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ज्योति नंदा की कहानी ‘मैं एक चाभी ढूँढ रही हूँ’

आज पढ़िए ज्योति नंदा की कहानी। ज्योति नंदा ने कई वर्षो तक विभिन्न हिन्दी  अखबारों में स्वतंत्र लेखन किया। थोडे समय रंगमंच से जुड़ाव।  2017 से  फिल्म निर्माण के क्षेत्र मे कथा पटकथा लेखन  जारी।  “रंगम फिल्मस” से जुड़ कर कॉटन कैंडी,  ‘वाशरूम’,  ‘दोहरी सोच’ तथा एक निर्माणाधीन शार्ट फिल्म की पटकथा भी लिखी।  2020 मे उपन्यास A son never forgets का हिन्दी अनुवाद (“पदचिह्न” ) प्रकाशित। लेखन के साथ वर्तमान मे आकाशवाणी लखनऊ मे समनुदेशी उद्घघोषिका के रूप मे कार्यरत। कहानी पढ़िए-

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गली के छोर पर बैठा वो मकान यूँ पुकारता है जैसे चैदह पार, सेालह की दहलीज पर खड़े लड़के लड़कियों का निगाहों की दस्तक पर खिंचे चले जाना।बाहर से झक्क सफेद दीवारें और हल्के गुलाबी रंग की किनारी से सजी उस घर की भव्य काया, हरदम इतराती, बेइंतिहा आकर्षित करती है। कितना दुरूह है बाह्य सौंदर्य के आकर्षण से खुद को बचा पाना।

गृहिणियों सी अभिलाषा लिये मैं बार-बार निहारती हूँ उस मकान को।मन ही मन गुनती हूँ एक दिन ऐसा ही मकान होगा जिसे मैं लाड़ से घर बनाउँगी।अखबारों के प्रॉपर्टी सप्लिमेंट में तलाशती हूँ अपने ख्वाबों का आशियाना। बिल्डरों के दिखाए सपनों का पता पर्स में लिए मेट्रो सिटी की खाक छानती हूँ। बड़े शहर में पैबस्त छोटे-छोटे देशों से गुजरती हूँ। लिजलिजी, भिनकती विस्थापितों की गलियेां से होकर तिब्बती कालोनियों के मरून और चटक पीले रंग और चाइना टाउन, सब पीछे छूटते जा रहे थे, मेट्रो रफ्तार पकड़ चुकी थी।

सूख चुके पानी से खाली, दरारी झील के सामने लेक व्यू अपार्टमेंटकी बारहवीं मंजिल पर टंगे फ्लैट से लेकर डूपलेक्स विलातक की सैर की। मिलने वाले पैसों की खनक-सी आवाज़ में स्टेट एजेंट अधूरी इमारतों में शब्दों के आशियाने बुनता।‘‘ये लाॅबी है, ठीक सेंटर में यहाँ पर झूमर लटकेगा, इस दीवार पर आप कोई पेंटिंग लगा सकती हैं या फिर शो केस, जैसी आपकी मर्जी।’’ मैने बायीं ओर देखा एक बहुत छोटा सा कमरा…..शायद …..स्टोर रूम होगा।वह इतना छोटा था कि उसमें बैठी मजदूरिन अपने दुधमुँहे बच्चे को चिथड़ों में लपेटे छाती से चिपकाए थपकी दे रही थी। यदि वह अपने पाँव पूरे फैलाती तो बच्चे का सिर दूसरी दीवार से टकरा जाता।मेरे ठिठकते कदमों से चिंतित एजेंट ने मजदूरिन को घूर कर देखा ‘‘मैडम ये देवस्थान है, नया काॅनसेप्ट। रोज-रोज मंदिर कौन जा पाता है, लेकिन सबकुछ ईश्वर की मर्जी से ही तो चलता है।ईश्वर का स्थान होना ही चाहिए…. पूरा बन जायेगा तब देखियेगा, चिन्ता न करिये, आइये आगे।’’ मेरी चिन्ता बस्ती में उगती गलियों की तरह चौतरफ़ा फैल रही थी।

‘‘क्या ये फ्लैट्स सिर्फ एक ही धार्मिक आस्था वालेां के लिए बनाये गये हैं?’’ मैंने पूछा,

‘‘मुझे नही पता मैडम’’,उसने रटा हुआ जवाब दिया। फिर कुछ सोचकर व्यंग्य से मुस्कुराकर बोला ‘‘उन लोगों का क्या है कहीं भी कपड़ा बिछा कर शुरू हो जाते हैं’’, कहकर सहमति के लिए मेरी ओर देखा, मैं तटस्थ होकर उसे देखती रही उसने नज़रें घुमा लीं। मजदूरिन बच्चे को सुला चुकी थी। वो ऐसी गहरी नींद में था/थी जैसे अक्सर ईश्वर सो जाते हैं जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

विशाल शहर से दूर नक्शों में उगते कागजी घरों को भी सूँघा जिनकी मिट्टी में कट चुकी फसलों की महक बाकी थी। मेड़ों पर जूतों के निशान चीर कर घास निकलने लगी थी।दरकती मेड़ों पे चलने की नाकाम कोशिश करते हुए सैंडिल पाँवों से हाथ में आ गई। नंगे पैरों में कुछ चुभा, मैं रूकी तो एजेंट ने पलटकर सैंडिल पहन लेने की सलाह देते हुए बताया ‘‘कोने वाला प्लाट है रास्ता जरा लंबा है पर सीधा मेनरोड से मिलता है।’’ उसका वाक्य जहाँ समाप्त हुआ ‘‘आगे सड़क बंद है’’ का बोर्ड लगा था। ‘‘मैने बताया न मैडम यहाँ से फ्लाई ओवर बनेगा जो सीधा रिंगरोड से जुड़ जायेगा।तब इस जमीन की वैल्यू और बढ़ जायेगी।’’

मैं सोच रही थी ये ठीक ही तो कह रहा है जहाँ सड़कें नहीं जाती हैं। वहीं से रास्ते निकलते हैं।

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अपने पुराने लाल फर्श वाले किराये के मकान से उस इमारत के निमार्ण की साक्षी रही जिसने मेरी ‘‘अपना घर हो’’ की लालसा को हवा दी। मैं गवाह थी ईंट-दर-ईंट सजने की, और उनके आशियाने की भी, जिन्होने इसकी नींव में भरी थी अपने बच्चों की किलकारियाँ।खोदी गई नींव की मिट्टी और दीवार में लगाई जाने वाली ईंटों से, मिटा दिया जाने वाला कच्चा बसेरा भी बनते देखा ।कुछ ईंटे मैं पहचान सकती हूँ क्योंकि वो जूठी हैं, उन पर रोज़ एक घर की कच्ची रसोई पकती थी।कभी-कभी दाल-भात तो कभी मोटी रोटी, साथ में चटनी या र्सिफ भूनी हुई र्मिचों की खुश्बू से मेरा घर गमकता रहता था। निर्माण के बाद से इस खुश्बू की जगह नये पेंट की महक ने ले ली है। दोनो सुगंध हैं; एक सांस है दूसरा आदत।अधूरी ईमारत में घर बसाने वालेां की आँखों में काम पूरा हो जाने पर अपना घर समेटते समय वही ‘‘दो वक्त की रोटी’’ वाले स्थायी भाव थे।

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गृह प्रवेश की दावत में जाने के लिए तैयार होते समय मेरा ध्यान इस बात पर ज्यादा था कि कहीं मेरा मेकअप, मेरा पहनावा मेरे घर का पता तो नहीं दे रहे।आइने के सामने खड़े होकर सुनिश्चित करती हूँ, मेरा घर मेरे साथ तो नही चल रहा।कितना भी ढकें- छुपायें इस काया को ये भीतर के इंसान का पता दे ही देती है। ठीक उसी तरह जिस तरह कोई मकान, किसी के  घर का पता हो जाता है। इसीलिए बार बार खुद का निरीक्षण दूसरों की नजरों से करने की कोशिश करती हूँँ ।अगर किसी ने पूछा कि आप कहाँ रहती हैं तो क्या जवाब दूँगी? ये कि

‘‘मैं चिर निर्वासित हूँ। जहाँ होना चाहती हूँ वो जगह अब तक मिली नहीं, जहाँ रहती हूँ, वहाँ बसती नहीं।’’

सामाजिक औपचारिकता, अपना घर, पड़ोसी का ओहदा, इन सबने मिलकर मेरे अच्छे खा़से रोशन दिमाग के कोने में माया के जाले बुन दिये थे। निमंत्रण अस्वीकार नहीं कर सकती थी।

कहाँ से लाऊँ वो घर जिसमें दीवारें न हो, बिना सहारे तानी गई छत हो, जिसकी एक भी खिड़की पड़ोसी के घर के सीलन वाले हिस्से में न खुलती हो।ख्वाबों के आशियाने से सुंदर घर कहाँ है? घर वही होता है जिसमें मैं होऊँ या न, वो हर वक्त मुझमें रहे।

नयी नवेली इमारत में प्रवेश करने से पहले पलटकर देखती हूँ अपने किराये के घर को, नजर उधार लेती हूँ उसकी जो नहीं जानता मुझे और मेरे घर को। अजनबी आँखों से हर इंसान बिना पते का मकान ही तो है।

देह की औपचारिक भाषा में अदा से झटकती गर्दन, चेहरा, हाथ-पाँव उगलियाँ सब दुरूस्त था। बिल्कुल ईमारत में करीने से सजी गैलरी, रेलिंग, बालकनी और अदा से मुड़ती सीढ़ियाँ। अचानक मेरी निगाह संगमरमर के चौड़े, ऊँचे खम्भों पर पड़ी, अपना प्रतिबिम्ब देख कर लगा तमाम कोशिशों के बावजूद मुझमें बसा आने को अनिच्छुक घर भी संग हो लिया।

मकान जितना बाहर से आर्कषक था उससे भी अधिक भीतर से। फैशन के मुताबिक एक्सटीरियर की तरह इंटीरियर को भी हमने चकाचैंध से भरने की कला सीख ली है। इसीलिए अब मोहल्ले कालोनियों मे बदल गये हैं और चौबारे कम्यूनिटी सेंटर में। सुबह से लेकर रात सोने तक अखबार के पहले पृष्ठ से सोशल मीडिया के विज्ञापन में सेलिब्रिटी के घर की सैर करते हुए जितने घर  दिमाग में स्क्रोल हुए ये उनका मिला-जुला रूप था। फिसलती जमीं, झिलमिलाती छत।

उस लेन के सभी घर आमंत्रित थे, जिनके आलीशान मकान मैंने दूर से देखे थे। अपने मकानों की तरह ही उनकी काया भी मेरी देहसज्जा से कहीं बेहतर थी। पर आज करीब से देखने, मिलने का मौका मिला तो पाया कि मेरी तरह ही उनके घर भी अनचाहे ही साथ आ गए थे। और मै देख पा रही हूँ उन सीले कोनो को जहाँ नही पहुँचती रोशनी की किरण। नये वास्तु के जानकारों ने रोशनदानों की अवधारणा ही खत्म कर दी है। कच्चे घरों और जेल की दीवारों में रोशनदान बचे है। घर और मकान दिन में भी चमकते रहते र्हैं आर्टीफ़िशियल लाइट्स से।

बड़े से लॉन में दावत का आयेाजन था। मुझे हर इंसान चलता-फिरता घर दिखायी दे रहा था।

आइसक्रीम की टेबिल के किनारे उचकते नन्हे घरौंदेां की आँखें झालर-सी टिमटिमा रही थीं।तभी मेरी दाहिनी कोहनी से सख्त कुशन सा कुछ हल्के से टकराया, मेरा चाय का कप छलका। देखा तो लगा कोई सजायाफ्ता घर है जिसकी थुलथुली तोंद थी, बच्चों को आँखें दिखा रहा था ज्यादा शोर मचाया तो तहखाने में बंद कर दूँगा।जिनके लिए वयस्कों ने बनवाये हैं भव्य महलनुमा घर वो तो खुश हैं मेज़पोशों की आड़ में, मिट्टी के हर पल बनाते बिगाड़ते घरौंदो से।

कुछ सुलगते से घर भी आये हैं जिनकी बुझी रंगत बयां कर रही है कि चिंगारी कभी भी भड़क सकती है।पर वो माथे के पसीने को वेट नैपकिन के हवाले करते बेफिक्री को बड़ी अदा से पहने हुए हैं। चारों ओर इंसानी घोसले अपने-अपने तिनके सजाने में व्यस्त थे फिर भी देख लेती हूँ बददिमागों की छत्रछाया में पलते सहमे से गुमनाम-घर, हाथों मे ट्रे लिए हर उस घर के सामने से गुजरते हैं जिन्हे नाश्ते में दिलचस्पी है उन बढ़े हुए हाथों में नही। सर्वेंट क्वार्टर की छत से बना अपनी औेकात की फर्श में धँसता अदना सा आदमी।

 हर एक मकान में कई घर, एक दूसरे की नींव की टोह लेते घर।

 मकान के बाहर आसरा ढूँढते घर….

सिसकते घर….जश्न में डूबे मकान में घुटन से निजात पाने की कोशिश में खोखली हँसी हँसते घर…

चिढ़ते-कुढ़ते, लांछन लगाते घर….

एक छत के नीचे दूरियों का रेगिस्तान बिछाये घर…..

अनुभवों की धूप से रीता, सीला, बूढ़ा, बुर्जुग होने को तरसता उम्रदराज़ घर….

कुछ बहुमंजिला इमारतें भी आमंत्रित हैं। वो जिनके घर की छत ऊपर वाले घर की जमीन बनती है। जैसे एक दूसरे के सिर पर पैर रखकर सपनों को पूरा करने की होड़। इन घरों में बसती हैं दौड़ती सुबहें, पिसती दोपहरें, बेमकसद शामें और दूसरे दिन की दौड़ की तैयारी में कटती बेचैन रातें।सपनों की ऊपर उठती वर्टिकल कतारों के अंतिम पंक्ति में बने वनरूम सेट और पेंटहाउस की टू-बेडरूम में बदलने की चाह में नये सिंगल मकानों के करीब आने की कवायद भी देख रही हूँ….

वहीं सिंहासन जैसे सोफे के कोनों पर बैठे हैं दो ऐसे घर जो कभी ‘‘दो जिस्म एक जान’’ टाइप घर थे। न जाने कब टू-बेडरूम सेट सुलगने लगा, हर कोना शोलों में बदलने लगा, दीवारें दरकने से पहले, नसों में लहू जमने से पहले उन्होने समझदारी से काम लिया और आज ‘‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें’’ होकर सहज, संतुष्ट दिख रहे हैं। वे समझ चुके थे कि कमरों की गिनतियों और इंटीरियर डिजाइन में नहीं, न ही दो से एक और दो से तीन होने की क्रियाओं में बसते हैं घर।

मैंने भी मकान को दुआयें दीं ‘‘इस मकान में बसने जा रहे घर के एकांत में कभी न हो अकेलापन। इसकी दीवारों को सहलाती ऐसी हथेलियाँ मिलें जिनसे एक ईंट भी न हिले, नजदीकियों  की गर्माहट से पिघलती रहें सब दूरियाँ। इसे वो उम्मीद मिले कि अमावस की काली रात में भी चाँद के खिलने की उम्मीद हो।

 परफ़ेक्ट फैमिली पिक्चर केवल दीवारों पर न टँगे रह जायें।

मेरी दुआओं को प्लाज्मा टी वी के शोर ने खंडित किया। डिस्कवरी चैनल पर दो हजार छः में आई सुनामी की तबाही की पड़ताल के चित्र उभरे। गूगल अर्थ की तस्वीरों को जूम कर जो हाथ गर्व से अपने घरों को खिला हुआ देखते थे वे हाथ मलबे से अपने आशियानों के निशान ढूँढ रहे थे।

मेरे हाथ मजबूती से पर्स जकड़े हुये थे, पसीने की बूँदे माथे को गीला कर रही थीं। ‘‘या खुदा हर घर की किस्मत में हो पाँवों भर जमीन और पूरा आसमान।’’

जितनी फुर्ती से मैं अंदर आयी थी उतनी तेजी से बाहर निकल गई, न जाने क्यों लगभग भागते हुए अपने मकान की ओर बढ़ रही थी ऐसे की जैसे जितना तेज चलूँगी उतनी जल्दी घर पीछे छूट जायेगा। ठीक उस समय मैं ईमान मर्सल की कविता की पंक्तियाँ बुदबुदा रही थी ‘‘मैं एक चाभी ढूँढ रही हूँ, जो अक्सर मेरे हैंडबैग की तलहटी में खो जाती है…..वेा (ओल्गा) और उसका पति मुझे देख नही पाते, असल में मैं घरों की अवधारणा से ही मुक्त होने का अभ्यास कर रही हूँ।’’                                        

                                        ज्योति नंदा

                          195, जानकी पुरम विस्तार, सीतापुर रोड

                                     लखनऊ

                                                                                        

 

 

 

 
      

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One comment

  1. बेहतरीन कहानी ..

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