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तकनीक ने बढ़ाया भारतीय भाषाओं का दबदबा

आज ‘दैनिक हिंदुस्तान’ में पत्रकार-लेखक उमेश चतुर्वेदी का लेख प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होने आंकड़ों के आधार पर यह बताया है कि किस तरह तकनीक ने भारतीय भाषाओं को एक नई मजबूती प्रदान की, नई उड़ान दी है, नया आत्मविश्वास दिया है। साभार पढ़िये- जानकी पुल

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भाषाओं को लेकर आम धारणा यही रही है कि वे जब राजनीति का औजार बनती हैं, तो उनकी ताकत बढ़ती है। उनकी मान्यता बढ़ जाती है और लोग उन्हें लेकर संजीदा हो जाते हैं। लेकिन तकनीक की बढ़ती ताकत इस अवधारणा को झुठलाती दिख रही है। हाल ही में आई गूगल-केपीएमजी की रिपोर्ट यह बताती है कि बढ़ती तकनीक ने भाषाओं को ताकतवर बनाने की राह खोल दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, यू-ट्यूब पर भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली भाषा के स्थान पर तेलुगू काबिज हो चुकी है, तमिल दूसरे नंबर पर है। यू-ट्यूब पर  इस्तेमाल होने वाली भाषा में देश का सबसे बड़ा भाषा समुच्चय हिंदी तीसरे स्थान पर है, मराठी, गुजराती और दूसरी भाषाएं इसके बाद हैं।

इन भाषाओं की ताकत किसी अभियान से नहीं बढ़ी। यह तकनीक के बढ़ते दबाव का नतीजा है। यही वजह है कि घोर अंग्रेजीभाषी ऑन लाइन कंपनी अमेजन हिंदी में अपना प्लेटफॉर्म शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ी है, तो बाकी कंपनियों ने भी इस ओर अपने कदम बढ़ा दिए हैं। यानी आने वाले दिनों में हिंदी की देखादेखी दूसरी बड़ी भारतीय भाषाओं के भी डिजिटल प्लेटफॉर्म होंगे और उन जगहों पर भी स्थानीयता का बोलबाला बढे़गा। इससे हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के बाजार में तो बढ़ोतरी और सहूलियत होगी ही, हिंदी और दूसरी भाषाओं के भी प्लेटफॉर्म बढ़ेंगे।

अब तक की अवधारणा के मुताबिक इन भाषाओं की ताकत और मांग तभी बढ़नी चाहिए थी, जब इनके लिए लड़ाइयां लड़ी जातीं। यूरोप में यूगोस्लाविया का बंटवारा हो या फिर यूरोपीय संघ में श्रेष्ठता-बोध का भाव, भाषाओं की अपनी भूमिका रही है। बांग्ला भाषा को आधिकारिक बनाने की मांग को लेकर पूर्वी बंगाल में उठी आवाज पाकिस्तान के बंटवारे की वजह तक बनी। भारत में भी भाषाओं को  आठवीं अनुसूची में शामिल करने की जो मांग उठती रही है, उसके पीछे भी भाषा को राजनीतिक ताकत दिलाना ही बड़ी वजह रही है। हाल में ओडिशा और झारखंड की सीमा पर पश्चिम बंगाल के इलाके में बोली जाने वाली भाषा ओलचिकी की पढ़ाई  को लेकर रेल और सड़क मार्ग पर लोगों ने जाम लगाया। भोजपुरी, अवधी आदि को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भी कुछ ऐसी ही है।

बेशक अंग्रेजी अब भी भारत में इंटरनेट में इस्तेमाल होने वाली सबसे बड़ी भाषा है, लेकिन गूगल-केपीएमजी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल जुड़ने वाले दस नए इंटरनेट यूजर्स में से नौ भारतीय भाषाओं के होते हैं। गूगल-केपीएमजी की इसी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 50 करोड़ इंटरनेट यूजर हैं, जिनमें से 30 करोड़ भारतीय भाषाओं के हैं। इसी रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि ऑनलाइन अंग्रेजी यूजर्स की संख्या के लिहाज से शहरों का दबदबा है। जहां से भारतीय भाषाओं के सिर्फ 13 प्रतिशत, जबकि अंग्रेजी के यूजर्स की हिस्सेदारी 87 फीसदी है। लेकिन ग्रामीण इलाकों के इंटरनेट यूजर्स  में 69 प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीय भाषा के यूजर्स की है, जबकि सिर्फ अंग्रेजी का इस्तेमाल करने वाले महज 31 प्रतिशत ही हैं। गूगल-केपीएमजी की इसी रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 तक ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले आधे लोग नॉन मेट्रो शहरों के होंगे।

भारतीय भाषाओं के कंटेंट की बढ़ती मांग ही है कि देश के टॉप 25 एप्स में सात और सोशल मीडिया व मैसेजिंग वाले चार टॉप एप्स वीडियो और म्यूजिक से जुड़ गए हैं। इसकी वजह यह है कि इन एप्स पर भारतीय भाषाओं में कंटेंट और वीडियो-म्यूजिक की मांग है। गूगल-केपीएमजी की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल गूगल सर्च पर 30 प्रतिशत हिस्सेदारी हिंदी की रही। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 तक भारतीय भाषाओं के इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अंग्रेजी के मुकाबले ढाई गुना बढ़ जाएगी। एक दौर में हिंदी को बढ़ावा देने का काम टेलीविजन और सिनेमा ने किया। लेकिन अब जमाना इंटरनेट का है। कह सकते हैं कि राजनीतिक हथियार बनकर भारतीय भाषाएं भले ही कामयाबी के शिखर पर नहीं पहुंच पाईं, लेकिन तकनीक के जरिए वे अब छा जाने के लिए तैयार हैं।

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  • Web Title:Senior Journalist Umesh Chaturvedi article in Hindustan on 01 october

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