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समर्थ वशिष्ठ, ‘सपने में पिया पानी’ और एक छोटी सी टिप्पणी

समर्थ वशिष्ठ का कविता संग्रह ‘सपने में पिया पानी‘ पर युवा लेखक अनघ शर्मा की टिपण्णी-

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मैंने इन दिनों इधर जिन कविताओं को पढ़ा उनमें समर्थ वशिष्ठ के राजकमल प्रकाशन से आये संग्रह “सपने में पिया पानी” की कवितायें बहुत अच्छी, अलग और नये मिजाज़ की लगीं| ये समर्थ का हिंदी में पहला ही संग्रह है और इसमें उनकी कविताओं की एक बड़ी रेंज और लम्बी यात्रा दिखती है| ये यात्रा भीतर से बाहर की तरफ़ है जो समर्थ के बेहद संवेदनशील होने को दर्शाती हैं|

सम्प्रेषण और संवेदना के लिहाज ये सब बेजोड़ कवितायें हैं| समर्थ बख़ूबी जानते हैं कि इन कविताओं को संवेदना और अनुभव के किस स्तर और किस ठहराव पर ला कर रोकना है| आज के जिस दौर में जब एक भाषा में भावाव्यक्ति ही बहुत मुश्किल होती है समर्थ के पास कहने और सम्प्रेषण के लिए दो-दो भाषा- हिंदी और अंग्रेजी मौजूद हैं और इनपर उनकी बराबर की पकड है| समर्थ की कुछ कविताओं में नए चलन के शब्दों और विज्ञान का दख़ल भी दीखता है जो इन कविताओं को एक अलग तरह की गंध और धरातल देता है जिसको गुरत्व,पुनर्पाठ जैसी कई कविताओं में देखा जा सकता है|

इस संग्रह में पिछले पंद्रह साल (२००१-१५) की कवितायें संग्रहित हैं| ये एक रोज़ की लिखी हुई कवितायें नहीं हैं ये लम्बे,सतत अनुभव से उपजी हुई कवितायें हैं| ये अनुभव उनके बचपन के घर (पंजाब) के हों, नौकरी के लिए दिल्ली जैसे महानगर के हों, पिता को लेकर अनुभव हों या अन्य| ये अनुभव भले ही अलग-अलग समय के हों पर इन आयामों में आवाजाही उनके लिए बड़ी सुगम है| ये कवितायें जिस सहजता से पिता से बात कर लेती हैं उतनी ही आसानी से 4 साल की बेटी से भी मुख़ातिब हो जाती हैं| इस संग्रह की कुछ कविताओं में उनके पिता के 84 के बाद के दौर में ग़ैर सिख समुदाय के साथ हुई हिंसाओं की वजह से पंजाब छोड़ने के दुःख की अनुगूंज साफ़ सुनाई देती है, ये पीड़ा ये दुःख समर्थ के अंग्रेजी कविता संग्रह में तो बहुत स्पष्ट स्वर में सुनाई देता है| इस संग्रह की दो कवितायें मुझे बहुत प्रिय हैं ‘दो साल की तुम’, ‘पराजय’ इन दोनों कविताओं में एक पिता का अपनी बेटी से मुख़ातिब होना है| और इन दो कविताओं के कितने आयाम और भावनात्मक पुनर्पाठ हो सकते हैं ये सिर्फ़ और सिर्फ़ समर्थ ही समझ सकते हैं, हम चाह कर भी उस स्पेस और डायमेंशन में नहीं पहुँच सकते हैं जहाँ समर्थ इन्हें महसूस करते और लिखते वक़्त थे|

समर्थ की कविता-भाषा और शैली बड़ी उदात्त है| इन कविताओं की काव्याभिव्यन्जना बहुत ठहरी और रिमझिम बरसात सी है, जो पढने वाले को अंदर तक सींच के चलती है और अंतर-दृष्टि को कुछ नया देखने का आयाम देती हैं| इन कविताओं में जो तड़प,बैचैनी, सुकून, इंतज़ार है वो समय के साथ चलती है और उससे आगे निकलने का रास्ता तलाशती,दिखाती है| ये कवितायें कई-कई सीढ़ियों पर अलग-अलग खड़े लोगों से एक साथ संवाद बनाती हैं| इन कविताओं में जितना बुद्धि-तत्व है उससे कहीं ज्यादा हृदय-तत्व है| ये जितनी सहजता से मानस के सामान में ढलने-बदलने पर बात कर लेती हैं उतनी ही आसानी से अपने गढ़े हुए ईश्वर की चुप्पी पर भी| ये सब कवितायें हमसे ऐसा कोई दावा नहीं करती की तमाम मुश्किलात का हल इनके पास है, हाँ पर ये गुंजलक भीड़ वाले रास्तों पर ला कर हमको अपने-अपने रास्ते तलाशने का हौसला देती हैं और मेरे ख्याल से यही इन कविताओं की बड़ी बात है| इस संग्रह की हर एक कविता बहुत धैर्य से, रुक कर, ठहर कर हमसे बात करती है और मुझे और आपको कुछ सोचने के रोक लेती हैं| इन कविताओं में समय और उसके पंख दोनों ही अपनी पूरी धमक से मौजूद हैं, जिसकी कुछ बानगी नीचे है|

‘सिक्के से भारी होते हैं हम कहीं भीतर,

 हीलियम से हल्के ज़्यादातर|” (गुरुत्व)

‘कहीं कोई जिस पर हमें सदा विश्वास था

हमारी प्रार्थनाओं से फेर लेता है मुँह’ (विद्रोह)

“बसों से बसों तक चलती हैं बसें

सीटों से सीटों तक दौड़ते हैं धावक

दिन-रात” (दिल्ली)

“कितने भय थे मेरे भीतर

जो कहे नहीं कभी” (प्रवास में याद )

‘और जब खोलूँगा मैं आँखें

एक लंबी नींद के बाद

बचा रहेगा कुछ मेरा सपना

मेरे साथ’ (कुटिल तर्क)

‘करवट सोते हैं रंक

पीठ पर राजा’ (तदर्थ)

‘कितना त्रासद

अपने बचपन को ढूँढना

अपने चेहरे को बना कर

पहचान-पत्र’ (वापसी)

‘ग्रीष्म की चीखती परछाईं

बचपन के जूठे अंश

अकेला जूझता बूढ़ा चाँद’ (पंजाब)…. इस कविता में ये ‘ग्रीष्म’ मौसम नहीं है वरन झुलसता हुआ समाज और ‘बूढ़ा चाँद’ खुद थका हुआ पंजाब है |

समर्थ के इसी संग्रह की भूमिका में मेरे प्रिय कवि “श्री गीत चतुर्वेदी जी” एक जगह कहते हैं कि…..

“आम तौर पर कविताओं में या जीवन में भी ऐसी इच्छा प्रकट की जाती है कि ऐसी बारिश हो कि भीतर तक भीग जाऊं| वैसे में बारिश के कुछ प्रतीकात्मक अर्थ भी होते हैं, लेकिन कवि यहाँ अपने भीतर को ही बचा ले जाना चाहता है और ऐसा करते हुए वह अपने भीतर का महत्तम प्रकाशन कर जाता है| भीतर तक भीगने की कामना क्यों की जाये,जब भीतर मखमली गंध और नन्हीं बूंदों की क़तारें पहले से हों?”

इस संग्रह की हर कविता अपनी आत्मा और मिजाज़ से ऐसी ही मखमली गंध और मुलायम बूंदों से भरी हुई है,जिससे गुज़रते हुए हम खुद भीग जाते हैं,तर-ब-तर हो जाते हैं| इस संग्रह को पढ़ते हुए समर्थ के लिए मेरे मन में बार- बार कैफ़ी आज़मी का यही शेर गूंजता रहा…

“अहसास में शबनमी लताफत

अन्फ़ास में सोज़-ए-शायराना”

 

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