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विमलेश त्रिपाठी का स्तम्भ एक गुमनाम लेखक की डायरी-3

युवा कवि विमलेश त्रिपाठी अपनी जीवन यात्रा को दर्ज कर रहे हैं। गाँव के छूटे हुए दिनों को बड़ी शिद्दत से याद कर रहे हैं। आज तीसरी किस्त पढ़िए-
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लगातार मनुष्यता की ओर यात्रा करने वाला मुसाफिर
मुझे अपने जन्म का वर्ष और तारीख पता नहीं है। माँ से पूछने पर बताती हैं कि माघ के महीने में मंगलवार की रात मेरा जन्म हुआ। जन्म का समय 12 बजे के बाद था तो वह एक तरह से बुधवार हुआ। जिस साल मेरा जन्म हुआ उस साल भयंकर बाढ़ आई थी, सारे फसल नष्ट हो गए थे लेकिन मेरे जन्म की खुशी में मेरे किसान बाबा वह सब भूल गए थे। पंडितों ने कहा कि मैं सतइसा में पड़ा था। सतइसा में जो बच्चा पड़ता है – पिता सताइस दिन तक उस बच्चे का मुँह न देख पाते हैं – उसके के लिए एक रस्म का आयोजन होता है और पहली बार पिता तेल की कटोरी में बच्चे की परछाई देखते हैं। रस्म पूजा-पाठ और अनुष्ठान से संवलित होता है। अगर उस अनुष्ठान के पहले पिता संतान का चेहरा देख लें तो अशुभ घटित होता है। यहाँ यह भी बता दूँ कि मेरे छोटे बेटे अंकुर का जन्म हुआ तो हम कोलकाता के एक फ्लैट में रहते थे और जिस दिन जन्म हुआ उसी दिन मैंने उसे देखा भी। बाद में पंडितों ने गणना कर के बताया कि वह भी सतइसा में पड़ा हुआ है लेकिन माँ के लाख मना करने के बावजूद मैं उसे गोद में लेकर घूमता रहा था। हालांकि सतइसा का रस्म उसका भी हुआ। लेकिन मुझे याद नहीं है कि जिस अशुभ के घटने के चिंता जताई जाती रही, वह कभी –कहीं घटित हुआ हो।
ज्योतिष की एक किताब में मुझे यह जानकारी मिली कि जिसे लोक में सतइसा कहा जाता है वह वास्तव में गंड मूल दोष है। गंड मूल दोष अपनी प्रचलित परिभाषा के अनुसार लगभग हर चौथी-पांचवी कुंडली में उपस्थित पाया जाता है तथा ज्योतिषियों की धारणा के अनुसार यह दोष कुंडली धारक के जीवन में अड़चनें पैदा करने में सक्षम होता है। वास्तव में यह दोष होता क्या है, किसी कुंडली में यह दोष बनता कैसे है, तथा इसके दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं, गंडमूल नक्षत्रों का विचार जन्म के समय से किया जाता है। अश्वनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती गंडमूल नक्षत्र कहलाते हैं। इन नक्षत्रों में जन्मे बालक का 27 दिन तक उसके पिता द्वारा मुंह देखना वर्जित होता है। जन्म के ठीक 27वें दिन उसी नक्षत्र में इसकी मूल शांति करवाना अति आवश्यक होता है। ऐसा ग्रंथों में वर्णित है। सभी नक्षत्रों के चार-चार चरण होते हैं इन्हीं प्रत्येक चरणों के अनुसार माता, पिता, भाई, बहन या अपने कुल में किसी पर भी अपना प्रभाव दिखाते हैं। प्रायः इन नक्षत्रों में जन्मे बालक-बालिका स्वयं के लिए भी भारी हो सकते हैं। लेकिन मैं अपने लिए या अपने परिवारवालों के लिए किस तरह भारी पड़ा इसकी चर्चा अगले किसी किस्त में करूंगा लेकिन जहाँ तक मेरी जानकारी है मैं किसी के लिए कभी अशुभ साबित न हो सका। हाँ, यह जरूर कहूँगा कि मेरा भाग्य उतना अच्छा न रहा। मैंने जितना किया उतना ही मुझे मिला – कभी-कभी तो उससे भी कम या न के बराबर।
मैं अपने माता पिता की पाँचवीं संतान बना। पहली संतान जन्म के साथ ही न रही थी। जिंदा सन्तानों में मुझसे दो बड़ी बहनें और एक बड़े भाई। भाई शुरू से ही विशेष शिशु की तरह रहे। बाद में लक्षण और बढ़ा और लगभग 24-25 की उम्र में ही हमारा साथ छोड़ गए। वे एक मात्र मेरे बचपन के साथी थे – उनके साथ मार-पीट करते हुए, उन्हें चिढ़ाते हुए और उनकी गालियाँ और प्यार सहते हुए हम दो भाई बड़े हुए। छोटा भाई अब मेरे साथ नहीं रहता। उसने अलग घर ले लिया है – माता और पिता भी अब उसके साथ ही रहते हैं। हालांकि अपने छोटे से जीवन में मैंने कभी कल्पना भी न की थी कि मेरे भाई का दूसरा घर बनेगा और माँ-पिता मुझे छोड़कर उसके साथ रहने चले जाएंगे। हमने अपने गाँव में बहुत अलगौझे देखे थे और उसके गवाह भी बने थे – और मन ही मन निर्णय किया था कि इस तरह की स्थितियाँ तो अपने घर में हम पैदा न ही होने देंगे। लेकिन यह हुआ। खूब जब्त कर के रखने के बाद एक दिन मैंने पिता और भाई के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया कि परिवार की शान्ति के लिए यह बहुत जरूरी है। लेकिन यह होना मेरे अंदर एक हरे घाव की तरह है जिससे हर रोज खून रिसता रहता है और मैं अपने घर के किसी एक कोने में मौन रोता हूँ।
कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या यह गंड मूल दोष या मेरे सतइसा में पड़ने के कारण हुआ? ऐसा चाहकर भी मैं नहीं मान सकता। लेकिन एक बात जरूर हुई है इन दिनों। जिस तरह मेरे पिता जीवन भर यह सोचते रहे कि मेरे बच्चे एक साथ एक घर में रहेंगे और हमारे आस-पास रहेंगे उस तरह अपने बच्चों को लेकर मैं कभी सोच ही न पाया। मेरे पिता और मेरे रिश्तेदारों के मन में हमेशा ही यह साध रही कि वे मेरा विवाह भारी दहेज लेकर किसी बड़े और धनाढ्य परिवार में करेंगे लेकिन वे ऐसा न कर सके। मैंने अपने लिए खुद लड़की चुनी। उसपर तुर्रा यह कि वह लड़की मेरी जाति की न थी। पिता ने विवाह तो करा दिया किसी तरह लेकिन मेरे घर का कोई भी सदस्य इस शादी से सहमत न था। पिता भी सहमत तो न ही थे लेकिन वे हमारे घर में सबसे अधिक प्रगतिशील सोच वाले हैं – यह शादी सिर्फ इसलिए हो सकी कि पिता मेरे इस सवाल का जवाब न दे सके कि मैं कहाँ गलत हूँ। वे हमेशा कहते रहे कि तुम गलत न हो लेकिन हम जिस समाज में रहते हैं वह अब भी बहुत पिछड़ा हुआ है – और मैं उनसे कहता रहा कि किसी न किसी को तो पहल करनी ही होगी। वह पहल मेरे पिता ने की और इसके लिए मैं ताउम्र उनके सामने नतमस्तक हूँ। एक बात अच्छी लगी कि शादी के रिसेप्शन के दिन प्रफुल्ल जी आए और उन्होंने कहा – तुमने शादी ही न की है, एक क्रान्ति भी की है। जो भी हो लेकिन मैं अपने बच्चों को लेकर कभी ये सोच ही नहीं पाता कि वे हमारे साथ रहेंगे या मेरी देख-भाल करेंगे। मैंने सिर्फ यही सोचा है कि उनकी अच्छी परवरिश करनी है – इस दुनिया में स्वाभिमान के साथ रहना और जीना सिखाना है। इसके बाद वे स्वतंत्र हैं। हर मामले में। मैं हर मामले में उन्हें सिर्फ सुझाव दे दूँगा, बाकी चीजें उन्हें ही करनी हैं।
मैं नहीं जानता कि पुरानी चीजें अच्छी थीं जब संयुक्त परिवार हुआ करते थे या यह वर्तमान की स्थिति जब हम नाभिकीय परिवार में बदलते जा रहे हैं – जरूर कहूँगा कि पुराने संस्कार अब भी मेरे जेहन में हैं और उनसे छुटने के लिए लागातार संघर्ष भी चल रहा है। लेकिन हम इतना जानते हैं कि पुराने और नए दोनों संस्कारों के ही साकारात्मक और नाकारात्मक पहलू रहे हैं – हमें हर वक्त साकारात्मक पहलु को ही ग्रहण करने की दिशा में प्रवृत होना चाहिए। यह भी सच है कि समय के साथ बदलाव होंगे – जो इन्हें स्वीकार न करेंगे वे पिछड़ जाएँगे या आँसू बहाएँगे। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, उसके साथ मनुष्य के रहन-सहन और सोच में भी बदलाव आने चाहिए, आते ही हैं। यह अच्छी बात है कि हमारा धर्म इन बदलावों को स्वीकार करता है – हम धर्म के साकारात्मक पक्ष को ग्रहण कर आगे बढ़ें। समय के बदलने के साथ और अधिक धर्म भीरू और अंधविश्वासी न बनें। यही लगातार मनुष्यता की ओर यात्रा है। इसी यात्रा के हम मुसाफिर हैं, हम जन्म में होना चाहेंगे।
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