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काश बुरके के भीतर लिपस्टिक की बजाय सपना पलता!

फिल्म लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ पर एक अच्छी टिप्पणी युवा लेखिका निवेदिता सिंह की- मौडरेटर

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लिपस्टिक अंडर माए बुरखा फ़िल्म तब से चर्चा में है जबसे से इसका निर्माण शुरू हुआ है पर फ़िल्म ज्यादा चर्चित तब हुई जब रिलीज से पहले फ़िल्म सेंसर बोर्ड में अटक गई। अटकना लाज़िमी थी जिस देश में औरतें अपनी छोटी छोटी ख़्वाहिशो का गला अपने गले के भीतर ही घोंट देती हों उस देश में औरतों के सेक्स सम्बन्धी इच्छाओं को इतने खुले तरीके से पर्दे पर प्रदर्शित करने के लिए सर्टिफिकेट आसानी से मिल जाता तो सेंसर बोर्ड जनता को क्या मुँह दिखाता भला। खैर सेंसर बोर्ड को यहीं रोकते हैं बात करते हैं फ़िल्म की जिसके रिलीज का इंतेज़ार लम्बे समय से कर रही थी।  फ़िल्म का निर्देशन किया है अलंकृता श्रीवास्तव ने और फ़िल्म की केंद्र बिंदु हैं चार स्त्रियाँ जिसमें से दो हिन्दू और दो मुस्लिम समुदाय के परिवेश को दर्शाती हैं। फ़िल्म की पूरी कहानी इन्ही चारों औरतों के इर्द गिर्द घूमती है।

बुआ जी (रत्ना पाठक शाह), शिरीन (कोंकणा सेन शर्मा), लीला (आहना) और रेहाना (प्लाबिता बोरथकर) चारों भोपाल की संकरी गलियों में बने हवाई महल की निवासी हैं और खिड़कियों को खोलकर हाथ फैलाकर चाँद छूने की जुर्रत करती हैं जो हर तरह के समस्या की मूल जड़ है। फ़िल्म का एक सीन जिसमें स्विमिंग कोच बुआ जी से उनका नाम पूछता है और बुआ एक सेकंड भी गँवाये बिना तपाक से बोल पड़ती हैं बुआ जी और फिर कोच आश्चर्य से पूछता है…क्या.. बुआ जी.. आप मेरी बुआ तो नहीं है..तब दिमाग पर जोर डालते हुए बुआ जी अपना नाम उषा बताती है समाज पर एक जोरदार तमाचा है जिसमें औरतें रिश्ते और रिश्तों के नाम ढोते ढोते अपनी पहचान क्या अपना नाम भी भूल जाती हैं। पर उसी बुआ जी को जो अपना नाम तक भूल चुकी थी अपनी शारीरिक जरूरतों और दबी हुई इच्छाओं की पूर्ति के लिए सेक्स से ओत प्रोत उपन्यास पढ़ते हुए खुद को उस उपन्यास की नायिका की तरह देखना और उसके लिए स्वीमिंग कोच जो कि एक नौजवान लड़का है आधी रात को फोन करके उससे सेक्स और प्रेम की बातें करना गले नहीं उतरता है। इच्छाएँ होना गलत नहीं है वह किसी भी उम्र में हो सकती हैं पर इंसान होने के नाते इच्छाओं पर काबू करना भी हमें आना चाहिए जब तक कि उसके लिए कोई सही उपाय न मिल जाये। फ़िल्म में अगर बुआ जी को किसी से प्रेम करते दिखाया गया होता और स्वाभाविक रूप से इच्छाएँ जन्म लेती तो शायद यह इतना अखरता नहीं। एक बार सोचना चाहिए था अगर बुआ जी की जगह एक पचपन साल का पुरुष होता जो अपने से 20 साल छोटी लड़की से ऐसी बातें करता तो लोग यही बोलते कि आदमी तो होते ही चरित्रहीन हैं और इसी के साथ न जाने और क्या क्या। जो बात एक पुरुष के लिए गलत हो सकती है उसे किसी औरत के लिए जस्टिफाई कैसे किया जा सकता है।
शिरीन तीन बच्चों की माँ है जो अपने पति से छुपकर एक कम्पनी में नौकरी करती है।  उसका पति (सुशांत सिंह) उसका इस्तेमाल सिर्फ एक वस्तु की तरह सेक्स के लिए करता है जिसकी वजह से तीन बच्चों को जन्म देने के अलावा शिरीन तीन बार एबॉर्शन करवा चुकी है। डॉक्टर उसे सलाह देती है कि इस तरह बार बार एबॉर्शन करना उसके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं इसलिए उसके पति को कंडोम इस्तेमाल करने के लिए कहती है पर जब वह कंडोम लेकर घर पहुँचती है और पति को इस्तेमाल के लिए देती है तो पति उस पर कंडोम खरीदने के नाम पर गन्दी और बेहुदा होने का लाँछन लगाता है। जब शिरीन डर के मारे उससे झूठ बोलती है कि उसे फ्री में दिया गया है तब वह कंडोम उठाकर फेंक देता है और हर बार की तरह फिर से उसका रेप करता है जिसके लिए हमारे समाज में औरतों की कोई सुनवाई नहीं है। अगर देखा जाए तो पहले की तुलना में कंडोम का इस्तेमाल बढ़ा है पर सोचने वाली बात यह है कि अधिकतर विवाहित पुरुष आज भी  गर्भ निरोधक के लिए अपनी पत्नी पर ही निर्भर हैं इसलिए शिरीन की कहानी हमारे देश की कई सारी औरतों की जिंदगी की हकीक़त है। फ़िल्म के दो और पात्र हैं लीला और रेहाना। लीला एक ब्यूटिशियन है जो पूरी फ़िल्म में अपने बॉयफ़्रेंड (विक्रांत मैसी) और प्रेमी के बीच में झूलती रहती है। वह जिंदगी में सेक्स के अलावा क्या चाहती है समझ से परे है। वह अपनी माँ से जबरदस्ती उसकी शादी किसी और से करवाने के लिए लड़ती है। आर्थिक रूप से निर्भर है ।खुलेआम सेक्स करती है फिर भी अपनी मर्जी से शादी का फैसला नहीं ले पाने की बात पल्ले नहीं पड़ती। चौथा कैरेक्टर रेहाना एक टीनएज लड़की है जिसे उसके माँ-बाप जो कि सिलाई का काम करते हुए एक बेहद साधारण जीवन जीते है कॉलेज पढ़ने के लिए भेजते हैं। रेहाना के सपनों के लिए उसका घर बहुत छोटा है। रेहाना छुप छुपकर मिले सायरस के गाने सुनती है और उसकी तरह ही कॉलेज के बैंड के लिए गाना चाहती है। इसके लिए रेहाना सिगरेट फूँकने से लेकर मॉल से स्टाइलिश कपड़े और बूट चोरी करने तक का काम करती है जो युवाओं के क़दम भटकने की तरफ इशारा करता है। यहाँ मन में एक कसक सी उठती है कि उसे एक मौका मिला था काश वह मन लगाकर पढ़ाई करती और फिर धीरे धीरे अपने सपनों को पूरा करने की तरफ एक एक कदम बढ़ाती।
फ़िल्म में समाज की मैरिटल रेप, औरतों की दमित इच्छाओं, पाबंदियों जैसी कई सारी कड़वी सच्चाइयाँ बयाँ की गई हैं पर पर सबसे ज्यादा जोर औरतों की सेक्सुअलिटी पर दिया गया है। सेक्स जीवन का एक हिस्सा हो सकता है पूरा जीवन नहीं। फ़िल्म के कुछ सीन जरूरत से ज्यादा बोल्ड है जिसकी फ़िल्म में कोई खास जरूरत नहीं जान पड़ती। इसके बिना भी फ़िल्म को मजबूत कहानी और निर्देशन के बल पर एक कदम आगे ले जाया सकता था। काश फ़िल्म के पात्र अपने पैर पर खड़ा होने और अपने सपने को जीने के लिए लड़ते। काश बुरके के भीतर लिपस्टिक की बजाय सपना पलता और उसको पूरा करने के लिए औरतों में जुझारूपन दिखता।
इसमें कोई दो राय नहीं कि सभी पत्रों ने अपने-अपने कैरेक्टर के साथ न्याय किया है खासकर बुआ जी और शिरीन ने पर कहानी और संवाद थोड़े और मजबूत होते तो फ़िल्म देखने का मजा दोगुना हो जाता। अगर रेटिंग की बात की जाए तो मेरी नजऱ में 5 में से 2 ही पॉइंट मिलना चाहिए पर एक पॉइंट ज्यादा मैं अलंकृता श्रीवास्तव को सिर्फ इसलिए देना चाहूँगी कि उन्होंने औरतों से जुड़े एक ऐसे विषय को उठाया है जिसकी जरूरत हमारे समाज ने कभी महसूस ही नहीं की।
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3 comments

  1. मैंने फिल्म तो अभी नहीं देखी।जल्द ही देखूँगा।निवेदिता जी की टिपण्णी से मैं भी सहमत हूँ। बाकी राय फिल्म देखने के बाद ही दूँ तो ठीक रहेगा।

  2. सोच रहा हूँ कि ये समीक्षा किसी पुरुष ने लिखी होती तो क्या होता ।
    सच्ची समीक्षा ।

  3. फ़िल्म में समाज की मैरिटल रेप, औरतों की दमित इच्छाओं, पाबंदियों जैसी कई सारी कड़वी सच्चाइयाँ बयाँ की गई हैं पर पर सबसे ज्यादा जोर औरतों की सेक्सुअलिटी पर दिया गया है। सेक्स जीवन का एक हिस्सा हो सकता है पूरा जीवन नहीं।यही इस फिल्म की सच्चाई है.इससे ज्यादा कुछ नहीं है.

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