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रोमांस राजा रविंदर सिंह के नए उपन्यास का एक अंश

इस बार वैलेंटाइन डे के अवसर पर सबसे लोकप्रिय रोमांस लेखकों में एक रविंदर सिंह का उपन्यास हिंदी में आ रहा है ‘ये प्यार क्यों लगता है सही…’ अंग्रेजो में यह उपन्यास पहले ही आ चुका है- This Love That Feels Right… इस बार रविंदर सिंह ने मैच्योर प्रेम कहानी लिखी है एक विवाहिता स्त्री नैना और जिम फिटनेस ट्रेनर के बीच की एक प्रेम कहानी है. यह मेरे जानते उसका अब तक का सबसे अच्छा उपन्यास है जिसमें आज के जीवन के खालीपन को पकड़ने की अच्छी कोशिश की है रविंदर सिंह ने. मंजुल-पेंगुइन प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास का अनुवाद मैंने ही किया है. आप फिलहाल उसका एक अंश पढ़िए- प्रभात रंजन

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‘आज जिम में मेरा दूसरा दिन थाI ’

आधी रात से थोड़ी देर पहले का वक्त थाI  मेरे पति और मैं खाने की मेज़ पर बैठे थेI  मैं पहले ही खा चुकी थीI  उन्होंने अपना डिनर खाना शुरू किया थाI

तब तक यह दिनचर्या बन चुकी थी, जिसमें उसका काम से देर से लौटना भी शामिल थाI  उसकी शामें या तो ऑफिस के काम के नाम रहती थी या होटल्स की कॉकटेल मीटिंग में, जिसमें वह दूसरे बिल्डरों, बड़े बड़े एजेंटों, निवेशकों के साथ सम्बन्ध बढाता था, जिसमें एनआरआई, एचएनआई और सीएक्सओ जैसे लोग शामिल होते थेI  कई बार वह अफसरों एवं राजनेताओं की सोहबत में भी रहता थाI  मैंने उसके इस तरह के मेलजोल को दो तरह से देखता था, एक जिनके पास पैसे थे और दूसरे जिनके पास ताकत थीI  इस तरह के लोगों से जुड़ना मेरे पति एक लिए बहुत मायने रखती थीI  आखिरकार, उसको अपने जायदाद के व्यापार को ऐसी ऊंचाइयों पर ले जाना था जिनके बारे में उसका कहना था कि मैं सोच भी नहीं सकती थीI  ‘…  वह जो उस मॉल में है…  सड़क की दूसरी तरफ!’ मैं अभी भी उसका ध्यान बँटाने की कोशिश कर रही थीI

वह अपने फोन पर कुछ पढने में मशरूफ थाI  जरूर काम से जुड़ा कोई मेल रहा होगाI

‘ह्म्म्म.. ’ उसने बस यही कहाI  उसने ऊपर नहीं देखाI

मेरे पति सिद्धार्थ अच्छे इंसान हैं और एक बुद्धिमान व्यापारी भीI  मुझे यह पता हैI  उसने अपने माता-पिता से परम्परा में यही मूल्य पाए थे- मेरे माता पिता को उसकी यही बात सबसे अच्छी लगी थीI  इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं हुई जब तीन साल पहले जब मेरी लिए शादी के रिश्ते आने लगे तो मेरे पापा ने बाकी सबको नहीं उसको चुनाI  अपने बीच की बाकी लड़कियों के मुकाबले मेरी शादी जल्दी हुईI  मैंने अपने लिए सही लड़के के चुनाव के लिए हमेशा अपने पिता और परिवार के ऊपर यकीन किया थाI  हमारे परिवार के बीच व्यवसायिक रिश्ते थेI  और उन्होंने बड़ी बुद्धिमानी के साथ हमारा रिश्ता कियाI  सिद्धार्थ और मैंने उनकी व्यवसाय की दोस्ती को रिश्ते में बदल दियाI

मेरे पति हमेशा से मृदुभाषी रहे हैंI  शादी के बाद हम दोनों में शायद ही कभी लड़ाई हुई हो और मुझे यह भी याद नहीं आता कि वह कभी चिल्लाये भी होंI  लेकिन जब किसी इंसान ने दूसरे इंसान के साथ समझौता करना सीख लिया हो तो लड़ाई की कोई जरूरत ही नहीं होती?

मैं अपने पापा की बेटी की तरह बड़ी हुई थी, जबकि सिद्धार्थ मम्मी के बेटे थेI  वह कभी अपनी माँ की बात का जवाब नहीं देता था और उनकी बहुत इज्ज़त भी, इतनी अधिक कि अगर वह एक फोन भी कर दें तो सिद्धार्थ जल्दी घर आ जाता थाI  अगर मैं फोन करती हूँ तो वह कोई पक्का कारण बताकर आने से मना कर देताI

सिद्धार्थ ने इस बात को माना था कि वह इस बात के लिए खुद को खुशकिस्मत समझता था कि उसको मेरी जैसी पत्नी मिली जो कि उसको समझती थीI  वह अक्सर यह बात मुझे कहती भी थीI  मेरे ससुर ने व्यवसाय की ज़िम्मेदारी अपने बेटे को सौंप दी थी लेकिन घर की महारानी अभी भी सिद्धार्थ की माँ ही थीI  उनमें अपने परिवार की जीवन शैली के सार रूप को बनाए रखने की ख्वाहिश थी, समय था और इतनी ऊर्जा भी थी, अपनी माँ की इसी बात के कारण अपनी माँ की तारीफ किया करता थाI  और चूँकि सिद्धार्थ मेरा पति है, मुझे हर वह चीज़ पसंद आने लगी जिसकी वह तारीफ किया करता थाI  कई बार मैं इस बात को याद करने की कोशिश करती हूँ कि शादी से पहले कैसी थीI  !’

‘सिद्धार्थ!’ मैंने कुछ अधीर होते हुए कहाI

उसने इस बात का इशारा करते हुए उंगली उठाई कि मुझे थोड़ा इंतज़ार करना चाहिएI

मैंने अनमने भाव से उबासी लीI  मैं यह चाहती थी कि वह मेरी तरफ ध्यान दे, मुझसे पूछे कि जिम में कैसा लग रहा था और क्या मुझे किसी तरह की कोई मुश्किल तो नहीं हो रही थीI  लेकिन इस बात की उम्मीद मैं सिड से नहीं कर सकती थीI  क्या यह इसलिए था क्योंकि शादी से पहले हमें प्यार नहीं हुआ था? क्या जिन लोगों में आपस में प्यार हुआ ही वे क्या इस तरह से व्यवहार करते हैं?

अपने कॉलेज के दिनों से ही मैं यह जानती थी कि मेरे भाग्य में अरेंज्ड मैरिज़ ही लिखा हुआ थाI  मेरे जीवन में कोई प्यार नहीं होने वाला थाI  किसी के साथ प्यार में पड़ने के लिए किसी को ऐसी हालत में होना चाहिए जहाँ कि प्यार खिल सकेI मुझे यह मौका कहाँ मिला था? मैं तो अपनी सहेली दीपिका की तरह भी नहीं थी जो जोर देकर कहती थी कि वह प्रेम विवाह करेगी और इस बात की घोषणा उसने अपने परिवार के सामने भी कर दी थीI  हम उसके ऊपर हंसा करते थेI  इस बात का फैसला कौन कर सकता था कि कब प्यार किया जाए? उस इस बात को लेकर वह किस तरह पक्का हो सकती थी कि वह शादी करेगा ही?

मैं जहाँ से आई हूँ वहां प्यार होने की सम्भावना न के बराबर होती हैI  मैं होस्टल में नहीं रहती थीI  न ही मैं मेट्रो में बैठकर कॉलेज जाती थीI  न ही मैं बाइक के पीछे किसी लड़के को जोर से भींचकर बैठी और ऐसे बात करती थी मानो यह दुनिया थी ही नहींI  मेरे जीवन में ड्राइवर था और आरामदेह कार थी जो मुझे कॉलेज लेकर जाती थी और वापस घर लेकर भी आ जाती थीI  काश मेरे मम्मी-पापा ने मेरा कम ध्यान रखा होताI  मैं अपने दोस्तों और अपने सहपाठियों के साथ शायद ही कभी बाहर गईI  वीकेंड में मैं या तो अपने परिवार के साथ घर में होम थियेटर सिस्टम में फिल्म देखकर परिवार के साथ समय बिताती थी या परिवार के दोस्तों के साथ डिनर पर जाती थीI

मैं प्यार-मोहब्बत के बारे में सुनती रहती थी जब मरे दोस्त बातें करते थे कि उन्होंने साथ साथ फिल्म देखी या वे किसी मॉल में साथ साथ घूमने गएI  उनकी वीकेंड्स मस्ती वाली होती थीI  इतवार की सुबह मेरे लिए पुरखों के मंदिर में पूजा से शुरू होती थीI  किसी किसी वीकेंड को जब हम घर वापस नहीं आना चाहते थे, तो हम या तो छतरपुर में अपने फार्म हाउस में जाया करते थे या पास के किसी रिसोर्ट में जाते थेI  मैं उन सबसे महरूम थी जिसको मेरे दोस्त ‘मस्ती वाली वीकेंड्स’ कहते थेI

मैं अपनी क्लास की बाकी लड़कियों से अलग थीI  वे जो चाहे पहन सकती थींI  मेरे घर में मेरी गुस्सैल दादी ने मेरी पसंद को सलवार सूट तक ही सिमटा दिया थाI  जब मेरे पापा ने हस्तक्षेप किया तब जाकर उन्होंने आधे मन से मुझे जींस और दूसरे तरह के पश्चिमी परिधान पहनने की अनुमति दीI  हालाँकि तब भी उनका नजरिया साफ़ था कि मैं केवल घर में बिना बाँह की टॉप, स्कर्ट्स और शॉर्ट्स पहन सकती थी, वह भी तब जब घर में कोई पुरुष न आया होI

फिर भी मुझे दादी और अपने पूरे परिवार से प्यार थाI  चूँकि सभी मेरी परवाह करते थे, यहाँ तक कि मेरा भाई भी जो मुझसे सात साल छोटा हैI  अगर मेरे चाचू अमेरिका में जाकर नहीं बस गए होते तो उनकी बेटी से मैं बातें साझा किया करती, जो मेरी ही उम्र की थीI  इस तरह घर में भी मेरा कोई दोस्त नहीं थाI  मैं निश्चित रूप से अपने पिता की आँखों का तारा थी, लेकिन फिर, हमारे परिवार के परम्परागत माहौल में वे मेरे सबसे अच्छे दोस्त नहीं हो सकते थेI  मैंने सिद्धार्थ की तरफ देखाI  वह मेरा सबसे अच्छा दोस्त हो सकता थाI

‘सिद्धार्थ, मुझे तुमसे बात करनी हैI  प्लीज मेरी बात सुनो न’, मैंने जोर से कहाI

‘मुझे एक मिनट का समय दो नैना’, उसने कहा और मैंने मुँह बना लियाI

यह हमेशा से ऐसा ही रहा थाI  मुझे इंतज़ार करना थाI  सिड हमेशा से महत्वाकांक्षी आदमी थाI  दिल्ली एनसीआर के इलाके में ज़मीन-ज़ायदाद के धंधे में वह अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी का व्यवसायी थाI  मेरे ससुर ने सिद्धार्थ के दादाजी से व्यवसाय विरासत में ग्रहण किया था और उसका खूब विस्तार किया, सिद्धार्थ के सपने अधिक महत्वाकांक्षी थेI  वह अधिक तेज़ी से अधिक विस्तार चाहता था, वह भी बहुत कम समय मेंI  वह मुझसे अक्सर यह बताया करता था कि किस तरह से उसके पिता या दादा व्यवसाय को चलाते थे और वह किस तरह अलग तरीके से उस व्यवसाय को चलाना चाहता थाI  यहाँ तक कि मैं सिद्धार्थ के कामकाज करने के तरीके उसके पिता के प्रबंधन के तरीके से किस तरह अलग थेI

एक प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूल में पढने के कारण मेरे पति इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि एक ब्रांडेड बिल्डर होने का क्या महत्व है, खासकर प्रचार-प्रसार के मद में खर्चे कोI  इसके विपरीत, उसके पिता और दादा का ध्यान इस बात के ऊपर था कि किस तरह से खर्चा कम रखते हुए एक निश्चित मुनाफा बरकरार रखा जाएI

‘बहुत सारी चीज़ों में खर्चा क्यों बढ़ाना? बस ज़मीन ज़ायदाद में निवेश करना चाहिए’, उसके पिता कहतेI  उनको इस बात का डर लगता था कि प्रचार और विज्ञापन में खर्च करने से से नुक्सान हो सकता थाI  जब सिड उनकी बात नहीं सुनता था तो वे बेचैन हो जाते थेI  और निश्चित रूप से कुछ सालों में सिद्धार्थ आखिरकार बैलेंस शीट में मुनाफा दिखा पाने में कामयाब रहाI  उसके पिता ने अपना लगभग सारा का सारा व्यवसाय अपने बेटे को देते हुए ख़ुशी और गर्व का इज़हार कियाI

तब जाकर हिंदी बोलने वाले पुराने ढंग एक ऑफिस की जगह अंग्रेजी बोलने वाले कर्मचारी दफ्तर में आ गएI  इसके साथ सिंघानिया कंस्ट्रक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड में एक नए दौर की शुरुआत हुईI  पहले कंपनी में 45 के करीब कर्मचारी थे जिनकी संख्या बढ़कर 200 के करीब हो गईI

मुझे बिजनेस को लेकर सिड के जूनून की झलक शादी के तत्काल बाद मिल गई, जब आखिरी पल में उसने हनीमून को 15 दिनों के लिए आगे सरका दियाI  उस दौरान उसके कुछ एनआरआई निवेशक भारत आ रहे थेI  वह उस मौके को कैसे बेजा जाने दे सकता था!

बिजनेस के लिए हनीमून को आगे सरका देना मेरे ख़याल से मेरे पापा की इस बात को ही पुष्ट करता था- उसमें यह प्रतिभा है कि वह जाना माना व्यापारी बन जाएI  मेरे पिता सही कहते थेI

बस मैं यही सोचती थी कि काश वह इतने सही नहीं हुए होतेI

मुझे इस बात का कोई अफ़सोस नहीं है कि हमारे हनीमून में देरी हुईI  मैं बस यही सोचती थी कि काश सिद्धार्थ मेरी भी राय लेता और फैसले लेने की प्रक्रिया में मुझे भी शामिल रखताI  तो मुझे ऐसा लगता कि मेरा भी कोई महत्व हैI

पीछे मुड़कर देखने पर पता चलता है कि हनीमून में देरी का फैसला सही साबित हुआI  एनआरआई निवेशकों ने सिंघानिया कंस्ट्रक्शन्स में निवेश किया और इस बात से देर से मनाये गए हनीमून में अधिक ख़ुशी का भाव भर गयाI  लेकिन फिर, यह सब तीन साल पुरानी बात थीI

‘सिड… ’

‘हाँ बाबा… मैं अब सुन रहा हूँI  बताओ… ’ उसने कहा, उसकी आँखें अभी भी मोबाइल फ़ोन पर गड़ी हुई थींI

‘नहीं, तुम नहीं सुन रहे’, मैंने खीझते हुए कहाI

उसने कुछ नहीं कहाI  मैं खड़ी हुई और चलते हुए उसके पास पहुँचीI  उसके पीछे खड़ी होकर मैंने अपनी कोहनी उसके कंधे पर टिका दीI

‘जब तुमए पहले से ही अपने व्यवसाय से शादी कर रखी थी तो तुमने मुझसे शादी क्यों की?’

यह पहली बार नहीं था जब उसने मुझसे यह बात सुनी थीI  यह पहली बार नहीं था जब उसने बड़ी सहजता से मेरी इस बात को भी नज़रअंदाज़ कर दिया थाI

उसने पीछे मुड़कर मुझे देखा और उसके बाद उसने फोन को बंद किया और टेबल के ऊपर रख दियाI

‘कुछ ज़रूरी बात थी’, उसने धीरे से मुस्कुराते हुए कहाI  ‘अब बताओ, क्या कह रही थी?’

मैंने उसकी तरफ उसकी आँखों में देखा, अपने आपको देखने की कोशिश की, कोशिश की यह देखने की कि उसके जीवन में मेरा हिस्सा कितना हैI  क्या मैं वहां थी भी? मुझे ऐसा क्यों महसूस हो रहा था कि उससे समय माँगना गलती थी?

‘नैना! अब बोल भी’, उसने कहा और अपनी बांहों को मोड़ते हुए डिनर की थाली अपने आगे सरका लीI

मैंने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने ख्यालों को गुज़र जाने दिया जो कि आजकल रोज़-रोज़ की बात हो गई थीI

‘याद है, मैंने आज सुबह तुमको यह कहा था कि हमारी सोसाइटी के सामने जो मॉल है उसमें मैं जाउंगी?’

‘ह्म्म्म… ’ उन्होंने खाते हुए सर हिलायाI

‘मुझे वह बहुत अच्छा लगाI  मैं वहां कसरत करने के लिए जा रही हूँ… ’

‘बढ़िया हैI  जाओ फिरI ’

मैं यही उम्मीद कर रही थीI  काश उसने मुझसे इसके बारे में और पूछा होताI  काश उसने इस बारे में बात करने में अधिक दिलचस्पी दिखाई होतीI

‘असल में, मैं यह सोच रही थी कि तुम भी मेरे साथ जिम में चलतेI  फ़िलहाल मैं दिन के वक़्त जाती हूँI  लेकिन अगर तुम आओ तो हम सुबह के समय एक्सरसाइज़ करने जा सकते हैंI  छह बजे!’ मैंने कहा, मुझे उसकी इस तरह की प्रतिक्रिया की पहले से ही आशंका थीI  ‘यह बहुत अच्छा जिम है, शायद गुड़गांव का बेहतरीनI ’

लेकिन इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ाI

‘अरे रहने दो नैना! मेरे पास यह सब करने का समय कहाँ है? तुमको पता है न मुझे अपने गोल्फ में मज़ा आता हैI ’

ज़ाहिर है! उसने कोई और जवाब दिया होता तो मुझे इस बात से हैरानी हुई होतीI  गोल्फ भी उसके लिए लोगों से मेलजोल बढाने का काम हैI  यह उसकी महत्वाकांक्षाओं से साथ सही जमता थाI

एक दिन बीच करके जाने का ख़याल कैसा रहेगा फिर?’ मैंने बस बातचीत को आगे बढाने के ख़याल से कह दियाI

उन्होंने पानी का एक घूँट लिया और चुभलाने लगाI  ‘नहीं बाबा! मेरा मतलब यह है कि मुझे देखोI  मैं बिलकुल तंदुरुस्त हूँI  मेरी दिनचर्या मुझे ठीक बनाये रखती हैI  मुझे जिम जाने की कोई जरूरत नहीं हैI ’

काश मैं सिड को यह कह पाती कि सुबह के समय साथ रहने और साथ साथ एक्सरसाइज़ करने से हमारे जीवन में नई ख़ुशी आ सकती थी जो कि एकरस हो चली थीI  हम कुछ देर के लिए साथ रह सकते थे, घर और काम से दूर, और कुछ वक़्त ऐसा निकालते जिसको कि हम पूरी तरह से अपना कह सकते थेI  लेकिन उसने अपनी बात कहकर ख़त्म कर दी थीI

फिर मैंने अपने आपको यह समझाने की कोशिश की, मुझे सुबह उठने की चिंता क्यों करनी चाहिए? मुझे दिन के वक़्त जाना अधिक सहुलियत भरा लगता था जिस वक़्त कुछ और गृहिणियां भी होती थींI  मैं नए दोस्त बना सकती थीI मानविका से मिलने के साथ बहुत अच्छी शुरुआत हुई थीI  कम से कम दिन में कुछ घंटे मैं वह करके बिता सकती थी जिसमें मुझे अधिक आनंद आता थाI

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