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इतिहास के गड़े मुर्दे, धर्म और इतिहास

इतिहासकार रज़ीउद्दीन अक़ील लगातार हिंदी में लिखते हैं और अनेक संवेदनशील विषयों से हिंदी भाषा को समृद्ध करते हैं. जैसे यह लेख देखिये जिसमें इतिहास लेखन और धर्म के विषय पर उन्होंने स्पष्ट सोच के साथ लिखा है- मॉडरेटर

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वैचारिक संघर्षों और पहचान की राजनीति में इतिहास का इस्तेमाल एक हथियार के रुप में किया जाता है. धार्मिक राजनीति से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों में इतिहास का दुरुपयोग ख़ास तौर से देखने को मिलता है. सार्वजनिक बहसों में उपयोग किए जाने वाले एजेंडा से प्रेरित इतिहास में ऐतिहासिक यथार्थ या सच्चाई के सवाल को ताक़ पर रखकर लोगों की भावनाओं और समय की आवश्यकताओं पर ज़ोर दिया जाता है. इस तरह की बहसों में, साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर अतीत की घटनाओं के सटीक ज्ञान के बजाय, राजनीति से प्रेरित राय या परिप्रेक्ष को थोपने का प्रयास किया जाता है. यह समस्या सार्वजनिक अनुक्षेत्र में परिचालित देशज भाषाई इतिहास के अलावा प्रोफ़ेशनल अकादमिक इतिहास की मान्यताओं में भी देखने को मिलती है. हालाँकि दोनों के प्राइमरी फंक्शन्स अलग-अलग हैं, विभिन्न पहलुओं और नज़रिए के साथ दोनों इतिहास को राजनीतिक संघर्षों का अखाड़ा बनाते हैं.

शैक्षणिक संस्थानों के समय और जगह के विभिन्न सन्दर्भों में, धार्मिक और राजनीतिक संस्कृति इतिहास के अध्ययन पर गहरा असर डालती हैं, जिससे झगड़ालु तर्कों के साथ इतिहासलेखन के समूहों और स्कूलों का निर्माण होता है. इस तरह, पिछली दो शताब्दियों में हिन्दुस्तान में इतिहासलेखन के इतिहास ने कई दृष्टिकोणों से विभिन्न मान्यताओं और फ़ॉर्मूलेशन्स को सामने लाया है. मिसाल के तौर पर, औपनिवेशिक इतिहासलेखन में – जिनकी कुछ क़िस्में हाल के दशकों तक भी जारी रही हैं – उपनिवेशवाद को कुछ इस तरह पेश किया गया है कि मानो उसे ग़ुलामी की ज़ंजीर से जकड़े गए लोगों की भलाई के लिए लाया गया था; वर्ना, वह इतिहास-हीन पशु-माफ़िक़ बर्बर बने रहते. यह गलत धारणा इस दृष्टिकोण के अनुरुप थी कि विजयी शक्तियाँ पराजित लोगों के शरीर को छलनी करते हुए अपनी सत्ता और कामयाबी का इतिहास लिखना चाहती हैं. १५वीं-१६वीं शताब्दी से, पाश्चात्य आधुनिकता ने यही हथकंडा अपनाया है. इस तरह के शोषण की दास्तान सत्ता के ग़लत इस्तेमाल के अन्य सन्दर्भों में भी देखने को मिलती है, जहाँ सत्ताधारी लोग अपने शक्ति प्रदर्शन के भयावह नैरेटिव को धर्म और संप्रदाय के वर्चस्व से जोड़कर वैधता हासिल करने का प्रयास करते हैं.

उपनिवेशवाद पर कटाक्ष करते हुए और यह दिखाते हुए कि पराजित लोग भी अंततः अपनी कहानी बताने या इतिहास लिखने के लिए जीवित रहते हैं, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी इतिहासलेखन के विभिन्न धड़ों या धाराओं ने १९वीं और २०वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की काली करतूतों को दोषी ठहराया है जिनके कुपरिणाम को अंग्रेज़ अपने पीछे छोड़ गए हैं. हिंदू-मुस्लिम संघर्ष, जाति-व्यवस्था, आर्थिक गिरावट और अन्य जवलंत मुद्दों और ख़राबियों को ब्रिटिश शासन की ग़लत नीतियों के तहत निर्माण किए जाने के रुप में दिखाया गया है. सेक्युलर स्कालरशिप की यह धारा सार्वजनिक जीवन में धर्म के महत्व को भी नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करती है, हालाँकि विभिन्न सन्दर्भों में धर्म का दुरुपयोग सांप्रदायिक घृणा की आग में ईंधन की तरह किया जाता है. जेएनयु के इतिहासकार नीलाद्रि भट्टाचार्य ने इस दुखद यथार्थ को धर्मनिरपेक्ष इतिहास के प्रेडिकामेन्टस की संज्ञा दी है.

दूसरी ओर, हिंदू सांप्रदायिक प्रचार इतिहास के रूप में बदसूरत मोड़ लेता है. दक्षिणपंथी ख़ेमे से जुड़े गंभीर इतिहासकार, हालाँकि उनकी संख्या न के बराबर है, अपनी बेतुकी सोच के साथ सत्ता के बाज़ार में अपनी दुकान खोलते हैं. उनकी हास्यास्पद डेस्पेरेशन या हताशा की एक मिसाल देखिए: “मध्ययुगीन भारत अंधकारमय था. पूरा देश अंधकार में डूबा हुआ था. क्योंकि बिजली की सप्लाई बंद थी. ऐसा इसलिए था कि कट्टरपंथी मुस्लिम शासक सत्ता में थे. उन्होंने इस्लाम का पालन किया और इस्लाम विज्ञान के ख़िलाफ़ है!” बदक़िस्मती से एक बहुत बड़ी आबादी के एक छोटे से भाग को, इस दौर में भी, इस तरह की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना लफ़्फ़ाज़ी से बेवक़ूफ़ बनाकर थोड़े दिनों के लिए सत्ता हथियाया जा सकता है.

इसके विपरीत और सांप्रदायिक हिंदू आख्यान के पूरक के रुप में, एक वैसी ही विचित्र मुस्लिम अलगाववादी क़लम-तराज़ी की परंपरा है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी अतीत का गौरवगान करती है. यह ८वीं शताब्दी की शुरुआत में सिंध पर अरब विजय से ही पृथक हिंदू-मुस्लिम पहचान की तारीख़ गढ़ती है. साथ ही, संत कबीर और मुगल सम्राट अकबर जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को हिंदू धर्म के एजेंटों के रुप में पेश करते हुए यह इलज़ाम थोपने की कोशिश भी करती है कि उन्होंने मध्ययुग में इस्लाम के कॉज़ को नुक़सान पहुँचाया था. इस तरह की तलवार-बाज़ी उनकी पृथक राजनीति की बिसात बिछाने के उधेड़बुन का नतीजा है.

इस प्रकार, हम आम तौर पर जिस समस्या का सामना कर रहे हैं वह दरअसल राजनीतिक प्रोपगंडे हैं जिन्हें इतिहास के रुप में प्रस्तुत किया जाता है. क्या इसका मतलब यह है कि इतिहासलेखन वैचारिक नियंत्रण से मुक्त नहीं हो सकता है? शुक्र है, हाल के दिनों में तथ्यपरकता पर आधारित बुनियादी उसूल की पाबंदी के अतिरिक्त सैद्धांतिक रुप से परिष्कृत शोधों ने ऐतिहासिक पद्धति और लेखन में ताज़ा सोच को जन्म दिया है. धर्मनिरपेक्षतावादियों और दक्षिणपंथी राजनीतिक झंडाबरदारों दोनों के द्वारा खड़ी की गई रुकावटों और विरोध के बावजूद भारत-सहित पश्चिमी देशों, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका, के अकादमिक संस्थानों में ऐतिहासिक शोध और शिक्षण के नए फ्रंटियर्स निरंतर तलाशे जा रहे हैं. तमाम राजनीतिक अड़चनों और धंधेबाज़ी से दूरत्व बनाकर इतिहासकार अपने काम में मसरूफ़ हैं. यह हर दौर की ज़रुरत है. राजनीतिक नालियों के कीड़े-मकोड़े और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में दबे गर्दो-ग़ुबार एवं जीवाणुओं से जूझकर ही इतिहासकार और उनके सहयोगी – राजनीतिक तथा सामाजिक शास्त्र के विद्वान, लेखक और दार्शनिक – बौद्धिक चिंतन के नए पैमाने तय करते हैं.

किसी तरह के भय और लालच से ऊपर उठकर, नए शोध में सांप्रदायिक रुप से संवेदनशील मुद्दों जैसे मध्यकाल में उपासना-स्थलों पर राजनीतिक हमले और ग़ैर-मुस्लिमों के इस्लाम में धर्मांतरण के सवाल को ऐतिहासिक विमर्श का विषय बनाया गया है. राज्य की प्रकृति का मूल्यांकन सभी के लिए बराबर क़ानून और न्याय के लिए शासकों की चिंता, समाज में शांति व्यवस्था की स्थापना, कल्याण तंत्र के साथ-साथ धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर आधारित भारत के अपने राजनीतिक सिद्धांत की तलाश की रौशनी में किया जा रहा है. अकबर और औरंगज़ेब पर नए अध्ययन में उन व्यापक राजनीतिक ढांचों, सिद्धांतों और नीतियों का विश्लेषण किया जाता है, जो धर्म के दुरुपयोग करने वाली संकीर्ण और भेदभाव से प्रेरित राजनीतिक रणनीतियों के विपरीत हैं. शासन के सिद्धांतों पर ऐतिहासिक उदाहरण और दार्शनिक अंतर्दृष्टि का उपयोग यह बताने के लिए किया जाता है कि जब बहु-सांस्कृतिक या बहु-धार्मिक संदर्भों में राज्य के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का धार्मिक विश्वासों से टकराव होता है, तो धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों और प्रगतिशील कानूनों को तरजीह दिया जाना चाहिए, जैसा कि हाल ही में विश्लेषणात्मक दार्शनिक, अकील बिलग्रामी ने भी ज़ोर दिया है. यानि, देश में कोई क़ानून-व्यवस्था है कि नहीं, या हर तरफ़ धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों का तांडव चलेगा?

इसके अलावा, प्राचीन (संस्कृत), मध्ययुगीन (फ़ारसी) और आधुनिक (अंग्रेज़ी) काल में (उपयोग किए जाने वाले स्रोतों की विशिष्ट भाषा के साथ) भारतीय इतिहास के पारंपरिक काल-विभाजन पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया जा रहा है. साथ ही, इतिहासलेखन में साहित्य के विवेकपूर्ण उपयोग सहित समृद्ध स्रोतों के माध्यम से पुराने और सरल अवधारणाओं को तोड़ा जा रहा है. मिसाल के तौर पर, सूफ़ी प्रेमाख्यान, या प्रेम की कविता, मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत जिसके सबसे अच्छे उदाहरणों में से एक है, का हाल के वर्षों में इतिहासकारों और साहित्यिक विद्वानों द्वारा अध्ययन किया जा रहा है. हालांकि, वह अभी भी ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि कलात्मक स्वतंत्रता या सांप्रदायिक राजनीति के नाम पर पैदा किए गए कुचक्र को संभाल सकें – जैसा कि हमने हाल ही में देखा है.

आध्यात्मिकता से शराबोर पब्लिक के बीच, सूफ़ी-भक्ति परम्पराओं के साझा और विवादित क्षेत्रों में सांस्कृतिक विमर्श के जोड़-तोड़ एवं क्रूर राजनीतिक हिंसा की संभावनाओं के दोषपूर्ण व्यवहार उजागर होते हैं. दो उदाहरण जो यहां दिए जा सकते हैं: योगी गोरखनाथ का सूफ़ियों के प्रति अनुकूल रवैया, जिन्हें अल्लाह की जाति से संबंधित समझा गया, और मध्ययुगीन भारत में शाकाहार के नए शौक़ या सनक को संत कबीर का आक्रामक समर्थन। यह और इन जैसे कुछ और अहम मुद्दों ने जहाँ एक ओर सामाजिक संबंधों में दरार को सामने लाया, वहीं दूसरी तरफ़ सामाजिक संरचना के कम्प्लेक्स टेक्शचर से भी अवगत कराया।

अंत में, निष्कर्ष के तौर पर, यह कहा जा सकता है कि सार्वजनिक डोमेन की लोकप्रिय राजनीति में इतिहास का बाज़ार गर्म है, हालाँकि यह ज़रुरी नहीं है कि कोई इतिहासकार रिज़र्व बैंक का गवर्नर बनकर बड़ा काम करेगा! कई तरह के वैचारिक खूँटों और विभिन्न प्रकार की शिनाख़्त की राजनीति के दबाव ने मिलकर ऐतिहासिक पद्धति और लेखन पर गंभीर अड़चनें डालीं हैं. लेकिन जैसा कि ऊपर बताया गया है, सब तरह की चुनौतियों के बावजूद, ऐतिहासिक शोध की नई परतें निरंतर खुलती रही हैं. विभिन्न स्रोतों, साक्ष्यों और तथ्यों का पेशेवर इतिहासकार उनके विभिन्न संदर्भों और ख़ुद अपने समकालीन परिप्रेक्ष में अध्ययन कर नए-नए विषयों और मुद्दों से निपट रहा है. धर्म और राजनीतिक संस्कृति के बीच के जटिल अन्तर्सम्बन्ध पर पर्दा डालकर अब उनको नज़रअंदाज़ नहीं किया जाता. क़ालीन के नीचे दबाए गए कूड़ा करकट को ज़्यादा दिनों तक छुपाया नहीं जा सकता. इतिहासकार उनमें से भी गड़े मुर्दे निकलकर उनका पोस्ट-मॉर्टम कर सकते हैं.

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