तरह–तरह के लेखक तरह-तरह के पाठक

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लेखक पाठक रिश्ते को लेकर आज राजकिशोर जी का लेख- मॉडरेटर 
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लेखक और पाठक का रिश्ता उतना सपाट नहीं होता है जितना उत्पादक और उपभोक्ता का। उत्पादक अपने मानसिक आनंद के लिए उत्पादन नहीं करता। उसका लक्ष्य उपभोक्ताओं की किसी आवश्यकता को संतुष्ट कर धन कमाना होता है। कुछ आवश्यकताएँ वास्तविक होती हैं और कुछ कृत्रिम। कृत्रिम आवश्यकताएँ विज्ञापन तथा अन्य संप्रेषण माध्यमों से पैदा की जाती हैं। ये ऐसी नई आवश्यकताएँ होती हैं जिनके बारे में उपभोक्ता कल्पना तक नहीं कर सकता था। यहाँ उत्पादक और लेखक के बीच कुछ साम्य दिखाई देता है। साहित्य के इतिहास में कई बार ऐसा होता है जब साहित्यिक प्रवृत्तियाँ रूढ़िबद्ध और पुरानी पड़ जाती हैं और अच्छी से अच्छी रचना बासी लगने लगती है। तब नई रचनाशीलता का जन्म होता है और लेखक ऐसी रचनाएँ देने लगते हैं जो एकदम नए स्वाद की होती हैं। इस नवीनता के प्रति पाठक इस तरह लपकते हैं जैसे बाजार में कोई नई मिठाई आई हो। यह समाज में एक नई अनुभूति पैदा करने का मामला है, जिसकी आवश्यकता के बारे में समाज खुद अवगत नहीं था। इस तरह की नई अनुभूतियों की रचना करते हुए लेखक अपने को भी बदलता है और अपने समाज को भी।
     सामान्यतः लेखक से यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि वह पाठकों की आवश्यकताओं को संतुष्ट करे। कोई भी लेखक, सब से पहले, अपने लिए लिखता है न कि किसी और के लिए। साहित्य या रचना के क्षेत्र में स्वांतःसुखाय का अर्थ यही है। लेकिन अपने सुख के लिए भी वही कुछ लिखा जाता है जिसकी समाज को जरूरत हो। अगर कोई लेखन समाज की किसी जरूरत को पूरा नहीं करता, तो वह लेखक की आत्म-रति है, जिसका उसे अधिकार है। हममें से कौन ऐसा है जो खाली समय में या अन्य मौकों पर कागज पर भिन्न-भिन्न प्रकार की आकृतियाँ नहीं बनाता? ये आकृतियाँ टिकाऊ नहीं होतीं, उनका निर्माता स्वयं उन्हें रद्दी की टोकरी में फेंक देता है और बाद में उन्हें याद भी नहीं करता। लेखक के लिए यह रचनात्मक स्तर पर की गई कोशिश होती है। कोई भी लेखक पता नहीं कितने ड्राफ्ट बनाता और नष्ट करता है, तब जा कर कोई ऐसी कृति बना पाता है जिससे उसे संतुष्टि होती है। लेकिन इसके अलावा भी वह शब्दों से खेलता रहता है, तुकबंदियाँ करता रहता है, जैसे किसी चित्रकार को चित्र नहीं बनाना होता, तब भी वह तरह-तरह की रेखाएँ खींचता रहता है। इसे मानव मन की एक स्वच्छंद प्रवृत्ति मानना चाहिए। अनुशासन के बाहर भी बहुत-सा जीवन होता है। कह सकते हैं कि जीवन का अपना एक अनुशासन है, जो अनुशासन के किसी भी शास्त्र में नहीं समा पाता है। यही रहस्य रचनाशीलता का भी है।
     लेकिन रचनाशीलता कोई अराजक या व्यक्तिवादी क्रिया नहीं हैं। इसे स्पष्ट करने के लिए हम गोस्वामी तुलसीदास का उदाहरण लेते हैं। तुलसीदास संस्कृत के महान विद्वान थे। उन्होंने इसके कई चमत्कृत कर देने वाले उदाहरण अपने रामचरितमानस में दिए हैं। वे चाहते तो संस्कृत में ही रचना कर अपने को वाल्मीकि, कालिदास और भवभूति की श्रेणी में लाने का प्रयास कर सकते थे। लेकिन तब उनकी रचनाओं की लोकप्रियता विद्वानों और पंडितों के बीच सीमित हो जाती। जन-जन के हृदय तक वे नहीं पहुँच सकती थीं। तुलसीदास का लक्ष्य विद्वानों के बीच प्रशंसित होना नहीं, बल्कि अपनी राम भक्ति को हृदय-हृदय तक पहुँचाना था, जिससे सरिता सम सब कर सुख होंही। यह काम संस्कृत में नहीं, अवधी में ही संभव था, जो उनके क्षेत्र की जनभाषा थी। साफ है कि अंतिम विश्लेषण में कवि का अभीप्सित समाज का ही अभीप्सित होता है। कवि में भले ही विलक्षण प्रतिभा हो, वह दूसरों से अलग दिखाई पड़ता हो, पर आखिरकार वह भी सामाजिक प्राणी होता है। कविता एकांत में रची जाती है और अधिकतर मामलों में एकांत में पढ़ी भी जाती है, पर वह समाज के वायुमंडल में ऑक्सीजन की तरह तैरती रहती है।
     इसके बावजूद, कवि अपने को छोड़ कर और किसी का गुलाम नहीं होता। उससे जो चाहे लिखवा लो, यह तानाशाही के वातावरण में संभव हो सकता है। लेकिन वह तुकबंदी होगी, रचना नहीं। असली कवि की उपमा घोड़े से दी जा सकती है, जिसे आप नदी के किनारे तो ले जा सकते हैं, पर उसका पानी पीने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। यह भी एक कारण है कि कोई भी रचनाकार तरह-तरह की चीजें लिखता है, जिनमें से कुछ, हो सकता है, पाठकों द्वारा ग्रहण न की जाएँ। निराला ने बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु जैसा मनोरम गीत भी लिखा और राम की शक्तिपूजा जैसी संस्कृति-गर्भित कविता भी लिखी। हिंदी के सिर्फ पाँच प्रतिशत पाठक ही राम की शक्तिपूजा का आनंद ले सकते हैं। जाहिर है, इन पाठकों की मनोभूमि वही होगी जो इस कविता को लिखते समय निराला की रही होगी। कहने का आशय यह है कि रचनाकार के मूड अनंत हो सकते हैं और इनमें से हर मूड का ग्रहीता कहीं न कहीं होता ही है। नहीं तो जेम्स ज्वायस की यूलिसिस जैसी महान, पर बोरिंग उपन्यास न लिखा जाता और न पढ़ा जाता। चार्ल्स डिकेंस के उपन्यासों के बहुत-से संस्करण निकल चुके हैं और अब भी हर साल नए संस्करण निकलते हैं, लेकिन ऐसा कोई समय नहीं आया जब यूलिसिस पुस्तक बाजार में उपलब्ध नहीं था।
     यह भी कहा जा सकता है कि पाठक तरह-तरह के होते हैं तो लेखक भी तरह-तरह के होते हैं। जैसे हर पाठक अपना लेखक खोज लेता है, वैसे ही हर लेखक अपना पाठक खोज लेता है। दोनों के मिलन की यह घड़ी अपूर्व आनंदमयी होती है। वस्तुतः लेखक लिखता अपने मौज में है, पर वह सिर्फ अपने लिए नहीं लिखता। पाठक तक गए बगैर कोई भी लेखन पूरा नहीं होता। जैसे नदी की सार्थकता महासागर में जा कर विलीन होने में है, वैसे ही रचना की सार्थकता पाठक के अंक में जा कर संतृप्त होने में है। इसी उम्मीद में भवभूति ने कहा था कि धरती इतनी विपुल है और काल इतना निरवधि कि कहीं न कहीं कोई न कोई पाठक ऐसा होगा ही जो मेरी रचना का आस्वाद ले सके। भवभूति शायद कुछ ज्यादा ही निराशावादी थे – उन्होंने यह देखने जितनी  लंबी उम्र नहीं पाई थी कि साहित्य जगत में उनकी प्रतिष्ठा किसी अन्य बड़े कवि से कम नहीं है।

     किसी रचना को अगर पाठक नहीं मिले, तो इसके कम से कम दो अर्थ हो सकते हैं : रचनाकार के स्तर तक कोई पहुँच नहीं पाया या फिर वह रचना ही ऐसी थी जिसका गंतव्य रद्दी की टोकरी होती है।  

2 COMMENTS

  1. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है…

  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 24 अप्रैल 2016 को लिंक की जाएगी…………… http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ….धन्यवाद!

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