर मसालेदार बना दिया ताकि इसके सुपर डुपर हित होने में कोई कसर न रह जाए. इसमें कोई शक नहीं कि यह उपन्यास उन स्टीरियोटाइप्स को ही पुष्ट करता है जो डीयू न आने वाले, यहाँ न पढने वाले विद्यार्थियों के मन-मिजाज में बनी हुई है.

बाकी चेतन भगत के उपन्यास मौसमी सब्जी की तरह होते हैं खूब बिकती है, और सीजन के हिसाब से कीमत भी कम रहती है. यह उपन्यास इतना बिक चुका है कि इसके आगे पीछे के सारे फ़साने बेकार हो जाते हैं. चेतन भगत जिस विषय को उठाते हैं वह विषय बाद में उनके नाम हो जाता है. चाहे उससे पहले उस विषय को लेकर कितना ही लिखा गया हो, कहा गया हो.

इस कड़ी का तीसरा उपन्यास है ‘तुम्हारे सपने हुए अपने’. रविंदर सिंह चेतन भगत के सामने ब्रांड के रूप में बौने नजर आ सकते हैं. लेकिन अपने चौथे उपन्यास के साथ बाजार में आने वाला यह लेखक एक टिकाऊ ब्रांड है, इसमें कोई शक नहीं. नई पीढ़ी की जद्दोजहद को लेकर, उनके जीवन के तनावों को लेकर लिखे गए उनके उपन्यासों ने अपना बड़ा पाठक वर्ग बनाया है. उनके इस उपन्यास में भी बिहार-डीयू कनेक्शन है. फर्क इतना है कि इसमें पटना की एक लड़की डीयू के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में पढने आती है. वह बहुत आदर्शवादी है, सही को सही और गलत को गलत कहना चाहती है. बदलाव की लड़ाई लड़ना चाहती है, लड़ती है और अचानक….

यह उपन्यास समर्पित है देश की निर्भायाओं के नाम. जाहिर है इस उपन्यास में लड़कियों के होस्टल, प्यार मोहब्बत की कहानी को यह सोशल एंगल का नया आयाम देता है. महानगरों में अकेली रहती लड़की के जीवन-संघर्ष की तरफ इशारा करता है. यही रविंदर सिंह की ताकत भी है कि उनके उपन्यासों में मनोरंजन के साथ-साथ उचित उपदेश का मर्म भी होता है. अधिक न सही लेकिन जरुरत भर तो होता ही है.

साल भर में भले डीयू के विद्यार्थी दो सेमेस्टर की पढ़ाई करते हों लेकिन उपन्यास तीन आये. हालाँकि यह सवाल तब भी रह ही जाता है कि क्या डीयू की कोई मुकम्मल कहानी आ पाई? वहां बाहर से पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों के जीवन की कश्मकश, उनके संघर्ष में आ पाए? उपन्यास से इतनी उम्मीदें पालने का मौसम नहीं रहा. फिलहाल आप रविंदर सिंह के इस मूल अंग्रेजी उपन्यास का हिंदी अनुवाद पढ़िए. अनुवाद मेरा ही है और प्रकाशक पेंगुइन. कीमत 150 रुपये है.

प्रभात रंजन  

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