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उषाकिरण खान की कहानी ‘पोर्ट्रेट’

हिंदी और मैथिली की वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान की कहानी पढ़िए। एक साधारण सी घटना की करूण कहानी- मॉडरेटर

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नरेश ने बीए पास कर लिया था। इतिहास आनर्स था। उसका रिजल्ट संतोषजनक रहा। उच्च अंक से उसने आनर्स पास किया। छोटा बड़ा प्रतियोगिता परीक्षा की ओर वह मुखातिब था।

                  चुनमुन बाबू का बेटा प्रशान्त साथ ही बीए कर परीक्षाओं में बैठ रहा था। नरेश प्रशान्त के मोटर-साइकिल पर बैठकर ही परीक्षा देने जाता था। नरेश बदले में उनके घर का काम कर दिया करता था। चुनमुन बाबू अपने पुत्र प्रशान्त को व्यंग्य से कहा करते – ‘‘खूब नरेश दास को संगी बनाओ, वह पास हो जायगा तुम फेल के फेल रहोगे वह दलित है रिजर्वेशन है न! तब तुम उसकी गाड़ी के पीछे पीछे भागना वह फर्राटा भर चल देगा।’’ – प्रशान्त पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। प्रशान्त शुरूआती दौर में नरेश को पढ़ाता था अब भी संग साथ नहीं छोड़ता। कई रिजल्ट आये; किसी में न नरेश दास ने पास किया न ही प्रशान्त ने। परन्तु परीक्षायें देते रहे। टेक न छोडा। नरेश की माँ मजदूरिन थीं, एक बहन थी जिसका विवाह हो चुका था। जिन दिनों दरभंगा के कॉलेज में पढ़ रहा था, उन्हीं दिनों नरेश दास ने पेंटिंग सीख लिया था। नरेश दास पोर्ट्रेट बहुत अच्छा बनाता था परंतु छिटफुट बिक्री मात्र मिथिला पेंटिंग की होती वह भी पारंपरिक कला की। नरेश की कमाई का जरिया मूलतः यही था। एक दिन नरेश का बहनोई उसके घर आया था। वह प्राथमिक विद्यालय का शिक्षक था। उसने सलाह दी –

‘‘नरेश बाबू, आपने आनर्स अच्छे अंकों से पास कर लिया है तब क्यों न एमए कर लें। स्कालरशिप मिलेगा ही। फिर बीएड, एमएड कर लेंगे आप, स्कूलों का बड़ा रास्ता खुल जायेगा। प्रतियोगी परीक्षाओं का क्या भरोसा?’’

‘‘आपने सच कहा’’ – नरेश ने धीमे से कहा। माँ सुन रही थी, उसने भी जोर दिया। कहा – ‘‘मुझमें अभी दम खम बाकी है बच्चे, जितना पढ़ना है पढ ले।’’ – नरेश ने एमए में नामांकन करवा लिया। माँ ने एक सेकेंड हैण्ड साइकिल भी खरीद दिया। नरेश साईकिल से कालेज जाता। पेंटिंग का गट्ठर भी लाद कर ग्राहक को दिखाता और बेचता। बचे हुए को केन्द्र की दूकान पर दे आता। अब इससे दिन अच्छे ही बीतते।

                  गाँव में हों कि शहर में राजनीति से कोई अछूता नहीं रहता। वह भी चुनावी राजनीति से। नरेश के सर भी यह आ ही गया। पेंटिंग का भुगतान लेने एक दिन नरेश सेंटर पर गया था, वहाँ एक परिचित मिले जिन्होंने पूछा कि यह किस गाँव का रहने वाला है। बताने पर कहा –

‘‘ऐ नरेश, अपने स्वजातीय नेता जो सबसे बड़े माने जाते हैं वे आपके गाँव के आसपास चुनावी भाषण देने पहुँच रहे हैं। आप ग्रेजुएट हैं, इतने बड़े कलाकार हैं, क्यों नहीं एक बड़ा सा पोर्ट्रेट बनाकर उनसे मिलते हैं।’’

‘‘मैं नेता बनना तो नहीं चाहता कि वो मदद करेंगे।’’

‘‘ए भाई नेता बनने की बात नहीं कह रहे हैं, कहीं, अच्छी नौकरी दिलवा दें यह आशय है मेरा। केन्द्र में बड़े नेता हैं, सजातीय हैं।’’ – कहा उन्होंने।

‘‘भैया बिल्कुल ठीक कह रहे हैं नरेश जी।’’ – केन्द्र वाले ने कहा

‘‘बड़े नेता से मिलने कौन देगा?’’ – नरेश ने शंका की।

‘‘मैं पता करता हॅूं कि आयोजक कौन है, वही मुलाकात करवा देंगे।’’

‘‘आप नेताजी का एक बड़ा सा पोर्ट्रेट बना लें। उपहार पा वे खुश हो जायेंगे। कहीं अच्छी जगह सेटिंग हो जायेगी।’’

‘‘आप सब कहते हैं तो मैं लग जाता हॅूं।’’ – नरेश उनकी बात मानकर पोर्ट्रेट बनाने में जुट गया। एक दिन स्वयं आयोजक आये और मुलाकात करवाने का आश्वासन दे गये।

                  जिस दिन नेताजी का भाषण था उस दिन प्रचंड गर्मी थी। हजारों की भीड़ बड़े फ़ुट्बॉल मैदान में जुटी थी सब बेचैन थे। नरेश ने पोर्टेªट को अखबार से लपेटकर साइकिल में अच्छी तरह बांध लिया था। अखबार की तहें मोटी थीं। चुनमुन बाबू ने देखा तो व्यंग्य भी किया। –

‘‘जाओ जाओ जात फरिया लो, यह जान लो सिर्फ वोट लेने के समय जाति याद करता है, बाकी समय रूपया पैसा और कुछ नहीं।’’ – नरेश चुप था, प्रशान्त संभ्रम में था। नरेश पूर्ण आश्वस्त भाव से मैदान पहुँचा। आयोजक से मुलाकात हुई । उसने कहा – ‘‘उस कोने पर साइकिल स्टैण्ड है वहाँ ताला लगाकर खड़ी कर पर्ची ले लीजिए नरेश बाबू और यहाँ मंच के पास पोर्ट्रेट लेकर खड़े हो जाइये।’’ – नरेश ने वैसा ही किया। गर्मी और प्यास से व्याकुल हो गया था। नेताजी निर्धारित समय से दो घंटे देरी से पहुँचे। नरेश पोर्ट्रेट थामे आगे बढ़ा कि एक बड़ी भीड़ ने धकिया कर इसे दूर फेंक दिया। पोर्ट्रेट बचा रहे सो चोटिल भी हो गया नरेश। आयोजक मंच पर था। नरेश उचक उचक कर उनका ध्यान आकृष्ट करना चाह रहा था पर उन्होंने देखा ही नहीं। निकट खड़े एक गार्ड से नरेश ने कहा – मैंने नेता जी का पोर्ट्रेट बनाया है। कलाकार हॅूं उन्हें देना चाहता हॅूं सो कृपया जाने दें।’’

‘‘नेता जी जेड प्लस सुरक्षा के घेरे में हैं। कोने पर सारे उपहार जमा हो रहे हैं आप भी रख दीजिये।’’

‘‘हम खुद अपने हाथ से देना चाहते हैं।’’

‘‘तब उतरकर जाने लगें तभी देना ठीक रहेगा। आप मेरे पास खड़े रहिये।’’

‘‘ठीक हैं।’’ – नरेश गार्ड की बाजू में खड़ा भाषण सुनने लगा। अचानक काली घटा ने घेर लिया। जबतक लोग संभले जोरदार वारिश होने लगी। चार बजे दिन अंधियारी रात में तब्दील हो गया। श्रोताओं में भगदड़ मच गई। नरेश धक्का मुक्की के फर्लांग भर दूर जा गिरे । होश आने पर पूरा मैदान खाली था। चित्र पर से अखबार नुच गया था, नरेश ने चित्र उलटकर रखा। नेता जी का दल चला गया था। लोग बाग चले गये थे। नरेश निराश हो साइकिल स्टैंड की ओर गया। वहाँ भी कोई नहीं था न साइकिल था। थोड़ी देर भटक भटककर थक गया नरेश फिर अपनी पेंटिंग सर पर ओढ लिया, तीन कोस चलकर पैदल ही अपने घर लौटा। राह देंखती माँ  दौड़ी। हाथ से चित्र लेकर दीवार से सटा कर रखा और आँचल से पुत्र का मुँह माथा पोछने लगी। सूखे वस्त्र दिये बदल लेने को। चौकी पर बैठ नरेश फूट फूट कर रोने लगा। माँ ने कलेजे से सटा लिया।

‘‘माँ साइकिल चोरी हो गई, चित्र धुल गया, नेता जी से मुलाकात नहीं हुई।’’

‘‘जाने दो बेटा, जो हुआ सो हुआ। खुद पढ़कर न तुम एमए क्लास पास कर गये। चुनचुन मालिक के बेटे की तरह मोटी मोटी किताब पढ़ते हो।’’

‘‘हाँ माँ।’’ – माँ से अधिक चिपक गया नरेश।

‘‘मेरे बच्चे, तुम्हारे हाथों में हुनर रहेगा तो सब होगा।’’

नरेश देह तानकर खड़ा हो गया। चित्र के धुले कैनवास को छप्पर पर रख दिया। ठीक से धुल जाय यह चित्र। तब माँ का चित्र बनाऊॅंगा। टखने से उपर साड़ी पहने कमर में हॅंसुआ खोंसे, आश्वस्त माँ, बेटा के वृद्धि की कामना करती माँ। माँ हैं तो जहान है। बना लेगा नरेश माँ का एक बड़ा सा संपूर्ण पोर्ट्रेट।

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