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गीताश्री की कहानी ‘लिच्छवि राजकुमारी’

प्राचीन भारत में रूपवती और गुणवती स्त्रियों के समक्ष जो समस्या थी वही आज भी है- उसे समझने वाला पुरुष कहाँ मिलेगा? प्रसिद्ध लेखिका गीताश्री ने प्राचीन भारत की इस कथा के माध्यम से इसी ओर ध्यान दिलाया है। बहुत प्रासंगिक कहानी है- मॉडरेटर

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लिच्छवि राजकुमारी की सुंदरता, विद्वता और वीरता की चर्चा समूचे नगर में होने लगी थी। रुपवती होने के साथ साथ उसने राजकाज भी सीख लिया था और युद्ध कला में निपुण हो गई थी। उसका लालन पालन राजकुमारों की तरह हुआ था। सभासदों से मुद्दों पर बहस भी कर लेती थी और आवश्कता पड़ने पर राजनीति भी कर लेती थी। लिच्छवि नरेश धनवर्मा उससे समय समय पर सलाहें भी लिया करते थे। लिच्छवियों के वंश की वह पहली राजकुमारी थी जो राजकाज में दक्ष थी और जिसे युद्ध-संचालन का कौशल भी मालूम था। वह बेहद निडर थी और अपने राज्य की सीमाओ को लेकर चौकस –चौकन्नी भी। ऐसी रुपवान-गुणवान बेटी को लेकर राजा बहुत प्रसन्न रहा करते थे, बस उन्हें हर पिता की तरह एक ही चिंता सताती थी कि बेटी के लायक वर कहां से ढूंढे। कहां मिलेगा ऐसा लड़का जो एक वीर-विदुषी बालिका को संभाल सके। जिसका बचपन तीर-तलवारों से खेलने में बीता हो और बाकी समय पोथियां पढ़ने में। जो हर समय सीमा पर जाकर युद्ध लड़ने को उद्धत हो। जो राज्य के कठिन से कठिन मामले भी झट से सुलझाने की क्षमता रखती हो।

नगर में उसकी सुंदरता और वीरता का बखान किया जाने लगा था। सबको लगता था कि राजा एक दिन राजपाट अपनी पुत्री को सौंप कर वानप्रस्थ को चले जाएंगे। राजा के मन में भी ये बात उठती थी। लेकिन वे आशंकित हो उठते थे, क्योंकि आखिर वह एक लड़की ही तो थी। वीरता और विद्वता का अदभुत सुयोग। वह तर्क और तलवार दोनों से पराजित करने की क्षमता रखती थी। राजा चिंता में घुलने लगे कि कहां से इसके लायक वर ढूंढा जाए। अपने पड़ोसी राज्यों में गुप्तचर भेज कर वहां के राजकुमारों का चरित्र पता लगवाना शुरु किया। सुंदर राजकुमारों की कहीं कमी नहीं थी। लेकिन सबमें कोई न कोई खोट निकल आता। राजा और चिंतित हो जाते। अपनी बेटी और अपने राज्य को किसी खतरे में नहीं डालना चाहते थे। उनका राज्य सबसे अलग था जहां सारे फैसले सभासद मिल कर करते थे। जहां राजा फैसले थोपते नहीं थे बल्कि गणतंत्र के लिए बनाए गए सात प्रकार के नियमों पर चलते थे। उन नियमों पर सारे लिच्छवि राजा चलते आए थे और आगे भी चलना था। यही बात उनके राज्य को अन्य राज्यों से अलग करती थी। वे एक खुशहाल राज्य के राजा थे और एक परम सुंदरी, विदुषी पुत्री के पिता भी थे। जिसके लिए सुयोग्य वर ढूंढना उनके लिए चुनौती थी। ऐसा वर हो जो राजकुमारी को समझे, उसे मान-सम्मान दे, उसकी वीरता को आदर से देखे और उसकी विद्वता के प्रति मान रखे। सिर्फ राजकुमारी के रुप से प्रभावित होने वाला वर उन्हें नहीं चाहिए था। इसी चिंता में दिन बीतते गए। कोई रास्ता न सूझता था। राजकुमारी के अनुरुप वर ढूंढना कठिन होता चला जा रहा था। राजकुमारी इन सब चिंताओं से मुक्त अपने को और गुणी बनाने में जुटी हुई थी। उसका पहला लक्ष्य अपना राजपाट, अपनी प्रज्ञा का सुख दुख देखना, संभालना था। उसने विवाह के सपने नहीं देखे थे। तरुणाई ने मन में कुछ फूल खिलाए थे जिन्हें वह अपने कर्तव्य के नीचे दबा देती थी। मन ही मन वो जानती थी कि उसके तेज को संभालने लायक कोई साथी मिले तो वह कदम आगे बढ़ाए। विवाह की चिंता पिता पर छोड़ दिया था।

इधर राजा की चिंता देखकर सभासद भी चिंतित हो उठे। राजा ने अपनी चिंता जताने के लिए एक बार सभा बुलाई। सभी मंत्रीगण, सभासदों के सामने अपनी चिंता रखी।

“आप सबको जानकर घोर चिंता होगी कि मैं किन कारणों से चिंतित रहता हूं इन दिनों। मैं एक राजा के साथ साथ एक पिता भी हूं। दोनों का कर्तव्य मेरे सम्मुख है। मैंने राज हित में ही अपनी पुत्री लालन पालन किया है, ताकि वे शासन व्यवस्था समझ सके, संभाल सके, अपने दायित्वों के निर्वहन में विवेक से काम ले सके, इसलिए उच्च शिक्षा दिलाई। एक शिक्षित प्रशासक प्रजा के हितों की बेहतर रक्षा कर सकता है। लेकिन एक समस्या मेरे सम्मुख आन पड़ी है, जिसके निवारण हेतु, उचित सलाह हेतु आप सबसे मंत्रणा करना चाहता हूं। मुझे आशा है कि आपकी राय से मार्ग सूझेगा।“

लिच्छवि नरेश की विनम्रता के सब पहले से ही कायल थे। वे हमेशा सबको मान देते थे और राजकाज में पारदर्शिता बरतते हुए सबकी सलाह पर अमल करते थे। इसीलिए लिच्छवि गणराज्य के टक्कर में कोई दूसरा राज्य टिकता न था।

राजा की बात सुन कर कुछ पल के लिए सभा में सन्नाटा छा गया। सब सोच समझ कर अपनी सलाह देना चाहते थे। मामला गंभीर था, सलाह भी किसी मामूली इंसान के लिए नहीं, एक अत्यंत रुपवती, गुणवती राजकन्या के हित में देना था। सलाह भी ऐसी हो कि जो राजा की दृष्टि में उचित लगे, सब वाह वाह कर उठे। सब अपने मन में गुणने लगे। एक से बढ़ कर सलाहें बरसने लगीं-

एक मंत्री ने कहा- “हमारी राजकुमारी अत्यंत रुपवती हैं, उनके लिए हमें कोई रुपवान राजकुमार ही खोजना चाहिए। हमें दोनों की जोड़ी मिलानी होगी। विवाह में हमेशा जोड़ा मिलाना उचित होता है। एक का भी रुप कम हो तो दापंत्य में दरार आ सकती है। किसी के मन में हीन भावना घर कर सकती है। यहां बराबरी का बोध अत्यंत आवश्यक है।“

महामंत्री थोड़े गंभीर मुद्रा में बैठे थे। राजा ने उनकी तरफ प्रश्नवाचक नेत्रों से देखा।

महामंत्री ने बोलना शुरु किया- “राजन, सुंदरता ईश्वरीय गुण होती है, वीरता हमें अपने बल पर अर्जित करनी पड़ती है। सौंदर्य सिर्फ स्त्री का देखा जाता है, वीर पुरुषों का नहीं। उनकी वीरता ही उनका सौंदर्य है। जिसके बल पर वीर पुरुष अपने दुश्मनों के स्वप्न में भी भय उत्पन्न कर देते हैं। वीर पुरुष इस पृथ्वी का सौंदर्य, सुख-शांति बहाल रख सकते हैं। राजकुमारी भी वीर हैं, भयहीन हैं, युद्ध कौशल जानती हैं, हमें उनकी टक्कर का कोई वीर पुरुष ढूंढना चाहिए ताकि वीरता का दंभ दोनों में बराबर का रहे। कोई किसी से कम न पड़े।“

स्वभाव से शांतिप्रिय एक मंत्री ने अपनी पारी आने पर प्रस्ताव रखा- “लिच्छवि राजकुमारी के लिए ऐसा वर होना चाहिए, जिसके टक्कर का पुरुष इस भू भाग में कम ही हों। उसे सर्वगुण संपन्न होना चाहिए जैसी हमारी राजकुमारी हैं। वैवाहिक संबंध बराबरी के हों तभी गाड़ी चलती है राजन।“

सभा में एक के बाद एक सलाहें आती रहीं। सबके मत भिन्न भिन्न थे। कोई रुप-सौंदर्य पर जोर दे रहा था तो कोई वीरता पर तो कोई धन-बल पर। किसी ने स्वंयर प्रतियोगिता आयोजित करने की सलाह दे डाली। एक बार की सभा में किसी एक सलाह पर एक राय न बन सकी तो कई बार ऐसी सभा बुलाई गई। राजा की चिंताएं बढ़ती जा रही थीं क्योंकि कोई भी सलाह उन्हें भा नहीं रही थी और न सारी सभा उस पर एकमत हो रही थी। सबकी सलाहें दूसरा व्यक्ति काट देता था। उससे बढ़ कर दूसरी सलाह देकर निरुत्तर कर देता। लगभग भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती जा रही थी।

एक बार इस पर विचार करने के लिए अंतिम सभा बुलाई गई जिसमें किसी न किसी निर्णय पर पहुंचना था।

समूची सभा में दो ही लोग थे अब तक जो चुप रहते थे। वे सबकी सलाहों पर मौन लगा जाते। एक विद्वान कनिष्ठ मंत्री थे। आज उनके बोलने की बारी थी- हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि लिच्छवि राजकुमारी अत्यंत विदुषी भी हैं। उनकी शिक्षा दीक्षा के बारे में हम क्यों भूल जाते हैं। एक स्त्री के लिए उसकी शिक्षा उसके सौंदर्य से बड़ी उपलब्धि होती है। वीरता भी एक गुण है किंतु विद्वता सबसे बड़ा गुण है जो व्यक्ति को विवेकवान बनाता है। सिर्फ वीरता और सुंदरता के बल पर न संबंध चलते हैं न राज कायम रहता है। न प्रजा पर आप कोई छाप छोड़ सकते हैं। सुंदर तो मूर्ख भी होते हैं, वीर तो अराजक भी होते हैं। मूर्खो का इतिहास नहीं बनता, अराजक भी विस्मृत कर दिए जाते हैं, स्मृति में विद्वता बनी रहती है। विद्वता की चमक इतिहास के पन्नो पर चमकती रहती है युगों युगों तक। हमें ऐसा राजकुमार ढूंढना चाहिए जो विद्वान हो, हमारी राजकुमारी ऐसे विद्वान के साथ ही सुखी रह सकेंगी।

इतना बोल कर कनिष्ठ मंत्री शांत हो गए। उनका चेहरा तप गया था। उन्होंने सिरे से सौंदर्य और वीरता दोनों को खारिज कर दिया था। सारी सभा मौन हो गई। लिच्छवी नरेश ने समूची सभा पर उम्मीद भरी निगाह डाली। वे चाहते थे कि किसी एक सलाह पर आम राय बन जाए। ताकि वे अपनी सुयोग्य बेटी के लिए सुयोग्य वर ढूंढ सकें। कई बार बैठकें हुईं और मतभिन्नताएं उभरीं, बात न बन सकी। राजा सोच में पड़ गए- जाने क्या लिखा है उसके भाग्य में। कन्याओ के अतिरिक्त गुण ही कई बार उनके मार्ग में बाधक बन जाते हैं। कभी किसी राजकुमार के लिए ऐसी सभाएं न हुई होंगी। न इतनी चिंताएं कि समूची सभा एक ही दिशा में समस्या का निदान ढूंढने में लगी हो।

राजा की चिंतन प्रक्रिया भंग करती हुई सभा में एक पुख्ता आवाज गूंज उठी। बेहद स्थिर, ठोस और निर्भय आवाज ने सबको चकित कर दिया।

वे एक वयोवृद्ध सभासद थे जो इन दिनों सभा में कम ही बोलते थे। उनकी राय के लिए कोई व्यग्र नही रहता था। वो बीते जमाने की बात हो गए थे। उन्हें भी अपनी उपस्थिति को बोझिलता का पता था। लेकिन इस बार बात कुछ ऐसे मोड़ पर आकर अटक गई थी कि उन्हें बोलना पड़ा।

वे बोले- “महाराज, जिस कन्या के लिए हम वर ढूंढ रहे हैं, हम इतना विचार- विमर्श कर रहे हैं। सबने भांति भांति के विचार प्रस्तुत किए। किसी को किसी के विचार पसंद नहीं आए। आप भी असहमत हुए। यहां सबको अपने विचार सर्वोपरि प्रतीत हो रहे हैं। आप सबके विचारो के प्रित सम्मान रखते हुए मैं एक सवाल पूछता हूं जिसमें मेरे विचार भी शामिल हैं। क्या आपने उस कन्या से उसकी राय पूछी है, उसका पसंद पूछा है जिसके लिए हम वर ढूंढ रहे हैं। जो खुद विवेकवान है, विदुषी है, जिसे अपनी आगे की जिंदगी अपने वर के साथ बिताना है, क्या उचित और न्याय संगत न होगा कि आप उस कन्या से पूछे कि उसे कैसा वर चाहिए। किस तरह के पति का वह स्वप्न देखती है। हमें न उसकी पसंद का पता है न उसके स्वप्नों और आकांक्षाओं का। मेरा मानना है कि शिक्षित कन्याएं अपने लिए हम सबसे बेहतर निर्णय ले सकती हैं। हमें उन पर अपना फैसला नहीं थोपना चाहिए। इस धृष्टता के लिए समूची सभा से क्षमा चाहता हूं।“

वयोवृद्ध सभासद इतना बोल कर अपनी जगह पर बैठ गए। समूची सभा सन्नाटे में डूब गई। इसके पहले कि कोई विवाद-प्रतिवाद होता, मन ही मन प्रसन्न होते हुए लिच्छवि नरेश ने घोषणा करके सबको चौंका दिया-  “राजकुमारी सभा में उपस्थित हों।“

राजकुमारी सभा के विचार विमर्श से अब तक अनभिज्ञ थी। राजा ने उसे अपने पास बिठाया, स्नेह में भर कर पूछा- आप यहां की राजकुमारी हैं, बेटी हैं, हर तरह से सुयोग्य हैं। हम आपमें एक संपूर्ण स्त्री की छवि देखते हैं। हमने इसी तरह से आपकी परवरिश की, कोई कमी नहीं रहने दी। अब समय आ गया है कि हम आपके भविष्य की चिंता करें। कुछ फैसले करें। हम जानते हैं कि एक जनक के रुप में हमारे लिए ये फैसला बहुत भावुक होगा, किंतु जगत की रीत यही है।

राजकुमारी अपने पिता को हैरानी से देखने लगी। उसके कमल नयन फैल गए थे।

“पुत्री, एक उलझन आन पड़ी है। आप ही सुलझा सकती हैं। हम सब कई दिन से यहां विचार-विमर्श कर रहे हैं, किंतु एकमत नहीं हो पा रहे हैं। आपके लिए कैसा वर ढूंढा जाए, स्वंयर के लिए क्या शर्त्ते रखी जाएं। हम किस तरह के राराजकुमारों को न्योता भेजें। आप ही बताएं कि आप जैसी सर्वगुण संपन्न कन्या के लिए कैसा वर चाहिए… सभा आपके विचार जानना चाहती है।“

राजकुमारी शर्माई, गौरवर्ण चेहरा रक्ताभ हो उठा। अधर कंपकंपा कर रह गए। बोल न फूटे। पिता और सभासदो के सामने अपने विवाह के बारे में कैसे बोले। क्या बताए कि कैसे पति का स्वप्न वो देखती रही है। पता नहीं, सब लोग उसे क्या समझेंगे। उसने सोचा भी नही था कि एक दिन ऐसा भी आएगा। अब वह बच नहीं पाएगी। वह कुछ देर चुप रही, भीतर ही भीतर साहस जुटाती रही।

उसे चुप देख कर सभी सभासद और राजा स्वंय आतुर हो उठे। राजा तो अपनी पुत्री की खुशी के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। उनका बस चलता तो स्वर्गलोक से कोई देवता उतार लाते। सबने फिर से आग्रह किया।

आखिर राजकुमारी ने हिचकते हुए अपनी बात रख दी।

“पिताजी, मुझे न सुंदर पति चाहिए, न कोई राजकुमार, न महावीर योद्धा । ऐसे पति की कामना हरेक लड़की करती होगी। मेरा लक्ष्य सिर्फ पति खोजना नहीं, बेहतर इंसान तक पहुंचना है जिसके हृदय में मेरे लिए, मेरी प्रजा के प्रति गहरा आदरभाव हो। जो मेरे रुप पर न्योछावर न हो बल्कि मेरे गुणों की कद्र करे। मुझे बराबरी का मान दे। मुझे ऐसा पति चाहिए जो सबसे श्रेष्ठ और समर्थ कुल में जन्मा हो, उसके माता-पिता श्रेष्ठ हों, जिसका जन्म सबसे पवित्र स्थल पर हुआ हो,  जो सबसे श्रेष्ठ धर्म को मानता हो।“

राजकुमारी की बात सुनते ही सारी सभा वाह वाह कर उठी। राजा की उलझन थोड़ी बढ़ गई। सबसे श्रेष्ठ होने की शर्त्त रखकर राजकुमारी ने कठिनाई में डाल दिया था। राजा और सभा तो अब राजकुमारी की बातें मानने को बाध्य थे। राजकुमारी अपनी शर्ते रख कर मुस्कुराती हुई वहां से प्रस्थान कर गई।

स्वयंवर की तैयारियां शुरु कर दी गईं।

सभी राज्यों में संदेशा भिजवा दिया गया था। राजकुमारी की शर्तों के साथ। लिच्छवि राजकुमारी का स्वयंवर हो तो भला राजकुमार अपना भाग्य न आजमाना चाहेगा। राजकुमारी के रुप-गुण के किस्से दूर दूर तक फैल गए थे। जिसे सुनकर दूर देशों से भी राजकुमार आए। स्वयंवर के दिन भारी भीड़ उमड़ आई थी। सभी राजकुमार सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए तैयार होकर आए थे। सबको लगता था कि वे एक राजकुमारी का हृदय तो आसानी से जीत लेंगे। सबके सब अपने को किसी से कम नहीं समझ रहे थे। एक से एक वीर, धनवान, उच्च कुल के दावेदार वहां मौजूद थे। स्वयंवर में आए राजकुमारों को देख कर प्रजा भी चकित थी कि राजकुमारी के लिए वर चुनना नि:संदेह कठिन होगा। सब एक से बढ़ कर एक जो थे।

स्वयंवर सभा में लिच्छवि महाराज ने राजकुमारी की शर्त्त फिर से दोहराई। स्वयंवर सभा में राजकुमारी अपने पिता के साथ बैठी थी। सामने सारे प्रत्याशी बैठे थे। सब एक एक कर उठने लगे। अपनी श्रेष्ठता का बखान शुरु हुआ। हर प्रत्याशी अपने कुल का जोर शोर से बखान करता, सात पीढ़ियों तक के गौरव का गान करता, अपने जन्म स्थान को सबसे पवित्र घोषित करता और खुद को सबसे श्रेष्ठ कुल का बताता। सभी प्रत्याशी एक से एक गुणवान थे। राजा ये सब देख कर अतिप्रसन्न हो उठे थे कि उनकी पुत्री के लिए कितने श्रेष्ठ राजकुमार उपस्थित हुए हैं। मन ही मन पुत्री की सराहना करते रहे। राजकुमारी ने सबका गुणगान सुना, बखान सुना और स्थिर बैठी रही। उसे किसी ने प्रभावित नहीं किया। उसने किसी राजकुमार के गले में जयमाला नही डाली। राजकुमारों के सिर इस प्रत्याशा में झुकते और फिर निराशा से तन जाते।

सारे सभासद चकित थे कि इतने रुपवान- गुणवान, वीर पुरुषों में से कोई राजकुमारी को पसंद क्यों नहीं आया?  क्या कमी रह गई? इसमें कई राजकुमार उच्चकुल के थे और जिनके पुरखे भी नामी गिरामी थे. उनमें कोई कमतर न था. आख़िर राजकुमारी चाहती क्या हैं? उनकी इच्छा क्या है? राजा और रानी भी पछताने लगे कि क्यों राजकुमारी को वर चुनने जैसा कार्य सौंपा? उसकी शर्तें क्यों मानी? अगर स्वयंवर  विफल होता है तो उनकी घोर निंदा होगी. उनका सिर झुक जाएगा. इसके बाद लिच्छवि कुमारी हमेशा के लिए कुँवारी रह जाएँगी.

स्वंयर के लिए ऐसी भी शर्त कोई रखता है? श्रेष्ठता कैसे मापी जा सकती है? कोई और शर्त हो सकती थी जिसमें राजकुमार भाग लेते, कुछ अनूठा, अदभुत प्रदर्शन करते. थोड़ी कठिन चुनौती होती तो भीड़ कम होती. कई राजकुमार बिना भाग लिए लौट जाते. स्वंयर में भारी भीड़ तो न उमड़ती.

राजकुमारी ने उचित नहीं किया. स्वयंवर सभा, विदूषक सभा में बदलती जा रही थी. जिसे देखो वही अपने कुल का बखान किए जा रहा है. कोई गा रहा है, कोई मूँछों पर ताव दे रहा है. विचित्र दृश्य उत्पन्न हो गया था.

अचानक एक कोने से एक साधारण युवक उठ कर बीच सभा में आ गया. साधारण वेशभूषा, ऊँचा क़द, गौरवर्ण, गठीला शरीर और दर्प मुखड़े से टपक रहा था. बड़ी बड़ी आँखें जिनमें आत्मविश्वास की चमक बाहर तक कौंध रही थी.

सारी सभा स्तब्ध रह गई. कुछ राजकुमारों के ठहाके गूँजे. न राजसी वेशभूषा न आभूषण न पैरों में जडाऊ जूतियाँ , न सिर पर कोई राजसी ताज ! जिस तरह वह सभा में आ खड़ा हुआ, वही सबके लिए चौंकाने वाली बात थी. कुछ मंत्रीगण को उसकी उपस्थिति अनुचित लगी. स्वयंवर सभा सिर्फ राजकुमारों के लिए थी, एक अनजान, बिन बुलाया साधारण अतिथि कहाँ से आन पड़ा? एक राजकुमारी के लिए ऐसे साधारण युवक की कल्पना भी राजा नहीं कर सकते थे। वहाँ सन्नाटा छा गया. फिर कुछ राजकुमार उसे देख कर ठहाके लगा कर अपनी झेंप मिटाने लगे। वे सब पराजित लोग थे जो अपने मुक़ाबले में उतरे एक साधारण युवक को देख कर सिर्फ हँस सकते थे। राजा तो वचनबद्ध थे, राजकुमारी की शर्तों से. राजकुमारी ने तो सबके लिए शर्त रखी थी, उसमें सिर्फ राजकुल के लोग शामिल नहीं होते, साधारण जन भी शामिल हो सकते थे। राजा ने अपनी तरफ से सिर्फ राजकुल को आमंत्रित किया था. फिर यह युवक कौन है और सभा में कैसे आया ? राजा के चेहरे पर अनेक सवाल आए और विलुप्त हो गए.

युवक ने अपनी बाँहें ऊपर उठाई –

सभा को प्रणाम किया , राजकुमारी की तरफ देखा, एक पल को दोनों की आंखों में बिजली कौंधी, युवक ने सिर झुकाया और फिर बोल पड़ा –

“मुझे पृथ्वी ने पाला है, गंगा में डूब गई मेरी नौका और मेरा परिवार समाप्त हो गया. तब से मुझे लहरों ने संभाला, पृथ्वी ने माता की तरह गोद दी, आकाश ने पिता बन कर छत दी, और प्रकृति ही मेरा वास रही , यही मेरा कुल है. मैंने सभी धर्मों का पालन किया, पृथ्वी मेरा जन्म स्थल है. विभिन्न स्थानों पर पलता बढ़ता रहा. प्रकृति में शरण पाई।

मैं दावा करता हूँ कि मेरे माता-पिता , मेरा जन्म स्थल , कुल और धर्म सर्वश्रेष्ठ है.“

सभा में राजकुमारों का अट्टाहास गूंजने लगा। सब मिल कर उस युवक का मखौल उड़ाने लगे। पड़ोसी राज्य के राजकुमार चंद्रसेन ने अहंकार में भर कर उसे ताना मारा-

“आपकी कहानी अदभुत है। अपने जीवन का थोड़ा और खुलासा करें, तनिक राजकुमारी जी को पता चले कि किस प्रकार आपका कुल, जन्म स्थान और माता पिता श्रेष्ठ हैं। आपकी जीविका क्या है, ये भी बताने का कष्ट करेंगे। आप एक राजकुमारी के स्वयंवर में खड़े हैं महाशय, आपमें इतनी चेतना तो होगी। यहां आने के लिए पहले पात्रता हासिल करनी होती है फिर यहां प्रवेश मिलता है। क्या ये बात आप भूल गए हैं?”

दूसरे राज्य के एक और राजकुमार बोल पड़े- “यहां आपको किसने अनुमति दी आने की, क्या आपके पास किसी ने आमंत्रण भेजा था…?”

एक सभासद बोल पड़ा- “यहां साधारण मनुष्य का प्रवेश वर्जित है, तुमने यहां आकर दुस्साहस किया है युवक…”

उसकी बात बीच में ही काटते हुए वृद्ध सभासद ने कड़कदार आवाज में कहा- “राजकुमारी की इच्छा का आप सभी अनादर कर रहे हैं। मत भूलिए कि राजकुमारी ने साधारण जन को शामिल होने का निषेध नहीं किया था। आप सब उनकी शर्त्त को याद करिए जिसके अनुसार कोई भी शामिल हो सकता था जो अपने को श्रेष्ठ साबित कर सके…इस युवक को एक अवसर अवश्य मिलना चाहिए।“

युवक के चेहरे पर अपार शांति थी। वह दृढतापूर्वक सभा में खड़ा रहा। उसने बोलना प्रारंभ किया-

“मैं जब गर्भ के अंधेरों से निकल कर बाहर आया, मैंने पाया कि पृथ्वी ने मुझे माता की तरह पाला पोसा, हवा ने मुझे सांसे दीं, सूर्य ने मुझे ताप दिया, पृथ्वी की समस्त वनस्पतियों ने मुझे भोजन दिया। जो सभी जीवों का आधार है। सूर्य महान है, उसके ताप से किसे इनकार है भला। वही सभी जीवन का आधार है। जब हम पैदा होकर पृथ्वी पर आते हैं तो सबसे पहले हवा हमें सांस के रुप में मिलती है, सूर्य हमें उष्मा देता है। समस्त जीवों का जो आधार है, वही श्रेष्ठ होगा। पृथ्वी का बल सूर्य है, पृथ्वी की सांसे हवा है। मैं पृथ्वी को अपनी माता मानता हूं और सूर्य को पिता। मुझमें सूर्य का वास है। पृथ्वी-सी धीरता है। मैं सूर्य-ताप से युक्त एक पुरुष हूं।“

“महानुभावों, माता का काम है, शरीर प्रदान करना, उसका पोषण करना। हमारे शरीर का पालन पोषण भोजन से होता है। पृथ्वी जो उगाती है हमारे लिए, हम उसे खाते हैं, शिशु से व्यक्ति बनते हैं। पृथ्वी ने मुझे शरीर दिया, इसीलिए वह मेरी माता है।“

“मेरी माता सभी माताओं में श्रेष्ठ हैं। मैं सदा उसके संरक्षण में रहता हूं। वह अपनी सभी संतानों को एक समान मानती है, कभी उनमें भेदभाव नहीं करती। चाहे कोई अच्छा हो बुरा। वह अतीव सुंदरी है क्योंकि घने वृक्ष, फसलें उसके वस्त्र हैं, जिससे उसकी देह ढंकी रहती है। वह सदानीरा है, उसकी गोद में जीवन जल छलछलाता रहता है। समस्त प्राणियों के लिए उसका नीर उपलब्ध है। मैं ऐसी माता का पुत्र हूं, जिन्होंने मेरे भीतर उदात्त करुणा का संचार किया है, निस्वार्थ भाव से सबके काम आना सिखाया है, मुझे क्षमाशील बनाया है और सहृदय भी। मैं सबकी रक्षा करने को तत्पर एक भूमिपुत्र हूं।“

युवक बोलता जा रहा था, सारी सभा सन्न थी। उसकी धीर-गंभीर आवाज सभा में गूंज रही थी और उपस्थित समुदाय पर मंत्रों सा काम कर रही थी। जैसे सब सम्मोहित हो रहे हों। सब अवाक खड़े होकर उस युवक की वाणी को सुन रहे थे।

“पृथ्वी सबसे पवित्र स्थान है, जहां मेरा जन्म हुआ।“

“महाराज, मेरा कुल, मानव–कुल है। बाकी सारे कुल मनुष्यों द्वारा निर्धारित किए गए हैं। उनका उद्देश्य देश, समाज को बांटना है। ऊंच-नीच का भेद पैदा करना है, यहां कोई करुणा, उदारता नहीं होती बल्कि वर्चस्व बोध होता है, उसे कैसे उच्च कुल कहा जा सकता है। मैं कर्म में विश्वास रखता हूं। मैं संसार के प्रति अत्यंत संवेदनशील हूं। मेरे कुल का निर्धारण प्रकृति ने किया है। उसी ने मुझे अपार बलशाली और सामर्थ्यवान बनाया है। मेरा कुल ही श्रेष्ठ है।“

युवक कुछ पल के लिए रुका। उसने राजकुमारी की तरफ देखा-

“हे वीर, विदुषी राजकन्या, मुझे अनेक लोगो ने शिक्षा दी, मेरी सेवा की, मुझे आश्रय दिया, मैं मानव-धर्म में विश्वास रखता हूं। जिसकी आस्था सिर्फ मनुष्यता में है। किसी पूजा-अर्चना में नहीं। मैं कर्म करता हूं। अपने श्रम से जीविका चलाता हूं।“

“अगर आपको मेरी स्थापनाओं पर विश्वास है तो वचन देता हूं कि मेरे रुप में आपको दुनिया का सर्वश्रेष्ठ प्रेमी मिलेगा। जिसकी आस्था सिर्फ मनुष्यता में है, और जो एक वीर, शक्तिशाली, विदुषी कन्या को मनुष्य रुप में स्वीकारने को उद्दत है। मैं आपके सामने इसलिए नहीं प्रस्तुत हुआ कि आप एक राजकुमारी हैं, बल्कि इसलिए कि आपने जो शर्त्ते रखीं थीं, स्वंयवर के लिए, वो कोई असाधारण स्त्री ही रख सकती थी। मैं आपका आशय समझ सका था।“

“मैं एक असाधारण स्त्री का असाधारण प्रेमी बनना चाहता हूं। “

युवक चुप हो गया। उसकी आवाज लरज गई थी। प्रेम तक आते आते वह अत्यंत कोमल और मधुर हो उठा था।

राजकुमारी अपनी जगह से उठ कर खड़ी हो चुकी थी। उनके साथ उनकी दासियां, सखियां सहेलियां भी खड़ी हो गईं। बाकी सब अपनी जगह बैठे रहे।

राजकुमारी ने गौर से युवक के चेहरे की तरफ देखा । माथे पर पसीने की बूंदें चहचहा रही थीं। युवक की बांहे उत्तेजना में फैली हुई थीं। आंखों में प्रतीक्षा और संशय के बादल घुमड़ रहे थे।

युवक ने सभा को स्तब्ध हालत में देख कर दोनों हाथ जोड़े, राजा का अभिवादन करके लौट पड़ा।

पीछे से आवाज आई-

“ठहरो…”

वीणा के तार बज उठे थे युवक के मन प्राण में। वह पलटा। राजकुमारी को उसी सखियां थामे हुए चली आ रही थी, उसकी ओर। हाथ में जयमाला लिए हुए राजकुमारी, ऐसे चल कर आ रही थी मानो किसी मंत्र के गहरे प्रभाव में हो। दासियां पग पग बलैया लिए जा रही थीं। सबके पांवो से रुनझुन की झंकार सुनाई दे रही थी। राजा की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए थे। रानी अपने आंसू नहीं रोक पाई थीं।

बेसुध-सी वह युवक के मोहपाश में बंध गई थी। उसके जीवन में सर्वश्रेष्ठ घटित हो चुका था।

युवक ने सिर झुका दिया।

……

(अज्ञात स्रोत से प्राप्त एक लोक-कथा पर आधारित )

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3 comments

  1. पंकज पराशर

    बेहतरीन रचना. गीताश्री लगातार बेहतर काम कर रही हैं. बधाई.

  2. उर्मिला शुक्ल

    इतिहास के माध्यम से वर्तमान स्थितियों को चित्रित करती एक अच्छी कहानी.

  3. अच्छी कहानी है । गीताश्री को फेबु या अन्य स्थानों पर थोड़ा रुक रुक कर देखता रहता हूँ । भाषा अच्छी और कसी हुई है । पूर्ण विराम के प्रयोग में कहीं कहीं अंग्रेजी का अक्षर के नीचे टाइप किये जाने वाला विंदु दिखा (.) तो अनेक स्थानों पर हिंदी का (।) ।
    पहली नजर में मुझे लगा फूल स्टॉप का प्रयोग एक सोच समझकर किया गया प्रयोग है । पर , बाद के वाक्यों में पूर्ण विराम आते रहे । सत्तर के दशक के मध्य में हिंदी पत्रिका दिनमान में इस तरह के प्रयोग एक एक सुविचारित योजना के अधीन किये जाते थे । संपादक अज्ञेय थे , फिर बाद में रघुबीर सहाय संपादक बने ।
    आज मेरा यह भी मानना है कि जिस तरह हिंदी के अंकों को त्याग कर अंग्रेजी के अंकों को अपना लिया गया है उसीतरह हिंदी के पूर्ण विराम खड़ी पाई की जगह उसके फूल स्टॉप को भी अपना लेना चाहिए । इसका प्रयोग भी प्रारंभ कर देना चाहिए ।

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