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मृणाल पाण्डे की कथा: लोल लठैत और विद्या का घड़ा

बच्चों को न सुनाने लायक बालकथा -3

प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पांडे अपने लेखन में निरंतर प्रयोग करती रहती हैं। हाल के वर्षों में जितने कथा प्रयोग मृणाल जी ने किए हैं उतने कम लेखकों ने ही किए होंगे। बच्चों को न सुनाने लायक बालकथा उनकी नई सीरिज़ है जिसमें वह पारंपरिक बोध कथाओं को उठाती हैं और हमें सब कुछ समकालीन लगने लगता है। इसकी मूल कथा जैन चूर्णि साहित्य से आई है (7वीं सदी के संकलन ‘आवश्यकचूर्णि’  की टीका)। लेखिका को डा. जगदीशचंद्र के संकलन (दो हज़ार साल पुरानी कहानियाँ) में मिली। सरस्वती और लक्ष्मी का भेद आम जन को जन भाषा में इतनी सहजता से बताने वाले  मुनि भी विलक्षण चीज़ रहे होंगे पर जैन साहित्य के ऐसे रत्न यदा कदा ही मिलते हैं। आप इस सीरिज़ की तीसरी कहानी पढ़िए-

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लोल लठैत और विद्या का घड़ा

एक गांव में एक लल्लन नाम का एक बली लठैत रहता था। उसके पास अपनी कोई खेती बारी नहीं थी, लेकिन गांव में जिसको भी अपने दुश्मनों को निपटाना होता, वह मांगा भाड़ा चुका कर लल्लन की मदद लेता था। किसी मकान मालिक को अड़ियल किरायेदार को हटाना होता, या किसी महाजन को अपने भूमिगत हो गये कर्ज़दार से उधारी का पैसा वापिस लेना होता, तो सब रात के अंधेरे में लल्लन को अपने घर बुला कर यह काम उसे सौंप देते थे। लल्लन की ख्याति थी, कि उचित मूल्य पर वह आनन फानन में अपने तेल पिलाये लट्ठ से मकान मालिकों, महाजनों के लक्ष्य को डरा कर और ज़रूरत पड़ी तो खोपड़ी फोड़ कर हिसाब किताब बरोबर करवा देता।

गरीबी काफी होने से राज्य में भाड़े पर किरायेदार रखनेवाले मकान मालिक कई थे और सूदखोर महाजन भी। इस तरह बिना खेती, बिना वाणिज्य, बिना चाकरी के लल्लन लठैत की अच्छी कट रही थी।

पर सब दिन होत न एक समाना बबुआ।

एक दिन इलाका इलाका घूमते दुबले पतले लंगोटीधारी महात्मा राज्य में पधारे। रोज़ शाम लोगों को वे किसी वनोपवन में बहुत सुंदर प्रवचन देते और नीति कथायें सुनाते। सबका सार यही था कि हिंसा से बचो, सच बोलो और प्रेम से मिलजुल कर रहो। सत्य, अहिंसा और अस्तेय यानी चोरी चकारी का त्याग, इनका पालन करने से सबकी किस्मत चमक जायेगी।

शुरू में लोग सिर्फ उत्सुकता के कारण कथायें सुनने आते, लेकिन बूढे की बातों में जाने कैसा जादू था, कि धीमे धीमे इलाके में उनका असर दिखाई देने लगा। एक दिन बाबा तो ऐसे गायब हो गये जैसे कभी थे ही नहीं, पर इलाके के लड़ाई झगड़े  मिट चले। मनमुटाव कम हुआ तो भाइयों में खेतों के खूनी बंटवारे बंद हो गये। बंटवारा बंद हुआ तो परिवारों की जोत बढ गई। जोत बढी तो अनाज भी अधिक उपजा। उपज बढी तो बिक्री भी बढी और मुनाफा भी।

जैसा बाबा ने कहा था, टंटेरहित मुल्क के लोग अमीर होने लगे। गांव के किसान भी बैलगाडी में चार चार बैल जोतते और पक्के मकानों में रहते। उनके खेत के बंटाईदार तक गरीब नहीं रहे। दूर दराज़ उनको कटाई रोपनी के लिये नकद में दूना भाड़ा देकर बुलवाया जाने लगा। सो जब देस में प्रवासियों की तरफ से काफी रुपया पैसा आने लगा तो सब झोंपडियां भी पक्की बन गईं।

पर तराजू का एक पलड़ा उठता है तो दूसरे का नीचे जाना तय है। वही हुआ। इधर शहर गांव खुशहाल हुए, उधर लल्लन लठैत, मकानमालिकों और सूदखोर महाजनों के भूखों मरने की नौबत आ गई।

कुछ दिन लल्लन और महाजनों ने जबरिया अपनी कब्ज़ाई ज़मीन पर खेती शुरू की, लेकिन वे परती पड़े थे। और खेता बारी में वे माहिर थे नहीं, सो खास सफलता ना मिली।

‘दद्दू, लल्लन ने एक रोज़ एक महाजन से कहा, ‘अब कुछ करनौ ई पडैगो।’

लल्लन अपने गाँव से निकला और अपना बारह हाथ का लट्ठ लिये दर दर भटकने लगा।पर हर जगह खुशहाली। हर जगह मेल मिलाप। लाठी लठैतों की कतई ज़रूरतै ना। लल्लन ने जे भी सुना कि देस के राजा ने अपनी सेना के हथियार मालखाने में जमा करा के सिपाहियों को बाग बगीचों की टहल या महल की रखवाली में लगा दिया था।

निराश होकर लल्लन लठैत ने घर वापसी की ठानी। सोचा, अरे वहाँ अपने लोग तो हैं। मारेंगे तौ भी छांव में ही गेरेंगे। फिर क्या पता कभी लडने लडवाने के दिन वापिस आ जायें? वह वापिस गांव की ओर चला। रास्ते में चलते चलते रात हो गई थी, सो वह शहर के बाहर जंगल में बने एक मंदिर के आंगन में ठहर गया।

रात गये लल्लन क्या देखता है, कि सफेद धोती पहने कोई एक गोलमटोल घड़ा  कंधे पर धरे उस मंदिर से बाहर निकल रहा है।बाहर आंगन में उसने पहले साफ जगह पर घड़ा  रखा, फिर उसे हाथ जोड कर कहने लगा, ‘आदरणीय मुझे मंदिर में अनुष्ठान की सामग्री दे दें।’

यह क्या? सामग्री हाज़िर हो गई। और उसको ले कर वह आदमी फिर मंदिर में घुस गया।

अब तक लल्लन लठैत की उत्सुकता जाग गई थी। चोर कदमों से वह भी भीतर घुसा। भीतर क्या देखता है कि वह आदमी तो कोई सिद्ध पुरुष है। और अब मधुर मंत्रोच्चार सहित विद्या माई की सुंदर मूरत की पूजा कर रहा है।

लल्लन ने सोचा दर दर फिरने से क्या लाभ? क्यों न वह सिद्ध पुरुष को खुश करे और फिर वैसा ही घड़ा अपने लिये भी मांग ले?

यह सोच कर अगले दिन से लल्लन तन मन धन से उन सिद्ध पुरुष की सेवा करने में जुट गया। वे नहाने जाते तो उनकी धोती अंगोछा लिये पीछे चलता। पोखर में नहाते तो उनको ज़रूरत मुताबिक पकड़ाता जाता। नहा कर मंदिर को चले तो बिन कहे उनकी डाली में खुशबूदार फूल भर कर रख देता और पूजा के बाद सारे बरतन धो देता। सुबह शाम वह अपने बाबा जी के लिये सात्विक कंदमूल का फलाहार भी यथासमय लाने लगा|

उसकी सेवा से प्रसन्न हो कर सिद्ध पुरुष ने कुछ दिन बाद उससे पूछा, ‘बच्चा तुमको क्या चाहिये?’

महाबली लल्लन लठैत रुंआसी शकल बना कर बोला, ‘बाबा जी मैं बहुत ही अभागा हूं। दरिद्रता की वजह से अब तक मेरे पास अपना घर बार गृहस्थी कुछ भी नहीं है। इसी से दुखी हो कर इस जंगल में आपकी शरण में हूं। आपकी दया होगी तो मेरा दलिद्दर कट जायेगा।’

मक्खन जैसे नरम मन वाले सिद्ध पुरुष ने सोचा यह बेचारा तो बहुत तकलीफ में लगता है। इसकी सहायता करनी चाहिये। उन्होंने बडी मुलायमियत से पूछा, ‘तुम क्या चाहते हो? मुझसे कोई विद्या? या मेरी विद्या से अभिमंत्रित किया यह घड़ा?’

अंधा क्या मांगे? दो आंखें।

‘घड़ा’, लल्लन बोला। ‘विद्या की साधना आपै करिये महाराज।मैं ठहरा गंवई आदमी। मुझे विद्या से क्या काम? मुझे तो बस इस जादुई घडे की ज़रूरत है।’

सिद्ध पुरुष ने अपना घड़ा उसको दे कर कहा, ‘तब जाओ, घर गिरस्ती जमाओ। खुश रहो!’

मुदित मन हो लल्लन लठैत अपने देस चला। राह में वह सोचने लगा कि वह तो कोई योगी या सिद्ध सन्यासी नहीं है। उसे घडे से फूल पत्ते धूप दीप नैवेद्य क्या निकलवाना? उसे तो लक्ष्मी का चमचमाता रूप मांगना चाहिये। जो सब लोग देखें। ऐसी संपदा का क्या मतलब जो मित्रों के साथ भोगी न जा सके? जिसे दिखा कर दुश्मनों को न जलाया जा सके?

यह सोच कर उसने पास ही एक साफ जगह खोजी और कुछ जल और फूल पत्ते अभिमंत्रित घडे को चढा कर बोला, ‘घड़ा  महाराज, मुझको तुरत फुरत सौ परम स्वामिभक्त कुशल लठैतों की लड़ाका टोली, एक बढिया हाथी और राजसी बाना चाहिये।’

अभिमंत्रित घड़े की कृपा से उसे तुरत वह सब मिल गया।

‘चलो रे,’ उसने अपने लठैतों से कहा, ‘राजा अभी महल के बगीचे में घूम रहा होगा, उसका सर फोड़ देते हैं।‘ भक्त लठैत तुरत राज़ी। ‘जै जै लल्लन लठैत’, का नारा लगाते वे लल्लन लठैत के हाथी के पीछे अपनी अपनी लाठी भांजते चल पडे। हाथी पर चढे लल्लन ने रेशमी कपडे में लपेट कर अपने जादुई घड़े को साथ में रख लिया।

यह पाल्टी महल में जाकर क्या पाती है, कि बाबा के दिये सत्य अहिंसा के मंतर का हर जगह बोलबाला था।राजा के आदेश से और बाबाजी के प्रताप से सब लोग, यहां तक, कि दरबान भी निहत्थे घूमते थे। लोग बाग घरों में ताले नहीं लगाते थे।गायें बकरियाँ भैंसें सब खुली घूमती रहती थीं।उनको कोई भी दुह कर ज़रूरत के मुताबिक दूध घर ले जा सकता था। जाते हुए हर दूधवाला उसका गोबर साथ ले जाता ताकि धरती साफ रहे। साथ ही दुधारू पशु को हरा भरा चारा खिलाना भी न भूलता।

ऐसे देस के महल में धडधड़ाते हुए घुस कर बगीचे में घुस कर राजा का सर फोडने में लठैत पाल्टी को कोई परेशानी नहीं हुई। राजा मरा तो लल्लन गुरु के भक्त लठैतों ने तुरत राजा की देही ठिकाने लगाई और खूनी वारदात के सारे निशान भी मिटा डाले। अब रास्ता साफ था।

अब लल्लन लठैत ने अपने दस चुनिंदा भक्तों की मदद से शहर शहर गांव गांव मुनादी फिरवा दी, ‘सुनो सुनो, सुनो, कल शाम जो है, सो ठीक साढे चार बजे सुमुहूर्त में नये शासक श्रीमान लल्लन लठैत जी राजमहल की प्राचीर से जनता को दर्शन तथा देस के नाम संदेश देंगे। सब जनी जुट आइयो।जो नहीं आया उसका सर फोड दिया जावेगा।’

शाम को लल्लन लठैत राजमहल की प्राचीर पर राजसी बाना धारण किये परगट भये। कैसा भव्य बाना! अहाहा सर पर सतरंगी पगडी, कमर में पटका, गले में पीतांबर। ये चौड़ा सीना, लोमश भुजायें, हाथों के डोले फडकते हुए जैसे ताज़ा पकडी रोहू मछलियां हों।

सामने भारी भीड जुटी हुई थी। ऐसी भीड, कि थाली फेंको तो सर से सर तक फिसलती चली जावे। लल्लन लठैत का जी जुड़ा गया।

‘मित्रो,’ गुरु गंभीर स्वर में लल्लन बोला, ‘आज से राजशाही खत्म हुई |’ भीड़ के गिर्द खडे सौ भक्त लठैतों ने तुरत नारा लगा दिया, ‘राजशाही नहीं चलेगी, नहीं चलेगी।’ फिर भीड़ के हर शख्स को को लट्ठ से ठसका कर कहा, ‘बोल बे!’

फिर तो खूब नारे लगे।

मुस्कुरा कर कुछ देर तक उनके शांत होने की प्रतीक्षा के बाद लल्लन बोला: ‘मित्रो, आज से आपका यह रक्षक लल्लन लठैत नहीं, लोक- लठैत है। वंशवादी राजशाही ने हमारी लाठियों को जबरन खामोश कर महाजनों का, मालिक मकानों का धंधा मिटा रखा था। अब हम सब, यानी मैं लोक लठैत और मेरे सौ लठैत भक्त, राज्य के तमाम महाजन और मकान मालिक बंधु तथा आप सबलोग, हमारे साथ चलेंगे।हम साथ लडेंगे, साथ मरेंगे। साथ सूद वसूल करेंगे, नालायक किरायेदार निकलवायेंगे। यह इमारत जिसे आप राजा का महल कहते आये हैं यह लोगों की दी हुई एक अति पवित्र धरोहर है। अब आपका प्रतिनिधि बन कर यह लोक-लठैत उसकी दिन रात रक्षा करेगा।’

‘आप सब मेरे साथ तीन बार दोहरायें, ‘जय देस, जय लट्ठ दल, जय लठैती-महाजनी।’

यह सुंदर संक्षिप्त भाषण दे कर लल्लन लठैत ने राजमहल की दहलीज पर शीश नवाया और द्वारों के भीतर प्रवेश कर गया। दूर तक उसे कर्णमधुर जयजयकार सुनाई देती रही|

गद्दी पर बैठते ही लल्लन ने मुस्तैदी से काम करना चालू कर दिया। सबसे पहले उसने अपने क्रूरतम लठैतों को गांव गांव शहर शहर लोगों की गरदन पर लाठी रख कर मोटा लगान वसूल करने भेज दिया। फिर उसने घडे से भरपूर नई मुहरें माँग कर खज़ाना भरा और सरकारी लूटपाट से गरीब बन गये मजदूरों, किसानों, कारीगरों को सरकारी खज़ाने से बिना ब्याज का कर्ज़ा देना शुरू कर दिया।

पहले दस लाभार्थियों को खुद लोक-लठैत ने मुहरों की थैली पकड़ाई। इसकी अनुकृति राजमहल के चितेरों से उतरवाई गई जिनकी प्रतियां हर गली मुहल्ले में भक्त लठैत जा कर तुरत चिपका आये।

ऐसी फुर्ती से दबे लोग बाग ठगे हुए से महल के सामने रोज़ खडे हो कर भीड लगाने लगे। भीड़ लल्लन को पसंद थी। उन्होने एक दिन राजमहल के बाहर खुद हाथ में झाडू लेकर लोगों को स्वच्छता की बाबत बताया और आवारा पशुओं के बंदोबस्त का भरोसा दिलाया। इससे पहले कि कोई कुछ कहता, सड़क स्वच्छता दिवस मना और तदुपरांत भक्त लठैतों ने सारे दुधारू पशु राजमहल में बने खास बाडों में बंद कर उनका दूध-मक्खन-छाछ सब मोटे दाम पर बेचना शुरू कर दिया! मुफ्त मांगनेवालों को लट्ठ दिखाया जाता।

सिद्ध पुरुष के दिये घडे से नाना तरह के ऐश के पदार्थ मांग कर बंधु बाँधवों भक्तों से घिरा घिराया लल्लन लठैत अब बडे चैन से समय यापन करने लगा। उसके स्वामिभक्त लठैत मुस्तैदी से घूम घूम कर पहरा देते रहते, ताकि कहीं कोई अलग खिचडी न पकने लगे।

अब ऐसे में थोडी सख्ती बिना काम नहीं चलता। जल्द ही उनकी सख्ती की बाबत आम लोगों के बीच कुछ बुरी अफवाहें उठतीं रहतीं। पर एक दिन अचानक वे और उनको फैलनेवाले गायब हो जाते। शहर की बातून खबरिया जनानियों और मरदों की ज़ुबान पर अब ताला पड़ गया।

लल्लन की पूछते हो? वह अब अधिकतर महलों के भीतर ही भीतर ऐश करता रहता था। कभी कभी महाजन लोग उपहार आदि लेकर आते। अच्छी अच्छी खबरें सुना जाते। मकान मालिक भी ठकुरसुहाती करते रहते।

इधर शहर से गांव तक भक्तों की मनमानी से उपजे असंतोष के कारण गुस्सैल झगडे हर जगह फिर बढने लगे।महाजनी टोली खुश थी। परिवार टूट रहे थे। दूध भी बिक रहा था। तो लोग किराया चुकाने और बाल बच्चों को पालने के लिये उधारी पर रुपया तो लेंगे ही ना?

इस मोड़ पर महल से ज़बर्दस्त प्रचार अभियान शुरू हुआ।

पहले ‘लोक-लठैत’ महल से जारी भित्ति पोस्टरों में ‘लोक- लॉयन’ बना कर चित्रित किये जाने लगे। फिर कहा गया कि जन सुविधा के मद्दे नज़र लल्लन लठैत उर्फ लोक-लठैत को अब संक्षेप में ‘लोल’ का नाम दिया जाता है। भक्तों ने कुछेक सर फोड कर जनता को आश्वस्त करा लिया कि ‘लोल’ जो हैं सो महल के भीतर चारों पहर लोगों के हित के कामों में जुटे रहते हैं। खाना पीना तो दूर सोना तक भूल कर।

हंजी हंजी हंजी सब कहते। हाथी के पांव में सबका पांव!

लोल के खज़ाने से कर्ज़ा मिलना जारी रहा। उसे पाने की शर्तें कुल दो थीं।

एक, कि लोल चाहे ये करे, भक्त चाहे वो करें, यह बस उनकी मर्ज़ी होगी। मर्ज़ी पर फर्जी अफवाह उड़ाने या सवाल पूछनेवाले का भक्त लठैत तुरत लोकल लेवल पर मुंह या टांग तोड देंगे।

इसका असर हुआ। जब कई सर पर घाव खाये या टांग तुडवाये लोग गलियों में दिखने लगे तो फिर समझदार लोग बाग सवाल उठाने से बिदकने लगे।

मुफ्त का माल किसे नहीं सुहाता? और अपनी टांग या मुंह तुडवाने का किसे शौक होता है भला?

खज़ाने से बिना ब्याज वाला कर्ज़ा पाने की दूसरी शर्त यह थी, कि हर महीने बारी बारी से लाभार्थियों की शाखायें भारी तादाद में, घर में जो भी हथियार पड़ा  हो: डंड़ा , लग्गी, फरसा, दरांती, खुरपी, फावड़ा , या कटहल काटनेवाला चाकू, उसे हाथों में लहराते हुए सीधे राज्य की सीमा पर जायेंगे, और फिर पहाडों की चोटियों से जोर जोर से चिल्लाते हुए कर अपने लोल की जय बोलेंगे।

लोगों को आश्वस्त किया गया कि खतरा भीतर से नहीं, पडोसी देश से है जो कि चिड़चिड़े जलकुकड़ों से भरा था।

जनता की इन टुकड़ियों को सूसू (सूक्ष्म सुरक्षा सुजन) का संक्षिप्त नाम दिया गया। और हर महीने लोग जत्थे बना कर राजकीय अधिकारियों द्वारा वितरित लोल के मुखौटे लगाये सूसू टोली घाटी के पडोसी राजा के गश्ती सिपाहियों को लगातार डराती धमकाती, ताकि वे उन पर चढाई करने से पहले दस बार सोचें। कुछ तो भक्त लठैतों की दुनियादारी और कुछ सूसू की गैर दुनियादारी से लल्लन लठैत उर्फ लोक लठैत उर्फ लोल के दिन अपने बंधु मित्रों के साथ गप्पें करते, खाना-पीना खाते पीते, नाच गाने के साथ बडे आराम से गुज़रने लगे।

एक दिन महल में लोल के जन्मदिवस पर महाभोज हुआ। पहले जम कर मदिरा पी गई। फिर चषक लिये बालाओं ने मनोहर नृत्य किये और अतिथियों को जाम पर जाम पिलाये। फिर भंग चली, रंग उड़े।

ऐसा समां बँधा कि अंत में मित्रों के आग्रह से नाना करते लोल कंधे पर अपना करामाती गोलमटोल घड़ा रख कर नाचने लगे। बड़ी वाह वाह हुई |

अचानक उनका पैर फर्श पर छलकी मदिरा पर फिसला और पलक झपकते उनका वह सिद्ध पुरुष का दिया अभिमंत्रित घड़ा चकनाचूर हो गया।

घडे का फूटना था कि उसके प्रताप से जितना ऐश्वर्य मिला था, जो भक्तवाहिनी फटाफट खडी हो गई थी, सब नष्ट होते चले गये। उनके नष्ट होने की खबर पा कर सूसू ने टिड्डी दल की तरह उमड कर देखते देखते महल को खंडहर बना डाला। इतने लोगों के खिलाफ लल्लन लठैत अकेले का लट्ठ भी बेकार ही था। कुछ समय वह पाकशाला में छिपा रहा, आखिर यह सुन कर कि पड़ोसी राजा अपनी अक्षौहिणी सेना लेकर आ रहा है और लोकल लोग उसे वोकल समर्थन दे रहे हैं, लल्लन लठैत जान बचा कर जंगल की तरह भागा।

घने जंगल के बीच छुप कर अपनी बगल में सिर्फ अपना धूलधूसरित पुराना लट्ठ पडा देखता लल्लन लठैत सोचने लगा, काश उसने सिद्ध पुरुष से उस दिन विद्या माँगी होती, मिट्टी का घड़ा नहीं।

पर अब क्या हो सकता था?

मुनि जी विद्या बिना कुशल होत विपरीता।

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