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दीपा गुप्ता की कुछ कविताएँ

दीपा गुप्ता कवि रहीम पर अपने काम के लिए जानी जाती हैं। वह संवेदनशील कवयित्री हैं और हाल में ही उनका कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है ‘सप्तपदी के मंत्र’ नाम से। उसी संग्रह से कुछ कविताएँ-
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शहरी भेड़िए
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तुम्हारे गाल पर पड़े
मेरी उँगलियों के निशान
मेरी सच्चाई की गवाही हैं
कि मैं तुम्हारी तरह कोई भेडिया नहीं
 
जो छिपा रहता है
अपने खोल में
गाहे-बगाहे खोल से
सिर निकालकर ढूँढता है
अपना शिकार
और फिर शराफ़त का नकाब ओढ़कर बन जाता है आदमी
 
ओ जंगल के भेड़िए!
जरा तू बच कर रहना
इन शहरी भेड़ियों से
 
यह शक्ल से बड़े मासूम हैं
और अक्ल से घाघ
इनकी शक्लों की मासूमियत ने ही
शहरों को
खौफनाक जंगल में बदल दिया है।
 
 
कुछ दरक रहा
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जब उम्र तुम्हारी
पचपन छप्पन हो जाए
और अचानक
बचपन की हर बात तुम्हें याद आ जाए
 
माँ का प्यार बाप की फटकार
भीतर तुम्हें रुलाने लगे
वह भीगा आँचल गीला आंगन
मन को धीरे से उकसाने लगे
 
नीम निमोली झूला पनघट
आँखों में झिलमिलाने लगे
तब समझो… देखो!
भीतर क्या कुछ खिसक रहा
 
सूखी अमिया
कच्चे पापड़ बड़ियाँ
अंतस को ललचाने लगे
पकड़ो… काटो…
ढील तो दे दो
कानों में फड़फड़ाने लगे
मन पतंग हो जाए
पाँव की धड़कन बढ़ जाए
तब संभलों…देखो!
भीतर क्या कुछ दरक रहा…।
 
 
सुर्ख़ लाल
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आज बरसों बाद
फिर से
खोल दी किताब मैंने
 
जो कब से बंद थी
जब वक़्त बदला
तो महक उठी
देखा
तुम्हारी खुशबू का गुलाब
आज भी सुर्ख़ लाल है।
 
 
कोई नहीं बोल रहा
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वह तो मासूम थी
जो रौंदी गई कई बार
अपने सगों से
फिर डराई गई
कई बार अपनी सगों से
 
क्या इसकी मासूमियत के पीछे
कोई शारीरिक भूख थी?
 
क्या इसकी सिसकियों के पीछे
ईज़ा की बेपरवाही खूब थी?
क्या इस हैवानियत के पीछे
अलसाई धूप थी?
 
कहीं ऐसा तो नहीं
इसकी हिचकियों के पीछे
गरमाई धूप थी?
नहीं!
 
इसकी उल्टियों के पीछे
अपनों का घात था
इसकी भटकन के पीछे
संस्कारों का ह्रास था
अब तो समय बीत गया
पल्ला झाड़ कर
सब साफ करा देंगे
यह हो नहीं सकता
अब तो तय था
एक बच्ची का असमय माँ बनना
भयानक शारीरिक और
मानसिक यातना से गुजरना
 
अनाथालय के लिए
एक और उत्पाद तैयार हो गया
दूसरों की मौजमस्ती का अंश
बच्ची की कोख में पल रहा
यही तो विडंबना है
भोगता कोई है
रोता कोई है
 
औरत तो भोग्या है
जिसे सदियों से
भोगा जा रहा है
कभी परायों से
कभी अपनों से
 
कोई क्यों नहीं
बोल रहा
सब खामोश हैं
क्यों है?
 
 
एक वीरान गाँव की व्यथा
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दरकते पहाड़
सिसकते पहाड़
बिखरती ज़मीं
सिसकती नमी
फसलें सूख गईं
गाँव वीरान के वीरान
 
कोई बात नहीं
बेटे शहरी जो हो गए!
 
ईज़ा की आँखें नम
बुबु की साँसें कम
 
ओ चेल्ला!
भात खा जा
अपन मुख तो दिखा जा
पुकार रहे
कौन सुने?
अनसुना कर रहे
 
कोई बात नहीं
बेटे शहरी जो हो गए!
 
पहाड़ की हवाएँ
महकती फिजाएँ
नोले का पानी
सब हासिल
पर क्या करें?
जड़ें खुद खोद बैठे
यह तो जंगल है
ईज़ा!
हम सभ्य हो चले
कोई बात नहीं
अपना ध्यान धरियो
चेला!
अब क्या कहें
तुम शहरी जो हो गए।
 
 
तिजोरी तो भर गई
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क्या हुआ जो मन वीरान
खाली पड़ा बाखली का आंगन
खेत में सूखी धान की बालन
हिसालु किलमोड़ी
काफल की मिठास
बुराँश का जंगल
गौरैया का नीड़न
सब छूट गया
तो क्या हुआ?
तिजोरी तो भर गई!
 
पुरखों की थात
चावल का विसवार
ऐपण पूए डलिया
दराती और सतवार
बांस के पेड़ों की
ठंडी पुरवाई
गरमा गई
तो क्या हुआ?
जो मन वीरान
तिजोरी तो भर गई!
 
बिना बात के खिलखिलाना
जंगलों में घंटों मस्ताना
सब छूट गया
गंभीरता ओढ़ ली
 
मौन मुखर हो गया
तो क्या हुआ?
जो मन वीरान
तिजोरी तो भर गई!
 
 
स्त्री
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स्त्री पहाड़ है
रेगिस्तान है
या
समुद्र
स्त्री एक बूँद है
जो पहाड़ पर बहती है
रेगिस्तान में सूखती है
और
समुद्र में मिल जाती है।
 
– “सप्तपदी के मंत्र” से
(कविताओं की किताब)
दीपा गुप्ता
अल्मोडा़
16.01.22
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