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ऐप धीरे धीरे हिंदी किताबों का परिदृश्य बदल कर रख देगा

जगरनॉट के हिंदी ऐप पर दिव्या विजय का लेख- मॉडरेटर

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मुझे याद आता है जब मैं थाईलैंड में थी और भारत से ले जाई गयी किताबों का स्टॉक ख़त्म हो जाता था तो वहां किताबों की दुकानों पर भटकने जाया करती थी. वहां ज़्यादातर किताबें थाई भाषा में होती थीं. हालांकि कुछ अंतरराष्ट्रीय  बुक-स्टोर्स पर अंग्रेज़ी की बेस्ट-सेलर्स भी हुआ करतीं पर वे किताबें पढ़ने की उस पिपासा को शांत करने में अक्षम थीं. तब ई-बुक्स की दुनिया में मेरा प्रवेश हुआ. यह लगभग 2009  की बात है. इतनी किताबें देख मन आह्लादित हो गया और मैं बौखलाई हुई कुछ दिनों तक बस किताबें डाउनलोड करती रही. हालांकि कई बार वे लिंक डेड  निकलते या उनका फॉर्मेट ऐसा होता कि उन्हें पढ़ पाना संभव नहीं होता था. तो कई-कई घंटे उन किताबों के पढ़े जाने लायक प्रारूप तक पहुँचने में गुज़र जाते. अंग्रेज़ी की अनगिनत किताबें पढ़ने के बाद ख़याल आया कि हिंदी भाषा की पुस्तकें भी ज़रूर उपलब्ध होंगी. हिंदी के उपन्यास ढूँढने से मुहिम शुरू हुई और निराशा हाथ लगी क्योंकि अधिकतर चीज़ें बहुत चलताऊ किस्म की थीं. फिर हिंदी की साइट्स मिलीं जहाँ बहुत सामग्री थी. कई महीने उन्हें पढ़ा.

किताबों का फील अवश्य उनमें नहीं था पर रेगिस्तान में पानी की एक बूँद भी पर्याप्त होती है. उन दिनों आज की तरह ऑनलाइन वर्शन हाथों-हाथ नहीं आता था. किसी किताब को पढ़ने के लिए कई महीनों इंतजार भी करना पड़ता था या इस बात की प्रतीक्षा कि कोई किताब का पायरेटेड वर्शन अपलोड कर दे. पायरेटेड वर्शन होने के कारण उनके बैन होने का डर सदा बना रहता था पर किताबों के दीवाने कोई न कोई तरीका निकाल ही लेते. उन्हीं दिनों का एक वाकया याद आ रहा है. हैरी पॉटर का आखिरी भाग रिलीज़ होने वाला था और पूरी दुनिया में सनसनी मची थी. उन दिनों हर थोड़े दिन में  किताब लीक होने की अफवाह फ़ैल जाती और दो ऐसे मेल मेरे पास आ पहुंचे जिनमें पूरी किताब होने का दावा था. खोल कर देखा तो आठ-आठ सौ पन्ने थे. असल किताब आने पर मालूम हुआ कि वो किताबें फेक थीं.

इन सालों में ई-बुक्स ने बहुत कुछ बदल दिया है. स्मार्ट फ़ोन आने के बाद बहुत-से ऐप  किताबों के लिए बने. बहुत सी अलग-अलग किताबों को कैरी करने की  मुश्किल हल करने के लिए जिस तरह इनसाइक्लोपीडिया का जन्म हुआ, उसी तरह अब छपी हुई किताबों की उपलब्धि, रीच आदि की बहुत मुश्किलें ऐप  ने हल कर दी हैं. यहाँ न सिर्फ किताबें योजनाबद्ध तरीके से मिल जाती हैं बल्कि किसी शब्द का अर्थ देखने के लिए मात्र उसे सेलेक्ट भर करना होता है. किताबों में जिस तरह हम अपनी पसंदीदा पंक्तियों को रेखांकित करते हैं, यह सुविधा यहाँ उपलब्ध होने के साथ शेयरिंग फीचर ऑन करते ही हमें अन्य पाठकों द्वारा रेखांकित की गयीं पंक्तियाँ भी दिखाई देती हैं. समूह में पढ़ने का और पढ़ी गयी किताबों पर चर्चा करने का उल्लास अलग होता है.  अमेज़न के किन्डल के अलावा बाज़ार में नूक, गूगल बुक्स, वाटपैड, कोबो आदि कई ऐप  हैं जो किताबें उपलब्ध कराती हैं जहाँ भुगतान कर आप आसानी से किताबें खरीद सकते हैं. आज प्रिंट के साथ ही किताबें ऑनलाइन भी रिलीज़ होती हैं. कई किताबें तो सिर्फ ऑनलाइन ही रिलीज़ होती हैं..पेपर फॉर्म में होती ही नहीं.

इन ऐप  ने बाज़ार का सारा परिदृश्य बदल कर रख दिया है. अब जबकि लाइब्रेरी आपकी अँगुलियों के पोरों पर हैं और चुनाव की सुविधा पहले से अधिक है तो लेखक मास्टर पीस रचने से अधिक ध्यान ज़्यादा बिकने वाले कंटेंट पर देने लगा है. इसी कारण से लेखन की नयी शैलियाँ विकसित हुई हैं और लेखक टारगेट-रीडर्स के लिए लिखने लगा है. पाठक भी पहले जैसी तन्मयता से नहीं पढता क्योंकि ये ऐप  मोबाइल पर हैं जो अन्य कई कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इस कारण कई व्यवधान आते रहते हैं.

किताब के पन्नों में जिस तरह किरदार के साथ हम भी रहने लगते हैं उस बॉन्डिंग की कमी हम जैसे प्राचीन आत्माओं को अवश्य खलती है लेकिन किताबों के इस प्लेटफार्म पर होने से किताबों की शेल्फ-लाइफ बढ़ी है. किताबों के फटने का अथवा गल जाने का कोई खतरा यहाँ नहीं है. छूटी रह गयीं, खो गयीं, मांग कर ना लौटाई जाने वाली कई भूली-बिसरी किताबें यहाँ उपलब्ध हैं. बचपन में पढ़ी हुई या चलते-फिरते किसी स्टाल पर देख कर चाही गयीं किताबों को अनायास यहाँ पा जाना अच्छा लगता है.

भारत का एक पब्लिशिंग हाउस जगरनॉट भी ऐप  की दुनिया में कदम रख चुका है. अभी तक भारत में हिंदी किताबें विदेशी पोर्टल्स पर ही उपलब्ध थीं या डेलीहंट, नॉटनुल जैसे कुछ भारतीय ऐप  जो चुनिन्दा किताबें और पत्रिकाएं उपलब्ध कराती हैं. लेकिन अब भारतीय पब्लिशिंग हाउस का इस क्षेत्र  में आगे बढ़ना एक शुभ संकेत है जो किताबों के बाज़ार को नए आयाम प्रदान कर सकता है.

ऐप  को होशियारी से डिजाईन किया गया है जो पहली नज़र में आँखों को भाता है. किताबों की रैक भी बढ़िया ढंग से वर्गीकृत है परन्तु जगरनॉट को गुणवत्ता और विविधता प्रदान करने पर ध्यान केन्द्रित करना होगा. कुछ ध्यान खींचने वाले फीचर हैं जैसे- टॉप इन द चार्ट सेक्शन, ऑथर ऑफ़ द वीक सेक्शन, दोस्त को उपहार देने का विकल्प. मार्किट में पहले से बहुत सारे प्लेयर्स हैं. उनको पछाड़ने के लिए, उनके बीच अपनी पैठ बनाने के लिए छोटी-छोटी बातों के ऊपर ध्यान देना होगा. मसलन इंटरफ़ेस को यूजर फ्रेंडली करना होगा. अधिकांश पाठक उस ऐप  को तरजीह देते हैं जो असल किताब का अहसास देती हैं. जैसे किन्डल में पन्नों को बांये से दांये पलटना असली किताब जैसा अनुभव है जबकि जगरनॉट पर पन्ने ऊपर से नीचे की ओर स्क्रॉल होते हैं जो पीडीएफ किताब पढ़ने जैसा अहसास देता है. टेक्स्ट को हाईलाइट करने के लिए भी मात्र एक रंग है जो एक और सीमा है. बुकमार्क, ब्राइटनेस कण्ट्रोल जैसे फीचर भी यहाँ ग़ैर-मौजूद हैं पर चूँकि अभी यह शुरुआत भर है इसलिए ऐसी बातों को नज़रअंदाज़ कर आगे के लिए सकारात्मक उम्मीद की जा सकती है.

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