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 डा.आंबेडकर और स्त्री मुक्ति का स्वप्न

 आज बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर की जयंती पर पढ़िए युवा शोधार्थी सुरेश  कुमार का लेख जो डॉक्टर आम्बेडकर के व्यक्तित्व के एक और विराट पहलू से साक्षात्कार करवाने वाला है-

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बीसवीं सदी के महान विचारक और सुधारक डा.भीमराव आंबेडकर अपने चिंतन में समाजिक समस्याओं पर सोचते हुए स्त्री समस्या पर  आए थे।  डा. आंबेडकर ने स्त्री समस्या की मूल जड़ में पितृसत्ता और स्मृतियों वाली व्यवस्था को माना था।  डा.आबेडकर अपने अध्ययन में इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि मनु के विधान से पहले समाज में स्त्रियॉं  को  पूर्ण रुप से अधिकार और सम्मान प्राप्त था। अपने लेख नारी और प्रतिक्रांति में लिखते हैं  कि ‘मनु से पूर्व नारी को बहुत सम्मान दिया जाता था, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। प्रचीन काल में राजाओं को राज्याभिषेक के समय जिन स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी, उनमें रानी भी होती थी।’ देखा, जाए तो स्त्री को उसके अधिकारों से वंचित करने में  ब्राह्मणवादी और पितृसत्तावादी  व्यवस्था  की बड़ी भूमिका रहीं है। स्त्री स्वतत्रंता के मार्ग में एक बड़ी बाधा के रुप में  विवाह का अविच्छेद होना था। गौरतलब है कि हिन्दू समाज विवाह अविच्छेद में अटूट आस्था रखता था। डा. आंबेडकर लिखते हैं, ‘पति-पत्नी के रुप में स्त्री-पुरुष के अविच्छेद-सम्बन्ध सम्बन्धी मनु के विधान को बहुत से हिन्दू बड़ी श्रद्धा से देखते हैं। और यह समझते हैं कि विवाह सम्बन्ध चूँकि आत्मा का मिलन होता है, इस लिए मनु ने इसे अविच्छेद बताया है।’ बाबा साहेब मानते थे कि इस प्रकार का कानून स्त्री की गुलामी का कारण बना और उसका  जीवन दुश्वारियों से लैस होता गया। डा.आंबेडकर अपनी पड़ताल में बताते हैं कि इस विधान में पुरुष  को स्त्री छोड़ने का अधिकार ही नहीं, उसे बेचने का अधिकार भी प्रपट था। यदि कोई बन्धन है तो यह है कि स्त्री स्वतंत्र नहीं हो सकती भले ही वह बेच दी जाए, या त्याग दी जाए।’ प्रत्येक अधिकार से स्त्री को वंचित रखा गया, उसे यह भी अधिकार तक नही था कि वह लूले-लंगड़े और मंदबुद्धि पति से छुटकारा पा सके।

 डा. आंबेडकर का मानना था किसी भी समाज के विकास की कसौटी का पैमाना उस समाज की स्त्रियों की  समाजिक और शैक्षिक प्रगति पर निर्भर करता है। वे मानते थे कि किसी भी समाज के विकास अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस समाज की महिलाओं की स्थिति क्या है?  जो समाज अपनी स्त्रिया पर प्रतिबंध और उनकी स्वतंत्रा  में बाधा बनता है। वह समुदाय प्रगति के पथ पर नहीं जा सकता है। भारतीय स्त्री की बात की जाए तो शास्त्रों और पितृसत्ता की व्यवस्था में  स्त्रियां चाह कर भी प्रगति के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकती थी। इसका कारण यह था कि संहिताएँ और पुरुषवादी मानसिकता स्त्री के विकास में बाधा बनकर खड़ी थी। यह भी सच है कि जिन स्त्रियों ने इन बाधाओं को पार करने की कोशिश की उन्हें पुरुषवादी तंत्र की  प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। डा. आंबेडकर का  मत था कि किसी भी स्त्री को ऐसे पुरुष के साथ नही रहना है जो स्त्री गरिमा का ख्याल और सम्मान न रखता हो। डा. आंबेडकर ने 15 अक्टूबर 1956 को  दिए  अपने  एक भाषण में कहा था कि स्वाभिमान किसी भी आर्थिक लाभ से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। हमारा संघर्ष स्वसम्मान और इज्जत के लिए है, केवल अर्थिक विकास के लिए नहीं।’ बाबा साहेब का कहना था कि स्त्री को अपने पति की दासी और नौकरानी बनकर नहीं रहना चाहिये। वे लिखते हैं कि सबसे जरुरी बात यह कि हर लडकी जो शादी करती है, अपने पति का साथ, अपने पति से मित्रता और बराबरी के रिश्ते कायम करे  और उसकी दासी न बनें ।’

 डा. आंबेडकर  स्त्रियॉं को अधिकार दिलाने के लिए चिंतित थे। उनकी इच्छा थी कि  स्त्रियों को वे सब अधिकार मिले, जिनसे उन्हें अब तक वंचित रखा गया है। सन् 1941 को बी.एन.राव की अध्यक्षता में एक समिति की नियुक्त की गई थी। इस समिति में देश के कई विचारकों और विधिज्ञ सामिल हुए और सहमति से स्त्री आधिकारों के लिए एक बिल बनाया गया। इस बिल को सन् 1946 में  केन्दीय विधान सभा में पेश किया गया लेकिन इस बिल को लेकर कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। अंत में बिल पुनः विचार के लिए वापस भेज दिया गया था। डा. आंबेडकर ने स्त्री स्वतंत्रता और अधिकारों को ध्यान में रखते हुए इस हिन्दु कोड बिल का कार्य अपने हाथों में ले लिया। बाबा साहेब ने हिन्दू कोड बिल द्वारा स्त्री मुक्ति के सादियों से बंद चले आ रहे दरवाजों पर कुठारा घात कर के स्त्री अधिकारों का रास्ता साफ करना चाहते थे। इस बिल में  स्त्रियाँ  अपने पिता की संपत्ति और पति से तलाक लेने का अधिकार था। इतना  ही नहीं इस बिल में यह भी निहित था कि स्त्रियां शासन-प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों पर जा सकती है। एक तरह से यह  बिल के द्वारा स्त्री मुक्ति और उसकी स्वतंत्रता का सबसे बड़ा कानूनी औज़ार था ।

डा. आंबेडकर स्त्री अधिकार का मसौदा हिन्दू कोड बिल के रुप में तैयार कर  5 फरवरी 1951 को लोकसभा में प्रस्तुत किया। इस बिल को प्रस्तुत करते ही इसका पुरजोर विरोध किया गया। कुछ लोगों ने इस बिल को हिन्दू संस्कारों पर कुठाराघत के रुप में देख, तो कुछ ने इसे पितृसत्ता की जड़ों को  कमजोर करने के रुप में देखा। इस बिल का विरोध लोक सभा के अंदर से लेकर बाहर तक विभिन्न प्रांतों में नेता और संगठनों के दवारा किया जा रहा था। हिंदू कोड बिल के विरोधियो का ध्यान इस बात पर नहीं था कि स्त्री के जीवन में जो त्रासदी और विघटन है उस से स्त्री को मुक्त किया जाए। पडिण्त भार्गव ने इस बिल का विरोध करते हुए कहा कि यह बिल पंजाब पर लागू न किया जाए। बाबा साहेब ने  भार्गव के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि सम्पूर्ण भारत में समान सिविल लागू होगी। स्त्री विरोधी और पित्सत्ता के पैरोकार इस बिल को लेकर बाबा साहेब का विरोध कर रहे थे। डा. आंबेडकर बडी निर्भिकता के साथ स्त्री मुक्ति की लडाई लडते रहे। हिन्दू कोड बिल के आने से यह बात एक दम साफ हो गई थी कि स्त्री स्वतंत्रता को लेकर हिन्दुओं का दृष्टि कोण क्या हैं? डा.आबेडकर ने इस बिल पर दोबरा चर्चा करवाने के लिए 10 अगस्त 1951 को  भारत के तत्कलीन प्रधानमत्रीं पंडित जवाहर लाल नेहरु को पत्र लिख कहा कि आप इस बिल को प्रथमिकता देकर 16 अगस्त को लोक सभा में विचार-विमर्श के लिए पेश करे, ताकि सितंबर तक इस बिल पर चर्चा  हो जाए। डा. आंबेडकर के  अनुरोध पर कांग्रेस दल की बैठक हुई और  यह निर्णय लिया गया कि 17 सितांबर, 1951 को हिन्दू कोड बिल के पहले भाग जिसमें विवाह और तलाक पर विचार  किया जाएगा।

 17 सितम्बर 1951 को डा. आंबेडकर न इस बिल को लोकसभा में चर्चा करने के लिए प्रस्तुत किया  तो  पितृसत्ता के  पैरेकारों ने डा. आंबेडकर के विरोध में लोक सभा के समाने स्त्रियों से प्रदर्शन करवाया। इस बिल को लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा कि ‘हिन्दू कोड़ बिल की वजह से  हिंदू  संस्कृति भव्य रचना का विनाश होगा और जिस गतिमान और उदार जीवन पद्धति ने अनेक शताब्दियों में विस्मयकारी रीति से जो उचित परिवर्तन स्वीकार किए, उस जीवन पद्धति का विघटन होगा।’ इस बिल के विरोधी स्त्री के जीवन में चल रहे विघटन और यातना को नहीं देख पा रहे थे। हिन्दू कोड़ बिल को लेकर तत्कालीन नेताओं और धर्म के ठेकेदारों ने समाज में कई तरह के भ्रम फैलाए। जैसे,यह परिवार को तोड़ने वाला और भारतीय मूल्यों के खिलाफ हैं इतना ही नहीं यह भी कुप्रचार किया गया कि कोई भी स्त्री अपने पिता, भाई को मार कर उसकी संपति हड़प लेगी और किसी भी समय स्त्री अपने पति को छोड़कर जा सकती है। इस बिल का सभा में काफी विरोध होने से तत्कालीन प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरु ने स्थिति को भांपते हुए कहा कि विवाह और तलाक हिन्दू कोड बिल के अलग विभाग माने जाए। डा. आंबेडकर की तमाम कोशिश के बाद भी हिन्दू कोड बिल का महत्वपूर्ण हिस्सा विवाह, संपत्ति और तलाक संबन्धी कानून पूर्ण रुप से पारित नहीं हो सका था। जब हिंदू कोड बिल पारित नहीं हुआ तो डा.आंबेडकर ने अत्यंत दुखी स्वर में कहा था कि स्त्री अधिकारों वाले इस बिल केा मार डाला गया और दफन कर दिया गया लेकिन कोई रोने वाला नहीं था। कहने का अर्थ यह कि इस दिन स्त्री अधिकारों और उसकी स्वतंत्रता की हत्या कर दी गई थी। डा. आंबेडकर इस बिल के परित न होने से इतने दुखी हुये कि उन्होंने 27 सितंबर 1951 को कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। वे शायद इतिहास में पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्त्री अधिकारों के लिए अपने मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। डा. आंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल के जारिए पुरुष की सैकड़ों से साल से चली आ रही स्त्रियों पर दबंगई पर रोक लगाना चाहते थे। वे इस बिल के द्वारा स्त्री और राष्ट्र को मजबूती प्रदान करना चाहते थे।

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[युवा आलोचक सुरेश कुमार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.ए. और लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद इन दिनों नवजागरण कालीन साहित्य पर स्वतंत्र शोध कार्य कर रहे हैं। इनके अनेक आलेख प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं]

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One comment

  1. Rajendra Kumar Sharma

    लेखक ने लेख के माध्यम से मात्र हिन्दू समाज में स्त्रियों की सामाजिक दशा पर दृष्टिपात किया है । डॉक्टर अम्बेडकर का सम्पूर्ण भारतीय समाज मे स्त्रियों की सामाजिक स्थिति पर क्या दृष्टिकोण था? यह स्पष्ट करना चाहिए।

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