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पहले प्रेम की दारुण मनोहारी वेदना का आख्यान : ‘कॉल मी बाई योर नेम’ और ‘कोबाल्ट ब्लू’

हाल में आई फ़िल्म ‘कोबाल्ट ब्लू’ और तक़रीबन पाँच साल पुरानी फ़िल्म ‘कॉल मी बाई योर नेम’ पर यह टिप्पणी युवा लेखिका और बेहद संवेदनशील फ़िल्म समीक्षक सुदीप्ति ने लिखी है। सुदीप्ति फ़िल्मों पर शानदार लिखती हैं लेकिन शिकायत यह है कि कम लिखती हैं। फ़िलहाल यह टिप्पणी पढ़िए-

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हाल में देखी ‘कोबाल्ट ब्लू’। इस फ़िल्म के पहले हिस्से की खूबी यह रही कि उसे देखते हुए बार बार मुझे ‘कॉल मी बाई योर नेम’ की याद आती रही। यह याद मुझे ही नहीं कई अन्य दर्शकों को भी आयी। मैंने ‘कोबाल्ट ब्लू’ किताब पढ़ी नहीं इसलिए कह नहीं सकती कि यह समानता मूल किताब में भी है या निर्देशक ने अपने स्तर पर उस फ़िल्म से रचनात्मक प्रेरणा ली है। लेकिन कुल मिलाकर यह समानता मेरे मन में खीझ नहीं पैदा करती क्योंकि अपने स्तर पर हिंदी (अगर इसकी भाषा हिंदी कहें) में पहली बार ऐसे विषय पर कोई बेहद सुंदर फ़िल्म है। लेकिन जब यह एक दूसरी फ़िल्म की याद दिला रही है तो क्यों नहीं उसे याद करते हुए इसे देखा जाए। वैसे भी  2018 में जब ‘कॉल मी बाई योर नेम’ देखी थी तभी से उस खूबसूरत फ़िल्म का असर मेरे मन पर था जिसे लिखने का मौक़ा न आया।

वैसे मुझे नहीं लगता कि सिर्फ़ कहानी के मूल में समलैंगिक प्रेम होने के कारण दोनों की एक साथ याद आती है। यह इसलिए है क्योंकि “कॉल मी बाई योर नेम’ का एलिओ और ‘कोबाल्ट ब्लू’ का तनय दोनों हम दर्शकों को उन पलों और अहसासों में वापस ले जाते हैं जो कभी हमने पहली बार महसूस किए थे। वे हमारे लिए उस पागलपन भरे, भीतर तक स्तब्ध करने वाले उत्कट आवेगपूर्ण आकर्षण की स्मृति का दुहराव लेकर आते हैं। वे उस प्रबल राग को झकझोर कर जगाते हैं जिसे कभी हमने भी पहली बार महसूस किया हुआ है। वे दोनों याद दिलाते हैं कि जब हम कम उम्र के होते हैं तब वे पल, उनकी पहचान, उनकी स्वीकृति हमारे लिए कितनी मुश्किल होती है। वे याद दिलाते हैं कि जिसके प्रति हम जीवन का पहला खिंचाव महसूस करते हैं उसे ठीक-ठीक बता पाना संभवतः असंभव होता है। खासकर तब जब हम उसे एक ऐसे दीवानेपन से पसंद करें जो लगभग हमें पैरालाइज होने की हद तक शक्तिहीन महसूस करवा दें, ठीक वैसा जैसा एलिओ ओलिवर के लिए महसूस करता है।

सच पूछिए तो यह पहले प्रेम के तूफ़ान के गुज़र जाने का अहसास करवाने वाली फ़िल्म है। अरसा बीत जाता है पर मन में उस ख़ूबसूरती और तड़प का अहसास नहीं बीतता। प्रेम जो वेदना से भर दे पर उसकी संतुष्टि उम्र के बाद भी बची रहे। उसी पूर्णता भरे प्रेम के बाद की तड़प की कथा है दोनों फ़िल्मों में।

हालाँकि मैं ‘कॉल मी बाई योर नेम’ के प्रति थोड़ी बायस हूँ। यह पहली फ़िल्म थी जिसने मुझे दो पुरुषों के दैहिक प्रेम को पूरी तरह स्वीकार करना सिखाया। इस फ़िल्म के अनुभव से गुजरने से पहले मैं भले ही सैद्धांतिक रूप से ‘गे’ प्रेम को स्वीकारती थी पर मुझे दो पुरुषों के बीच किस जैसा दृश्य भी असहज ही करता था। इस फ़िल्म की ख़ूबसूरती यही रही कि इसने मेरे मन की उस असहजता को दूर किया। तिमोथे शैलामे और आर्मी हैमर के बीच की केमिस्ट्री ऐसी है कि वह भावात्मक प्रेम और दैहिक प्रेम की चरम सुंदरता उभरकर आती है। स्त्री और पुरुष देह से परे हम वहाँ प्रेम की अकुलाहट और देह की बेचैनी देखते हैं। बाइस साल के तिमोथे सत्रह साल के एलिओ का किरदार इस प्रमाणिकता से निभाते हैं कि चित्रपट पर एक किशोर की पूरी बेचैनी, उसके शरीर का तनाव, उसके दिलोदिमाग़ की व्याकुलता- उनकी आंखों, हाथों और पूरे हाव भाव से प्रकट होती है।

एलिओ इस मामले में तनय से ज़रा सा भिन्न है क्योंकि उसके चरित्र के विकास का अवसर फिल्मकार के पास ज्यादा है। ‘कोबाल्ट ब्लू’ में कहानी को एक अलग विस्तार देने की कोशिश है इसलिए दो चरित्रों के बीच प्रेम के विकास पर ज़्यादा वक्त नहीं दिया जा सका है।

कथा के स्तर पर भी दोनों फिल्मों में एक समानता है। एलिओ और तनय  दोनों पढ़ने लिखने वाले संवेदनशील किशोर हैं। दोनों ही फिल्मों में उनके आकर्षण और प्रेम का केंद्र उनके घर में रहने के लिए आता है। ‘ कॉल मी बाई योर नेम’ जब ऑलिवर जब आता है तो एलिओ  को अपना कमरा उसे दे देना पड़ता है जबकि तनय के घर में पेइंग गेस्ट रखा जाता है  जिसके कारण तनय  को अपना अलग कमरा नहीं मिलता है। प्रतीक बब्बर और आर्मी हैमर दोनों के किरदार बहुत हद तक एकसमान है।  दोनों अपने युवावस्था में पूरे शारीरिक सौष्ठव और सुंदरता के साथ सामने वाले को मोहित कर देने वाले व्यक्तित्व से संपन्न हैं।

कोबाल्ट ब्लू में जहाँ तनय को अपनी सेक्सुअलिटी का थोड़ा-बहुत आभास है क्योंकि वह अपने अंग्रेजी के प्रोफेसर से लेकर मोहल्ले में खेलते लड़कों के प्रति एक आकर्षण महसूस करता है, वही एलिओ को अपने बारे में यह मालूम नहीं है। ओलिवर के प्रति अपने खिंचाव को वह आरम्भ में ठीक-ठीक नहीं समझ पाता इस कारण से शुरू में वह उससे बहुत कटा-कटा रहता है। इसके अलावा वह अपने को समझने के क्रम में अपनी बचपन की दोस्त से भी शारीरिक संबंध बनाता है पर फिर भी उसे ओलिवर के प्रति तीव्र आकर्षण और उसकी स्त्री-मित्र से जलन की भावना उपजती है तो किसी तरह अपनी बात कहने की कोशिश करता है।

याद कीजिए वह दृश्य जब अपनी सायकिल से दोनों टाउन स्क़वेयर पर गये हैं, वहाँ एक मीठे ताने में ओलिवर कहता है, “कोई चीज़ है जो तुम्हें नहीं पता? इस पर बेचारगी भरी हंसी से साँस छोड़ते हुए एलिओ कहता है, “ मुझे कुछ नहीं पता ओलिवर” जब इसका जवाब ओलिवर देता है कि, “तुम यहाँ किसी भी और से ज़्यादा जानते हो”

तब एलिओ कुछ साहस जुटा कर कहता है, “काश! तुम्हें पता होता कि मुझे उन चीज़ों के बारे में कितना कम मालूम है जो असल में मायने रखती हैं।” यह कहते हुए उन दोनों के बीच भौतिक दूरी पर्याप्त है। प्यार के इस अटपटे इकरार में कैमरा काफ़ी दूर है और उनके बीच की असहजता को हम तक ला रहा है। कैमरा इस दृश्य में ही नहीं पूरी फ़िल्म में इसी दूरी से उनके बीच की असजता से लेकर रागात्मकता की पड़ताल करता है। इसे सुन ओलिवर दूसरी ओर और भी दूर बढ़ने लगता है और सवाल करता है, “मायने रखने वाली कौन सी चीज़ें हैं?” एलिओ इससे ज़्यादा कुछ नहीं कह पता कि, “तुम जानते हो कि कौन सी चीज़ें।” एलिओ अपनी जगह खड़ा है और ऑलिवर आगे और दूर बढ़ता गया है। ऐसे में प्रेम को कैसे कहा जाए जब कोई पूछे ‘तुम मुझे क्यों बता रहे हो?’  इन्हीं शब्दों में शायद जिसमें एलिओ कहता है- क्योंकि तुम्हें जानना चाहिए, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम जानो —

ओलिवर कहता है ऐसी बातें खुलकर नहीं कही जातीं। सोचिए एक किशोर डरते-झिझकते प्रेम का स्वीकार कर रहा है और एक युवा बस संकेतों में बात करता है, सामाजिक परिपाटी का सोचता है। यह इसलिए भी है कि किशोर के माता-पिता उदार हैं और सब समझते हुए स्वीकार करते हैं।

तनय की बेफ़िक्री पर प्रतीक बब्बर का किरदार कहता है- तुम्हें डर नहीं लगता?  तनय और उसके प्रोफेसर की बात तो हम सब समझ रहे थे लेकिन जब प्रतीक वाला किरदार तनय से पूछता है कि ‘तुम्हें डर नहीं लगता’ तो क्या वह अपने डर की बाबत बात नहीं कर रहा। तनय के माता-पिता वैसे नहीं जैसे एलिओ के हैं लेकिन वे अपने अनजानेपन में अनभिज्ञ और उदार हैं। वे अनुजा को रोकते हैं पर तनय दिन-रात ऊपर रहने को मुक्त है। फिर भी अन्य जगहों पर भी वह बेफ़िक्र है। इससे दिखता है की इन फ़िल्मों में जो किशोर हैं वे प्रेम के आवेग में मतवाले, जो युवा हैं वे समय और परिस्थिति के अनुरूप सामाजिक आचरण में बंधे हुए।

एलिओ तालाब के किनारे जिस इंटेन्सिटी से ओलिवर को चूमता है उस वक्त ओलिवर भी आगे बढ़ता है लेकिन तब उसे अपनी पूर्णता में स्वीकार नहीं कर पाता,रुक जाता है। उसे वक्त लगता है लेकिन जब करता है तो अपनी पूर्णता में करता है। उन दोनों के बीच के दैहिक प्रेम के दृश्य उनकी एकात्मकता के गहरे प्रतिबिंब हैं। दर्शक भी उस परिणति तक साथ पहुँचता है। जबकि कोबाल्ट ब्लू में वे दृश्य अचानक से आए हैं और तनय के रागात्मक उद्वेल को स्पष्ट करते हैं जबकि प्रतीक बब्बर एक रहस्य के रूप में ही रहता है। एक रात तनय के तुम कहाँ थे, हम कहाँ जा रहे जैसे सवालों के बीच नदी और नाव के प्रतीक में वे एक बांध पार कर जाते हैं। यहीं पर यह फ़िल्म अलग हो उठती है।

कोबाल्ट ब्लू में अनुजा का एक डायलॉग है- उसने मुझे मेरे शरीर से परिचित करवाया। उसने यानी प्रतीक बब्बर ने तनय को भी उसके शरीर से परिचित करवाया। उसके होने के जितने आवेग भरे मानी उसके मन में छिपे थे उन सबको बाहर निकाल दिया। उसका प्रेम हर धरातल पर उसकी खुद से पहचान करवाने वाला ही तो रहा। तनय की जो मुश्किल थी वही उसकी आसानी थी। प्रेम उसे ऊपर के कमरे में आए पुरुष से हुआ तो आसानी यह कि लड़का होने के कारण वह आसानी से उसके पास रह सकता था, जा सकता था। उसे तो खूब खूब प्यार था। ऐसा कि उसे कुछ और दिख तक नहीं रहा था पर सामने वाले को भी वैसा ही प्यार था? शायद नहीं!

प्रेम करना और करुणा करना अलग बात है। प्रेम करना और प्रेम को स्वीकार कर लेना एक अलग। सामने दिखता प्रेम ऐसा गाढ़ा हो कि हम उसे प्रतिबिंब किए बिना न रह सकें यह भी एक और बात है।

ऐसा लगता है तनय के इस भयानक खिंचाव में प्रतीक खिंच गया, बह गया। या फिर उसके बचपन की कथा, उसका बोहेमियन कलाकार होना उसके बाईसेक्सुअल होने को जस्टिफ़ाई  करता है। मानो वह समाज की बंधी-बँधायी परिपाटी से अलग व्यक्तित्व के इन दो भाई-बहनों को पहले प्रेम की दीक्षा देना आया हो। मानो वह उनके शरीर और मन का तालमेल बिठाने आया हो। या फिर जो कछुआ मन था उसे बाहर निकालने? क्या हम दर्शक उसे एक क्रूर ठग के रूप में देखते हैं? मैं तो नहीं देखती। अनुजा का ही एक सम्वाद याद करती हूँ, “किसी संबंध के मुकम्मल होने और उसे  अच्छा मानने के लिए उसका कितनी अवधि का होना ज़रूरी है?”

दिल किसका टूटा वैसे? भाई का कि बहन का? दुःख तनय के लिए होता है आज रात मैं अकेले सो जाऊँ- पूछने वाला उसका प्रेमी उसे कभी नहीं मिलेगा से भी ज़्यादा दुखद था प्रेम की स्मृतियों, गलियों, चिन्हों में किसी और की उपस्थिति की कल्पना। वह कोई और अपनी ही बहन हो तब? तब तो कोई रोता हुआ यही कहेगा न-

तुम अपने प्रेमी के चेहरे की आभा हो

अपनी गुप्त जगह पर सो नींद में डूब जाओ

पर अपने प्रेमी के साथ कोई मंसूबे मत बनाओ

कहानी के ये मोड़ और जटिलताएँ इस फ़िल्म को पहली से अलगाती है पर प्रेम के तमाम दृश्य चाहे नॉर्थ इटली के कंट्री साइड की सुंदरता हो या केरल का पैनोरमिक व्यू सब एक दूसरे से अभिन्न रूप में जुड़े हुए हैं। यहाँ तक कि जो पीच सीन ‘कॉल मी बाई योर नेम’ का सेंसुअस पर भावात्मक असुरक्षा का एक उदात्त दृश्य बन गया है उसे भी संतरे के द्वारा दुहराने की कोशिश है हालाँकि वैसा साहस सचिन कुंडलकर में नहीं जैसा लुका गुआडगनीनो में है।

मैं पीच सीन के डिटेल्स नहीं लिखूँगी। पर पहली बार उसे देख बहुत दिनों तक मन अस्वीकार में था। सच पूछिए तो उस दृश्य को बढ़ा कर देखा था। मेरे मन में बतौर दर्शक भी बहुत सीमाएँ थीं। दूसरी बार धैर्य से देखा, तीसरी बार उसकी ज़रूरत और ख़ूबसूरती समझी। एक और बार में पता चला कि यह शरीर की सीमाओं से परे हर तरह के प्रेम का स्वीकार और किसी को अपने भीतर धारण कर सकने की इच्छा का चरम है। ख़ैर! आपको मन हो तो खुद देखिए और समझिए।

दृश्यों का दुहराव दोनों फ़िल्मों को एक धरातल पर लाता है। एलिओ द्वारा ओलिवर के कपड़ों को जिस तीव्र लालसा में सूंघा जाता है वही तनय प्रतीक के शर्ट के साथ करता है। जिस लोच और ललक के साथ एलिओ की देह मुद्रा घूमती है उसी तरह तनय की। प्रेम के कुछ दृश्यों में एलिओ  की पीठ एक किशोरी की पीठ लगती है और प्रतीक बब्बर तनय के चूमने को एक लड़की के चुम्बन जैसा कहता है। दोनों कहानियों में एक नॉस्टैल्जिया है। जो घट चुका है उसे देखने की एक तीसरी संवेदनशील आँख दोनों में है। दोनों अपने-आप में अलग-अलग देश काल, परिस्थिति और किरदारों की कथा होते हुए भी एक जैसी इन्हीं कारणों से लगती है। दोनों देखकर ही आपको पता चलेगा कि क्या एक जैसा है और क्या एकदम अलग।कहानी के ट्रीटमेंट में संवेदनशीलता और सुंदरता का प्रयोग दोनों में एक जैसा है। फिल्मों में एंद्रिकता कोई नई बात नहीं है लेकिन उसमें ऐसा सौंदर्य, इतनी कोमलता और आंतरिक रागात्मकता का संगम एक नई बात है।

वास्तव में, क्या है अन्तस को मथ देने और उससे निथर कर बाहर आने की प्रक्रिया? और क्या वह मन का स्थायी रंग नीला नहीं कर देती?

प्रेम जिस समाज में अपने आप में अनैतिक हो उसमें अपने समलिंगी व्यक्ति से प्रेम हो जाना क्या आसान हो सकता है? तरुणाई के दिनों में कोई ऐसा आए जो बिल्कुल मन मस्तिष्क पर छा जाए तो उसके आकर्षण से बाहर निकलने का कोई माध्यम बचता नहीं। जब वह आकर्षण, प्रेम और समर्पण अधराह अकेला कर दे तब? एलिओ का पिता कहता है, “तुम्हें सभी भावों को जीने आना चाहिए। उनसे भागो मत उनका सामना करो, उन्हें जियो।” यही है जीवन। जो एक वक्त में अत्यंत आह्लादकारी होते हैं वही मन को असीम वेदना से भी भर देते हैं। जिनसे प्रेम होता है वही तो दुःख सिरजते हैं न? सुख की स्मृति दुःख को कम नहीं करती। बस यही कि प्रेम के आनंद को उसी ख़ुशी के साथ याद करना चाहिए जब उसके न होने का दुःख साथ हो। जो बीत गया वह कैसा सुखद था इसे महसूस करते हुए ही हम दिल के फ़िरोज़ा होने को भी उसी शिद्दत से जी सकते हैं। मेरे लिए यह फ़िरोज़ा है, तनय के लिए कोबाल्ट ब्लू और एलिओ के लिए तो उसका अपना नाम ही। वेदना और उदासी की पूर्णता इसी में है कि  उसके पीछे का सुख कैसा सुंदर मनोहर था। देखिए, महसूस कीजिए।

सुदीप्ति

 

 

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