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‘अमृतसर 1919’ उपन्यास का एक अंश

हाल में ही जलियाँवाला बाग़ के निर्मम नरसंहार को केंद्र में रखकर लिखा एक उपन्यास आया है ‘अमृतसर 1919′, जिसके लेखक हैं रजनीश धवन। धवन अमृतसर के मूल निवासी हैं और कनाडा में यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़्रेज़र वैली में अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं। उनके की नाटक कनाडा में प्रदर्शित हुए हैं। उपन्यास का प्रकाशन राजपाल एंड संज प्रकाशन ने किया है। आज उसी उपन्यास का एक अंश- मॉडरेटर

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आज जो कहानी मैं आपको सुनाने वाला हूँ उस कहानी का तो कोई नायक है ही नायिका। अमृतसर शहर ही उस कहानी का नायक भी है और नायिका भी। यह कहानी शुरू होती है 29 मार्च 1919 को। अमृतसर शहर का डिप्टी कमिश्नर माइल्स अर्विंग मॉल रोड पर स्थित अपने निवास के लॉन में बैठा चाय पी रहा था। उसकी पत्नी एमिली भी उसके पास बैठी थी। रोज़ की तरह आज भी माइल्स अलेक्सेंड्रा ग्राउंड में दौड़ लगाकर आया था। वहाँ नेट प्रैक्टिस कर रहे कुछ गोरों को देखकर उसका मन हुआ था कि वो भी थोड़ी गेंदबाज़ी करे लेकिन उसके ज़िम्मेदारी के एहसास ने उसको करने से रोक दिया। अपने नियमित व्यायाम की आदत के कारण माइल्स अपनी उम्र से जवान दिखता था, हालाँकि उसकी पचास वर्ष की आयु उसकी आँखों के गिर्द पड़ी झुर्रियों में झलकने लगी थी। उसके चेहरे पर दाढ़ी थी मूँछ और उसकी भूरि आँखें किसी चीते की तरह हरदम सचेत रहती थी।

माइल्स अर्विंग की नज़र उसकी गोद में पड़े अख़बार  पर टिकी थी। अख़बार की सुर्खीगांधी द्वारा भारतव्यापी हड़ताल की तारीख़ में बदलाहवा में अभी भी बचीखचि सर्दियों की ज़रा सी ठंडक थी जो उस अंग्रेज़ दम्पति के लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। अर्विंग की नज़र रह रह कर अख़बार से हटकर कोठी के दरवाज़े की ओर जाती थी। एमिली अपने पति के हाव भाव में बेचैनी महसूस कर रही थी और वह इस बेचैनी का कारण भी जानती थी। फ़रवरी के महीने में ब्रिटिश सरकार ने रौलेट एक्ट नाम का क़ानून पास किया था और तभी से भारत के अलग अलग हिस्सों में उस क़ानून के विरुद्ध धरनेप्रदर्शन हो रहे थे। इस विरोध की आँच से अमृतसर भी अछूता नहीं था। बल्कि यूँ कहना चाहिए कि अमृतसर की गर्भ में एक दावनल दहक रहा था जिसकी तपिश को अशोक के पेड़ों से घिरा हुआ और ओस की बूँदों में नहाया हुआ डिप्टी कमिश्नर के आलीशान बंगले का लॉन भी कम नहीं कर पा रहा था।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने रोलेट ऐक्ट के विरोध में 30 मार्च को सम्पूर्ण भारत बंद का आह्वान किया था। किन्हीं कारणों के चलते कांग्रेस नेतृत्व ने हड़ताल की तारीख़ बदलकर 6 अप्रैल कर दी।

माइल्स अर्विंग ने अपना चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा, और अख़बार को उस चश्मे के ऊपर रख दिया। पतिपत्नी की आँखें मिली। अपनी 45 वर्षीय पत्नी की नीली आँखों में माइल्स को कोमलता और दृढ़ता की वही मिलीजुली झलक मिली जो अठारह वर्ष पहले उसने ‘i do’ कहने के बाद उसके चेहरे से पर्दा हटाते ही देखी थी। एमिली दुबलीपतली, शांत और संयमी स्वभाव की औरत थी और जिस फ़िज़ा में वो दोनों साँस ले रहे थे उसमें माइल्स को अपना संतुलन बनाए रखने के लिए एमिली की स्थिरता की अत्यंत आवश्यकता थी। तभी बंगले का दरवाज़ा खुला और एक शख़्स साइक्लि पर सवार होकर अंदर दाख़िल हुआ। साइकिल सवार का नाम हंसराज था और वो म्यूनिसिपल दफ़्तर में क्लर्क था। 36 वर्षीय हंसराज कांग्रेस की ज़िला इकाई का सदस्य भी था और कांग्रेस की गतिविधियों की ख़बर माइल्स अर्विंग तक पहुँचाता रहता था।

अपनी साइकिल को सलीक़े से स्टैंड पर टिकाकर हंसराज फूलों की क्यारियों के साथ साथ चलते हुए माइल्स अर्विंग के सामने पहुँचा। उसने सफ़ेद रंग की क़मीज़ और गहरे नीले रंग की पतलून पहन रखी थी। लम्बी नाक के नीचे पतली सी मूँछें थीं। अपनी छोटी छोटी आँखों में दासता का भाव लिए दोनों हाथ जोड़कर उसने माइल्स और एमिली को नमस्ते कहा और चुपचाप खड़ा हो गया। एमिली उठी और अपना चाय का कप लेकर अंदर चली गई।

क्या ख़बर लाए हो हंसराज?’ माइल्स ने पूछा।

जनाब, कांग्रेस ने हड़ताल की पूरी तैयारी कर ली है। कल पूरा अमृतसर बंद होगा।

मगर गांधी ने तो हड़ताल स्थगित कर दी है’, माइल्स कुर्सी से उठ खड़ा हो गया।फिर अमृतसर के ये मूर्ख कांग्रेसी क्यों हड़ताल करना चाहते हैं?’

केवल हड़ताल ही नहीं जनाब, कल जलियाँवाला बाग़ में एक सभा भी होगी जिसे डॉक्टर किचलू और डॉक्टर सतपाल सम्बोधित करेंगे।

हंसराज की बात सुनकर माइल्स के चेहरे पर एक अनदेखी परछाईं छा गई। उसने इशारे से हंसराज को जाने के लिए कहा और स्वयं गहन मुद्रा में कुछ सोचता हुआ बंगले के भीतर चला गया। 

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किताब का अमेजन लिंक

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