Home / Featured / कुँवर नारायण और उनकी किताब ‘लेखक का सिनेमा’

कुँवर नारायण और उनकी किताब ‘लेखक का सिनेमा’

80-90 के दशक में कुंवर नारायण विश्व सिनेमा पर दिनमान, सारिका और बाद में नवभारत टाइम्स में लिखा करते थे. अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखाई गई फिल्मों पर. उन्होंने उस गूगलविहीन दौर में एक पीढ़ी को विश्व सिनेमा से परिचित करवाया. हाल में ही राजकमल प्रकाशन से उनकी किताब आई है ‘लेखक का सिनेमा’. इसी किताब पर यह टिप्पणी लिखी है मीना बुद्धिराजा ने- मॉडरेटर

========

बीसवीं सदी मे विश्व सिनेमा के महान और सबसे असाधारण फिल्मकार माइकल एंजेलो एन्तोनिओनी का कथन है कि – “फिल्मो का जन्म उसी तरह होता है जैसे एक कवि के ह्रदय में कविता का । शब्द, ध्वनियां और विचार – ये सब दिमाग मे उठते है और एक दूसरे मे घुल मिल जाते हैं और एक कविता सामने आती है । मैं यह मानता हूं कि फिल्म के साथ भी यही होता है ।”  एन्तोनिओनी को दूसरे महायुद्ध के बाद का सबसे विलक्षण फिल्मकार माना जाता है । उनकी फिल्में आकारों और दृश्यों के बीच आधुनिक मनुष्य के अस्तित्व की एक अनवरत खोज है । उनका सिनेमा मानवीय यथार्थ के अंतहीन त्रास का चित्रण है । इसके लिए उन्होने एक नई फिल्म-भाषा की खोज की, जिसमे रिक्तता और अनुपस्थिति का अपना महत्व है । इसे एक रचनाकार का सिनेमा भी कहा जा सकता है ।

      हिन्दी कविता के वर्तमान परिदृश्य मे वरिष्ठ कवि कुंवरनारायण की एक नितांत अलग तरह की उपस्थिति है । अपनी छ: दशक लंबी काव्य यात्रा मे उन्होने इतिहास की विडंबनाओ और मनुष्य की नियति का सामना किया है । अपनी कविता के बारे मे उनका मानना है कि कविता उनके लिए एक अनुभव मात्र या भाव की अभिव्यक्ति नहीं वह ज्यादा फैले हुए और ज्यादा गहरे स्पेस (विस्तार) की रचनात्मक खोज है । ‘आत्मजयी’ जैसी कृति उनकी इसी गहन वैचारिकता और आत्म सजग चेतना की परिचायक है । हिन्दी जगत मे उनकी सृजनशील उपस्थिति एक गहरी आश्वस्ति का प्रतीक है । कविता के अतिरिक्त साहित्य की अन्य विधाओं मे वे निरन्तर लिखते रहे है । वे विश्व-साहित्य विशेष रुप से विश्व-कविता और विश्व-सिनेमा के गहन अध्येता और जानकार भी है । आधी सदी तक सिनेमा पर गंभीर विवेचन और लेखन उन्होने किया है । कई व्याख्यान भी दिए और बहुत से अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहो मे जाकर विश्व-प्रसिद्ध फिल्मकारों की फिल्में देखने और समझने का अवसर मिला ।

      इन सभी अनुभवों पर आधारित कुंवरनारायण जी की नई पुस्तक हाल ही मे राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है – ‘लेखक का सिनेमा’ । इस किताब मे एक लेखक के  द्वारा बनाए गए सिनेमा पर एक लेखक द्वारा देखे गए सिनेमा की तरह विचार किया गया है । सिनेमा से जुड़े उनके लेखों, टिप्पणियों, व्याख्यानों और संस्मरणो को यहां संकलित किया गया है। कुंवरनारायण जी का मानना है कि सिनेमा का कैनवास हमेशा व्यापक होता है क्योंकि व्यक्ति का यथार्थ ही घटनाओं और चरित्रों में प्रस्कुटित होकर समाज के यथार्थ मे परिणित होता है । इस दृष्टि से फिल्म एकान्तिक न होकर समग्र संरचना मे अधिक संश्लिष्ट होकर ज्यादा बड़े जीवन का आभास देती है ।

यह अनायास नहीं है कि कुंवरनारायण यहां उन फिल्मों के प्रति गहरा जुड़ाव अनुभव करते है जिनकी सर्जनात्मकता के मूल में साहित्यिक मूल्य रहे है । पुस्तक मे अनेक यूरोपियन फिल्मों व निर्देशकों की फिल्म-निर्माण दृष्टि पर एक आत्मीय मींमासा दिखाई देती है । एक कवि के रुप मे सिनेमा जैसे कला-माध्यम के साथ संवाद करते हुए लेखक ने कुछ नये सूत्रों को भी सामने रखा हैं। उनके अनुसार सिनेमा देखने के भी कई तरीके हो सकते है जो एक दर्शक को नया कोण, तथा परिप्रेक्ष्य और विजन की नई भूमि दे सकते है । अनेक स्थलो पर  कुंवरनारायण जी कला, जीवन, समाज, राजनीति और सिनेमा के संबधो को भी परिभाषित और विश्लेषित करते है । राजनीति और कला का गहरा संबंध होते हुए भी उनका निश्चित मानना है कि कला हमेशा राजनीति से बड़ी होती है । एक लेखक द्वारा सिनेमा के साथ किया गया यह आत्मीय, आलोचनात्मक और सर्व समावेशी संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है ।

      पूर्वी-यूरोपियन फिल्मो के प्रति अपने लगाव की वजह भी उनकी संवेदंशील रचना – दृष्टि रही है । उनका मानना है कि मानवीय-संस्कृति और परंपरा के स्थायी और वैश्विक सरोकार लगभग एक जैसे हैं और कम ही बदलते है । इसी लिए किताब के बहुत से लेखो को पढ़्ते हुए महसूस होता है कि इन फिल्मो के माध्यम से उस समय का जीवित इतिहास गतिमान हो रहा है । पुस्तक मे अनेक विशेष रपटें भी शामिल है जो अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहो पर आधारित है। ये एक लेखक की व्यक्तिगत कला दृष्टि के साथ ही सिनेमा के व्याकरण की एक गंभीर आलोचना भी प्रस्तुत करती है । एसे अनेक फिल्मकारों का यहां विशाल समूह है जो अलग-अलग पाठशालाओं से आए है और वैश्विक सिनेमा को नई ऊचांइयो तक पहुंचाने मे कामयाब रहे । महान भारतीय फिल्म-निर्देशक ‘सत्यजीत राय’ से होने वाले संवाद और उनके साथ गुजारे वक्त को भी एक आत्मीय संस्मरण में उन्होने याद किया है । प्रसिद्ध फिल्मों व निर्देशको के अतिरिक्त पहली बार उन फिल्मो के बारे मे पढ़ना भी सुखद रहेगा जो इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक तक कम ही जानकारी मे आ पाए । पुस्तक का संपादन लोकप्रिय कवि ‘गीत चतुर्वेदी’ ने किया है । जो यह मानते हैं कि कुवरनारायण जी ने पूरी तरह इन फिल्मों को जीकर ही और उनमे गहराई से उतरकर ही यहां उन्हे मानो साकार कर दिया है ।

हिन्दी साहित्य, सिनेमा और नई पीढ़ी जो विश्व-सिनेमा में दिलचस्पी रखती है उनके लिए यह पुस्तक एक दस्तावेज के रुप मे महत्वपूर्ण है । सिनेमा देखने का एक नया तरीका जो इन दिनो दुर्लभ है, उसे भी यह किताब प्रस्तावित करती है । यूरोपीय सिनेमा को जानने के अतिरिक्त हिन्दी सिनेमा के अध्ययन विश्लेषण में, एक –विधा के रुप मे सिनेमा की सैद्धान्तिकी को समझने, और नए सिनेमा की संभावनाओं एवं चुनौतियों से रुबरु होने मे यह पुस्तक उन  छात्रों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है जो विश्व-विद्यालयों के नए पाठ्यक्रमों में ‘हिन्दी – सिनेमा’ को एक विषय के रुप मे पढ़ रहे हैं ।

  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

ड्रीम गर्ल- कहानी भीड़ में तन्हा होने की

हाल में ही रिलीज़ हुई फ़िल्म ड्रीम गर्ल की समीक्षा लिखी है निवेदिता सिंह ने- …

2 comments

  1. मीना बुद्धिराजा ने बहुत ही खूबसूरती के साथ कुंवर नारायण की पुस्तक – लेखक का सिनेमा – से हमें रूबरू कराया है। इस पुस्तक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए मीना जी का धन्यवाद। – विनोद विप्लव

Leave a Reply

Your email address will not be published.