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प्रियंका ओम की कहानी ‘धूमिल दोपहर’

आज पढ़िए युवा आप्रवासी लेखिका प्रियंका ओम की कहानी। यह कहानी किसी गुमनाम सी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। मुझे लगा कि इसे अधिक लोगों तक पहुँचाना चाहिए-
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कभी-कभी देर तक सोना चाहती हूँ, इतनी देर तक कि जैसे कोई सुबह नहीं हो। सोते हुए मैं अपनी उस कहानी को पूरा करना चाहती हूँ जो वर्षों से अधलिखी पड़ी है। अधूरी कहानी। अधूरे प्रेम की अधलिखी कहानी।
मैं उस प्रेम कहानी को क्यूँ पूरा करना चाहती हूँ? जब स्वयं प्रेम आधा है।
आधा प्रेम, अधूरा प्रेम। बहुत गौर करने पर भी प्रेम के सम्पूर्ण होने की तस्दीक नहीं मिलती।
कहीं पढ़ा था मैंने “अधूरेपन में अनिवर्चनीय सौन्दर्य निहित होता है। सम्पूर्णता में निश्चिन्तता और निश्चिन्तता में नीरसता।अधूरापन अपने आप में विमूढ़ खिंचाव छुपाये रखता है।अधूरेपन का आकर्षण पुकारता है|मुझे मेरा अधूरा प्रेम पुकार रहा था।
वही है शायद। मेरे संदेह को हल्के नीले रंग के यूनिफार्म पर बायें सीने पर एक हुक से लटकते उसके नेम टैब ने पुख़्ता कर दिया। ’’सच, दुनिया कितनी छोटी है ”अजाने ही मुँह से निकला था” जैसे फिसलन पर कदम |
‘दुनिया छोटी भी है और गोल भी” दुबारा मिलना तय होता है’’ उसने डेस्कटॉप पर मेरी फाइल में नज़रें गराये ही कहा!
पिछली दफा प्रेमिल छणों के दौरान मेरी पीठ पर उग आये नवेले तिल को चूमते हुए अश्विन ने कहा था ”स्याह गेसुओं में चांदी के तार और चेहरे पर महीन सलवटों के अतिरिक्त मुझमें कुछ खास बदलाव नहीं आया है।” उसने भी मुझे पहचान लिया।
‘’तुम इंतज़ार में थे?’’ यह एक गैर जरूरी प्रश्न मुँह से बिन प्रयत्न ही निकल आया।
‘’नहीं, समय का पहिया माक़ूल मोड़ की ताक में था।’’ उसने ठहरे हुए स्वर में कहा।
मैं मोबाइल स्क्रीन को छू वॉलपेपर में लगे फ़ैमिली पिक्चर को देखती हूँ। फिर बिना निगाह उठाये ही पूछती हूँ “और जो कभी बिना बिछड़े ही मिल जाते हैं?”
“बिछड़े हुए ही मिलते हैं।” उसने मेरी ओर देखते हुए दृढ़ता से कहा।
मेरे चेहरे पर एक बेअर्थ मुस्कान तिर आई।
मैं आश्विन से कब बिछड़ी थी? मेरे भीतर अचरज का एक अदृश्य द्वार खुलता है।
सहन से माँ की आवाज़ आती है “पति दरअसल पिछले जन्म के बिछड़े प्रेमी होते हैं।”
“और प्रेयस?” मैं उत्कंठा से भर गई।
‘’स्त्री का प्रेयस उसका पति होता है।’’ माँ ने मुंसिफी से कहा।
माँ की बातें जहन से झटक मैंने उसे विदा कहा किंतु जिसे मैं विदा समझ रही थी, वह एक नई शुरुआत थी। अधूरे प्रेम के सम्पूर्ण होने की इब्दिता !
घर लौटते हुए एक-दो मर्तबा उसके कार्ड को उलट-पुलट कर देखा। कार्ड पर अंकित उसका नाम, ईमेल एड्रेस और फ़ोन नंबर। हैंडबैग के सबसे अंदरूनी खोह में कई तरह के बेहद गैर जरूरी पुर्जों के साथ रख दिया। इस खोह को मैं कभी कभार ही तलाशती हूँ। छुट्टे पैसे रखने वाले बटुवे में रख मैं बार-बार उस तक पहुँचने वाले कार्ड तक नहीं पहुँचना चाहती थी लेकिन घर पहुँचते-पहुँचते हाथ स्वतः ही कई दफा उस भीतरी खोह में चले गए। कभी मात्र छूकर निकल आये तो कभी अंदाजन ठीक बीच में उसके नाम को सहला कर।
क्या ही कोमल और शीतल, बेहद सुगंधित नाम | मलय | जैसे अगर का पसारा !
मलय मेरा पूर्व प्रेयस है। प्रेयस होने से पहले पड़ोसी था। समान वय के पड़ोसी लड़के से प्रेम हो जाना इतना ही सरल और सुविधाजनक था जितना धरती पर गिरी शेफाली चुन लेना।लेकिन सभी शेफालियाँ चुनी नहीं जाती, बहुत सारी वहीं गिरी रह जाती है और फिर दोपहर ढले मुरझा गल जाती हैं। मेरा प्रेम भी नही चुना गया, जल्द ही मुर्झाकर गल गया !
 
तीन वर्ष पूर्व भेंट से पहले वह मेरे ज़हन में नहीं था। किंचित भी नहीं। मैं उसके मुताल्लिक तमाम बातें भूल चुकी थी, जैसे मेह बरसाती गर्मी में जाड़े की ठण्ड भूल जाते हैं मैं उसे वैसे ही भूल गई थी और यह भी भूल गई थी कि उन दिनों रातें उनींदी आँखों का काजल हुआ करती थी और शामें उमस भरी दोपहर का करवट !
 
एक दोपहर हाथ में चाय का कप थामे मैं उसके बारे में सोचती हूँ, बीते प्रेम के बारे में सोचती हूँ जो अधूरी रह गई थी।
 
‘’हलो’’ एक शालीन पुकार पर चौंकते हुए मैं वर्तमान में आ गई। सामने की बालकनी में उत्तर की प्रतीक्षा में खड़ा श्वेत लड़का मुस्कुरा रहा है। मुस्कुराते हुए इसके पतले गुलाबी होंठ सुकृत ढंग से फ़ैल जाते हैं जो बरबस ही आकृष्ट करते हैं | शुरुआत में इस कंजी आँखों वाले लड़के के प्रति मेरे मन में गहरी खिन्नता थी, मैं इसके हेलो का जवाब यूँ देती मानो बहुत जरूरी हो काम अन्यथा बेशऊर मान ली जाऊँगी | कुछ महीनों पहले खाली पड़े घर में पड़ोसी आया है। मेरे किचन की बालकनी से इसका किचन दिखता है और इसकी बालकनी से मेरा किचन। ऐसा कभी कभी ही होता है कि हम दोनों अपनी-अपनी बालकनी में एक दूसरे के सामने खड़े होते हैं। जैसे अभी।
 
इस लड़के से पहले एक अफ़्रीकी स्त्री रहा करती थी।लिफ्ट में हुई पहली औपचारिक मुलाकात पर उन्होंने अपना नाम जोला बताया। उम्र में लगभग दो दहाई से अधिक फासलों के बावजूद जोला से मेरी पहचान बालकनी के मध्य मित्रता से प्रगाढ़ता में तब्दील हो आई थी। जोला के बाल रुई के फाहों से सफ़ेद थे और आँखे लालटेन के दिये सी पीली। बायीं हाथ की पहली दो ऊँगली के बीच हमेशा ही जलती हुई सिगरेट फंसी रहती और देह से सुर्ख बू आती |
 
जोला को प्रेम की विडम्बनाओं का खास तज़ुर्बा था। उन्हें यकीन था उनका जन्म मात्र प्रेम की पड़ताल के लिए ही हुआ है। व्यस्त सप्ताहों की तमाम दोपहर अपने प्रेमिल अनुभवों को मुझसे सन की रस्सियों की तरह बांटा करती, प्रथम मैं एक ऐसे पुरुष के प्रेम में पड़ गई थी जो प्रेम की अनुभूतियों से बेहद अनजान था, किन्तु उसका मन कोमल और निर्मल था | वह मेरे प्रेम का प्रतिकार न हो सका कहते हुए जोला नामालूम सी बेचैनी से अपनी उँगलियाँ चटकाती |
 
“मन सा बेगैरत कोई दूजा नहीं, अप्राप्त को ही चाहता है”!
बाद के वर्षों में ज़ोला ने अनेक पुरुषों से प्रेम किया और वे सभी अलग-अलग तरह के पुरुष थे। हालांकि अब जोला को उनके नाम तक याद नहीं और यह भी याद नहीं कि कितने दिन कितने वर्ष उनके प्रेम में रही। जोला अपने जीवन में आये उन तमाम पुरुषो के किस्से सुनाती जिनसे उन्हें कभी प्रेम हुआ था।
एक बार वह दो भिन्न पुरुषों से एक साथ एक समान से प्रेम करने लगी थी |
 
एक साथ दो भिन्न पुरुषो से समान प्रेम? मैं विस्मय के खोह में रास्ता भटक जाती हूँ।
 
“हाँ, वे दिन मुश्किलों भरे थे।” फिर बायीं आँख दबा किसी गूढ़ रहस्य से पर्दा हटाते हुए कहा “वे मेरी सहेली के पिता और भाई थे” |
वर्षों उपरान्त उनकी जिंदगी एक धूमिल दोपहर थी और विवाह ऊब से भरी हुई आदत। उनके भीतर अपने वर्तमान और आने वाले कल के लिए कोई उत्तेजना शेष नहीं बची थी। ऐन उन्हीं दिनों वह स्वयं से आधी उम्र के लड़के के प्रेम में पड़ गई। उनके कमरे की दीवारों पर हरी घास उग आई थी, फर्श पर आसमान उतर आया था। कुछ नायाब सितारे चुन अपने स्कार्फ में टांक वह इतराती, उन दिनों बरसाती नदी में कागज की नाव की तरह बहा करती !
 
कौतुक बियाबान के अन्धकार सा सघन हो आया “भिन्न उम्र में चाहना का बितान भिन्न होता है।“ मैंने जिरह किया था |
 
‘’हाँ, किन्तु किसी भी उम्र में प्रेम मनुष्य को निष्कपट और निश्छल बना देता है।’’जोला ने हँसते हुए कहा फिर यकायक संजीदा हो गई “बाद ताउम्र तलाशने के प्रथम प्रेम से खाली मन प्यासा ही रहता है” फिर मुझे गहरी नजरो से देखते हुए कहा “तुम्हारे चेहरे पर आकुलता की मोहरें छपी हैं, तमाम स्त्रियों के जैसे तुम्हें भी प्रेम की खोज है।
 
‘’मैं प्रेम में हूँ।’’ मैंने विवाह पर प्रेम की मुहर लगाते हुए कहा।
 
‘’विवाह प्रेम नहीं; आदत है।’’ उन्होंने अनहद निराशा के साथ कहा। मैं बेपरवाही से चाय के बड़े-बड़े घूँट गटकती रही थी।
 
अनभिज्ञता के स्वांग में स्त्रियों से दक्ष भला और कौन हो सकता है और इस स्वांग को कुशलतापूर्वक समझते हुए दूसरी स्त्री अनभिज्ञता का स्वांग करती है!
 
जोला के आने से पहले मैं विरक्त रहा करती, अक्सर दुआ में इस खाली घर में कोई भारतीय परिवार रहने आ जाए मांगती और यह भी मांगती कि उस परिवार की स्त्री मुझ जैसी चाय-पिपासु हो, जिससे दोपहर के वक़्त अपनी-अपनी बालकनी में खड़े हो चाय पीते हुए दुनिया-जहान की बातें भी की जा सके और खाने की रेसिपी भी साझा भी |
 
जोला प्रेम-रहस्यों की पड़ताल के अतिरिक्त बेकिंग में बेहद कुशल थी। बहुत दिनों तक किसी निर्जन एकांत में कैफ़े खोलना उनका सपना रहा था, जहाँ वह अदीस अबाबा के आला कॉफ़ी के साथ साथ मिचेलिन गार्लिक ब्रेड सर्व करना चाहती थी। किन्तु खानाबदोशी की आदत से कैफ़े का शौक तजना पड़ा। अब वह एक वृद्धा आश्रम खोलना चाहती हैं, जहाँ रात के खाने में मेरे सिखाये मूंग दाल की खिचड़ी के साथ इटालियन मैश पोटैटो सर्व करना चाहेंगी !
 
बालकनी में खड़े फिरंगी लड़के ने पूछा “ कैसी हो?’
‘’दुरुस्त, तुम कैसे हो?’’
 
‘’कुछ दिन पहले तक ठीक नहीं था, अब बिल्कुल ठीक हूँ।’’
 
दरअसल मुझे पूछना चाहिए “तुम्हें क्या हुआ था?’’ किन्तु घनिष्टता बढ़ जाने से भय से पूछा “तुम क्या करते हो?’’
 
‘’मैं इंटरनेशनल स्कूल में फ्रेंच पढाता हूँ।’’
 
‘’माफ़ करना, लेकिन फ्रेंच मुझे हास्यप्रद लगता है। ज़ोला आंटी ने फ्रेंच सीखाने की कोशिश की थी लेकिन सप्ताह के नाम लोंदी (सोमवार) मार्डी (मंगलवार) सीखते हुए मुझे हंसी आ जाती थी।’’ कहते हुए मैं बेलौस हंस पड़ी।
 
“हँसते हुए तुम बेहद आकर्षक लगती हो” लड़के ने निर्निमेष देखते हुए कहा।
 
जोला आंटी ने कहा था “तरुण पुरुषों को बेलौस हंसने वाली पक्व स्त्रियाँ लुभाती है।”
मैं कई देर तक उसे देखती रही।
उसने कहा ‘’मेरी सहयोगी एक गंभीर स्त्री है, यद्यपि उसकी आँखे हलके नीले रंग की और बाल भूरे हैं। वह पतली और छरहरी है और बेहद धीमी आवाज़ में बात करती है। पिछले दिनों मेरी रुग्णता के दौरान मेरा बेहद खयाल रखते उसने हुए मुझे चूमने का प्रयत्न किया। तिस पर भी मैं कोई खिंचाव महसूस नहीं करता’’ फिर कुछ क्षण रूककर ‘’उसके ब्रा की हुक खोलते तक मैं बेहद सामान्य रहा” ।
मैंने देखा, यह बताते हुए भी वह बेहद सामान्य रहा। वह कह रहा था, ‘’उसकी देह के भीतर मेरी देह के प्रवेश कर चुकने के बाद भी मेरे मन के भीतर उसका प्रवेश हठात वर्जित रहा। दरअसल मेरा मन हाई स्कूल की सहपाठी, काले केशों वाली एक एशियन लड़की के बेलौस कहकहों की स्वर ध्वनियों में कैद है।’’ कहते हुए उसके लफ्जों की वर्णमालाएं स्वर लहरियों में बदल गई।
मैंने देखा, मेरे हाथ ख़तम हो चुकी चाय की प्याली है और उसके हाथ पार दिखने वाले कप में कॉफ़ी। आधी कप कॉफ़ी। मैं फिर से आधे के सम्मोहन में कूद पड़ती हूँ !
हैंगर से लटकी सभी रंगों की साड़ियाँ, अधिकाँश पीले रंग की | आश्विन को मैं पीले रंग में लुभाती हूँ |
मलय को कौन सी भायेगी ? मन पशोपेश में था।
अमूमन पुरुषों को नीला रंग अधिक भाता है। शायद उसे भी। हाँ, शायद। मैं उसे ठीक से नहीं जानती। यह भी नहीं कि उसे कौन सा रंग पसंद है |
ज़ोला आंटी ने कहा था, प्रेम में यह जरुरी है कि कुछ रहस्य बना रहे। सबकुछ जान चुकने के बाद प्रेम अपनी जुम्बिश खो देता है।
 
आज पहला सेशन था।
‘’बीते कई महीनों से मेरे साथ विचित्र घटनाओं की पुनरावृत्ति हो रही है। मैं बेहद बेचैन रहती हूँ |
 
‘’कैसी घटनाएं?’’ मलय ने पूछा।
 
उस लड़की को देखते ही मेरे भीतर उदासी की सिल्लियाँ टूटने लगती है |
 
‘’किस लड़की को?’’
 
‘’वो घर के कामों में मेरा हाथ बँटाती है, पहले के वर्षों में उसकी माँ किया करती थी। लड़की ने कहा, उसकी नई-नई शादी हुई है लेकिन उसके चेहरे पर उमंग की लहक नहीं है ।’’
 
‘’तुमने पूछा नहीं वह खुश क्यूँ नहीं है?’’
 
‘’मैंने पूछना जरूरी नहीं समझा |”
 
‘’तुम्हें आइसक्रीम पसंद है?’’
 
‘’आइसक्रीम तो बच्चे खाते हैं।
 
‘’तुम्हारे घर के रास्ते में जुलाटो पार्लर है, आज रुक जाना |
 
जुलाटो के काउंटर पर मैं देर तक असमंजस में रही, क्या आर्डर करूँ? खिदमतगार उम्मीद से देख रहे थे। जब बहुत देर तक कुछ समझ नहीं आया तो तिरामिशु मंगा लिया ।
 
दरवाजे के पास वाली टेबल पर वह स्त्री मेरी ही उम्र की रही होगी, जिसका साथी उसे अपने हाथों से खिला रहा था और दूर कोने वाली टेबल पर मेरे बेटे की उम्र का वह लड़का साथी लड़की के होंठो पर लगी आइसक्रीम अपनी जीभ से साफ़ कर रहा था। मेरे बेटे की आवाज़ अचानक भारी हो आई है और उपरी होंठों पर पर रोयें नुमायाँ होने लगे हैं। मैं मोबाइल में उसकी तस्वीर देखने लगी, ठीक मुझपर गया है। आजकल उसके कमरे का दरवाजा ज्यादातर बंद रहता है | आश्विन ने पुछा प्रेम में हो?,तो उसने साफ़ मना कर दिया !
 
वो मेरे घर के सामने वाली सड़क के पार वाले अपार्टमेंट की चौदहवीं मंजिल पर रहती है। मेरे बेडरूम की बालकनी और उसके कमरे की खिड़की आमने-सामने खुलती है। सुबह के जिस वक़्त मैं चाय के साथ सिगरेट फूंकती रहती हूँ उसी वक़्त वह चाय पीती होती है।
 
मैं उसे देख मुस्कुराती हूँ, लेकिन वह मुँह फेर लेती है|”
 
‘’उसकी चाय फीकी रहा करती होगी।’’ मलय ने फ़ौरन से कहा |
 
मलय के साथ यह तीसरा सेशन था।उसने कहा, आज के लिए इतना काफी है। जब मैं दरवाजे के पास पहुँची तब उसने पुछा “क्या मैं तुम्हें फ़ोन कर सकता हूँ?”
 
मैंने पलट कर देखा, फिर हाँ कहा और मुड़ गई।
“प्रथम प्रेम मन के आँगन में उगा अकौना का पौधा है” मैं बालकनी में खड़े फिरंगी लड़के से कह बुझे मन से मुड़ने को होती हूँ फिर उसकी आवाज़ पर ठिठक जाती हूँ “तुम मुझे उसकी याद दिलाती हो।“
“तुम्हारी याद आती रही थी” मलय ने कहा तो मैं मुँह फेर बायीं ओर देखने लगी थी | दीवार पर एक पेंटिंग टंगी है। ब्लैक कैनवास पर नीले आर्किड के फूलगुच्छे खिले हैं और नीचे कोने में हस्ताक्षर, लिखावट नीले रंग की है। मैं वह बेहद अस्पष्ट लिखा नाम पढ़ने की कोशिश करती हूँ।
मेरी नजरों की उलझन समझ उसने झिझकते हुए कहा “निशा, मेरी पत्नी ने बनाया है। उसे पेंटिंग करना पसंद है।
‘’क्या तुम अब भी कवितायें लिखती हो?’’
 
‘’नहीं।’’
 
‘’क्यों?’’
 
‘’अब ढब नहीं ढलती।’’
 
उन दिनों मैं कवितायें लिखती थी, मलय के सोलहवें जन्मदिन पर मैंने उसे एक कविता भेंट की। वह खूब हँसा था और कहा, कविता लिखना फजूल काम है। मैंने अपनी कविताओं की डायरी जला दी।
 
“मै निशा की पेंटिंग में तुम्हारी कवितायें पढता हूँ” जब मैं उससे पहली दफा मिला मुझे लगा वह तुम हो मलय ने चाय में चम्मच से शक्कर घोलते हुए कहा!
 
आज छठा सेशन था।
 
कल शाम मैं रोना चाहती थी। कोई कारण भी नहीं था फिर भी, और मैं रो भी नहीं पा रही थी, फिर तुम्हारी दी हुई टेबलेट्स खाकर सो गई। सुबह उठी तो तकिया भीगा था।
 
‘’सपने में क्या गुजरा?’’
 
‘’ठीक से याद नहीं, लेकिन किसी धुप्प अंधे बियाबान में रास्ता भटक गई थी और मेरे साथ कोई नहीं था।’’
 
‘’मैं हूँ तुम्हारे साथ।’’ मलय ने मेरा हाथ थाम लिया था।
 
मैंने हाथ छुड़ा लिया था।मुझे अश्विन की याद आ रही है।मैं घर जाती हूँ !
 
फ़ोन पर अश्विन ने पूछा, सेशन कैसा रहा?
मैं डॉक्टर को जानती हूँ। वह पड़ोस में रहता था। कभी बात नहीं हुई थी।
अब बातें करना “चुप रहना मरज है, बोलना इलाज़ नहीं है, सच बोलना शिफा है।’’
मैंने घबरा कर फ़ोन रख दिया, सच बोलना शिफा है। कई देर तक यह वाक्य प्रतिध्वनित होती रही, मन में। जहन में| आत्मा के भीतर प्रकोष्ठ में और मैं सिगरेट पर सिगरेट फूंकती रही !
 
“मेरी चाय में शक्कर नहीं होता” फिरंगी लड़के से कह मैं भीतर चली आई!
 
मेरी उठती गर्दन पर उकेरित टैटू, दो पंखों वाली उड़ती नन्ही परी को अपने अंगूठे से सहलाते हुए मलय ने कहा अब तुम बिलकुल ठीक हो और कवितायें लिखना फिजूल काम नहीं है ”अपने पंख फैलाओ, जी भर उड़ो, आकाश तुम्हारा है।’’
 
अब कैसा महसूस करती हो ? फ़ोन पर आश्विन ने पुछा |
‘’मैं डॉक्टर से प्रेम करती थी।’’
‘’अब भी करती हो?’’
’नहीं |”, कहते हुए मैं अपनी उँगलियाँ चटका रही थी।
‘’वापस कब आओगी?”
‘’कल।’’
एयरपोर्ट पर अश्विन मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।
‘’पूछोगे नहीं, कैसी हूँ?’’
 
‘’नहीं।’’
 
‘’क्यूँ?’’
 
‘’महबूब की चाह जोंक की तरह होती है, रेंग कर कहीं भी पहुँच जाती है। जब तुम थक कर सो रही थी तब मैं ठीक तुम्हारे सिरहाने बैठा तुम्हारे बालों में उँगलियाँ घुमा रहा था।’’
 
‘’तो बताओ, उस वक़्त मेरे सपने में क्या चल रहा था?’’
 
‘’एक लड़की साबुन वाले पानी के बुलबुले उड़ा रही थी और दूर खड़ा एक लड़का उसे मोहब्बत से तक रहा था।’’
 
मैं आश्विन को ताक रही थी |
 
‘’तुम कुछ पियोगी?’’
 
‘’हाँ, समय को चाय में घोल कर ले आओ।’’
 
घर का दरवाजा खोलते ही आश्विन ने कहा ‘’तुम्हारे लिए एक चिट्ठी आई है” और एक लिफाफा मेरी ओर बढ़ा दिया |
ज़ोला आंटी ने लिखा था “शादी में प्रेम न होने की बात झूठी है।“
वह लड़की चाय पीते हुए मुझे देख मुस्कुराती है। कभी कभी मैं उससे मिलने जाती हूँ, उम्मीद है एक दिन पहिये वाली कुर्सी से उतर वह चलने लगेगी | सहायिका व्हाट्स अप्प उमंग से भरी हुई तस्वीरें भेजती है। मैं अक्सर अश्विन के साथ आइसक्रीम खाने जाती हूँ। बेटे ने कहा, वह प्रेम में हैं। अब उसके कमरे का दरवाजा बंद नहीं होता !
 
 
      

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2 comments

  1. बहुत सुंदर कहानी है प्रभात जी. नई भाषा और कहन का नया अंदाज. जानकीपुल और प्रियंका जी को बधाई.

  2. मैंने पहले भी प्रियंका ओम जी की कोई ख़ूबसूरत कहानी पढ़ी थी। मुझे नाम या शीर्षक याद नहीं रहते। ये कहानी भी उसी कहानी की तरह ख़ूबसूरत है लेकिन कुछ ख़लत-मलत गड-मड जैसा लगा। जो शायद पिछली कहानी जो मैंने पढी थी उसमें सबकुछ साफ़-साफ़ और स्पष्ट था। विदेश में रहते हुए महिलाओं के पास समय प्रयाप्त होता है जिसका इस्तेमाल प्रियंका ओम जी एक ख़ूबसूरत काम में इस्तेमाल कर रही हैं मतलब साहित्य साधना कर रही हैं।

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