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पीढ़ियों से लोकमन के लिए सावन यूं ही मनभावन नहीं रहा है सावन  

प्रसिद्ध लोक गायिका चंदन तिवारी केवल गायिका ही नहीं हैं बल्कि गीत संगीत की लोक परम्परा की गहरी जानकार भी हैं, विचार के स्तर पर मज़बूती से अपनी बातों को रखती हैं। कल से सावन शुरू हो रहा है, सावन में गाए जाने वाले गीतों की परम्परा को लेकर उनका यह लेख पढ़िए- मॉडरेटर

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सृष्टि,स्त्री और प्रकृति का महीना सावन आ गया है. इसे गीत—संगीत का महीना भी कहते हैं. एक समय में हिंदी सिनेमा जगत भी इस सावन के प्रेम में फंसता था तो बॉलीवुड में भी सावन पर एक से एक गीत बने. हाल के वर्षों में हिंदी सिनेमा संगीत में सावन हाशिये पर चला गया है. लेकिन उससे गीत—संगीत की दुनिया में सावन की समृद्धि पर कोई असर नहीं पड़ा है. लोकगीतों की दुनिया में सावन पीढ़ियों से प्यारा था, अब भी उसी तरह से है. लोकगीतों की दुनिया से गुजर कर देखें तो हिंदी महीनो में सावन छोड़ कोई एक महीना ऐसा नहीं, जिसमें इतने तरीके के गीत गाये जाने का चलन रहा हो. गुणीजन—ज्ञानीजन कहते हैं कि भले ही बसंत को ऋतुओं का राजा कहते हों लेकिन मौसम की रानी तो सावन ही है. सावन के मेघ पर ही बसंत के उल्लास और रंग का भविष्य टिका होता है.
अब इस एक सावन महीने में गीतों की विविधता को देखें. सावन के आने से पहले से ही भूमिका बंधनी शुरू हो जाती है. सावन से पहले आषाढ़ में आषाढ़ी गीत गाने का चलन है. बादल—मेघ को बुलाने के लिए, आ जाने पर स्वागत करने के लिए गीत गाये जाते हैं. बादल आ जाते हैं तो खेती का मौसम शुरू हो जाता है. फिर खेती का मौसम आता है तो खेती गीत गाते हैं. रोपा—रोपनी का गीत. सावन को शिव का महीना कहा गया है तो सावन शुरू होते ही शिव का गीत. लेकिन शिव का सावन आखिरी पांच दिनों में राधा और कृष्ण के रंग मे रंग जाता है. महीने भर गीतों के संग झूला झूलने के बाद यह उत्सव में बदल जाता है. राधाकृष्ण के झूलनोत्सव में. और फिर आखिरी दिन तो यह सावन भाई बहन के प्रेम का पर्व या उत्सव बन जाता है. रक्षाबंधन नाम से. प्रेम का गीत भाई बहन के प्रेम गीत में ढल जाता है. और फिर जब सावन खत्म हो जाता है तो भादो आता है. कृष्ण का जन्म. जन्माष्टमी. सोहर गीतों की गूंज. सावन अपने आगे पीछे गीतों को लेकर चलता है. लेकिन इन सबके बीच सावन आने से पहले सावन के जाने के बाद तक जिसकी खुमारी रहती है वह है कजरी. कजरी और सावन एक दूसरे के पर्याय हैं. और जब कजरी की बात चलती है तो सबसे पहले नाम मिर्ज़ापुर का ही आता है. मान्यता है कि कजरी की विधा वहीं से निकली है, जिसे दुनिया में फैलाया बनारस ने. कई कहानियां है कजरी के पीछे. कोई इसे कजली देवी से जोड़ता है, जिनका मंदिर है उस इलाके में तो कोई कजली नामक नायिका से, जिसने प्रेम की तड़प के साथ अपने दुख और विरह को स्वर देना शुरू किया तो कजली गायन की विधा जन्मी, जो बाद में कजरी के नाम से जाना गया. खैर, कजरी की मिथकीय कहानियां ढेरों हैं. मिथकीय कहानियां तो एक तरफ हकीकत यह है कि कजरी की परंपरा गजब की रही है. कजरी की महफिलें सजती थीं. कजरी की बैठकी होती थी. कजरी में सवाल जवाब चलता था. कजरीबाजी होती थी. हिंदी के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र इसके दिवाने थे. वे प्रेमधन की हवेली पर पहुंचते थे. प्रेमधन कजरी के रचवैया, रसिया और संरक्षक तीनों थे. कल्लू मास्टर जैसे कजरीबाज हुए. दिलदार खान से लेकर जगेसर जैसे कजरीबाजों की तूती बोलती थी. कई—कई रातें कजरी का अखाड़ा लगता. कजरीबाजी के इस अखाड़े में स्त्री और पुरूष, दोनों भाग लेते. सवाल—जवाब चलता. मूल रूप से यह कजरी तो प्रेम और विरह का ही भाव लिये हुए रहता लेकिन कजरीबाजों ने कजरी को कई रंगों में ढाला. देश की आजादी की लड़ाई के समय में यह सुदेसी रंग में ढला, किसानी के रंग में ढला. इस कजरी गीत में गांधी भी खूब आये. उनका चरखा, तकली,खादी भी आया. मिथक की दुनिया से निकलकर कजरी की हकीकत की दुनिया में आयें तो कजरी गीतों की तरह ही कजरी के किस्से, कजरी की कहानियां रस घोलती हैं. कजरी गायन को मिर्ज़ापुर और बनारस के कजरीबाजों ने आगे बढ़ाया. कजरी ने, दोनों शहरों और इलाकों को एक सूत्र में जोड़ा. और जब हम कजरीबाजी या कजरीबाजों की बात करते हैं तो महिलाओं के तरफ से एक नाम प्रमुखता से उभरकर आता है. वह नाम है सुंदर वेश्या का. कजरी की रानी कह सकते हैं उन्हें. हम सब कम जानते हैं उनके बारे में लेकिन एक जमाने में बरसाती चांद नाम से लिखित उनकी किताब बहुत मशहूर थी कलाकारों के बीच. उन्हें खुद ही बरसाती चांद कहा जाता था. सुंदर वेश्या की ही मूल रचना है मिरजापुर कईलअ गुलजार हो… जो आज दुनिया में मशहूर है और कजरीगीतों का पर्याय भी. सुंदर एक सुशील लड़की थी, जिसका अपहरण तब के मिसिर नामक गुंडे ने कर लिया था और उनका नाम सुंदर वेश्या कर दिया था. सुंदर को लेकर मिसिर कजरी के अखाड़े में जाता था. वह बड़े से बड़े कवियों से कजरी के अखाड़े में टकराती थी. लेकिन मिसिर अंग्रेजों का दलाल था और सुंदर को यह बात अखरती थी. वह सुंदर पर जुल्म भी ढाता था. बनारस के एक बड़े कजरीबाज और पहलवान नागर थे. नागर पहलवान कहते थे सब उनको. मतलब यह कि वह काशी के प्रमुख पहलवान थे. एक बार मिसिर गुंडा सुंदर को लेकर नागर के अखाड़े पर गया. नागर पहलवान अंग्रेजों के विरोधी थे. देशभक्त थे. मौका मिलते ही सुंदर ने मिसिर के जुल्म की कहानी बतायी. मिसिर और नागर में लड़ाई हुई. मिसिर मारा गया. सुंदर को नागर ने बहन माना. मिसिर की हत्या के जुल्म में नागर को कालापानी की सजा हुई. और उसके बाद सुंदर ने अपने भाई के बिरह के गीत रचने शुरू किये. इस तरह से देखें ने सुंदर ने अपने समय में प्रेम, बिरह, आजादी और भाई बहन के प्रेम, सभी तरीके के गीतों को रचा और लोगों को सुनाया. सुंदर के गीत तो लोकमानस में सदा—सदा रचा—बसा रहा लेकिन दुनिया में मशहूर करने का काम उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब ने किया, जब उन्होंने उनके कजरी गीतों पर शहनाई का रंग चढ़ाकर दुनिया में फैलाना शुरू किया. सुंदर के गीत दुनिया में फैल गये लेकिन हम सुंदर को नहीं जानते. उनकी कजरी दुनिया सुनती है लेकिन कजरी की उस पटरानी को हम नहीं जानते. लोकविधा में यह चुनौती भी रही है. हम मूल रचनाकार को गौण कर देते हैं. कितना सुंदर होता कि इस सावन हम सुंदर को, और कजरीबाजों को अच्छे से याद करते. इन दिनों हिंदी और भोजपुरी के बीच भी विवाद होते रहता है. कितना सुंदर होता कि कजरी गाते हुए हम भारतेंदु हरिश्चंद्र को याद करते, सबको बताते कि कजरी सिर्फ गीत या गायन नहीं, एक मुकम्मल चीज है. सावन सिर्फ एक महीना नहीं, यह तो सालों भर हमारे वजूद और अस्तित्व को बचाये—बनाये रखनेवाला महीना है. इसीलिए लोक जगह सदा से सावन का स्वागत विशेष रूप में करते रहा है.

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