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एक हाउस वाइफ का विमेंस डे

सभी को विमेंस डे की शुभकामनाएँ- दिव्या विजय

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बे-दम हुए बीमार दवा क्यों नहीं देते

तुम अच्छे मसीहा हो शफ़ा क्यों नहीं देते                                                     

आज न विमेंस डे मनाया जा रहा है. मैंने भी कह दिया पतिदेव से कि आज मेरी छुट्टी है…काम से भी, तुमसे भी, बाकी सबसे भी. आज कोई काम नहीं करुँगी और कुछ किया तो अपने लिए करूंगी. तुम आज सबको लेकर कहीं चले जाना. उन्होंने मामले की संजीदगी समझते हुए यह हुक्म तामील करने में ज्यादा देर नहीं लगायी. वैसे आज के रोज़ सॉलिटेयर डायमंड्स का चलन बढ़ रहा है. मुझे भी पेशकश हुई थी पर मैंने तो न कह दिया.  डायमंड का क्या…कहने को हमेशा के लिए होते हैं पर पत्थर अंगुली में पहन कर कैसा मनों बोझा लगता है क्या मैं जानती नहीं. मुझे तो हल्का-हल्का महसूस करना है. उड़ने जैसा. बहुत पहले एक बार उड़ी थी..पैराग्लाइडिंग करते हुए..पर तब डर लगता था. अबके उडूँगी तो डरूँगी नहीं…ये पक्का वादा खुद से. मगर फिलहाल तो अपने घर की फील लेनी है. इतना बड़ा घर पर उस से ज्यादा लोग…रात-दिन शोर-शराबा.

“तोहफा चाहिए कुछ?”

सुनने पर इस दफ़ा मना नहीं किया बल्कि घर में अकेले रहने का तोहफा मांग लिया. सुबह-सुबह ही चले गए सब.

‘सुब्ह की आज जो रंगत है वो पहले तो न थी’

आधी-अधूरी पंक्ति गुनगुनाते हुए मैंने रसोई की ओर रुख किया. आज मैंने अपनी पसंद की उन चीज़ों को बनाने का ठान लिया जिनका नम्बर साल भर नहीं आता. तभी दीवार पर एक छिपकली रेंगती दिखी और मैं चिहुंक कर दो क़दम पीछे हो गयी. यूँ अचानक मिले इस झटके के कारण अंगुली गर्म कड़ाही पर चिपक कर झुलस गयी. एक चिलक उठी मन में कोई आकर थाम ले. अंगुली को पास रखे आटे से लपेटा और मन बगल में रखे सी डी प्लेयर पर प्ले हो रही ग़ज़ल पर थिर कर दिया.

‘यार को हमने जा-ब-जा देखा

कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा’                                                      

सोचते हुए हँसी छूट गयी कि क्या देखने वाला स्किज़ोफ्रेनिया का मरीज़ था. फिर मन हुलस उठा कि जब शायर अपने यार को हर कहीं देख सकता है तो मैं क्यों नहीं. सोचते हुए भाप उड़ाते पतीले पर नज़र टिका दी. यार तो अलबत्ता नज़र नहीं आया पर कुछ जलने की गंध ज़रूर नाक से टकराई. बाप रे! फटाफट पतीले के चावलों को दूसरे बर्तन में उलटा और रसोई से बाहर निकल आई. छोड़ो काम-वाम…खुद से कहते हुए कुर्सी पर पसर गयी.

होती है गर्चे कहने से यारो, पराई बात 

पर हम से तो थमी न कबहू मुंह पे’ आई बात                                                       

भीड़ में मुद्दतों अकेले रहकर देख लिया. आज देखूँगी एकांत का अकेलापन कैसा होता है. एक चुप्पी जब हर ओर से झरती हो…कुछ कहते जाने का दबाव न हो. ये जो बोलना है न…मेरे लिए दुनिया का सबसे मुश्किल काम है. शब्दों को यूँ चुनना कि वे खूबसूरत भी लगें और सामने वाले को चुभे भी न. भला बताइए, अब या तो बोल सकते हैं या सोच सकते हैं. मुझसे तो दोनों काम एक साथ नहीं सधते. कभी लगता है भगवान् ज़ुबान न देता तो बोलने की ज़िम्मेदारी से ही बच जाती. फिर लोग मुझसे कुछ उम्मीद ही नहीं रखते. पर हैरत ये है कि मुश्किल लगने के बावजूद मैं पिछले कुछ सालों से लगातार बोले चली जा रही हूँ. एक बार बोलती हूँ तो चुप होने का नाम ही नहीं लेती. ये तो कठिन परीक्षा अच्छे नंबरों से पास करने जैसा हुआ न! सुना है हिटलर आईने के सामने बोलने का अभ्यास करता था. मैं बोलते हुए कैसी दिखती हूँ? आईने के सामने गयी तो गिरहों वाले बाल नज़र आये. आज कहीं जाना तो है नहीं..क्या फर्क पड़ता है. सोचते हुए हाथी-दांत से जड़ी कंघी नज़र आई. कितनी खूबसूरत है! ऐसी चीज़ों को इकठ्ठा करना मेरा शौक़ रहा है. शौक़! शौक़ तो बहुत सारे हैं पर कोई शौक़ ऐसा नहीं जो मुहब्बत करने के मेरे शौक़ को हरा दे. सोचते हुए खिलखिला पड़ी.

होगा किसू दीवार के साए में पड़ा ‘मीर’

क्या काम मुहब्बत से उस आरामतलब को                                                         

बस यही परेशानी है कि किसी से इश्क होता नहीं. मुहब्बत करना पसंद है पर उसकी मुश्किलातों को कौन झेले. सीधी-सादी ज़िन्दगी ठीक है भई. लेकिन मुझे कैसे मालूम चला अपने इस शौक़ के बारे में. बस चल गया! हम सबको अपने बारे में मालूम होता है. मुझे भी अपने बारे में पता चलने लगा है. धीरे-धीरे ही सही पर खुद को समझ पाने लगी हूँ. मैं बहुत रूखी हूँ…हद दर्जे की मूडी भी. कुछ पसंद न आये तो बीच महफ़िल में अपनी नापसंदगी ज़ाहिर कर चली आने वाली. घड़ी टर्राई. मुझे याद आया मैं तो मुस्कराहट का लिबास पहने हर बात को इतना स्वीकार चुकी हूँ कि नाराज़ होना भूल चुकी हूँ. हटाओ ये मुस्कराहट का ताना-बाना. मैंने आईने को आँखें तरेरते हुए देखा और मुंह फुला कर बैठ गयी. उहूँ…जंचता नहीं अब ये. मुस्कराहट को उलट कर पहन लिया. वाह… अब बनी न मिसेज़ ब्ला ब्ला. ही ही.. और भी कुछ याद आया और साड़ी का पल्ला सर पर रख लिया. हाय…कितने बरस हुए शरमाये हुए…कई कोशिशों के बाद भी कोशिश मुकम्मल होती नहीं दिखी. हुंह…रोज़ इतने लोगों से माथा मारना पड़ता है…कहाँ होंगे अब ये शर्माने के चोंचले. ये भी जाने दो.

आज बस मैं, मेरे घर के कोने और दीवारें और…और गद्दे. गद्दों पर जो कूदना शुरू किया तो हांफने पर ही बंद किया. कैसा सख्त बिस्तर है…क्या करें…पीठ की भलाई के लिए ऐसे ही बिस्तर ठीक रहते हैं. उफ़ ये निगोड़ी पीठ…सोचते हुए लंबलेट हो गयी. हाय, कोई आये और पीठ को पंखों से सहला दे. आँखें मुंद गयीं…कभी हुआ था क्या ऐसा? हाँ कभी लेकिन…

तुझ से दो-चार होने की हसरत में मुब्तला

जब जी हुए वबाल तो नाचार मर गए

खैर, साहिब  गए उनकी सल्तनत गयी…एक ठंडी आह भरी. अब क्या हासिल उन यादों का. चांदी झलक आई बालों में. जाने दो मनहूस बातें…कायर आदमी के लिए खुद को क्यों हलकान करें. त्योहार है भई…खुद से कहते हुए चटक लाल रंग निकाला. आज तो जम कर नाचेंगे. बिना पीये ही नाचेंगे वैसे जैसे बारात में लड़के नाचते हैं. विडियो बनायेंगे और घर वालों को हैरान कर देंगे. कौन सा गाना चलायें…जो भी रेडियो पर बजता हो उसी पर.  स्विच ऑन किया तो घर नाच उठा, साथ मैं भी…

मांगे जो बबुना प्रेम निसनिया

बोले जो टोड़ी कटीहो कनिया

बदले रुपैय्या के देना चवनिया

सैंय्या जी झपटे तो होना हिरनिया…

 

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