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मंटो के जीवन और लेखन पर बनी फिल्म ‘मुफ्तनोश’ के 60 साल

सैयद एस. तौहीद फिल्मों के बारे में एक से एक जानकारी खोज निकालते हैं. मंटो के जन्म के महीने में ‘मुफ्तनोश’ नामक एक फिल्म के बारे में उन्होंने लिखा है जिसमें मंटो के जीवन को आधार बनाया गया है. बहुत दिलचस्प. आप भी पढ़िए- मॉडरेटर 
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मुफ़्तनोशी की तेरह किस्मेपहली मर्तबा सन 1954 के आसपास साया हुआ. उस ज़माने में आप अलीगढ़ मे तालीम ले रहे थे. मंटो का यह लेख उनके साहित्यिक संग्रह तल्ख,तर्श और शीरीका अहम हिस्सा बना. युवा फिल्मकार आसिम बिन क़मर की चर्चित पेशकश मुफ़्तनोशमंटो के इसी रचना पर आधारित है. मंटो ने मुफ़्त की चीजों का इस्तेमाल करने वाले लोगों का ज़िक्र दूसरे जंग -ए -अजीम यानी विश्वयुध्द संदर्भ में किया था. क़मर आसिम ने फिल्म को मंटो का आत्मकथात्मक स्वरूप देकर रुचिकर बना दिया है. मूल रचना की भावना में बदलाव नहीँ किया. प्रस्तुति का स्वरूप फिल्म की खासियत बनी है. फिल्मकार ने हालांकि मंटो की बताई मुफ़्तनोशी की किस्मों में बदलाव कर रचनात्मक दृष्टि का संकेत दिया है. यहां मंटो की बताई किस्मों में आप थोड़ा बदलाव देखेंगे. पटकथा व दृश्य संयोजन पर मेहनत नज़र आती है. शेरों के दिलचस्प इस्तेमाल ने कथन की तरफ़ रुझान बढ़ा दिया. चूंकि फ़िल्म मे डायलाग्स नहीँ इसलिए नैरेशन काफ़ी महत्वपूर्ण एंगल थाजिसे आशिष पालीवाल ने बड़ी खूबसूरती से निभा दिया.

मंटो बताते हैं कि दूसरी जंग -ए -अजीम के वक्त रोज़मर्रा के इस्तेमाल कि चीज़ों को हुकूमत ने युरोप के लड़ाई वली इलाकों की तरफ़ मोड़ दिया. जिसकी वजह  से मुल्क में  चीज़ों की कमी होने लगी. यहां तक कि सिगरेट जैसी मामूली चीज़ भी ब्लेक में ही मिलने लगी. इस तंगी की चपेट में सबसे ज्यादा शायर,फनकार और उनके समान संघर्षरत लेखक आ गए. यहां तो बगैर  ही दो कश लगाए कलम से अल्फाज ही नहीँ निकलते. ऐसे हालात में कुछ लोगों ने अपनी इज्ज्त ताक पे रख मुफ़्तनोशीका नया रास्ता तलाश लिया. अर्थात मुफ़्त की चीजों का इस्तेमाल. मुफ़्तनोशी हराम या हलाल है, इस बहस में ना ही पड़े तो अच्छा! आपने शायद इसलिए कहा होगा क्योंकि फितरतों में शामिल चीज़ सी थी.

मंटो फ़िर उन किरदारों से हमारा तार्रुफ कराते हैंजिनसे कभी हमारी भी मुलाकात हुई होगी. हम अलीगढ़ के उसी ज़माने से मिले जिसमें यह सब चल रहा था. ज़माने के लिहाज़ से उमर आसिम ने फ़िल्म को ब्लेक एण्ड वाईट रखा है. संवाद नहीं रखे गए,बातचीत को हाव-भाव में खूबसूरती से ज़ाहिर किया गया है. यह खासियत फ़िल्म में दिलचस्पी बनाने के लिए काफ़ी है. महोत्सवो में मिल रहा सम्मान के राज़ को जानना चाहा, यही समझ आया कि मंटो कि जिंदगी पर बनी यह फीचर फ़िल्म पहली है. सिगरेट की लत से जुडा मंटो का यह दिलचस्प व्यंग्य लोगों ने सिर्फ पढ़ा होगा, इस अंदाज में देखा नही. यह एक बात इसे महत्वपूर्ण काम बना रही.

क़मर बिन बताते हैं कि फ़िल्म को आज़ादी से पहले समयकाल में ले जाना एक चुनौती थी. लेकिन विषय के प्रति उनका रूझान भी अपनी जगह था. उन्होने समयकाल तो वही रखा लेकिन हालात को आज के आईने मे ढालना चाहा. पटकथा के डेस्क पर उन्हे एहसास हो चला था कि आज कि परिस्थिति में इसे नहीं रखा जा सकता, सिगरेट को जिद करके या किसी भी चालाकी से मांगने की वो आदत लोगों में आज नहीं. आज सिगरेट के मसले पर शौक से दूसरों को पिलाना एक चलन है. जबकि मंटो की कहानी में तंगी के दौर का ज़िक्र था, इसलिए फ़िल्म के हिसाब से वही ठीक लगा. यह तय हो जाने बाद कि ट्रीटमेंट मंटो के ज़माने का होगा, टीम ने कहानी पे काम करना शुरू किया. अलीगढ़ में यह पीरियड फ़िल्म जाड़े के दिनो में शूट की गयी. पोस्ट प्रोडक्शन के बाद इसे फ़िल्म महोत्सवो में भेजा जाने लगा, जहां ईनामे भी मिले. हालिया अलीगढ़ के फ़िल्मसाजका सर्वश्रेष्ट निर्देशन अवार्ड रहा.

चाय की दुकान पर मुफ़्तनोशी के मुन्तजिर..मंटो के पास माचिस नही,एक जनाब ने माचिस पेश की तो बदले में आपने भी सिगरेट पेश करी..सिगरेट जलाई और निकल लिए, मानो उसी इन्तेज़ार में थे.
अजब बीमार सा दिल है, अजब खानाबदोशी है
किसी ने सच कहा, यह बुरी शय मुफ़्तनोशी  है
सिगरेट के बिना क़रार ना पाने वाले लत से बीमार मुफ़्तनोश. मंटो के टेबल पर पड़ी अधजली सिगरेट को बगल के कमरे के पड़ोसी ने किसी बहाने से उठा लिया. मुफ़्तनोशी  में डूब गया. मंटो के पुराने दोस्त विलायत से तालीम लेने बाद वापस हिंदुस्तान आए कि चले दोस्तों से मिला जाए.बात-बात मे विलायती ठाठ -बाट दोस्त का दिल मंटो कि एक आने की  गोल्ड फलेक सिगरेट पर आ गया.वतन से कोसों दूर हो आए लेकिन मुफ़्तनोशी का मज़ा लेना नहीँ छूटा.फ़िर जबरदस्ती की नातेदारी जोड़ने का फ़ायदा सिगरेट या चाय की लत वालों को खूब मालूम है. मंटो ने इंकलाबी किस्म के लोगों को भी करीबी नज़र से देखा,परखा तो यही समझ आया कि मुफ़्तनोश होना सिर्फ बुरी लत वालों की बात नहीँ, यह शौक़ की  बात थी. मसलन देखिए कि कला व फनकारी के तलबगार किस तरह मुफ़्तनोश हो सकते हैं.आपकी सिगरेट ब्रांड की वहां कोई महिला तारीफ करे तो इसका इहतराम करते हुए आपको उसे सिगरेट आफर करनी होगी.

आपने सोचा कि अकेले में भी सिगरेट का मजा लिया जाए.लेकिन मुफ़्तनोशो का खुदा उनसे शायद कोई बदला ले रहा था.इस डर से कोई इस बार भी सिगरेट मांग ना ले जाए, वहां से गुज़र रहे शख्स को देखकर आपने डब्बा फेंक दिया कि वो सिगरेट मांग ना ले.लेकिन हाय रे बदनसीबी बच्चे के खेल की दुहाई देकर मुफ़्तनोश ने डब्बा उठा लिया जिसमें अभी भी सिगरेट थी. मंटो मुफ़्तनोशो से तंग से हो चुके थे, झल्ला कर अपनी अधजली सिगरेट फेंक दी.लेकिन यकायक दिल में ख्याल आया कि छोड़ ही रहा हूं तो कम से कम उसे अधजली का तो मजा ले ही लिया जाए,गोया कि आप पर भी मुफ़्तनोशी का असर थोड़ा आ चला.मुड़े उसे तरफ,देखा कि एक शख्स अधजली लावारिस सिगरेट की कश लगा रहा था. इस तरह मंटो की आखरी सिगरेट भी एक मुफ़्तनोश के हाथों हलाक हो गयी..जिस अंदाज मे फिल्म को मंटो को समक्ष रखा वो एक चेतना गढ़ रहा कि मानो उसी ज़माने को देख रहे.

कहानी अलीगढ़ मे घट रही इसलिए पात्रों की वेषभूषा को उसी के हिसाब से रखना उचित था. मुख्य क़िरदार (मंटो ) जिसे युवा अभिनेता ओवेस सफ़दर ने दिलचस्पी से निभाया, फ़िल्म की एक बड़ी खासियत है.



मुफ़्तनोश धूम्रपान का प्रचार नहीं बल्कि उसकी रोकथाम पर एक सकरात्मक पहल कही जाएगी. ज़माना मंटो का हो या आज़ का सिगरेट एक आम लत नज़र आती है. साहित्य में मंटो आज भी लोकप्रिय हैं. सिगरेट की लत पर लिखी व्यंग्य धार देखनी हो तो क़ासिम क़मर की फ़िल्म देखना लाज़मी होगा. इसलिए भी कि  फ़िल्म उन सभी बहादुर लोगों को समर्पित  की गयी है जिन्होने हिम्मत व हौसले से धूम्रपान त्याग दिया.
 
      

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2 comments

  1. मुफ्तनोश को साठ साल हुए या "मुफ्तनोश की तेरह किस्में" को??
    शीर्षक और पाठ्य में अंतर लग रहा है|

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