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वीरू सोनकर की नई पुरानी कविताएँ

कानपुर के कवि वीरू सोनकर की कविताओं में एक अजीब सी तुर्शी है. एक तरह का बांकपन. अच्छी लगती हैं. इस महीने 14 तारीख रविवार को ‘मुक्तांगन’ में जिन कवियों का कविता पाठ है उनमें वीरू सोनकर भी एक कवि हैं. आइये उनकी कुछ कविताएँ पढ़ते हैं- मॉडरेटर

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१-

– भाषा –

मैं अपनी मातृभाषा में सोता हूँ
हिंदी के कपडे पहनता हूँ और तैयार होकर निकल जाता हूँ घर से

जो कहीं फसता हूँ तो उर्दू में अपने काम निकाल लेता हूँ
जो कहीं चिढ़ता हूँ तो फिर लौटता हूँ
मांगी गयी पहली रोटी की भाषा में
दी गयी सबसे पहली खिसियाई गाली में
सबसे पहली प्रार्थना में!

मैं जितना देह में था उतना ही उस भाषा में
मैं उस भाषा-देह के व्याकरण में आत्मा सा घुला था

इस भाषा के तकिए पर सर टिकाए
मैं सबसे अधिक मौलिक था
सबसे अधिक मुखर
सबसे अधिक विस्तृत
सबसे अधिक कल्पनाशील था

मैं आदमी नही, मातृभाषा का सबसे ठेठ मुहावरा हूँ
मैं आदमी नही, मातृभाषा से हट कर
दूसरी भाषा मे बरती गई एक चालाकी हूँ

२-

[ दृश्य ] ________

मैंने एक दृश्य में प्रवेश किया
और एक नया दृश्य रच दिया
पुराना दृश्य अब नही रहा.

मैं इस दृश्य का सुख हूँ
विस्थापित हो चुके इतिहास-दृश्य का दुख भी

मैं इस दृश्य में एक प्रतीक्षा भी हूँ
तुम इसे आने वाला दृश्य कह सकते हो
मैं इसे भविष्य कहुंगा!

मैं कहुंगा
हर दृश्य में, थोड़ा सा बीत गया
और थोड़ा सा आने वाला, एक दृश्य घुला है

३-

सड़क

सड़क एक सुंदर परिकल्पना है
चलता हुआ आदमी सड़क के अलावा भी
कहीं और चल रहा होता है

सड़क से लौट आना भी कम रोमांचकारी नही है
जितनी बार लौटो,
आदमी एक नई जगह पहुँचता है
कई बार पुराने घर में एक नया आदमी जा पहुँचता है

कई बार घर मे पहुँचा आदमी
दरअसल सड़क पर ही चल रहा होता है

४-

‘प्रेतात्माओं का स्वांग’

प्रेतात्माएं पेड़ो से उतर कर दौड़ रही है
हँस रही हैं लाइब्रेरियों में
उन्होंने मेकअप की दुकानों को लूट लिया है
वे देव मंदिरों के बाहर से नग्न गुजर रही है
अपने रज का तिलक पुजारी के माथे पर लीप कर
एक प्रेतात्मा ने कहा है
ये तुमसे नही धुलेगा अब!

अजान से तेज, अब इनकी आवाज है
ट्रकों और टैंकों पर सवार होकर वे रौंद रही है तमाम धर्म संहिताओं को
स्त्री-वर्जनाओं के तमाम इतिहासों की कब्रें
अब खुली पड़ी हैं
पोप की कुर्सी लूट ली गयी है
धर्मदंड अब एक उदंड प्रेतात्मा के हाथ मे हैं

प्रेत्माएँ खेल रही हैं समय-सुरंगों से
खींच निकाल रही हैं हर इतिहास अपराधी को
और घुस गई हैं सब एक शमशान में
ढूंढ रही हैं जिनकी पत्नियां मर गयी हैं उनके पुरुष कहाँ हैं ?
सतयुग की सतियाँ भी शामिल हैं प्रेत्माओ की इस भीड़ में
और उनके हाथों में है
अपनी चिता से बची, जल रही लकड़ियाँ!

वे ईरान की खुली सड़क पर नग्न दौड़ रही हैं
और निकल रही हैं सबकी-सब अरब की पवित्र गलियों में
बनारस के घने बाजार तक में घुस गई हैं वो
और लिख दिया है हर मूत्रालय के बाहर
ओनली फ़ॉर लेडीज!

रातो-रात बदल गए हैं सभी मेडिकल स्टोर्स के बाहर लगे विज्ञापन
काले अभिशप्त हाथों ने लिख दिया है
सेनेटरी पैड्स, अब से टैक्स फ्री!

दुनिया भर की व्यवस्थाओं को धूल चटा कर
वे ढूंढ रही हैं मुल्लाओं को
वे ढूंढ रही हैं सत्ताओं को
खेल रही हैं खुली सड़क पर
और बालों को पटक रही हैं सहेलियों के चेहरों पर

गा रही हैं सामूहिक स्वरों में
ढोल-गवार-तुलसी और पापी
ई सब है ताडन के अधिकारी!

प्रेत्माएँ
कायर नैतिकता से भरी
इस दुनिया पर फैल गयी बारूदी गंध हैं
वे तमाम विमर्शों के सफेद मुँह पर धड़ाम से गिरी
एक काली अराजकता हैं
तमाम मान्यताओं के कुँए में भांग सी घुल गयी
एक अवहेलना हैं

अब स्त्रियां भी इस भीड़ में आ मिली हैं
मिला रही हैं वो कदमताल उनके नृत्यों में

प्रेत्माएँ धीरे-धीरे गायब हो रही हैं
अपने नख, दंत
अपने दौड़ते पैरों को, छुपा दिया है उन्होंने अपने जीवित प्रतिनिधियों में
समय-सुरंगों की चाभियाँ अब स्त्रियों के हाथों में चमक रही है

स्त्रियों धीरे-धीरे अपने घरों में लौट रही हैं

दुनिया के कई हिस्सों में खबर है कि प्रेत्माएँ कहीं नही गयी हैं
आपके घर अभी-अभी जो स्त्री लौटी है उसे ध्यान से देखिए
उसकी आँखों मे जो अवज्ञा की एक छाप है
वहाँ एक प्रेतात्मा सोई है

आप सोच सकते हैं कि इन प्रेत्माओ के पुरुष-प्रेत कहाँ हैं ?
थोड़ा खंगालेंगे तो पाएंगे,
जो पुरुष-प्रेत इस भीड़ का हिस्सा हो सकते थे
वह आपके भीतर कब के मरे पड़े हैं

५-

‘आत्मा से देह तक’
————–

मैं बचा रहा
इधर-उधर के दुखों से
आत्मा के प्रलाप का आत्मसुख पीती एक देह
जितना जी सकती है
जितना हँस सकती है
और जितना रो सकती है
उतना मैंने एक देह को थकाया है

मेरे एकांत में बार-बार चले आते हैं मुक्तिबोध के दिवास्वप्न
बार-बार एक देह पढ़ती है बच्चन की जीवनी
अज्ञेय की सलाहें देर तक समझाती हैं मेरी अवज्ञायों को
मैं समझ ही नही पाता,
मेरी आत्मा ने जिस देह को ओढ़ रखा है
उसके थकने पर एक आत्मा क्यों नही थकती

नेरुदा को चाहिए कि वह लौट आएं
एक आत्मा से अधिक, एक देह को ज्यादा जरूरी है समझाना
कि कैसे पृथ्वी एक जड़ है
मैं उनसे कहुंगा एक देह के दुःसाहस के पीछे
आत्मा की साजिश है

कहुंगा कि,
यह जो आपके साथ चल रही है ‘देवानन्दपुर’ की पगडंडियों में
शरत दा, यह देह मेरी ही हैं
मुझे ऐसा लगता है आपकी देह ने इस देह के कान में कुछ कहा है
कानपुर के भीड़ से भरे एक चौराहे पर
मेरे नाम की एक देह बरामद हुई है
आप समझिए
इसका अंतःपुर हुगली के पार है

समकालीन, इस देह को अपने-अपने पूर्वाग्रहों की कसौटी पर कसते हैं
उन्हें बार-बार एक छद्म यथार्थ मिलता है
मैं समकालीनों से किसी युवा सा मिलता हूँ
और यथार्थ से किसी अधेड़ सा.
स्मृति और भविष्य के समुच्चय के बीच जो जगह खाली है
मैंने कल्पनाओं की एक चादर वहाँ बिछा दी है

एक देह के लिए अब सिर्फ अंधकार बचता है
वहाँ भी एक दिन मेरी आत्मावज्ञा कहती है
मैं किसी झरने सा तुम्हारी देह में गिरती ही रहूँगी
बनी रहूँगी,
तुम्हारी देह का एक उदास चेहरा

मैं अंधेरे में हाथ उठा कर किसी भाषा मे लिख देता हूँ
प्रकाश से सुंदर कुछ नही!
एक देह जितना हो सकती है अब उस अंधेरे में चुप रहती है

मैं ‘वे दिन’ को पढ़ रहा हूँ तो जान रहा हूँ
अकेलेपन में कितनी भव्यता है
‘रेहन पर रग्घू’ के पन्नो में छुपी नसीहतें जगाती हैं
कि नामवरो का हासिल कुछ नही!

एक आत्मा, एक देह से पूछ बैठती है
तुम आखिर करना क्या चाहते हो

दस हजार फीट की किसी अनाम ऊँचाई से वीरेंद्र डंगवाल कहते हैं

सुनो राम सिंह!
मैं ‘सुनो वीरू’ सुनता हूँ

एक आत्मा, एक देह से अब सहमत है साहब!
कविता को खत्म करने के लिए इससे सुंदर जगह
कोई और नही

६-

[ दोनों हाथ ] __________________

मै इतने सुकून में था
कि घुस जाने दिया चींटियों को अपने पैरों की नसों में
एक दिन को माना पिछले दिन का पुनर्जन्म, जहाँ गलतियां पुण्य में बदली जा सकती थी
और हर रात को मृत्यु का पूर्वाभ्यास!
अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण है उस रात के बाद सुबह मेरा जाग जाना!

रात-दिन के इस खेल में इतना सकून था कि मैंने दोनों हाथों से अपना मौन लुटाया!

घावों को यूँ रखा खुला
कि वायु उनका चेहरा चूम सके
मानो वह युद्ध में कट मरे अपराजित योद्धा हैं

मैं इतना गुस्से से भरा था कि एक पूरा दिन बड़े सकून से अपने जबड़ो में चबाया.
मैं इतना अधिक आशा से भरा था
कि चुपचाप देखता रहा
एक व्यग्र कवि को,
जो अपने पक्ष से धीरे-धीरे हट रहा था
धीरे-धीरे जो एक समूची पृथ्वी के पक्ष में जा रहा था

मैं अपने सकून की वृक्ष-छाया में
आलोचनाओ के प्रतिउत्तर में ओढ़ा हुआ मौन हूँ
जिज्ञासाओं के पहाड़ की तरह उगा हुआ एक ढीठ
शिनाख्तो का सबसे बड़ा सेंधमार, जिसकी हर सुरंग खुद में खुल रही थी

बावजूद इसके, मैं इतने सकून में था
कि आकाश मेरे लिए बहुत धीमे पक रही एक प्रार्थना है
जिसे एक दिन अचानक मेरे हाथों में गिर पड़ना है

मैं उम्र की व्यग्रता में मृत्यु के सकून का पहला पाठ हूँ
मुझे देर तक पढो
मेरे दोनों हाथ भरे हैं!

७-

मैं कवि हूँ ( नई कविताएं )
____________

१-

चेतना की मुंडेर पर बैठा एक पंछी अपनी गर्दन झाड़ता है कहता है स्मृतियों ने तुम्हे बूढा बना दिया
तुम एक पंछी की तरह हमेशा युवा रह सकते हो
उठो, और झाड़ दो इस भारी बोझ को

नए के लिए बची जगह पर ही रहता है तुम्हारा यौवन

*

बेहद बोर लेक्चरों से ऊब चुका
मेरी कविता में चला आया एक शिक्षक कहना चाहता है छात्रों से
मैंने बचा रखी है खुद के भीतर बेवकूफ होने की तमाम संभावनाएं

चलो, साथ मे बाटते हैं इसे

*

कि एक युग-प्रवर्तक मिल गया मुझे रास्ते मे
युग के बदल जाने के अपराध बोध से दबा हुआ
मैंने उसे अपने युग की एक ताज़ा कविता सुनाई
प्रसन्नता से भरा वह कह उठा
मैं चलता हूँ
मैंने पूछा कहाँ!

उसने कहा, मैं भूल गया था युग बदलने से ज्यादा बड़ा काम है
आदमी को बदल देना

यह भीषण दुख की स्मृति में रची गयी कविता के बसंती दिन थे

*

देर रात आंख खुलते ही मैंने देखा
भाषाविद आपस मे लड़ रहे हैं
कविता के असंस्कारी होने के आरोप पर वहां किसी एक कवि का होना बेहद जरूरी था
पर मैं उस झगड़े से दूर अपनी कविता में आ कर सो गया

*

भोर में,
मैंने नजरे चुराते हुए देखा नदी में स्नान करती स्त्रियों को
और पूछ लिया
नदी का उत्साह पी कर तुम दिन भर युवा रहोगी
या सच मे तुमने ही घोला है अपनी पिछली रात्रि का स्वप्न
इस नदी के पेट मे
कैसे तुम और नदी एक साथ इतनी बावली हो उठती हो
बताओ तो!

मुझ तक स्त्रियों की आवाजें इतनी मंद हो कर आई
मानो वह पांच हजार साल की थकी आवाजे हों

सुनो चले जाओ, हम अपने कपड़े छुपा कर नहाते हैं अब
दूसरा कृष्ण नही चाहते हैं
हम अभी पहले वाले कृष्ण को ही भुगत रहे
मैं आगे बढ़ गया
यह सोचते हुए कि आगे कभी महाभारत होगी तो मेरी भूमिका क्या होगी
अगर कभी ऐसा हुआ तो
मैं जरूर इस नदी के पास फिर लौटूंगा
और कहुंगा मैं कवि हूँ कृष्ण नही!

२-

एक दिन की बात है
मेरे घर की कुंडी खटखटा कर
रहस्य ने भीतर चले आने की इच्छा प्रकट की
मैंने पूछा कौन हो तुम

उसने कहा मेरा परिचय ही मेरी मृत्यु है
मैंने कहा आओ, भीतर चले आओ

उसके बाद उस शहर में
एक आदमी बढ़ गया था और एक कवि घट गया था
घट गया कवि, अपनी कविता में था जिसे लोग पढ़ते नही थे
बढ़ गया एक आदमी कविता लिखता था और कहता था
मैं कवि नही, एक रहस्य हूँ!
उससे कोई बात नही करता था

शहर के बूढ़े अब सिर्फ बूढ़े थे
पता नही किसने, उनके शहर के रहस्य में सेंध लगा दी थी

उनका शहर अब बिल्कुल आम शहर था
जिसकी तमाम खासियतें कभी उन बूढ़ों की आंखों में चमकती थी

३-

टोटकों से भरी पड़ी है पृथ्वी
चलने से पहले कोई दही का तिलक लगवा रहा है
कहीं गाँव मे डायन ढूंढ ली जाती है
मुंडेर पर बैठे कौवे में भी अनिष्ट संकेत ढूंढ लिए हैं लोगो ने
द्वार पार करने के लिए पहले उठे शुभ दाएँ पैर ने धकेल दिया है
अशुभ बाएं पैर पर विज्ञान के दावों को

कोई नही लेता अब भयानक बीमारियों का नाम
बेवजह नही कोसता कोई किसी को
किसी अफवाह सी बैठी रहती है सरस्वती हमारी जिव्हा पर
कि चौबीस घंटे में एक बार वो जो बोलेगी वही घटेगा आगे चल कर

हिचकी और छींक में बनते बिगड़ते हैं जिनके काम
अनिष्ट चला आता है सभी टोटकों को धता बता कर
कि मान जाओ मेरा आना तय है जैसे तय है सुखों के दिनों का चले आना
पर कहीं कोई एक यकीन का धागा बंध जाता है
धरती पर एक टोटके का बोझ और बढ़ता है

मैं सोचता हूँ
धरती के तमाम इंसानों में एक कवि का होना
पृथ्वी का आजमाया एक टोटका तो नही!

【 वी रु 】

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