Breaking News
Home / Featured / मैत्रेयी जी मैत्रेयी जी क्या हुआ आपको?

मैत्रेयी जी मैत्रेयी जी क्या हुआ आपको?

मैत्रयी पुष्पा की किताब ‘वह सफ़र था कि मुकाम था’ पर चल रहे विवाद पर युवा लेखिका दिव्या विजय की टिप्पणी- मॉडरेटर

=======

‘वह सफ़र था कि मुकाम था’ इस पर मैत्रेयी पुष्पा  भले ही कन्फ़्यूज़्ड हों पर आस-पास चल रहे मुबाहिसे में लगभग सब एक मुकाम पर पहुँच चुके हैं. और वह यह कि अपनी आत्मकथा में मैत्रेयी पुष्पा ने दुर्भावना से वशीभूत हो एक और लेखिका के ऊपर आरोप युक्त भाषा को स्थान दिया है. मैं किसी के पक्ष-विपक्ष में नहीं हूँ पर इस आत्मकथा में जिस तटस्थ गुण की अनुपस्थिति की भर्त्सना लोग कर रहे हैं वे भी कहाँ तटस्थ हैं. एक महिला के प्रचारित बचाव में वे भी तो  एक और महिला ही को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं.

यह तो प्रत्यक्ष ही है कि राजेंद्र यादव उनके ख़ास मित्र थे तो उनकी जीवन चर्चा में पक्ष भी मित्र का ही लिया जाएगा तथा नज़रिया भी. यह तो सामान्य और सीधी समझ आने वाली बात है. हम स्वयम् को अपने मित्रों का ही ख़याल करते और पक्ष लेते पाते हैं. मैत्रेयी पुष्पा ने मन्नू भंडारी के विषय में जो भी कहा वह उनके जीवित रहते ही कहा. पीठ पीछे कहतीं तो बात के भेदभावपूर्ण होने के आरोप स्वतः ही लग जाते. पर मैत्रेयी पुष्पा ने यह नहीं किया. उन्होंने वर्तमान को चुना और स्वदेखे को कहा.

सच तो मन्नू भंडारी और राजेंद्र यादव के मध्य ही है पर मैत्रेयी ने जो देखा-सुना और अपने मित्र के नज़रिए से मन्नू भंडारी को जैसा पाया वैसा ही लिखा. राजेंद्र की जिस हालत का ज़िक्र किया गया है उसमें भी मन्नू भंडारी को राजेंद्र के लिए सख़्त पा मित्र के नाते मैत्रेयी के स्वर का तल्ख़ होना कैसे सुनियोजित कहा जा सकता है?

मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा में स्वयम् ही अपनी माँ के सबमिसिव स्वभाव का ज़िक्र किया है कि कैसे मन्नू के पिता  का हुक्म घर में सर्वोपरि था. तब से ही मन्नू ने कभी अपनी माँ को आदर्श नहीं माना. अपनी माँ की परंपरा के विरुद्ध जा उन्होंने नारी की बराबरी को ऊपर रख कर अपने तईं न्याय ही किया. अतः मैत्रेयी पुष्पा के बयानों के अनुसार यदि मन्नू भंडारी ने यदि अपने पति के साथ मतभेद होने पर अपने आत्मसम्मान को ऊपर रखा तो  उसके सच होने में ग़ैर भरोसे लायक तर्क जमता नहीं क्योंकि यह मन्नू की आत्मकथा के हिसाब से उनके स्वभाव में ही था. लेकिन  मैत्रेयी का मन्नू से एक आदर्श पत्नी जैसे व्यवहार की अपेक्षा करना भी एक नारी की दृष्टि से असंगत है. पर यहाँ मैत्रेयी का स्वर मन्नू भंडारी पर आरोप लगाने की बजाय अपने ख़ास दोस्त राजेंद्र यादव की अस्वस्थता में उनकी अनदेखी के प्रति दुख का ज़्यादा है. उम्र की जिस अवस्था में परिवार की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है तथा पुरानी शिका़यतों को भूल परिवार पुनः एक भी होते देखा गया है, उस अवस्था में राजेंद्र को अन्यों पर आश्रित होते देख एक मित्र का दुखी और रोषपूर्ण होना क्या अस्वाभाविक है?

मन्नू के करीबी लोगों ने भी जो देखा सो लिखा. उन्होंने मन्नू भंडारी को अस्पताल में तीमारदारी करते देखा सो उनका मैत्रेयी पुष्पा पर अविश्वास करना तो बन सकता है. परंतु उन्हें अपनी अदालत में लाकर आरोप लगाना औचित्यपूर्ण नहीं. उनके लिखे को एकांगी और कल्पित कहना एक लेखक का दूसरे लेखक के प्रति अन्याय है. अब क्या मैत्रेयी को दो दोस्तों के बीच हुई बातों का भी साक्ष्य देना होगा? मैत्रेयी के मन्नू के साथ जैसे अनुभव रहे आत्मकथा में भी उन्हीं अनुभवों ने  वैसे ही रूप में जगह पायी. यदि मन्नू भंडारी के साथ मैत्रेयी के अनुभव तिक्त रहे तो क्या केवल दिखावे भर को उन्हें मधुर लिखना असत्य नहीं होगा?

यही बात और घटना कल को मन्नू भंडारी के करीबी अपनी किताब में उनके नज़रिए से लिखेंगे. वहाँ सत्य उनकी स्थिति और उनकी हक़ीक़त पर आधारित होगा. लेखक तो लिखेगा ही, औरों के आरोपों की परवाह के बग़ैर लिखेगा. तब क्या किसी वाद या काल की नज़र से ही उसे भी देखा जाएगा?

  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

आँखों में पानी और होंठो में चिंगारी लिए चले गए राहत इंदौरी: राकेश श्रीमाल

मुशायरों के सबसे जीवंत शायरों में एक राहत इंदौरी का जाना एक बड़ा शून्य पैदा …

Leave a Reply

Your email address will not be published.