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विमलेश त्रिपाठी का स्तम्भ एक गुमनाम लेखक की डायरी-2

आज पढ़िए युवा कवि विमलेश त्रिपाठी की आत्मकथा की दूसरी किस्त। वे जानकी पुल के लिए यह साप्ताहिक स्तम्भ लिख रहे हैं-
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शब्दों की दुनिया ही हमारा आसरा
 
खेत-बधार और गली-गांव से अधिक की पहुंच नहीं थी हमारी। कभी-कभी छुपकर दोस्तों के साथ नदी चले जाते थे। वह भी क्यों, इसलिए कि जोशोप को बहुत सारे गीत याद थे। वह घास गढ़ता था और अपने दोस्तों के साथ भैंस चराता था। हीरालाल भी बहुत अच्छे गीत गाता था। उनके साथ हम बच्चों की टोलियां गाते- बजाते नदी की ओर भैंस धोने के लिए जाते। मैं नदी के किनारे खड़ा रहता। सारे बच्चे अपने अपने कपड़े उतार कर नदी में उतर जाते। एक दिन मैं नदी में उतरा और मेरे सारे कपड़े गीले हो गए। फिर भीगे हुए कपड़े पहने मैं कई घंटे बाहर ही घूमता रहा ताकि कपड़े सूख जाएं तो घर जाऊं। गीले कपड़े के कारण नदी जाने की बात घर वालों को पता चल जाती और मेरा अपने दोस्तों के साथ की चल रही करामातों पर पाबंदी लग जाती। कपड़े सूख गए लेकिन सिर पर पानी ने अपने निशान छोड़ रक्खे थे। मां को पता चला तो उसने बहुत डांट लगाई। लेकिन नदी जाना नहीं रूका।
एक बार मैं नदी में डूबने लगा। अंतिम बार लगा कि अब मैं मर जाऊंगा, अब फिर मेरी वापसी नहीं होगी। लेकिन मेरी एक ताकत मेरी जिद भी है। जिद में आकर मैंने अंतिम प्रयास किया और तैरता हुआ किसी तरह किनारे तक पहुंचा। उस दिन लगा कि मैं तैर सकता हूं, लेकिन गहराई में जाने में अब भी मुझे डर लगता है।
वह नदी अब सूख-सी गई है। वहां लोग अब नहाने नहीं जाते। औरतें अपने कपड़े फिंचने नहीं जाती। बालकिशुन मल्लाह अब नाव से नदी पार कराने के एवज में अनाज मांगने नहीं आते। अब नदी उदास-उदास दिखती है। हमारे जवान होने तक वह अब बूढ़ी हो चुकी है। नदी मर रही है और हम सिर्फ उसे देख भर रहे हैं। वह धर्मावती नदी जब नहीं रहेगी तो मैं अपने बच्चों से कहूंगा कि यहां एक नदी बहा करती थी और हमारे उस कहने की पीड़ा को शायद उस समय मेरे बच्चे नहीं समझेंगे।
गंगा जी दूर थीं जिसे हमारे बाबा भागड़ कहते थे। गंगा नदी हमें छोड़कर चली गई थीं और अब भागड़ रह गया था। गंगा जी के भाग जाने के कारण शायद उसका नाम भागड़ पड़ा था। हमारे बार वहीं उतरे थे। नदी को मापने के लिए बाध की रस्सी पकड़ हम गंगा के उस पार पहली बार गए थे । मैं और मेरे बड़े भाई। मल्लाह से कहकर हमने गंगा के बीच में झिझिली खेली थी। बहनों ने गीत गाया था – मलहवा रे तनिए सा झिझिली खेलाउ -। .. पूरी नौका गांव की औरतों से भरी हुई थी और पानी के बीच में गीत गूंज रहा था। वह गीत आज भी कभी-कभी मेरे कानों में गूंजता है। आज जब उस गंगा के किनारे से गुजरता हूं तो अनायास ही मेरे हाथ प्रणाम की मुद्रा में उठ जाते हैं। मैं खुद को अब तक रोक नहीं पाया। रोकने की कोशिश भी नहीं की।
 
वह गंगा नहीं थी। गंगा का पानी सिर्फ बाढ़ के समय सावन-भादो में आता था। लेकिन पूरे साल हमारे लिए वही गंगा नदी थी। हमारी सारी रश्में वहीं होती थीं। मुर्दे फूंके जाते थे। तीज-जिऊतिया में औरते उसी के किनारे गीत गाते हुए-नहाते हुए अपने व्रत-उपवास पूरा करती थीं। उसी के किनारे कथा का आयोजन होता था। कई बार चईता-बिरहा और दुगोला का भी आयोजन होता।
वह गंगा नहीं थी लेकिन लोग उसे गंगा की तरह ही पूजते-आंछते थे। वह भागड़ भी अब सूखने के कगार पर है। और हम उसे सूखते-मिटते हुए देख रहे हैं। मैं हर बार मन ही मन उस गंगिया माई को प्रणाम करता हूं। उसने हमें पानी दिया। हमें तैरना सिखाया। बेघर होकर भी कैसे रहा जाता है, हमें वह सिखाया। यहां हुगली को रोज पार करता हूं, लेकिन वह श्रद्धा वह हूक मेरे मन में नहीं उठती जो उस सूख रही गंगा के लिए उठती है।
कविता कहीं नहीं थी। बस यही सब था जो जमा पूंजी था। आज भी कथा-कहानी के नाम पर वही सब है जिसे मैं हर रोज घर में या घर से निकलने के बाद जतन से बटोरता चलता हूं।
यही कारण है कविता में घूम फिर कर भेष बदलकर वही जगहें आती हैं, वही चेहरे आते हैं, वही पेड़ और वही खेत आते हैं और यह इतना अनायास घटित होता है कि कविता में उसका बार-बार आना किसी दुहराव की तरह नहीं लगता। लोग कहते हैं कि कविता का मिजाज बदल चुका है, कविता अब अपना केंचुल छोड़कर नई हो गई है। लेकिन हमारी कविता ने अबतक केंचुल नहीं छोड़ा, वह वक्त आएगा कभी। आना ही चाहिए। हर कवि को एक-न-एक दिन अपने केंचुल छोड़कर नया होना पड़ता है, खुद को अतिक्रमित कर नया लिखना और कहना पड़ता है। यह कवि और कविता दोनों के लिए जरूरी है। लेकिन यह भी जोर देकर कहना चाहूँगा कि केंचुल छोड़कर भी जिस तरह साँप साँप ही रहता है, उसी तरह कवि को भी होना चाहिए। कहने का आशय यह है कि उसकी अपनी जमीन कभी छूटनी नहीं चाहिए, जिस जमीन पर खड़े होकर उसने पहली बार कविता का ‘क’ लिखा था।
मैंने सबसे पहले कविताएँ ही लिखनी शुरू की थीं – वहाँ तुकबंदियाँ थीं – प्रेम –देश भक्ति। वे शुरूआती कविताएँ अब कहाँ हैं नहीं पता। तब कहाँ जानता था कि कविता में कई आन्दोलन हो चुके हैं। कविता लिखते हुए एक कवि इलाहाबाद की सड़कों पर फटेहाल घूमता है। यह भी कहाँ मालूम था कि एक कवि को उसके लिखने की सजा यह दी गई थी कि उसकी किताब पर सरकारी बैन लगा दिया गया था – वह बेहद डरी हुई स्थिति में जीता और कविताएँ लिखता था – तब कहाँ पता था कि उस कवि को एक अदद नौकरी की जरूरत थी – वह इलाज के अभाव में मरा। आज जब उन सभी कवियों को थोड़ा बहुत जान गया हूँ तब तो लिखने की जिद और पुख्ता हो गई है।
साफ कर दूँ कि लिखने की दुनिया में मैं यश और पैसे कमाने के लिए नहीं आया। हिन्दी में सिर्फ लिखकर दो जून की रोटी खा पाना मुश्किल है, जो यह सोचता है – वह दिवाना है। यहाँ लेखक लिखता है और प्रकाशक उसकी लेखनी के बल पर पाँच सितारा होटलों में पार्टियाँ उड़ाता है – यह हिन्दी का यथार्थ परिदृश्य है। फिर भी यदि लिखने की जिद है तो इसलिए कि आज न सही कभी तो हमारी आवाजें सुनी जाएंगी – हम जो सोचते हैं उसपर कोई तो होगा जो कान देगा – न सही आज – इस सदी के बाद जब हम खाक हो चुके होंगे। और न भी सुने कोई तो भी हम यही कर सकते हैं – यही हुनर प्रकृति ने हमें दिया है। किसी को जुआ खेलने में मजा आता है, किसी को नई-नई जगहों पर घूमने में अच्छा लगता है – कोई शराब पीकर खुश हो लेता है – कोई अपने परिवार और पीढ़ियों के लिए धन संचय कर के गुमान करता है – हमने इस भीड़ में शब्दों को चुना है। उन्हें ही अपना साथी बनाया है – वहीं हम रोते हैं, चिल्लाते हैं, खुश होते हैं। हमारा अपना एक और जीवन है जो शब्दों से निर्मित है – वहाँ हमारा अपना साम्राज्य है। नौकरी, घर, समाज और अन्य तरह की बंदिशें वहाँ नहीं हैं। यह संसार हमारे लिए खुदा की नेमत है। हमें कुछ न चाहिए हम उस संसार में रहकर कुछ पल रोना चाहते हैं, हँसना चाहते हैं, मरना और जीना चाहते हैं – बस इतना ही, और कुछ नहीं।
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3 comments

  1. आलोक कुमार मिश्रा

    आपके जादुई शब्दों ने लोक के एक बीते दौर में पहुँचा दिया। अस्सी और नब्बे के दशक का पूर्वांचल में बीता अपना बचपन भी पुरज़ोर याद आया। आपके आत्मकथा की यह सिरीज़ चलती रहे सर। बधाई और शुभकामनाएं आपको।

  2. रचना सरन

    लेखक गुमनाम तो कतई नहीं है ; जिस किसी ने भी उनकी लेखनी का आस्वादन किया है , गाहे बगाहे उसका ज़िक्र ज़रूर करता है । बिना अनावश्यक अलंकरण के सीधी, सरल भाषा में अपनी बात कह डालना, लेखक की विशेषता है जो बहुत ही सहजता से पाठक को जोड़ लेती है । पाठक पढ़े हुए को ‘देखने’ लगता है । ऐसा ही कुछ इस स्तम्भ में भी हुआ है । लेखक के बाल्यकाल का चित्रण जीवंत हो उठा हो जैसे !
    शब्दों की दुनिया लेखक की लेखनी से दिन प्रतिदिन और समृद्ध होती रहे -ऐसी स्वस्तिकामना के साथ हम आभार एवम् साधुवाद प्रेषित करते हैं !

    — रचना सरन, कोलकाता

  3. अजय कुमार सिंह

    बहुत ही बेहतरीन ढंग से अपने बातों को प्रस्तुत किया है विमलेश जी ने! यह ईमानदारी कवि को और भी अधिक अच्छा करते रहने की प्रेरणा भी देता है। निश्चित रूप से भविष्य में जब हम अपने लोक-संस्कृति,पर्व-त्यौहार की चर्चा आने वाली पीढ़ियों से करेंगे तब अचंभित होना लाज़मी होगा। विमलेश जी अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े हुए कवि हैं यही जुड़ाव उन्हें अन्य समकालीन रचनाकारों के फेहरिस्त से अलग करती है। समाज को अभी आपसे बहुत कुछ पाना बाकी है। रचते रहिए।💐🙏

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