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कैसे रचा गया होगा यूँ पत्थरों में स्वर्णिम इतिहास

भारती दीक्षित चित्रकार हैं, कहानियों का यूट्यूब चैनल चलाती हैं और बहुत अच्छा लिखती हैं। जानकी पुल पर हम उनके यात्रा वृत्तांत पहले भी पढ़ चुके हैं। इस बार एलोरा यात्रा का वर्णन पढ़िए- मॉडरेटर

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जब  अजंता से चले तब आँखों में चमक थी,मन और तन दोनों था ऊर्जा  से लबरेज़।  अब प्रकृति  के हर रंग और अधिक गहरे और चमकीले लग रहे थे।   अजंता से हमे औरंगाबाद जाना था पर फिर सोचा कि अभी वक़्त है तो क्यों न दौलताबाद का किला देख लिया जाय। यह किला औरंगाबाद के बहुत नज़दीक है। इसका परकोटा दूर तक फैला हुआ है ,यह कितना फैला हुआ है यह किले के ऊपर पहुंचने पर ही पता लग पाया।  जब दौलताबाद के किले पर पहुंचे तब अजंता की छवि को हटाकर उसके स्थान पर दूसरी छवि रखना नामुमकिन लग रहा था।  मेरे कदम किले की तरफ बढ़ तो रहे थे पर मन की डोर अब भी अजंता की चित्रकारी में ही गुंथी हुई थी।  सोचा बस थोड़ा टहल कर वापस चला जाय पर बातों बातों में  हम आगे  बढ़ते रहे। किले की मीनार और फिर आगे से सीढ़ियों से चढ़ाई।हम सोच रहे थे कि  बस पास ही होगा लेकिन सीढ़ियां ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले  रही थीं।  मोड़ आने पर अगली चढ़ाई के लिए सीढ़ियां फिर दिखाई देने लगतीं। हम सभी थक चुके थे पर उत्साह था कि देखें ऊपर क्या होगा।कई  सीढ़ियां अँधेरे कमरे,सुरंगों  से होती हुईं ऊपर जा रही थीं। कहीं संकरी सीढ़ी तो कहीं खड़ी चढ़ाई,इन्हें पार  करते -करते मेरी साँस और कदम दोनों जवाब दे गए।  अब हम लगभग किले के ऊपरी हिस्से पर थे ,पर अंतिम सिरा अभी भी और ऊपर था…मेरी साँस फूल रही थी और पैर  काँप रहे थे।  ऊपर से पूरा औरंगाबाद ऐसा लग रहा था मानो हम आसमान से देख रहे हैं सब कुछ छोटा छोटा सा और दूर तक फैला किले का परकोटा। कैसा होगा सदियों पूर्व सब।  बस अंदाज़ा  ही लगाया जा सकता था।  जब ऊपर चढ़ रहे थे तब किले के बारे में कई बात मालूम पड़ी कि इस किले को सिर्फ अलाउद्दीन खिलजी ही जीत पाया था। किले को दुश्मन से बचाने के लिए भूल -भुलैय्या रूपी कई दरवाज़े थे ,जिसमें से कई अब बंद थे.. और वे कहाँ जाकर खुलते होंगे नहीं पता ।  किले में एक सुरंग है अँधेरी। जिस तक दुश्मन यदि पहुँच भी जाये तो उसमे दुश्मन को मारने के पर्याप्त साधन मौजूद थे।  पूरा किला चारो ओर से कई फ़ीट गहरी खाई  के बीच बना है। ये खाई बारिश में पानी से भरी रहती होगी।  सोचो ज़रा पानी के बीच बना किला या  यूँ कहें तैरता हुआ किलानुमा जहाज़ ,जो आसमान को छूने का प्रयास रहा है और आज़ाद भारत में सर उठाये पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी उम्र में वर्ष का इज़ाफ़ा करता जा रहा है।ध्यान से देखने पर कहीं- कहीं बची खुची चित्रकारी भी दिखाई  दे जाती है।  इसका नाम देव गिरी हुआ करता था पर जब मुहम्मद बिन तुगलक ने इसे राजधानी बनाया तब इसका नाम बदल कर दौलताबाद रख दिया गया। चूँकि अब यह किला काफी क्षतिग्रस्त है पर सौंदर्य में अब भी किसी से कमतर नहीं। इसके बड़े-बड़े दरवाज़ों,बड़ी-बड़ी कुण्डियों,सुरंगों,तोपों सीढ़ियों आदि से पता लगता है कि यह अपने समय में कितना भव्य रहा होगा।
सांझ  होते-होते हम किले के बाहर  थे। काफी थके हुए, किन्तु कल एलोरा की गुफाएं देखनी थी सो दौलताबाद के किले की चढ़ाई मानो एलोरा के लिए ध्यान सिद्ध हुई। मैं मन से बतिया रही थी कि  कल हमे निर्जीव पत्थरों की देह पर रची सजीव मूर्तियों से भेंट करनी है। अपने मन को संयमित कर रही  थी। रात  में आँखों से नींद नदारद थी। घड़ी की बढ़ती हुई सुई एलोरा और मेरी दूरी को कम करने का काम कर रही थी सो रोमांचित थी।
 सुबह बढ़  चले अपने गंतव्य की ओर उत्साहित और हर्षित। ये जानती थी कि आज पुनः चमत्कार से दो-चार होना है। एलोरा या वेलूर की गुफाएं सड़क से ही दिखाई देने लगती हैं अतः मुझमे टिकट लेने तक का धीरज न था। नज़र टिकट खिड़की पर कम और गुफा की ओर  ज़्यादा थी।  अंदर जाकर कुछ वक़्त के लिए चारों ओर चट्टानों को देखा कि भला देखो…सामान्य पत्थरों को कैसे तराश कर जादू किया गया है। एलोरा की गुफा उसके निर्माण से ही अस्तित्व में रही, इनका निर्माण काल 600 से 1000 इसवीं माना  गया है।  यहाँ बुद्ध , जैन और हिन्दू धर्म से सम्बंधित शिल्प हैं।  गुफा प्रांगण में  प्रवेश करते ही सामने भव्य कैलाश मंदिर और उसके दाएं-बाएं क्रमश 1-15 और 17-34 गुफाएं हैं। हमने पहले गुफा 17-34 देखना तय किया जो कि  थोड़ी दूरी पर हैं। वहां बस द्वारा पहुंचा जा सकता है।  बस से उतरते ही कुछ कदम की दूरी  और गुफाएं सामने थीं। मुझे सुध न थी सिर्फ आँखे और मेरी  गर्दन का घुमाव यही हरकत महसूस कर रही थी। सामान्य छैनी हथोड़े से रची गई अनुपम शिल्पकारी।  यहाँ जैन गुफाएं थीं।  ये गुफाएं मानव निर्मित हैं, देख कर विस्मय होता है। इतनी विशाल शिल्पकारी करना आसान कार्य नहीं हैं।  जैन गुफाओं में इंद्र, इंद्राणी  की सभा , आदिनाथ और स्तम्भों  पर बनी अद्भुत नक्काशी। मेरा सर गोल घूम  रहा था और दिमाग शिथिल, कि कैसे काटी गई होगीं ये वृक्षों की प्रत्येक पत्तियां उन पर लगे फल मानो स्वयं प्रकृति  साक्षात् मेरे सामने मुस्कुरा रही है।  बेल-बूटे और फूल की नक्काशी ऐसे उकेरी गई है जो आपकी पुतलियों को स्थिर करने में भरपूर सहयोग देती हैं।गुफा में पहुंच कर ॐ का नाद किया। …. शांति और सुकून हर तरफ छाया हुआ। गुफा में मैं सबको छू कर देख रही थी कि कैसे प्रतिमाओं को कटाव, गोलाई दी गई है। बेहतरीन काम मेरे चारो ओर बिखरा हुआ था। प्रत्येक गुफा में लगा कि यही रुक जाएँ और घंटों शिल्पों से वार्तालाप करें…उन्हें निहारते हुए।  हिन्दू गुफा में आदम कद से कई गुना तिगुना, चौगुना या उससे भी ज़्यादा  बड़े बनी शिल्प प्रतिमाएं हैरत में डाल देती हैं। सीमित साधन में की गई अद्भुत कारीगरी।  शिव पार्वती  का विवाह हो या शिव की तांडव नृत्य मुद्रा, सब कुछ कल्पना से परे। शिव पार्वती विवाह शिल्प रचना मानो कैनवास पर चित्र हो…पूरी रचना परिप्रेक्ष्य के साथ…आश्चर्य …मैं मंत्र मुग्ध सी बस देखे जा रही थी…पलक झपकना कब का बंद हो चुका था।  कैसे रचा गया होगा यूँ पत्थरों में स्वर्णिम इतिहास।
 
 वापसी में हम पुनः गुफा नंबर 16 के सामने थे जो कैलाश मंदिर है। यह एक ही  चट्टान को काट कर बनाया गया है, पर मेरे कदम तो जैसे वहीँ जम गए बमुश्किल गुफा के बाहरी सम्मोहन से निकली और अंदर प्रवेश किया तब भीड़ अपने चरम पर थी। बहुत कोलाहल। खैर भीड़ मेरे लिए वहां नगण्य थी अतः उसे नज़र अंदाज़ कर जब सरसरी निगाह चारों ओर दौड़ाई तब मुझे लगा कि मैं सिर्फ भीड़ की आवाज़ सुन रही हूँ…महसूस कर रही थी बहती हुई हवा और दृश्यों को समेटते हुए मेरी नज़रों को, जो मेरे मन और दिमाग में लगातर इस छवि को क़ैद करती जा रही थीं।  यहाँ भी  दुविधा थी कि क्या देखूं और क्या नहीं। हाथियों के विशाल शिल्प शिल्पकारों के यशोगान में शामिल झूमते हुए से लगे। चारो तरफ शिल्प परिवार मानो सब मिल कर शिव स्तुति कर रहे हों। आस-पास दीवारों पर तराशी हुई विष्णु के अवतार, शिव की प्रतिमा और रावण की प्रतिमा सब कुछ विलक्षण।  छत पर नक्काशी, हर कोना, हर दीवार मानो छैनी हथौड़े रूपी तूलिका से  पत्थर नुमा कैनवास पर खींचा हुआ,  एक ही रंग से सजा हुआ या  उकेरा हुआ अद्भुत चित्र।  मैं स्वयं बुत बनी  देख रही थी। भूतकाल में जाने को आतुर। अब मुझे भीड़ का शोर ऐसे लग रहा था जैसे छैनी हथौड़े से मधुर स्वर ध्वनि कानों में बज रही है।  मंदिर में कहीं-कहीं चित्र भी हैं जो इसकी भव्यता में इज़ाफ़ा  करते हैं।  पूरा मंदिर अनेक खूबियों से  परिपूर्ण…. नि:संदेह सभी शिल्पकारों के समक्ष नत मस्तक हूँ। एक -एक गुफा की शिल्प कृति अद्भुत मिसाल देती हुई ।  परिश्रम, लगन, कारीगरी की अतुलनीय प्रस्तुति।   
 
गुफा नंबर  1-15 में से कुछ गुफा दर्शनीय है। बुद्ध की सुन्दर शिल्प रचना और कुछ सामान्य गर्भ गृह हैं। 
 
बड़ी-बड़ी सीढ़ियाॅ , बड़े कक्ष उनकी उत्तम वास्तु कला को बताते हैं । आखिर कैसा अनोखा संवाद रहा होगा चट्टानों को तराशे जाने के पूर्व …शिल्पकारों और चट्टानों के मध्य।  कलाकारों ने यूँ तराशा है मानो नरम मुलायम मक्खन का सामान्य छुरी से काटे जाना।  सहज किन्तु कितना जटिल रहा होगा ये हम उन्हें छू कर, देख कर ,महसूस कर सकते हैं।  इतना अद्भुत कार्य सामान्य छैनी हथोड़े से क्या यह संभव है? क्या यह मानव निर्मित ही है ?   मेरे प्रश्न एक-एक गुफा को देखते हुए बढ़ते जा रहे थे।  विशाल कक्ष , बड़ी बड़ी प्रतिमाएं, उनका स्पष्ट भाव , गंगा यमुना का देवी रूप में शिल्प , गणेश , महिषासुर मर्दिनी ,आदिनाथ ,इंद्र  , इंद्राणी , शिव पार्वती ,उनके गण , मानो पूरा परिवार हो , जो स्वयं सजीव हो और हमे बुत बने हुए देख रहे हों और  अभी कह उठेंगे …….आओ तुम्हें परिवार  के अन्य सदस्यों से भेंट करवाऊं . मेरा दिमाग और आँखों का संतुलन अपना आप खो चुके थे। 
 
 सभी दृश्यों को आंखों में समेटे मैं  कुछ समय के लिए मौन रहना चाहती थी ताकि यह रच -बस  जाये मेरे मन की गहराई में। वे शिल्पकार सच में महान हैं ,जो वर्षो वर्ष पत्थरों में जीवन फूंकते रहे और सौंप  गए हमें यह गर्वित मिसाल।  उन्हें मेरा शत शत नमन। 
 
 पर मेरे मन में एक  कसक थी… जब गुफा नंबर 16 के पास थी तब गुफा के पास एक छोटी  सी खाई थी जो अभी सूखी हुई थी। वर्षा के बाद पानी से भर जाती होगी..पर अभी  कूड़े के ढ़ेर से पटी हुई थी और इसके पास थी विश्व धरोहर कैलाश मंदिर … इस गुफा की ओर आते हुए रास्ते में भी झाड़ियों में कुछ गन्दगी  देखी जो कल्पना से परे है। यह गन्दगी मन व्यतीत कर गई। खाई में जमा कूड़ा मुझे मुँह चिढ़ा रहा था जिसमे  खाली बोतलें, बिस्किट और चिप्स के खाली पैकेट और अन्य कूड़ा था।  चूँकि वहां कूड़ेदान भी था जिसे लगातार खाली किया जा रहा था। … पर फिर भी कौन उठ कर  अपने पैरों को अतिरिक्त तकलीफ दे कर कूड़ेदान का उपयोग करे, शायद यही प्रवृत्ति रही होगी इसलिए  कूड़ेदान की जगह कूड़ा खाई में था। यह हमारी समझ को बताता है। इसमें शिक्षा का कहीं भी दूर-दूर से सरोकार नहीं। कूड़ेदान का उपयोग शिक्षित ,अशिक्षित गरीब या  अमीर के भेद से सर्वथा अलग हैं। मन में था कि क्या हम इस तरह स्वर्णिम धरोहर को आने वाली पीढ़ियों को सौपेंगे? कूड़े करकट से सजा हुआ, या यूँ  कि कौन देख रहा है….यहीं  फेंक दिया जाय। एक को कूड़ा डालते देख अन्य भी उत्साही हो जाते हैं और वो भी गर्वित हो ऐसा करते हैं । बुरा अनुसरण करना हम जल्दी सीख जाते हैं पर चेतना तो लानी ही होगी।  हमे अकल्पनीय कला,  परिश्रम को  सिर्फ देख कर या निहार कर इति श्री नहीं करना है इसे रचने में लगन, मेहनत, कल्पनाशीलता, हुनर लगा है इस पर भी विचार  करें ताकि हम स्वच्छ और सुरक्षित विरासत सौंप सकें।  संभालना होगा , सहेजना होगा , देखभाल करनी होगी , अपनों की तरह। ….. वैसे ही दुलार और अपनेपन के साथ, एक परिवार की तरह ………
 
खैर जब बाहर आने को हुई तो मन अशांत तो था पर एलोरा या वेलूर के शिल्पकारों की लगन और कलाकारी हावी रही।  मन में कसक ज़रूर थी पर छैनी हथौड़े का जादू मेरे मन और दिमाग पर चल चुका  था।  आँखें अब भी फैली हुई मुड़ – मुड़ कर पीछे देखती हुई। लगा वापस लौट जाऊं और फिर से भेंट कर आऊं सजीव शिल्प कृतियों से, कुछ क्षण और बतिया लूँ , बाकी था अभी उनसे बहुत कुछ कहना, सुनना और बतियाना……
 
मैं तब तक उन्हें देखती रही जब तक वे आँखों से ओझल नहीं हो गईं।  निः संदेह मैं गौरवशाली कला इतिहास को पाकर धन्य हूँ ,और सभी कलाकारों की अद्भुत कलाकारी पर हतप्रभ…अवाक…मौन और नतमस्तक।
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