कई जरूरी सवाल उठाने वाली फिल्म ‘डियर जिंदगी’

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शाहरुख़ खान-आलिया भट्ट की फिल्म ‘डियर जिंदगी’ कल रिलीज हुई. फिल्म की एक संवेदनशील रिव्यू दिव्या विजय ने लिखी है- मॉडरेटर
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महिला निर्देशकों के साथ बॉलीवुड के स्त्री-किरदार फेमिनिज़म का यथार्थवादी स्वाद चख रहे हैं. वे क्रान्ति का परचम लहराने की बजाय, रोज़मर्रा के जीवन में घटित बदलावों को शांतिपूर्वक जी रहे हैं. वे समाज द्वारा आँके जाने की कवायद से चुपके-से बाहर निकल रहे हैं. पुरुषों द्वारा तय की गयी सीमाओं को लांघ रहे हैं…नियंत्रित होने से इनकार कर रहे हैं. इंग्लिश-विन्ग्लिश में आत्म-सम्मान के लिए ज़िद पर अड़ी नायिका के बाद डियर ज़िन्दगी में गौरी शिंदे के साथ हम इंडिपेंडेंट और अपने काम में बेहद ज़हीन नायिका से रू-ब-रू होते हैं. ‘मेंस टेरिटरी’ कहे जाने वाले तकनीकी कार्यक्षेत्र में आलिया अपना वर्चस्व जमाना चाहती है…पहला स्टिग्मा गौरी यहीं तोड़ती हैं. इंग्लिश-विन्ग्लिश में जहाँ नायिका के भय और द्वंद्व अपने परिवार के कारण पनपते हैं वहीं डियर ज़िन्दगी में भी कायरा के मन में असुरक्षा की नींव उसके परिवार की वजह से पड़ती है. परिवार दोनों कहानियों के केंद्र में है मगर इस फिल्म में गौरी के स्ट्रोक्स अधिक विस्तार पा जाते हैं. गौरी इस फिल्म में एक साथ कई ज़रूरी सवाल उठाती हैं.

सबसे पहला सवाल मानसिक स्वास्थ्य और उसको लेकर हमारे समाज में मौजूद ख़ामोशी की बाबत है. दिमागी अस्वस्थता को लेकर हमेशा से समाज में एक चुप्पी विद्यमान रही है. यह कोई बीमारी है और इसे डॉक्टर की आवश्यकता भी हो सकती है लोग सदा इस बात को नकारते रहे हैं. दिमाग की समस्या अर्थात पागलपन जिसे किसी को बताना नहीं है, सबसे छिपाकर रखना है. शरीर को लेकर जितना शोर होता है, दिमाग को लेकर लोग उतना ही ‘हश-हश’ वाला एप्रोच अपनाते हैं. हाल ही में कई सेलिब्रिटीज इस विषय को लेकर आगे आये हैं और खुल कर बात की है. लेकिन आम घरों में आज भी इसके बारे में बात नहीं होती है. बात करने पर परिहास अथवा झिड़की के आवरण से ढककर इस विषय को समाप्त कर दिया जाता है. जबकि हमारी जो जीवन पद्धति हो गयी है उसमें पहले की तुलना में अधिक लोग अकेलेपन के शिकार हैं. आवश्यक नहीं सिर्फ डिप्रेस्ड लोग ही थेरेपी के लिए जाएँ, सामान्य लोग जो किसी वजह से उलझे हुए हैं, मात्र बात करने के लिए भी थेरेपिस्ट के पास जा सकते हैं. अच्छा काम, अच्छे दोस्त, तीन हो सकने वाले अच्छे प्रेमी और हर तरीके से खूबसूरत दिखती ज़िन्दगी के भीतर भी दरारें हो सकती हैं और इन दरारों को पाटने के लिए किसी थेरेपिस्ट का रुख करना साँस लेने जितना ही सहज है.

फिल्म दूसरा सवाल बच्चों की परवरिश में माँ-बाप की भूमिका को लेकर उठाती है. विदेशों में और अब भारत में भी पेरेंटिंग को लेकर कई प्रोग्राम्स होते हैं, क्लासेज़ होती हैं, डिस्कशन्स होते हैं पर पेरेंटिंग का कोई सेट पैटर्न नहीं है. माँ-बाप अनुभव से सीखते हैं और इस ‘लर्निंग प्रोसेस’ के दौरान कई गलतियाँ भी कर बैठते हैं. पेरेंट्स होने का अर्थ न तो बच्चों पर  मालिकाना हक जमाना होता है कि बच्चों से जो चाहें करवा सकें और न पेरेंट्स होने का अर्थ परफेक्ट होना होता है. उनसे भी भूल हो सकती है. फिल्म इस विषय को गंभीरता से उठाती है कि माँ-बाप की बेख़याली में की गयी गलतियाँ बच्चे के नाज़ुक मन पर खरोंचें डाल सकती हैं जिसके फलस्वरूप बच्चा ‘प्रॉब्लम चाइल्ड’ की केटेगरी में आ सकता है. समस्यात्मक व्यक्तित्व की जड़ें बचपन की इन चोटों के भीतर हो सकती हैं.

तीसरा सवाल विवाह को लेकर है. हालांकि फिल्म में इस बात को अधिक तूल नहीं दिया गया है. पर फिल्म कुछ टुकड़ों में अपनी बात कह जाती है. सेटल होना क्या होता है? क्या विवाह को सेटल होने का पर्याय माना जा सकता है. पेरेंट्स अक्सर एक नियत उम्र होते ही बच्चों के विवाह की चिंता में घुलने लगते हैं. फिर भले ही बच्चे विवाह के लिए मानसिक रूप से तैयार हों या नहीं.

अगला विषय ‘सिबलिंग राइवलरी’ है. हमारा प्रथम प्रतिद्वंदी हमारा भाई अथवा बहन होता है. दुनिया में सबसे पहला व्यक्ति जिस से हम अपने चीज़ों के साथ-साथ माता-पिता का प्यार भी बाँटते हैं. वही सबसे पहला व्यक्ति होता है जिस से हमारी तुलना होती है. कभी घर वाले तो कभी बाहर वाले गाहे-बगाहे ये तुलना कर देते हैं. अक्सर यह तुलना बच्चों को कुंठाग्रस्त कर देती है. कभी-कभी बच्चा अपने सहोदर के प्रति वैमनस्य से भर उठता है. फिल्म में ऐसा नहीं हुआ है पर एक-आध संवादों में क्षीण-सी ईर्ष्या झांकती है.

सम्बन्ध जीवन का आवश्यक अंग है. जो प्रेम में होता है वही टूटन की पीड़ा को समझ सकता है. एकल परिवारों के बच्चे किन असुरक्षाओं में बड़े होते हैं और क्यों संबंधों में ठहराव नहीं आ पाता फिल्म इन बातों को कुरेदती है. कितनी भी कैसुअल एप्रोच क्यों ना लगे पर सच यही है कि संबंधों का टूटना आज भी दुखदायी होता है. एक से अधिक संबंधों में हो चुकी लड़की के प्रति लोग किस तरह जजमेंटल होते हैं और क्यों हमें लोगों की बातें नहीं सुननी चाहिए फिल्म हमें फनी लेकिन सार्थक उदाहरण से समझाती है. संबंधों की ‘कुर्सी’ से सादृश्यता बहुत रोचक बन पडी है. जब हम एक कुर्सी खरीदने से पहले कई कुर्सियाँ जाँचते-परखते हैं तो संबंधों को भला क्यों नहीं जाँच सकते. इस उदाहरण का मंतव्य संबंधों के लिए अस्थिर हो जाना नहीं वरन ब्रेक-अप के बाद की पीड़ा को सबसे बड़ा दर्द न मान लेना है. प्यार ज़िन्दगी की सबसे बड़ी समस्या नहीं है. ‘रोमांटिक लव’ बहुत ओवर रेटेड है. फिल्म सिखाती है कि इस तरह के प्यार के अलावा भी जीवन में कई स्पेशल रिश्ते हो सकते हैं. हमें उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.

आलिया शिकायती, चिडचिडी कायरा के किरदार को गैर-मामूली सहजता से निभा ले जाती हैं. कायरा अपने परिवार के साथ अशिष्ट है, अपने मित्रों के साथ बदमिज़ाज हैं. उनका व्यवहार कई जगह असंगत और अस्थिर लगता है परन्तु वह जिस आक्रामकता से चरित्र पर अपना दावा प्रकट करती हैं वह आश्चर्यजनक है. सोच में सिकुड़ी उनकी आँखें कई दृश्यों में कमाल कर जाती हैं. असुरक्षित और आशंकित लडकी के किरदार में वो एक ईमानदारी  ले आई हैं जो कायरा को तमाम खामियों के बावजूद सम्मोहक बना देता है. अपने प्रेमी को अपने नए प्रेम-सम्बन्ध की सूचना देने वाला दृश्य हो या उसके बाद अकेले सड़क किनारे नूडल्स खाने वाला दृश्य… उनकी अतिसंवेदनशीलता उभर कर आती है. संकोची कायरा डॉक्टर की मदद से अपनी गांठों को सुलझाते हुए जीवन के प्रति सारे संदेह कहीं बहा देती है. परिणाम स्वरुप एक नयी कायरा अनावृत्त होती है.

शाहरुख़ अपनी मोहक मुस्कराहट और सौम्यता से आकर्षित करते हैं. चमकती आँखों वाला, अपनी पेशेंट के साथ साइकिलिंग करने वाला, लहरों के साथ कबड्डी खेलने वाला थेरेपिस्ट किसी का भी मन हर सकता है. उनके लहजे की नरमी, पेशेंट को ‘मैं हूँ न’ वाला अहसास देती विनम्रता लुभाती है. अपना ‘सुपरस्टार चार्म’ वह बहुत शालीन ढंग से पहने नज़र आते हैं. वह सहजता से आलिया को स्पेस देते हैं. हालांकि अंत में कायरा का अपने थेरेपिस्ट के प्रति आकर्षण प्रसंग टाला जा सकता था. इतने सबक सीखने के बाद भी कायरा का रूमानी रिश्ते में मन का सुकून खोजना फिल्म को थोडा-सा कमज़ोर कर देता है.

क्रेडिट्स में पहला नाम आलिया का आता है और यह फिल्म पूरी तरह से उनकी और गौरी की है. गौरी बहुत एहतियात से अपने अभिनेताओं की संभावनाओं को चीन्हती हैं और उन्हें परदे पर उतारती हैं. वह अत्यंत सरलता से सूक्ष्म विषयों को कह जाती हैं.

पूर्णता और अपूर्णता में सदा द्वंद्व रहा है. रिक्तता प्रसन्नता के लिए किसी पर आश्रित न रहने की विलक्षणता से रिझाती है. अपूर्णता पूर्णता के क्षणिक सामीप्य से मिलने वाले सुख से लुभाती है. पूरा कब कौन हो सका है! पर रिक्तता और अपूर्णता के निर्वात के बीच ज़िन्दगी बहती है. ज़िन्दगी हमें लिफ़ाफ़े में रख क्या देती है यह हम पर निर्भर करता है. पीड़ा चुक के जाने के बाद एक तरल एकांत शेष रह जाता है जिसे किसी भी आकृति में ढाला जा सकता है. इस तरलता को खुशनुमा आकृतियों तक पहुंचाने का ज़िम्मा यह फिल्म उठाती है.

Posted 26th November 2016 by prabhat Ranjan

Labels: dear zindagi divya vijay डियर जिंदगी दिव्या विजय

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