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हृदय दुनिया की सबसे कठोर वस्तु भी हो सकता है

यूँ तो हिंदी में ‘बनारस’ पर कई कविताएँ लिखी जा चुकी हैं। फिर भी, हर नया कवि उस शहर की ओर आकर्षित होता है। हर एक आँख उस शहर को अपनी नज़र से देखती है। हर एक दिल उस शहर को अलग तरह से महसूस करता है। अपना अनुभव बयान करता है। बनारस, किसी के लिए इश्क़ है तो किसी के लिए महज़ उन्स। लेकिन उपासना के बनारस का रंग और ही है। आज जो कविताएँ आप पढ़ने जा रहे हैं, उनमें बनारस तो है ही। साथ में, एक कवि की स्मृति और आत्म-स्वीकृति भी है। और लिखने का अंदाज़ ऐसा, जैसे हंसते हंसते आँसू निकल आए। उन आँसुओं को शब्दों में ढाल कर कुछ शक्लें तैयार की गई हैं। उन्हें पहचानने की कोशिश कीजिए, पढ़िए उपासना झा की कविताएँ – त्रिपुरारि

बनारस क्या शहर है बस…!
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*
उगते सूर्य को अर्घ्य देकर ही
विदा होती है अरुंधति
कालभैरव की आरती करती है
अनवरत जलती चिताएं
उसी शहर में
गंगा पार ठंडी रेत में
बैशाख के किसी अनमने दिन में
सूर्य के साथ उदित हुआ था प्रेम
तुम्हारे लिए हो सकता है
वह संकीर्ण गलियों वाला
गन्दी सड़कों वाला शहर
भीड़भाड़ और ट्रैफिक जाम में फंसा हुआ
शहर जिसकी ठगी मशहूर है
उस शहर ने मुझे ऐसे ठग लिया था
कि सब तरफ़ हरा ही नज़र आता था
 
**
जाने कितने व्याकुल दिन
हमने बिताए एक शहर में रहकर
एक-दूसरे को बिना देखे
जाने कितने असंख्य क्षण काटे गए
संग में बिना हँसे
तुम्हारा कंधा चूम लेने की हसरत
बनी रही एक प्यास
लेकिन ‘चाहना भी चूमना ही है’
कहकर जिस तरह तुमने देखा था
आत्मा पर उसका स्पर्श अब भी है
बनारस वह आदिम इच्छा भी है
जिसने जला रखा है प्रेमियों को सृष्टि के आरंभ से
 
***
तुम कह सकते हो उसे
उम्र के उन बरसों की नादानी
या ये भी कि नदियों में भी होती है
समय की उठान
उनदिनों हर चीज़ नशा होती थी
हँसी में घुली रहती थी
गोदौलिया की भाँग और रथयात्रा की ठंडई
सिगरा चौराहे की चाय
लहुराबीर का समोसा
और कैंट पर खाये गये अमरुद
उचटी हुई नींद से उठने पर
गला सूख जाने से जो याद आये
बनारस वही कलेजे की फाँस है…
 
****
घाट-घाट का पानी पीकर
लहरतारा से जो लहर उठकर
चली गयी है मंडुआडीह की तरफ़
उसमें गुम हैं हज़ार मुस्काने
क़ैद हैं जाने कितनी जवानियाँ, जिन्दगानियां
बजरडीहा में धुन है धागों के रंगों की
उसी शहर में उठती है विदा की धूम
मणिकर्णिका के मरघट पर, अनवरत
उसी शहर से कुछ अलग हटकर
दिनरात जपते हैं बौद्ध-भिक्षु
करुणा के मंत्र
उस शहर ने बना लिया है
मुझमें एक ऐसा प्राचीन शहर
जो युगों तक जीवित रहेगा
 
*****
प्रेम की सब कविताओं में
उदासियाँ उसी तरह गुंथी हुई है
जैसे जब मैं सपनों की बात लिखना चाहूँ
तो लिख जाती हूँ भरी हुई आँखे
जैसे बरसात के मौसम में किसी भी क्षण
छलकने को तैयार रहती है गंगा
जब मैं लिखना चाहूँ तुम्हारे चेहरे पर
ख़ुशी की खिलखिलाहट
कागज पर उतर जाता है तुम्हारे होंठो का चुप
बनारस वह धागा भी है
जिसने जोड़े रखा है तुम्हें मुझसे अबतक
 
******
उनदिनों जब तुम पूछते थे कि
प्यार की मात्रा और गहराई
और कभी-कभी उम्र भी
अस्सी घाट की सीढ़ियां, गंगा का तल
और बनारस
कितने माक़ूल जवाब लगते थे
और अब सोचती हूँ तो लगता है
अस्सी की कितनी सीढियां डूब गई
गंगा के कितने पाट सूख गए
बनारस कितना पुराना हो गया…
 
स्मृति.
*
दुःख-सुख की कई अवस्थाओं में से
समय ने जो छाँट लिया था
वह बच गया था मेरा अभीष्ट
वह बन गयी थी स्मृति
 
**
तुम्हें उतना बचा रखा था
जितना जिए जाने में बाधक नहीं था
जितना ला सकता था
एक छोटी मुस्कान कभी भी
 
***
तुम्हें उतना भुला दिया गया था
जितना उठा सकता था अमर्ष
जो जगा सकता था कोई
सुप्त असह्य पीड़ा
 
****
चुन लिया था समय ने
स्वर्ग- सब सुन्दर याद रखकर
भोर के स्वप्नों में बहुधा
नर्क झाँक जाता था
*****
क्या और हो सकता था
ने उतना ही ठगा है भीरुता को
जितना ‘हम ने क्यों नहीं समझा’
ने कातरता को
 
******
अवचेतन में सिमटी रही
और जो एकाएक सामने आकर
कर गयी थी क्लांत
वह थी तुम्हारी गंध
 
*******
स्पर्श आता था नहीं
स्मृति की ज्यामिति में
वह मिटता है सबसे पहले
रहता है सुरक्षित व्याप्ति में
 
*******
स्मृति बन जाती है पगडंडी
जिसपर चलकर कभी भी
जाया जा सकता है
पुल के उस पार, अनामंत्रित
 
*********
स्मृति इतिहास नहीं है
अतीत का पुनर्पाठ भी नहीं
स्मृति नहीं है वरदान
स्मृति है- केवल भंग आवृत्ति
 
आत्मस्वीकृति
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नींद की चौहद्दी पार कर
स्वप्नों के धुँधले रास्ते पर
चलने लगती हैं कुछ अबूझ पीड़ाएँ
जो खींचती है एक बारीक महीन रेखा
अकेले होने और अकेले पड़ जाने के बीच
अपने को समझाने के कई तरीकों में
हम सृष्टि के नियम एक बार फिर दुहरा लेते हैं
‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च’
मन के शून्य-मंदिर में
न कोई स्वर है न कोई सुगंध
सब कठोर है प्रस्तर पिंडो सा
जिसे होना चाहिए था नये जन्मे
शिशु की मुस्कान सा कोमल
मनुष्य का वही हृदय
दुनिया की सबसे कठोर वस्तु भी हो सकता है

 

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