मेरी क़िस्मत में मुहब्बत के सिवा सबकुछ है

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रात की बारिश के बाद सुबह सुबह रूहानी ग़ज़लें पढने को मिल जाएँ तो इससे बड़ी नेअमत और क्या हो सकती है. त्रिपुरारि कुमार शर्मा की ग़ज़लें मैं तबसे पढता रहा हूँ जब वे चिराग के तखल्लुस से लिखा करते थे. लेकिन इन गज़लों को पढ़कर लगा कि चिराग नामक अब वह लड़का रोशन हो चुका है. इतनी अच्छी बहरों(छंदों) में इतनी सहजता से उन्होंने भावों को पिरोया है कि बस वाह ही कहा जा सकता है. बहुत ताजगी का अहसास करवाती ग़ज़लें हैं. पढ़िए, अच्छी लगे तो दाद दीजियेगा- प्रभात रंजन 
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ग़ज़ल-1
चाँदनी जाम कली ख़्वाब घटा सबकुछ है
मेरी क़िस्मत में मुहब्बत के सिवा सबकुछ है

वो जो देखे तो बहारां जो न देखें तो ख़िज़ाँ
उन्हीं आँखों से तो नुक़सान नफ़ा सबकुछ है

रोशनी के लिए जो लोग तरस जाते हैं
ऐसे लोगों को तो जुगनू की सदा सबकुछ है

वो जो मौजूद है मौजूद नहीं हो कर भी
वो ही माँ दोस्त बहन भाई पिता सबकुछ है

उम्र के साथ समझ और घनी होगी जब
तुम भी इक रोज़ ये मानोगे वफ़ा सबकुछ है

चाहे मंदिर में नमाज़ें हों या मस्जिद में हवन
नेक नीयत से करोगे तो अता सबकुछ है
ग़ज़ल-2
उसने ख़ुद फ़ोन पे ये मुझसे कहा अच्छा था
दाग़-ए-बोसा वो जो कंधे पे मिला अच्छा था
प्यास के हक़ में मिरे होंठ दुआ करते थे
प्यास की चाह में जो हश्र हुआ अच्छा था
नींद बलखाती हुई आई थी नागिन की तरह
काट भी लेती अगर वो तो बड़ा अच्छा था
यूँ तो कितने की ख़ुदा आए मिरे रस्ते में
मैंने ख़ुद ही जो बनाया था ख़ुदा अच्छा था
वो जो नुक़सान की मानिंद मुझे लगता है
सच तो ये है कि वही एक नफ़ा अच्छा था
दिल की तारीक सी गलियों में तुम्हारी आहट
और आहट से जो इक फूल खिला अच्छा था
जिस्म को याद किया करती है अब रूह मिरी
और कहती है कि वो बाग़ अमा अच्छा था
लोग कहते हैं कि वो शख़्स बुरा था लेकिन
दिल तो कहता है कि वो शख़्स बड़ा अच्छा था
ग़ज़ल-3
अपनी तन्हाई के साए से लिपट कर रोए
याद आई जो तिरी ख़ुद में सिमट कर रोए

मुद्दतों बाद मुलाक़ात हुई थी सो हम
अपनी आँखें सखी आँखें में पलट कर रोए

अश्क के साथ ही जब सूख गईं आँखें भी
हम तो सूखी हुई आँखों को उलट कर रोए

जब किसी बाग़ से गुज़रे तो हुआ यूँ अक्सर
फूल के साथ उगे ख़ार से सट कर रोए

दिल जो रोता है बिना बात के हर मौक़े पर
दिल से कह दो कि मिरी राह से हट कर रोए  

आज के बाद तो रोने की इजाज़त ही नहीं
जिसको रोना है कहो आज ही डट कर रोए

ग़ज़ल-4
इस तरह रस्म मुहब्बत की अदा होती है
फूल के होंठ तले बाद-ए-सबा होती है
कहकशाओं में भटकते हुए यूँ लगता है
मेरे कानों में अज़ानों की सदा होती है
बद्दुआ कोई अगर दे तो बुरा मत मानो
बद्दुआ भी तो मिरी जान दुआ होती है
कौन पढ़ पाया है अब तक कि पढ़ेगा कोई
उसकी ज़ुल्फ़ों में जो तहरीरहवा होती है
नींद के साथ ही इक बाब नया खुलता है
ख़्वाब के टूटने जुड़ने की कथा होती है
प्यास लगती है तो महसूस हुआ करता है
ब के प्यास से ये प्यास जुदा होती है
ग़ज़ल-5
एक मुद्दत से मुहब्बत का तलबगार हूँ मैं
ग़ौर से देखिएगा आपका बीमार हूँ मैं
चंद किरदार मैं हर रोज़ जिया करता हूँ
मुझको शायर न कहो एक अदाकार हूँ मैं
एक भूले हुए नग़्मे का फ़क़त बोल हूँ मैं
एक टूटी हुई पाज़ेब की झंकार हूँ मैं
मेरी मर्ज़ी से सितारे भी उगा करते हैं
कहकशाओं के क़बीले का ही सरदार हूँ मैं
जब से गुज़रा हूँ मैं बाज़ार के इक कूचे से
ऐसा महसूस क्यूँ होता है कि बाज़ार हूँ मैं
ग़ज़ल-6
ज़ीस्त जो रक़्स सी करती है सबब रौनक़ है
तुम न होगे तो मिरी ज़ीस्त में कब रौनक़ है

वस्ल की रात के कुछ नूर बचे थे सो अब
हिज्र में उसकी बदौलत ही ग़ज़ब रौनक़ है

चाँद की ख़ुश्क सी आँखों से लहू बहता है
आसमानों में रवां ग़ौर तलब रौनक़ है

देखता हूँ तो नज़र मेरी चिपक जाती है
उसकी बीमार सी आँखों में अजब रौनक़ है

एक उम्मीद है उस अजनबी के वादे में
एक उम्मेद पे ये वादा-ए-शब रौनक़ है

उसकी आमद के बिना बुझने लगा था ये दिल
उसके आने से तहेदिल में भी अब रौनक़ है
ग़ज़ल-7
ढूँढ़ती फिरती है क़ुर्बत के बहाने क्या क्या
रात कहती है मिरे जिस्म से जाने क्या क्या

एक अनफ़ास का परदा है मुसलसल यानी
हमने ख़ुद में ही छुपाए हैं ख़ज़ाने क्या क्या

जिसको देखा ही नहीं है किसी ने दुनिया में
उसके बारे में उड़ा करते फ़साने क्या क्या

ध्यान में उसके जो इक लम्हा ठहर जाता हूँ
रूह को छू के गुज़रते हैं तराने क्या क्या

दाद देता हूँ मैं उस शख़्स के अंदाज़े का
एक ही तीर से भेदे हैं निशाने क्या क्या

मुझसे तो याद के धब्बे भी नहीं मिट पाए
देखना ये है वो आएँगे मिटाने क्या क्या
ग़ज़ल-8
भूल जाता हूँ सभी ज़ुल्म जुनूँ करते हुए
याद आते हैं कई लम्स फ़ुसूँ करते हुए
जाने किस फ़िक्र में डूबे ही रहे बाबूजी
मैंने देखा न कभी उनको सुकूँ करते हुए
क़त्ल करना है नए ख़्वाब का सो डरता हूँ
काँप जाएँ न मिरे हाथ ये ख़ूँ करते हुए
चार-छे फूल मिरे जिस्म पे भी हैं यानी
चार-छे साल हुए सोज़-ए-दरूँ करते हुए
सामने आग का दरिया हो तो पी ही जाना
सोचना कुछ भी नहीं इश्क़ में यूँ करते हुए
मेरी तक़दीर के कूचे में तिरा घर होगा
सोचता हूँ यही तक़दीर निगूँ करते हुए
ग़ज़ल-9
मैं तो सूरज हूँ भला और किधर जाऊँगा
शाम की कोख में हर शाम उतर जाऊँगा

जिस्म से मेरे कोई रात गुज़र जाएगी
रात के जिस्म से मैं भी तो गुज़र जाऊँगा

वो सितारा जो मिरे साथ चला करता है
उससे कह दो कि किसी रोज़ ठहर जाऊँगा

मेरी पलकों पे फ़क़त होंठ यूँ ही रख देना
मैं अगर मातमी लम्हों से जो भर जाऊँगा

तुम न मानोगे मिरी बात मगर सच है ये
बाद मरने के ख़लाओं में बिखर जाऊँगा

अपने होंठों को ज़रा खोलो गुलाबों की तरह
इतनी ख़ामोश रहोगी तो मैं मर जाऊँगा
ग़ज़ल-10
अश्क दर अश्क वही लोग रवां मिलते हैं
ख़्वाब की रेत पे जिस जिस के निशां मिलते हैं

मेरे दीवान के माथे पे ये किसने लिक्खा?
ख़ून में भीगे हुए लफ़्ज़ यहाँ मिलते हैं

मैंने इक शख़्स से इक बार यूँ ही पूछा था
आपकी तरह हसीं लोग कहाँ मिलते हैं

उनकी हर याद को इस तरह सम्भाला मैंने
मेरे ज़ख्मों के तो टाँके भी जवां मिलते हैं

एक मुद्दत से उसे लोग उफ़ुक़ कहते हैं
एक मुद्दत से पके जिस्म जहाँ मिलते हैं
ग़ज़ल-11
ज़िंदगानी का कोई बाब समझ लो लड़की
भूल ही जाओ मुझे ख़्वाब समझ लो लड़की
प्यार करने की है ख़्वाहिश ये मैं समझा लेकिन
तुम मिरे जिस्म के आदाब समझ लो लड़की
वस्ल की रात वो मैंने जिसे तामीर किया

3 COMMENTS

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