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उर्दू का मैं पहला शायर हूँ जिसकी किताब के अपनी ही जिंदगी में इतने एडिशन छपे

आज साहिर लुधियानवी का जन्मदिन है. उनका नाम याद आते ही मोहब्बत और मोहब्बत के अफ़साने याद आने लगते हैं. लेकिन उनसे उनके कई समकालीन बेहद जलते भी थे. तरक्कीपसंद लेखक हंसराज रहबर ने अपनी आत्मकथा ‘मेरे सात जनम’ में साहिर की खूब खबर ली है. तारीफ कर कर के खबर ली है. उसी पुस्तक से एक अंश- मॉडरेटर

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इस बीच साहिर लुधियानवी पाकिस्तान छोड़कर अचानक हिन्दुस्तान आया। उसने युसुफ जमई के सहयोग से ‘शाहराह’ नामक मासिक पत्रिका निकालनी शुरू की, जिसका दफ्तर जामा मस्जिद के पास उर्दू बाजार में स्थित था।

साहिर की मोटी लम्बी नाक चेहरे पर अलग से रखी दिखाई पड़ती थी। नाक की तरह कद भी लम्बा था। कूचा काबुल अत्तार के एक काफी बड़े मकान में वह रहने लगा। आबादी वहां मुसलमानों की थी और वह मकान भी किसी पकिस्तान चले गए मुसलमान का था। साहिर खुद, उसकी माँ और एक ममेरी बहन- मुख़्तसर सा परिवार था। उम्र तीस-पैंतीस के करीब थी, पर शादी अभी नहीं की थी और बाद में भी नहीं की। कारण शायद कुछ भी रहा हो, पर यार लोगों का कहना था कि वह शादी के काबिल ही नहीं है। चेहरे से भी पौरुष का अभाव दिखाई पड़ता था। वैसे उसने एक प्रसिद्ध कवयित्री से अपने इश्क की कहानी इधर-उधर फैला रखी थी। उद्देश्य था चर्चा का केंद्र बने रहना।

मोटी-लम्बी नाक के अलावा साहिर की एक विशेषता यह भी थी कि वह आत्मप्रचार में निपुण था। दो छोटे लेखक या यों कहिये लेखक नाम के दो व्यक्ति मुसाहिबों की तरह दायें-बाएं साथ चलते थे। उनका खर्च भी प्रायः वह खुद ही वहन करता था और वहन इसलिए  करता था क्योंकि उसे दो आदमी साथ रखने का शौक था। इसके अलावा उसे खुले हाथ से खर्च करने और खिलाने-पिलाने का भी शौक था। होटल में बैठे खा-पी रहे हैं, शराब का दौर चल रहा है। साहिर बहुत कम पीता था। एक पैग आगे रखकर बैठा रहता और धीरे धीरे सिप करता। जब दूसरे नशे में झूमने लगते तो वह अपनी मोटी लम्बी नाक ख़ास अंदाज में हिलाकर ख़ास अंदाज में कहना शुरू करता:

“ ‘तल्खियाँ’ का पांचवां एडिशन छप रहा है। उर्दू का मैं पहला शायर हूँ जिसकी किताब के अपनी ही जिंदगी में इतने एडिशन छपे।”

‘इसमें क्या शक है? साहिर, तुम इस दौर के सबसे मजबूततरीन शायर हो।” हमप्याला दोस्तों में से कोई न कोई दाद देता। हालाँकि सब जानते थे कि साहिर ने अपने इस ‘तल्खियाँ’ नाम की पुस्तक के ढाई-ढाई सौ के तीन एडिशन खुद छपवाकर इधर-उधर मुफ्त बाँट दिए थे। लेकिन ‘जिसका खाना उसी का गाना’ कहावत तो चरितार्थ करनी ही थी।

“ताजमहल नज्म का तो जवाब नहीं साहिर, उसने तुमने अमर बना दिया है।’ कोई दूसरा बात आगे बढाता और जाम उठाकर आगे कहता ‘पियो दोस्तो, साहिर की ताजमहल नज़्म के नाम पर।”

जाम एक साथ ऊपर उठते और घूँट भरने के बाद सभी समवेत स्वर में गुनगुनाते:

‘मेरी महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे…’

साहिर का कण-कण ख़ुशी से झूम उठा। उसके लिए यही सबसे बड़ा नशा था।

दूसरी बात यह कि साहिर किसी बड़े मशहूर शायर को इसलिए अपने साथ रखता था कि उसकी बदौलत मुशायरों में और अमीर घरानों की निजी महफ़िलों में आमंत्रित होने का मौका मिलता था। इन दिनों असरारुल हक़ मजाज साहिर का मेहमान था और यह मेहमानी तब तक चली जब तक साहिर दिल्ली में रहा।

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