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युवा शायर विजय शर्मा की कहानी ‘लिविंग थिंग’

आज पेश है युवा शायर विजय शर्मा की कहानी लिविंग थिंग – त्रिपुरारि

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छुट्टियों वाले दिन नींद अक्सर जल्द खुल जाया करती है..यदि छुट्टी सोमवार की हो, तो शायद और भी जल्द.. सुबह के नौ बज चुके थे और अयान अबतक अपनी बिस्तर में क़ैद था.. हालाँकि पिछले दो घंटे से वह जगा हुआ था किन्तु अब तक बिस्तर से बाहर नहीं आ सका..इस दो घंटे में उसने लेटे लेटे घर की उन जगहों को कई बार देख चुका था, जहाँ तक उसकी नज़र आसानी से जा सकती थी.. यह फ़ुर्सत की नज़र थी… आये दिन वह अपने काम में इस तरह से व्यस्त रहता कि घर का ख़याल सिर्फ़ सोने के समय या ऑफिस जाते हुए दरवाज़ा बंद करते समय आता…इस बीच उसकी दृष्टि कई बार घर की उस दीवार पर गयी, जहाँ से पिछले दिनों एक तस्वीर गिर कर टूट गयी थी.. किन्तु फ्रेम का अक्स अब भी दीवार पर महसूस किया जा सकता था…   इस दौर में या शायद किसी भी दौर में इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी ये रही है कि वह चाह कर भी कहीं रुक नहीं सका है.. समय की ज़ंजीर में बंधा वह चाहे अनचाहे घिसटता हुआ आगे निकल ही जाता है.. अयान भी थक हार कर बिस्तर से निकला और वाशरूम की तरफ़ चल दिया….

वापस आकर उसने अच्छे भले कपडे पहने और आगे क्या करना है, ये न सूझ पाने पर चुप चाप बेड पर बैठ गया… इस समय उसकी दृष्टि घर के हर कोने में जा रही थी.. वह ख़ामोशी से घर के हर कोने को देख रहा था… कभी कभी ऐसा होता है कि हम अपने कमरे में बैठे- बैठे कुछ इस तरह गुम हो जाते हैं कि हमारे अस्तित्व की सच्चाई उस कमरे मे से जुडा वहम हो जाती है… शादी के पहले जब रूही अयान के इस फ्लैट में पहली बार आई थी, तो कमरे की बेतरतीबी को देखते हुए उसने कहा था कि -‘कमरा लिविंग थिंग होता है, तुम्हें पता है? यह अपने रहने वालों के साथ साथ साँस लेता है.. हमें कमरे में चीज़ें ऐसे बरतनी चाहिए कि इन चीज़ों से कमरे को घुटन न हो, क्यों कि घुटती हुई जगह पर हम नहीं रह सकते… और एक दिन इस घुटन से तंग आकर हम कमरा त्याग देते हैं?’ दो घड़ी चुप रह कर रूही ने फिर कहा -‘हम कमरे को त्याग कर भी कमरे में रह सकते हैं, ठीक उसी तरह जैसे दो लोग एक समय के बाद जाने अनजाने अपने रिश्ते को त्याग कर भी एक साथ रहते हैं, किसी जाने पहचाने अजनबी की तरह..” अयान को कहाँ इन सब बातों से सरोकार था …उसे तो बस इतना पता था कि भविष्य में रूही और वो इस फ्लैट में रहने वाले हैं, पर तस्वीर तोड़े जाने वाले दिन के बाद से अयान कुछ बदल सा गया था,.. अब अयान को रूही कम और उसकी कही गयी बातें अधिक याद रहती थीं..अयान इस समय पूरे संसार से इस तरह कट के बैठा हुआ था, कि उसे ये कमरा ही संसार लग रहा था..एक बिखरा हुआ संसार..उसे लग रहा था कि जैसे काफी दिनों के बाद ये कमरा खोला गया हो, और अभी तक कमरे की सारी चीज़ें एक ऊंघती सी नींद में सो रहीं हों, जैसे इसकी दीवारें उसे देख कर भी अनदेखा कर रही हों..उसकी दृष्टि बार बार कमरे के कोनों में जमी धूल और दीवारों में लगे जालों में फँस जा रही थीं.. हाँ पिछले छः महीने में इसने शायद ही दूसरी या तीसरी बार कमरा साफ़ किया हो.. आगे कुछ भी न सूझ पाने पर वह म्युसिक सिस्टम के पास बैठ कर गाने चलाने लगा..दो तीन गानों के बाद उसके कान से अचानक उस गाने की धुन टकराई जिससे रूही को काफ़ी चिढ़ थी..इस गाने के साथ जैसे अतीत का अधखुला दरवाज़ा एक गहरे झटके से पूरा खुल गया…एक क्षण को उसे लगा जैसे रूही आकर अभी सिस्टम की स्विच ऑफ करने वाली हो..किन्तु अगले ही क्षण सब फिर से नार्मल हो गया..नार्मल…वो तो होना ही है..दरअसल हमारे अतीत की सारी समृतियाँ हमें जड़ से विचलित नहीं कर सकतीं, हमारी अस्तित्व की निचली तहों तक सिर्फ वो स्मृतियाँ ही जा सकती हैं, जिनमे कभी हमारा स्वार्थ छिपा था..वह स्वार्थ वह इच्छा जो तब पूरी न हो सकी थीं और अब कभी पूरी नहीं होगी.. फिर भी..स्मृतियों के इन क्षणों में हमें उस व्यक्ति का हल्का से अक्स ज़रूर नज़र आ जाता है, जिनसे हमारी इच्छाएँ जुड़ी हुईं थीं.. रूही अचानक अयान की दृष्टि से गुज़र गयी थी..

वह बैठे बैठे सिस्टम के पास जमा डीवीडी खँगालने लगा..धीरे धीरे एक एक करके सारी डीवीडी निकालता गया..कुछ देर में शेल्फ़ पूरी तरह ख़ाली था….. ‘अरे आख़िर गयी कहाँ?’ उसने बुदबुदाया..उसकी बेचैनी बढ़ी और इसी बेचैनी के साथ उसका तलाशी का दायरा भी बढ़ने लगा…शेल्फ़ की तलाशी कमरे की तलाशी में बदल गयी..इस तलाशी में दो बियर कैन, तीन जोड़ी मोज़े, दो गन्दी टाई, एक रूही की गिफ्ट की गयी टी शर्ट, रूही का पॉवर ग्लास और दो रंग उतरी बालियाँ निकल आयीं…अचानक इन चीज़ों से घिरा अयान ख़ुद को अब और अधिक क़ैद महसूस कर रहा था..उसके आगे जैसे अतीत सांस लेने लगी थी, किसी लिविंग थिंग की तरह….. उसने परेशानी में एक गहरी साँस भरी और साँस छूटते ही उसके मुँह से अनायास ही निकला -‘वो दिन ही अच्छे थे यार’

कौन से दिन आख़िर कौन से दिन अच्छे हैं? शायद वे जिन्हें गुज़ारते हुए हम जिंदा बच निकले हैं.. पर वाकई वे दिन इन दोनों के लिये बहुत अच्छे थे..और सबसे अच्छे तो तब थे जब दोनों एक दूसरे को चेहरा या बहुत अधिक तो नाम से जानते थे..कॉलेज के दोस्तों के बीच इन दोनों में बात चीत बहुत कम होती थी.. शायद मतलब भर की..किसी बात हँसते हुए जब दोनों की आँखें मिलती तो अयान ये सोच कर हँसना बंद कर देता कि वह हँसते हुए अच्छा नहीं दीखता है.. उन पॉवर ग्लास के पीछे की दो बड़ी बड़ी आँखों को अयान सबसे छुपकर देखा करता, उससे भी….कभी कभी रूही भी उसके एहसास के धागे पकड़ लेती किन्तु बहुत जल्द उसपर अपने दाँत बिठाकर प्रेम के आकाश में अकेले लहराने के लिये छोड़ देती..इन दिनों दोनों पूरी तरह आज़ाद थे..अपनी अपनी ज़मीन पर मौजूद..दोनों में प्रेम की ख़ूब संभावनाएँ थीं.. गुज़रते समय के साथ दोनों में से किसी को भी यह पता नहीं चल सका कि कब दोनों ने एक साथ चलने का फ़ैसला कर लिया… अयान उन दिनों थोड़ी बहुत फोटोग्राफी किया करता था..इसी धुन में उसने रूही की कई तस्वीरें ली, रूही ने भी अयान की कुछ तस्वीरें लीं और कुछ तस्वीरें जिसमे दोनों साथ थे, उन्हें या तो उनके दोस्तों ने या कुछ अजनबियों ने इनकी आग्रह पर ली थीं..वो डीवीडी कैसेट इन्हीं पलो का सरमाया था..उनमे ये सारी तस्वीरें मौजूद थीं..पूरा कमरा छान मारने के बाद भी जब कैसेट हाथ न आया, तो वह समझ गया कि  रूही अपने बाक़ी सामानों के साथ ये कैसेट ले गयी है.. एक पल को उसे इतना ग़ुस्सा आया कि यदि इस समय रूही वो कैसेट लिए इसके सामने खड़ी होती तो, उसे एक झापड़ खींच के लगाता और उसके हाथ से वो कैसेट छीन लेता… वह सर से पैर तक परेशान था..उसने फ्रिज से पानी निकाल कर्पियावौर सोचने लगा कि आगे क्या करना है! करना क्या है …फ़ोन कर के चार बातें इतनी ज़ोर से डांटनी हैं कि उसके होश ठिकाने आ जाएँ ..मेरे कैमरे से खींची गयी तस्वीरों पर उदका हक कैसे…? अयान ने उसे फ़ोन लगाया.. फ़ोन की हर रिंग के साथ उसका क्रोध दुगुना होता जा रहा था, और अचानक,

-हैल्लो !

इससे पहले कि अयान कुछ कह पाता, उसका गला सूख चुका था, उसने फिर दो घूँट पानी पिया..

-‘हलो?’

-‘ हाँ सुनो मैं बोल रहा हूँ’ अयान का ग़ुस्सा ख़त्म हो चुका था

-‘हाँ मैंने वकील से बात की है, समय हो चुका है! अब डाइवोर्स फाइल की जा सकेगी..’

दोनों तरफ़ अचानक एक ऐसा मौन छा गया, जिसमे निहित आँसू कब के सूख चुके होते हैं ..रह जाता है तो बस सूखे आंसुओं का निशान, सूखे हुए खून की तरह..

-‘अच्छा फ़ोन रखती हूँ’ -मौन टूट गया

-‘अ.. रुको , मैं …दरअसल … वो कैसेट तुम ले गयी क्या?’

-‘ कौन सी, मैंने सिर्फ़ अपने हिस्से की चीज़ें ली हैं…बाक़ी तुम्हारी चीजें वहीँ हैं..और कोल्डप्ले वगैरह के कैसेट्स तो मैं हाथ तक नहीं लगाती थी… वहीँ पड़ीं होंगी ढूँढ लो…’

-‘नहीं मैं… मैं तस्वीरों वाली डीवीडी कैसेट की बात कर रहा हूँ’

-‘तुम्हें जल्द डाइवोर्स नोटिस मिल जायेंगे!’

फ़ोन काट दिया गया

अयान कुछ देर चुप चाप बैठा रहा… वह किसी बहाने शायद एक बार और उसकी आवाज़ सुनना चाहता था.. वह आवाज़ जिनमे गुज़रे दिनों की कई कहानियाँ मौजूद थीं..उसे एक मन तो हुआ कि वह रूही को फोन करे तथा उसे उसका चश्मा और रंग उतरी बालियाँ लौटाने की बात कहते हुए कहे कि -‘तुम्हारे हिस्से की दो चीज़ें यहीं रह गयीं है, इन्हें भी ले जाओ’ पर अगले ही पल उसे महसूस हुआ कि उसके पास अब यही दो चीज़ें बच गयी हैं, जो इस टूटे हुए रिश्ते का सरमाया है…

वह धीरे धीरे कमरा ठीक करने लगा.. शाम तक कमरा ठीक हो चुका था..अयान अब इसे रूही की लिविंग थिंग की तरह महसूस कर सकता था…

समय अपनी गति से आगे निकलता रहा… रात गयी फिर दिन गुज़रे.. वह फिर से अपनी नौकरी में मशरूफ़ हो गया.. कमरे में धूल फिर से जमने लगी.. एक शाम काम से वापिस आकर जब उसने अपने फ्लैट का दरवाज़ा खोला और लाइट जलाई तो फर्श पर उसे एक लिफाफा नज़र आया, लिफ़ाफ़े पर न कोई कोरियर टैग था और न ही कोई पता..जैसे किसी ने ख़ुद ही दरवाज़े के नीचे से लिफ़ाफ़ा इस कमरे में डाल दिया हो…लिफ़ाफ़ा हाथ में लेते ही वह समझ गया कि इसमें डीवीडी है..’ तो क्या रूही ख़ुद आई थी?’ अयान ख़ुश होते होते रह गया… फिर भी एक दबी सी उत्सुकता उसके मन में ज़रूर थी, जिसे वह ख़ुद भी नहीं समझ सकता था.. इसी दबी हुई उत्सुकता की वजह स वह सीधे अपने कमरे में गया तथा पानी पीने से अधिक आवश्यक टीवी चलाना समझा..उसने झट से लिफ़ाफ़े से कैसेट निकाली.. कैसेट  नया था, जैसे डुप्लीकेट करा के दिया गया हो.. उसने कैसेट से डीवीडी में चला कर लाइट ऑफ़ की तथा बिना मोज़े उतारे ही अपने बेड पर बैठ गया..

कुछ ही क्षणों में दोनों की पुरानी पुरानी तस्वीरें एक एक कर टीवी स्क्रीन पर मुस्कुराने लगीं..पहले अलग अलग, फिर एक साथ… कमरे में इस समय रौशनी थी तो इन मुस्कुराती हुई तस्वीरों की वजह से … इसी बीच फोन बजा..

-‘हलो’

-‘हाँ ,मैं बोल रही हूँ (एक हिचकिचाहट भरी आवाज़)

-‘ये भी कोई वक़्त था आने का, तुम्हे तो पता है कि मैं 7 बजे के बाद ही लौटता हूँ, इस वक़्त आयी होती,कम से कम इस एहसान के बदले तुम्हें चाय तो पिला देता’

-‘ मैंने चाय पीनी छोड़ दी है’

-‘अच्छा! ख़ैर .. शुक्रिया ..कि तुमने डीवीडी शेयर की.. तुम्हारा ये अहसान याद रखूँगा, और वैसे भी यादें ही तो रह जाती हैं, चीज़े और लोग कहाँ टिक पाते हैं’

-‘कुछ चीजों को संभाल कर रखनी होती है.. लोगों को भी’

-‘लोग संभाले संभलते कहाँ हैं?’

-‘लोग सँभल भी जाएँ तो रिश्ते नहीं सँभलते है न ! छोड़ो, डीवीडी कैसेट के साथ जो पेपर्स थी, उसे ग़ौर से पढ़ लेना और साइन कर के भिजवा देना..’

फोन कट गया था…

अयान एक क्षण के लिये अचंभित तो हुआ, किन्तु अलगे ही पल उसे बात समझ आ गयी.. उसने सामने पड़ा डीवीडीका लिफ़ाफ़ा उठाया और फिर से जाँचा.. हाँ , एक और पतला सा लिफ़ाफ़ है तो इसके अन्दर..उसने लिफाफा खोला..ये डाइवोर्स पेपर्स थे.. वह इसे खोल कर पढने की कोशिश करने लगा, किन्तु पढने के लिए यह रौशनी बहुत कम थी.. हालाँकि वह रूही की पसंद और ना पसंद से इतना वाकिफ़ था कि काग़ज़ पर छपे शब्दों को छू कर ये जान सकता था कि रूही ने कौन कौन सी शर्तें इस तलाक़ के लिये रखी है..टीवी स्क्रीन पर अब भी दोनों की तस्वीरें एक के बाद एक मुस्कुरा रही थी, अयान जैसे साँस रोके किसी गहरी सोच में डूब गया और इन सबके बीच कमरा किसी लिविंग थिंग की तरह उदास हो चुका था….

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