कलम आज कलाम की जय बोल!

3
53
कलाम साहब का जाना 21 वीं सदी के सबसे बड़े भारतीय नायक का जाना है, युवाओं के प्रेरणास्रोत का जाना है. 21 वीं सदी में भारत में जो तकनीक विस्फोट हुआ उसमें कलाम साहब को युगपुरुष के रूप में देखा गया. आईआईटी से स्नातक युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर ने कलाम साहब को सम्यक श्रद्धांजलि दी है. उनको अंतिम प्रणाम के साथ पढ़ते हैं यह लेख- मॉडरेटर 
=================================================

हरेक युग के अपने नायक और प्रतिमान होते हैं. हर सभ्यता के विशिष्ट मानक तथा मूल्य होते हैं. किन्तु वे महामानव होते हैं जो हर देश और काल के प्रतिमानों पर अग्रणी सिद्ध हो जाते हैं. जिनकी शीलता, सौम्यता, विश्वदृष्टि, बंधुत्व आने वाली सदियों के लिए उदहारण बन जाती है. इस कलयुग में घृणा और द्वेष पौरुष के मूल्य बन कर, प्रेम और सहिष्णुता से अधिक स्वीकार्य बन चुके हैं, वहीं पूर्व राष्ट्रपति अवुल पकिर जैनुलब्दीन अब्दुल कलाम का व्यक्तित्व उन सभी नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण रहा जो हमारे जन मानस में आदर्श जीवन के निर्विवाद प्रतीक रहा है. उनका जीवन  चिंतनशील और गरिमामय विचारधारा के अक्षुण्ण ज्योतिर्मय स्त्रोत बन गया है. महात्मा गाँधी के बाद अब्दुल कलाम उन विशिष्ट लोगों में गिने जाते हैं जिन्हें समाज के सभी वर्ग, सभी क्षेत्र, राजनैतिक दलों का अपूर्व समर्थन मिला. जिस तरह सूरज की प्रकाश के सन्दर्भ में किसी तरह उपमा व्यर्थ ही जायेगी, उसी तरह उनके बेमिसाल व्यक्तित्व की महिमा का वर्णन भी अपूर्ण ही होगा.
यह हमारा राष्ट्रीय शोक है, जहाँ महान वैज्ञानिक, भौतिकवेत्ता, एरोस्पेस इंजिनियर, मिसाइल पितामह, भारत रत्न अब्दुल कलाम के निधन पर देश के कोने कोने से करोड़ों रूदन समवेत स्वर में उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं. जैसे लाखों लोग सहसा अनाथ हो गए हैं. जैसे हमारा नायक हमसे छीन गया हो. सहसा पुण्य प्रकाश स्तम्भ का लोप हो गया हो और घनघोर अन्धकार छा गया है.
सन १९३१ में एक गरीब मछुआरे परिवार में जन्म ले कर, अखबार बेच कर, छोटे मोटे काम करते हुए, विज्ञान और इंजीनियरिंग की कठिन पढाई करते हुए, भारत की रक्षा में अपूर्व योगदान देते हुए, देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले डॉ अब्दुल कलाम अदम्य इच्छा शक्ति के पर्याय थे. पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को उनके पोखरण अभियान में योगदान, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, भारत रत्न, बहुतेरे मानद उपाधियाँ से याद करने की अपेक्षा उस स्वरुप में याद करना चाहिये, जिस स्वरुप में आम लोग उन्हें पहचानते हैं और उनका नाम बड़े ही आदर के साथ लेते हैं.
विद्यार्थियों से घुलने मिलने वाले, शिष्ट, सौम्य, सरल, सहज, स्वप्नद्रष्टा, विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय, वीणा वादक, गीता और कुरआन के प्रति आदर करने वाले एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करना चाहिये जो राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने पर केवल दो सूटकेस ले कर राष्ट्रपति भवन से निकल गए. धन के प्रति कोई मोह नहीं, चिंतन और नैतिकता के लिए प्रतिबद्धता, यही आचरण तो श्रद्धेय ऋषि-मुनियों का आचरण है. इसी अंतःकरण की शुद्धता की वंदना की जाती है. यही मानव की सर्वोत्तम उपलब्धि समझी जाती है. निंदा, द्वेष, और क्रोध से कोसों दूर वहीं लोगों में ऊर्जा फूंकने के लिए कटिबद्ध, जन प्रतिनिधियों को उनका दायित्व का स्मरण करने वाले, सही मायनों में कलाम साहब सच्चे ऋषि, जननायक और नेता थे.
थोड़ी सफलता मिलने पर ही आम लोग सातवें आसमान पर चढ़ जाते हैं. आज सोशल मीडिया पर नज़र डालें, अनगिनत ऐसे उदहारण मिल रहे हैं जहाँ राष्ट्रपति पर आसीन अब्दुल कलाम ने स्वयं साधारण पत्रों को उत्तर दिया, विभिन्न कार्यक्रमों में लोगों से मिले. जीवन भर वो स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों और आम लोगों से मिलते जुलते रहे. लगभग निर्विवाद रूप से चुन लिए गए राष्ट्रपति जैसा आदर और सम्मान आज किसी राजनैतिक दल के किसी नेता को हासिल हो, ऐसा अकल्पनीय है. उनका होना इस बात की आश्वस्ति थी कि नैतिकता है. कोई ऐसा आदर्श है, जैसा हम बनना चाहें या आने वाली पीढ़ियों को बता सकें. कई बुद्धिजीवी अक्सर यह आलोचना करते नज़र आते हैं कि अब्दुल कलाम जैसे वैज्ञानिक क्यों आध्यात्म (जिसका मतलब वो अंधविश्वास समझते हैं) को महत्त्व देते रहे? उन बुद्धिजीवियों से यह प्रश्न है कि वह इसे किस रूप में लेते हैं? एक विज्ञान का चिन्तक आध्यात्म को क्या केवल पूजा-पाठ या हवन से लेता है? एक जटिल विषय पर व्यक्ति विशेष की अवधारणा से उनका मूल्यांकन या आलोचना उसके समग्र स्वरुप को नहीं समझ पाती.
कहते हैं मृत्यु जीवन को रेखांकित करती है. कुछ विलक्षण उदाहरणों में नियति का खेल बड़े अनुपम तरीके से प्रतीकात्मक हो उभर आता है. टॉलस्टॉय के अमीर नौकरशाह ईवान इलिइच की मौत तब होती हैं, जब लोगों से उसे उसकी अपनी मृत्यु की सूचना मिलती हैं. चेखोव का एक मामूली अदना क्लर्क अपने अधिकारी के खफ़ा होने से चुपचाप मर जाता है. वहीं यथार्थ में महात्मा गाँधी जो बड़े भक्त थे, प्रार्थना को जाते हुए उनका इहलीला समाप्त कर दी गयी. जनजीवन में चेतनता को समर्पित डॉ कलाम आइआइएम शिलांग में भाषण देते गिर पड़े.
अगर जीवन परिपूर्ण हो, सार्थक हो, मानक हो; ऐसी स्थिति में मृत्यु उनके तिरासी वर्ष के आदर्श जीवन का अंतिम उत्सव बन जाना चाहिये. फिर भी अपनी मानवीय कमजोरियों से वशीभूत हो कर आज अनगिन जनों से वेदनाधारा फूट पड़ी है. इन असंख्य श्रद्धांजलियों के साथ डॉ ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को आखिरी सलाम!
 
अंधा चकाचौंध का मारा,
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के,
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

3 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here