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मेरी हिम्मत देखना मेरी तबीयत देखना

अग्रज और बाज़ौक शायर पवनजी ने जब ‘पालतू बोहेमियन’ पर मुझे रुक्के में लिखकर भेजा और इस ताक़ीद के साथ लिखकर भेजा कि ग़ालिब का एक मिसरा तुमने बहर से बाहर लिख दिया है और कमबख़्त उसी को शीर्षक भी बना दिया। उनकी यह शायराना टिप्पणी सबसे अलग थी लेकिन जानकी पुल पर लगाते हुए संकोच होता रहा। बहुत दिनों के संकोच के बाद आज लगा रहा हूँ- प्रभात रंजन

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जो सुलझ जाती है गुत्थी फिर से उलझाता हूँ मैं

‘पालतू बोहेमियन प्रभात रंजन की ‘हिम्मत और तबीयत’ की रचनात्मक अभिव्यक्ति है, क्योंकि ‘हिम्मत और तबीयत’ के बिना इतनी बेबाक़ और पठनीय पुस्तक लिखना सम्भव ही नहीं है. ‘पालतू बोहेमियन’ में गुरु और शिष्य के जीवन की न जाने कितनी गुत्थियाँ हैं जो सुलझती भी हैं और उलझती भी हैं.

‘जीवन में संयोग भी होते हैं’

पैदा कहाँ हैं ऐसे लोग परागन्द: तबअ लोग

अफ़सोस तुमको मीर से सोहबत नहीं रही

      मनोहर श्याम जोशी अपनी तबियत और व्यवहार में परागन्द: तबअ (खिन्न मन) बिल्कुल नहीं थे. हालाँकि मीर ने ख़ुद को परागन्द: तबअ कहा है और अफ़सोस उन लोगों पर जिन्हें मीर से सोहबत नहीं रही. लेकिन मीर साहब के शेर का अस्ल लुत्फ़ ‘परागन्द: तबअ’ में नहीं, ‘मीर से सोहबत’ में है, और कहना न होगा कि प्रभात को ‘जोशीजी’ से सोहबत रही और ख़ूब रही. प्रभात ने इस सोहबत से जहाँ अपने गुरु की ऊर्जा को पहचाना, उनसे सीखा, वहीं ख़ुद की भी नए सिरे से खोज की. क्या करना है, क्या छोड़ना है का विवेक हासिल किया और उस रास्ते को चुना जहाँ शोध विश्वविद्यालय के घुन भरे यथास्थितिवादी माहौल से निकलकर ‘जीवन की राहों’ पर चल निकलता है और ‘गोर्की’ के शब्दों में सारी दुनिया का ज्ञान पाने के लिए ‘मेरे विश्वविद्यालय’ बन जाता है. इस लिहाज़ से ‘पालतू बोहेमियन’ लेखक बनने की प्रक्रिया और उसके लिए की जाने वाली तैयारी का अद्भुत दस्तावेज़ है.

‘पालतू बोहेमियन’ पढ़ते हुए ‘यादगारे ग़ालिब’, ‘दूसरी परम्परा की खोज’ और ‘व्योमकेश दरवेश’ की बारहा याद आती रही, ये पुस्तकें भी अपने गुरुओं या उस्तादों के जीवन, उनके संघर्षों और साहित्यिक अवदान को हमारे सामने लाती हैं और अब प्रभात रंजन की यह पुस्तक भी इस फ़ेहरिस्त का हिस्सा बन गई है.

                  हो के ‘आशिक़’ वह परीरूख और नाज़ुक बन गया

                  रंग खुलता जाए है, जितना कि उड़ता जाए है

मिर्ज़ा ने भले ही शेर ‘आशिक़’ के मिज़ाज को प्रकट करने के लिए कहा हो लेकिन नाज़ुक बन गया निश्चित ही आशिक़ की संवेदनशीलता को अभिव्यक्ति देता है. और कहा जा सकता है कि संवेदनशीलता के अभाव में न प्रेम सम्भव है और न ही अच्छा शिष्य हो पाना. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और हज़रत अमीर खुसरो, मिर्ज़ा ग़ालिब और हाली, पं. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी इसी संवेदनशीलता के संबंधों की कही-अनकही मिसालें हैं. पुस्तक के आरम्भ में प्रभात का रंग जोशीजी से मिलने पर उड़ता हुआ दिखता है, लेकिन धीरे-धीरे यह रंग खुलता है और अब यह रंग ख़ूब खुल और खिल रहा है. मिर्ज़ा के ही शेर में इसे यूँ भी समझा जा सकता है.

                  मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे

                  तू देख के क्या रंग है तेरा मेरे आगे

गुरु शिष्य परम्परा को यदि सही से समझने का प्रयास किया जाए तो उसके रंग साहित्य या अन्य पारम्परिक विधाओं में उतने देखने को नहीं मिलते जितने भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य में मिलते हैं! पंडित भीमसेन जोशी की मेहनत मशक़्क़त दिन-रात गुरु की ड्योढ़ी पर माथा रगड़ने से शुरू होकर उनकी सेवा टहल करते हुए व्यतीत होते थे, तब कहीं जाकर उन्हें गुरु के ज्ञान से कुछ हासिल हो पाया था और रियाज़ का कड़ा अनुशासन , ज़रा सी भी ग़लती होने पर फिर ककहरे से शुरू, कोई रियायत नहीं, गुरु का ताप ऐसा ही होता है—गुरु का साया तक उससे यानी ख़ुद से धुएँ की तरह भाग जाता है तो फिर शिष्य की क्या बिसात-

                  साया मेरा मुझसे मिस्ल-ए- दूद भागे है, असूद

                  पास मुझ आतशबजाँ के किससे ठहरा जाए है

प्रभात ने अपने आतशबजाँ (जिसके दिल में आग लगी हो) गुरु के ज्ञान के ताप को महसूस किया है उसमें तपे हैं. शिष्य की पहली कहानी पर गुरु के विचार, मध्यवर्गीय संस्कारों से मुक्त होने की सलाह और समय-समय पर शिष्य के मन में पैदा होते संदेह ‘कि कहीं मेरा इस्तेमाल तो नहीं हो रहा.’ ये ऐसी धारणाएँ परिणाम मिस्ल-ए-दूद धुएँ की तरह उड़ जाने में भी हो सकता था लेकिन प्रभात भागे नहीं, जिसका नतीजा आज पालतू बोहेमियन के रूप में सामने है.

प्रभात के व्यवहार में एक ख़ास क़िस्म की शालीनता है जो आद्यांत पुस्तक में गुरु के प्रति श्रद्धा भाव में रूपांतरित होती जाती है. प्रभात सोचते हैं, संदेह करते हैं, कुछ कहते भी हैं तो दबे स्वर में या इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि वे जोशी जी की किसी दुखती रग पर हाथ रख देने की गुस्ताखी नहीं कर पाते. यह गुस्ताखी ‘हाली’ यानि मौलाना अल्ताफ़ हुसैन ‘हाली’ से हुई थी, जिसका जवाब मिर्ज़ा ग़ालिब ए जिस पीड़ा के साथ बयान किया उसने ‘यादगार ग़ालिब’ को कालजयी रचना बना दिया, क़िस्सा मुख़्तसर यूँ है कि

‘एक रोज़ मिर्ज़ा ग़ालिब की महानता, उस्तादी और वृद्धावस्था के अदब और सम्मान को ताक पर रखकर नीरस धर्मोपदेशकों की तरह उनको नसीहत करनी शुरू की, वे पाँच वक्तों की नमाज़ पाबंदी के साथ पढ़ा करें. मिर्ज़ा को यह अभियान नागवार लगा. मिर्ज़ा ने मेरे बकवास क़िस्म के भाषण को देखकर जो कुछ फ़रमाया, वह सुनने लायक है. उन्होंने कहा:

सारी उम्र खुदा की नाफ़रमानी और बदकारियों में गुज़री. न कभी नमाज़ पढ़ी न रोज़ रखा, न कोई नेक काम किया. ज़िंदगी की चंद सांसें बाक़ी रह गयी हैं. अब अगर चंद रोज़ बैठकर या इशारों से नमाज़ पढ़ी तो इससे सारी उम्र के गुनाहों की तलाफ़ी (प्रायश्चित) क्योंकर हो सकेगी? मैं तो इस क़ाबिल हूँ कि जब मरूँ, मेरे अज़ीज़ और दोस्त मेरा मुँह कल करें और मेरे पाँव में रस्सी बाँध कर शहर के तमाम गली-कूचों और बाज़ारों में रूस्वा करें और फिर शहर से बाहर ले जाकर कुत्तों और चीलों और कौवों के खाने को (अगर वे ऐसी चीज़ खाना गवारा करें) छोड़ आये. हालाँकि मेरे गुनाह ऐसे हैं कि मेरे साथ इससे भी बदतर सलूक किया जाए.’

काश ‘पालतू बोहेमियन’ में भी ऐसा कोई प्रसंग होता, जहाँ जोशीजी भी मिर्ज़ा की तरह अपने भीतर कहीं गहरे दबे हुए दर्द को फ़रमा पाते. ख़ैर जो नहीं है उसका ग़म क्या?

हाँ एक प्रसंग ऐसा है जहाँ प्रभात ख़ुद से ‘किसी बात से दुखी चल रहा था’ की बात तो बताते हैं लेकिन कारण सामने नहीं आ पाता, लेकिन इस प्रसंग का अंत ख़ासा दुखद है —

‘मैं उन दिनों किसी बात से उनसे दुखी चल रहा था और कई महीने से उनके घर नहीं गया था. जिस दिन पार्टी थी, उस दिन उनका फ़ोन आया कि शाम में आ जाना.

मैंने कहा कि शायद आप भूल गए हैं कि अब मैं शाम में कॉलेज में पढ़ाने लगा हूँ इसलिए नहीं आ सकता…

देर शाम जोशी जी का फ़ोन फिर आया अब भी आ जाओ. मैंने कहा कि मैं एक -दो दिन में आता हूँ. इस पर वह बोले, एक दो दिन में आकर क्या करोगे?

तब मैं इस बात को समझ नहीं पाया, उस पार्टी के हफ़्ते भर बाद ही पता चला कि वह अस्पताल में भर्ती हो गए हैं—साँस की तकलीफ़ के कारण. अस्पताल जाने न जाने को लेकर मैं कुछ सोचता कि वह सुबह आ गई.

मैं सोया हुआ था कि पुण्य प्रसून वाजपेयी का फ़ोन आया. मैंने नींद में ही फ़ोन उठाया तो उधर से आवाज़ आई, ‘तैयार होकर साकेत निकल जाइए. जोशी जी नहीं रहे.’

इस प्रसंग पर कुछ कहना बेमानी है, जो कहना है वह जिगर अपने इस शेर में बख़ूबी कह गए हैं—

मिरी सिम्त से उसे ऐ सबा ये पायाम-ए- आख़िर-ए-ग़म सुना

अभी देखना हो तो देख जा कि खिजाँ है अपनी बाहर पर

क्या जोशी जी  भी अपने शिष्य को ‘प्याम-ए-आख़िरए-ग़म’ सुनाना चाहते थे?

शायद मैं नित नया कोई मोती निकाल दूँ

तौफीम दे जो डूबने की नारकदा मुझे.

अभी हाल ही में प्रभात ने अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में जोशी जी के हवाले से एक घटना का ज़िक्र किया है जिसमें यह रोचक प्रश्न  किया गया है कि जब रचनाकार की कोई पुस्तक पाठकों में लोकप्रिय हो जाए तो क्या करना चाहिए? जोशी जी का ‘वन लाइनर’ जवाब है कि उसे एक और किताब लिखनी चाहिए. जोशी जी का जवाब दुरुस्त है और प्रभात दुरुस्त ही नहीं चुस्त भी हैं उन्हें तौफीक हो चुकी है अब नित नए मोती निकालने बाघी हैं और हो भी क्यों ना? उत्तर आधुनिक लेखक गुरु और उत्तर आधुनिक शोध निदेशक की सोहबत में निश्चित ही उन्हें अनेकों तजुर्बात और हवादिस हुए होंगे— साहिर के शब्दों में सिर्फ़ लौटाना बाक़ी है — दुनिया ने तजुर्बात-ओ-हवादिस की शक्ल में

जो कुछ दिया है मुझको वो लौटा रहा हूँ मैं

और अंत में, सिर्फ़ इतना कि मिर्ज़ा ग़ालिब को तो उम्र ये बात सलती रही कि ‘हक़ अदा न हुआ’ लेकिन प्रभात की बाबत यह तो निर्विवाद रूप से कहा ही जा सकता है कि ‘तुमने हक़ अदा किया और ख़ूब अदा किया.’

अब आगे-आगे देखिए होता है क्या—

पवन

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