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‘दिल्ली की शायरी में लड़कों के लिए इश्क बहुत है, लखनऊ में लड़कियों के लिए’

उदयन वाजपेयी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘समास’ के 15 वें अंक में उर्दू के महान लेखक शम्सुर्ररहमान फारुकी का एक बहुत जबरदस्त इंटरव्यू आया है, जो कि उदयन वाजपेयी जी ने ही लिया है. उस इंटरव्यू में बहुत सारी बातों के अलावा लखनऊ-बनाम दिल्ली की बहस के ऊपर भी उन्होंने बात की है. वही अंश ‘समास’ से साभार- मॉडरेटर

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लोगों ने दिल्ली और लखनऊ को फिजूल में ही एक दूसरे का प्रतिपक्षी बना रखा है. यह मिथक इतना गहरा है कि लगता है यह पांच छः सौ साल पुराना होगा. मैंने इसकी छानबीन की और पाया कि इस मिथक का जन्म 1926 का है. एक मौलाना थे, बड़े काबिल थे, शिबली के शागिर्द थे. उनका नाम था अब्दुस्समद नकवी. उन्होंने आजमगढ़ में शिबली अकादेमी बनाई और वहीं जिंदगी गुजार दी. शेर-अल-अजम में शिबली ने अपनी समझ से उस सारी फ़ारसी शायरी का जिक्र किया है जिसे वे कहने या बताने के काबिल समझते थे, उसमें उन्होंने फ़ारसी कविता का इतिहास, साहित्य-सिद्धांत और उसके सांस्कृतिक पक्षों के बारे में लिखा है.

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ग़ालिब उसमें कहाँ होंगे, वे उन्हें घास नहीं डालते. ग़ालिब तो ग़ालिब बेदिल भी नहीं हैं. उसमें एक जुमला है कि लोगों कि रूचि इतनी बिगड़ गई है कि लोग ब्दिल, नासिर, सरहिंदी और शाईब जैसे शायरों पर सर धुनने लगे हैं. वे हाफ़िज़ की परम्परा के थे, खुसरो को मानते थे. खैर… चूँकि अब्दुस्समद नकवी शिबली के शागिर्द थे तो उन्हीं की किताब के नाम से इन्होने शेर-अल-हिन्द लिखा, दो जिल्दों में. वह किताब थी केवल उर्दू के बारे में गोया उसका आशय यह था कि अगर हिंदी में कोई साहित्य है तो केवल उर्दू का. उसी किताब के दूसरे भाग में उन्होंने एक अध्याय लिखा: उर्दू शायरी के दो स्कूल दिल्ली और लखनऊ. दिल्ली और लखनऊ की बात ले-देकर यहीं से शुरू हुई. उन्होंने ही कहा कि दिल्ली की शायरी में सूफियानापन होता है, जुबान फ़ारसी से मिलती है, लखनऊ की शायरी में सूफियानापन कम है या नहीं है. दिल्ली की शायरी में लड़कों के लिए इश्क बहुत है, लखनऊ में लड़कियों के लिए. दिल्ली की शायरी में ढाका हुआ अंदाज़ है, लखनऊ की शायरी में खुला हुआ. लखनऊ में अंगिया-कुर्ती, पिस्तान, कूल्हा और कमर के बारे में लिख देते हैं, यहाँ लड़कों का इश्क बिलकुल नहीं है.

ये सब बातें गलत है. लेकिन जो चल गया सो चल गया. अगर इनके बीच कोई प्रतिद्वंद्विता थी तो वह यह कि दिल्ली वाले श्रेष्ठ हैं और लखनऊ वाले कमतर.

इंशा ने 1807 में मेरे ख़याल से भाषा विज्ञान की दुनिया की पहली किताब लिखी थी, यह किताब उन्होंने सादत अली खान के ज़माने में लिखी थी और वे दिल्ली से आए थे इसलिए इंशा ने बहुत बचाकर किताब लिखी. उन्होंने कहा कि ऐसा कोई घराना जो पचास से कम बरसों पहले दिल्ली से आया हो, उसकी भाषा हम नहीं मानेंगे. मुर्शिदाबाद वाले अपने को दिल्ली वाला कहते हैं, वे कहाँ दिल्ली वाले हो गए जबकि इंशा खुद मुर्शिदाबाद से आए थे. इससे लखनऊ वालों को कुछ अच्छा लगा होगा, कुछ बुरा लगा होगा. इसके बाद रजब अली बेग ‘सुरूर’ ने अंग्रेजों को उर्दू पढ़ाने के लिए लिखी गई मीर अम्मन के ‘बागो-बहार’ पर यह चुटकी ले ली कि दिल्ली वाले कहते हैं, “मैंने यह काम करकर छोड़ दिया, लेकिन ये ‘करकर’ क्या होता है, ‘करके’ लिखना चाहिए. इसतरह के छोटे मोटे चुटकुले चलते रहते थे. हाली ने 1864 की किताब में संकेत किया है कि लखनऊ वालों के मुहावरे कुछ अलग हैं. लेकिन ऐसा नहीं था कि लखनऊ वालों के मुहावरे कुछ अलग हों.

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