युवा शायर #23 वर्षा गोरछिया की नज़्में

मैं नज़्में नहीं कहती / मैं दुआएँ लिखती हूँ / दर्द की किर्चें चुनती हूँ / तेरे पैरों की उँगलियाँ सहलाती हूँ

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युवा शायर सीरीज में आज पेश है वर्षा गोरछिया की नज़्में – त्रिपुरारि ======================================================

नज़्म-1 तुम

आओ एक रात कि पहन लूँ तुम्हें
अपने तन पर लिबास की मानिंद
तुम को सीने पे रख के सो जाऊँ
आसमानी किताब की मानिंद
और तिरे हर्फ़ जान-ए-जाँ ऐसे
फिर मिरी रूह में उतर जाएँ
जैसे पैग़म्बरों के सीने पर
कोई सच्ची वही उतरती है

नज़्म-2 ख़याल तेरे

ख़याल कुछ यूँ बिलखते हैं सीने में
जैसे गुनाह पिघलते हों
जैसे लफ़्ज़ चटकते हों
जैसे रूहें बिछड़ती हों
जैसे लाशें फंफनाती हों
जैसे लम्स खुरदुरे हों
जैसे लब दरदरे हों
जैसे कोई बदन कतरता हो
जैसे कोई समन कचरता हो
ख़याल तेरे कुछ यूँ बिलखते हैं सीने में

नज़्म-3 आवाज़

तुम्हारी ज़बाँ से गिरा
एक शोख़ लफ़्ज़
बारिश
यूँ लगा कि मुझे छू गया हो जैसे
खिड़की के बाहर बूंदों की टिपटिपाहट
कानों से होती हुई धड़कन तक आ पहूँची
एक संगीत एक राग था
दोनों में
पत्तों पर पानी की बूँदें यूँ लगी मानो
तुम ने चमकती सी कुछ ख़्वाहिशें रखी हों
गीली गीली यादों की कुछ फूहारें
सफ़ेद झीने पर्दों से आती ठंडी हवा
दूर तक फैले हुए देवदार के दरख़्त
और उन की नौ-उम्र टहनियाँ की सरगोशियाँ
पैरों की उँगलियों में गुदगुदी कर गई
सुनो ना
मैं कसमसा जाती हूँ
यूँ न मेरा नाम लिया करो

नज़्म-4 कार्बन-पेपर

सुनो न
कहीं से कोई
कार्बन-पेपर ले आओ
ख़ूबसूरत उस वक़्त की
कुछ नक़लें निकालें
कितनी पर्चियों में
जीते हैं हम
लम्हों की बेश-कीमती
रसीदें भी तो हैं
कुछ तो हिसाब
रखें उन का
क़िस्मत
पक्की पर्ची तो
रख लेगी ज़िंदगी की
कुछ कच्ची पर्चियाँ
हमारे पास भी तो होंगी
कुछ नक़लें
कुछ रसीदें
लिखाइयाँ कुछ
मुट्ठियों में हो
तो तसल्ली रहती है
सुनो न
कहीं से कोई
कार्बन-पेपर ले आओ

नज़्म-5 चूड़ियाँ

जानते हो तुम
मुझे चूड़ियाँ पसंद हैं
लाल नीली हरी पीली
हर रंग की चूड़ियाँ
जहाँ भी देखती हूँ चूड़ियों से भरी रेड़ी
जी चाहता है तुम सारी ख़रीद दो मुझे
मगर तुम नहीं होते
ना मेरे साथ ना मेरे पास
ख़ुद ही ख़रीद लेती हूँ नाम से तुम्हारे
पहनती हूँ छनकाती हूँ उन्हें
बहुत अच्छी लगती है हाथों में मेरे
कहते रहते हो तुम
चुपके से कानों में मेरे
जानते हो तुम
मुझे चूड़ियाँ पसंद हैं

नज़्म-6 दुआ

मैं नज़्में नहीं कहती
मैं दुआएँ लिखती हूँ
दर्द की किर्चें चुनती हूँ
तेरे पैरों की उँगलियाँ सहलाती हूँ
माथे से भौं के बीच
एक चाँद तेरे नाम करती हूँ
होंठों पे अटके काँच के टुकड़े चूम कर
ख़्वाहिश कहती हूँ
तेरे बाएँ हिस्से पे हाथ रखकर
कुछ सनसनाहट अपनी नसों में भरती हूँ
और उँगली से आसमान पर
मैं तेरे लिए दुआएँ लिखती हूँ

नज़्म-7 काशी

गंगा की छाती पर
सर रख कर नई
कुछ देर
जकड़े बनारस के
बूढ़े नाख़ूनों और झुर्रियों ने
चिपचिपाती चमड़ी वाले हाथों को
छू कर यूँ लगा कि तुम वही हो जो मैं हूँ
और ये मेरी जगह है
मैं हूँ मनिकरनिका
और तुम मेरे काशी
ये जो गंगा है ना
इसी में बहते बहते हम एक किनारे
मिले थे कभी
और हमेशा के लिए एक हो गए
ये गंगा ही साक्षी है
गंगा ही रिश्ता
यही प्रेम भी
सूत्र भी ये है
हम गंगा के कंकर
गंगा की औलाद
और इसी में मोह
मोक्ष भी इसी में
मैं मनिकरनिका
तुम मेरे काशी

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