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इमरोज से वे कहतीं – आग तुम जलाओ और रोटी मैं बनाती हूँ

संस्मरण के इस भाग में फिर मिलते हैं इमरोज से। देखते हैं कि एक भावुक व्यक्ति, एक भावुक कलाकार कैसे प्रेम–प्यार, व्यक्ति, परिवार और समाज को देखता है। अमृता के विषय में लम्बी बातचीत करने के बाद जब इमरोज से मैंने उन दोनों की तस्वीरें मांगी, थोड़ी देर बाद ही वे खाकी लिफाफे में कुछ पुरानी तस्वीरें ले आए थे। उन्हें देखने के बाद मैं तस्वीरों को वापस लिफाफे में डालते समय उन्हें सहारा देने के लिए लाए गए उस हार्ड बोर्ड को रखना भूल गई। इमरोज ने तुरंत मेरे हाथों से लिफाफा लिया और खुद उन तस्वीरों को लिफाफे में डालने लगे। ‘किसी भी काम को करने का प्रोपर तरीका होना चाहिए।’ लग रहा था जैसे अमृता से जुड़ी हुई हर चीज को उन्हीं लिफाफों की तरह ऐसे सहेज लेना चाहते हैं कि उनमें कभी कोई सिलवट न पड़ने पाए। जबकि वहीं उनकी खुद बनाई हुई पेंटिंग पर धूल की परतें जमी थीं। पत्रकार-अनुवादक संगीता के द्वारा इमरोज से बातचीत के आधार पर तैयार यह संस्मरण सन 2003 मार्च में लिटरेट वर्ल्ड में प्रकाशित हुआ था। संस्मरण का पहला भाग ये रहा — इंविटेशन एक नहीं, दो मंगाना मैं भी साथ चलूंगा – इमरोज

‘अमृता एक नहीं , दो इंविटेशन मंगाना… । मैं भी साथ चलूंगा… ।’ …कहकर मुश्किल से ही, पर खुद को संयत करते हैं। ‘… । हम कभी लड़े नहीं, दोनों अपनी मर्जी की जिंदगी जी रहे हैं। अपने–अपने काम में जुटे रहते हैं। मैं अपना पेंट करता हूँ, वह कविताएँ लिखती हैं। और जब हम किचन में मिलते हैं, तो मिलकर खाना बनाते हैं। सब कुछ खुद ही करते हैं।’ ‘आप खाना बना लेते हैं?’ ‘हां, जब उनकी तबीयत ठीक नहीं होती है तो मैं बना लेता हूँ।’

‘आप लोग अलग कमरे में रहते हैं, अपने–अपने कामों में व्यस्त रहते हैं, फिर बातें कब करते हैं?
‘सुबह में करते हैं। जब वे चाय पीती हैं, खाना खाती हैं। किचन में भी बातें होती है। मिलकर हमलोग खाना बनाते हैं। सुबह को हम बनाते हैं बच्चों के लिए और रात में वे बनाती हैं, हम ऊपर खाना खाते हैं बच्चे नीचे खाने जाते हैं। हमारी फैमिली ज्वाइंट भी है और इंडीविजुअल भी। अमृता कभी कहेंगी, ये नहीं खाना है तो कभी वो नहीं खाना है। थोड़ा ज्यादा सिंक गया टोस्ट उन्हें अच्छा नहीं लगता। तो बहू के हाथ का सिंका टोस्ट उन्हें पसंद नहीं आता। तब उनकी बहू भी इमरोज से ही कहती है कि आप ही बना दो।’ इमरोज कहते हैं ‘अगर कोई इन छोटी–छोटी बातों में खुश रहता है तो कर देना चाहिए। इन्होंने कभी शापिंग नहीं किया है। इनको पता भी नहीं है कि शापिंग मार्किट किघर है। अब तो वे बीमार हैं, मैं सारा दिन उनके पास ही रहता हूँ। रात को तकरीबन जागती ही रहती हैं वे।’ …कहते–कहते इमरोज फिर उदास हो जाते हैं।

इमरोज-अमृता प्रीतम

इमरोज को जब अमृता के कमरे में रंग भरना होता है तब वे इंतजार में होते हैं कि उस समय अमृता कहीं बाहर गई हों। वे कहते हैं ‘ ये जब घर में होती हैं, तो इनके होते हुए घर रंग नहीं सकते आप। क्योंकि सब चीजें निकालनी पड़ेंगी और ये मुश्किल काम है। जब ये कहीं गई होती हैं तो पीछे से मैं इनका कमरा रंग करवा देता हूँ। जिंदगी में पहली दफा जबकि वो बीमार हैं, इस बार उनके कमरे को उनके रहते हुए ही रंगना पड़ा है। उनको उठाकर मैं अपने कमरे में लाया। वे मेरे कमरे में भी कम्फर्टेबल नहीं हैं। उनको अपना ही कमरा चाहिए। दो–तीन दिन वो रहीं मेरे कमरे में पर उन्हें कम्फर्टेबल नहीं कह सकते, वो अपने कमरे में ही कम्फर्टेबल है। वे बेड पर ही लिखती हैं, .मेज पर नहीं। उनका बेड भी सामान्य से बड़ा है। मेज की जरूरत नहीं पड़ती। एक साईड में कागज–वागज, किताबें और किताबें हैं। सोने के लिए तीन फुट ही काफी है। वह तो ऐसे ही है। बिल्कुल सहज।’

आपसी संबंधों के बारे में इमरोज कुछ ऐसे सोचते हैं। ‘ मैं कहता हूं, बलपूर्वक आप औरत से क्या लोगे? बलपूर्वक आप उससे शारीरिक संबंध बनाएंगे, तब, जब उसका मन तैयार नहीं होगा, कहोगे कि मैं पति हूँ, ये मेरा राइट है। एक तरफा क्या होगा? ये तो ऐसा ही है जैसे कि आदमी दीवार के साथ खेले। दीवार के साथ खुद ही हिट करते रहो और बॉल आपके ही पास वापस आता है। आप खेल तो नहीं रहे। मगर आम घरों में मियां–बीवी मेरे ख्याल से इसी तरह जिंदगी खेलते हैं। जब उसका दिल नहीं चाहता, वो थकी हुई होती है, तो आप ये नहीं सोचते कि वे थकी हुई है इस वक्त। ये तो एक तरह का रेप ही हुआ न। बीवी के साथ भी आप एन्जॉय नहीं कर सकते, जब तक वे मिली हुई नहीं होती हैं। आदमी को पता नहीं क्या हो गया है। मुझे तो लगता है कि आदमी सेंसिबल ही नहीं रह गया है। कल्चर्ड तो आदमी हुआ ही नहीं। पढ़ने–लिखने से भी आदमी कल्चर्ड नहीं हुआ। पढ़ने–लिखने से तो आदमी चालाक ही हो गया है, कनिंग ज्यादा हो गया है। एकतरफा प्यार, एकतरफा सेक्स क्या है, कुछ नहीं। पता नहीं आदमी सोच क्यों नहीं पाता!’

अमृता के लिए कहते हैं ‘ वो बहुत सिंपल भी हैं। जब नज़्म लिख रही होती हैं और बच्चे कहते हैं कि मम्मी नाश्ता दो, तो वह नज्म को वहीं रोककर कहती है ‘प्लीज होल्ड आन, मैं तुरंत आती हूं।’ आकर वह नाश्ता तैयार करती है फिर जाकर नज़्म लिखने में जुट जाती हैं। ’

वो लगातार कहते ही जाते हैं ‘उनका उनके पति के साथ वास्तव में मैच गलत हो गया। हो सकता है कि उनके पति को सिर्फ खाना बनाने वाली, कपड़े धोने वाली बीवी मिलती तो वे खुश रहते। शादी तो उनकी बचपन में ही हो गई थी। इनके पिता और लड़के के पिता अच्छे दोस्त थे और दोनों ने आपस में ये तय किया हुआ था कि बड़े होंगे तो इन दोनों की शादी करा देंगे। तो ऐसे हुई थी इनकी शादी। एकबार उनके पति का दोस्त उनसे कहने लगा कि पोएट्री–वोएट्री क्या सुनना है। औरत को क्या चाहिए, गर्म खाना और एक गर्म बिस्तर। वो पोएट्री–तस्वीरों की बात क्या करेगी? पर आज वह नज़्म लिखती है तो मुझे सुनाती है, मैं कुछ बनाता हूं तो उन्हें दिखाता हूं। हो सकता है कि नहीं अच्छा लगे, परंतु सुनता हूं। उनके पति को कर्ज लेने की आदत थी। एक से कर्ज लेकर दूसरे को सूद देना, फिर कर्ज लेना। वे कहती थीं कोई नौकरी कर लो’, परंतु वे भी नहीं करते थे।’

‘उनको एक अवार्ड मिला था उसी पैसे से उन्होंने यह मकान बनाई। नहीं तो राइटर मकान नहीं बना सकता। थोड़ा–थोड़ा करके मकान किश्तों में खड़ा किया गया। मकान 1961 में बन गया था, लेकिन तब मैं नहीं रहता था यहाँ। मैं 1964 से इनके साथ रह रहा हूं।’

1957 से रोज शाम को रेडियो लेकर जाता था छोड़कर आता था। इकट्ठे रहने की तो बाद में सोचा। वे आगे कहते हैं ‘जहाँ कंडीशन है वहां मुहब्बत नहीं हैं। हमलोगों ने एक दूसरे से कुछ भी नहीं पूछा कि मां–बाप कौन हैं, जायदाद आदि। बच्चे हमारे पास रहेंगे या नहीं।’

आप लोगों ने अपना बच्चा क्यूं नहीं चाहा? ‘होना चाहिए था। लोग पूछते हैं। दो बच्चे पहले भी हैं। आप कल्पना करें कि हमारा बच्चा भी होता तो ये बच्चे खुश नहीं होते। इन बच्चों के लिए नए बच्चों का आना…ये स्वीकार नहीं करते। फिर उनके लिए माहौल क्या होता? बच्चे तो प्रोपर्टी भी चाहेंगे, प्रॉपर्टी शेयर करने को तैयार नहीं होंगे। समस्या होती यदि हम अपना बच्चा लाते।’

वे बताते हैं ‘अमृता कभी मुझे स्टेशन पर छोड़ने नहीं जाती थी, मेरे जाते ही उन्हें बुखार हो जाता था और जब लेने आती थीं तो स्टेशन पर ही इनका बुखार उतर जाता था। एक बार जब हम हिल स्टेशन पर गए तो वहां एक आर्टिस्ट थे शोभा सिंह। वे इनके पिता के दोस्त थे और बचपन से अमृता जानती थीं उनको। हम उनके पास ही ठहरे हुए थे। उनकी पत्नी हमलोगों के लिए खाना बनाती थीं। बड़ी मुश्किल से उनको मनाकर तैयार किया कि एक वक्त वो खाना बनाए, एक वक्त हमलोग बना लेंगे। वहां लकड़ी का चूल्हा था। तब अमृता कहती हैं ‘आग तुम जलाओ और रोटी मैं बनाती हूँ।’ एक और दिलचस्प यात्रा का जिक्र करते हैं वे, ‘एक दफा मैं और अमृता बंबई गए थे। जब महाराष्ट्र में प्रवेश किया तो चेकिंग चल रही थी। उन्होंने चेक किया कि कोई नशे की चीज तो नहीं है हमारे पास। सब सामान देखा, कुछ मिला नहीं। तो मैंने अमृता से कहा कि इन बेवकूफों को पता ही नहीं है कि जो सबसे ज्यादा नशे वाली चीज है वो तो उसने देखी ही नहीं। उनको तो सिर्फ बोतल ही नजर आती है। वे बोतल को ही नशा समझते हैं।’

वे कहते हैं ‘मेरे हिसाब से तो जिंदगी कुछ ऐसी होनी चाहिए। एक कहानी है ‘आखिर कब तक?’ ‘एक बहुत संपन्न स्त्री किसी बहुत संपन्न आदमी से पार्टी में मिली। आदमी को वह औरत कहती है कि मेरी बात सुनो। शादी की बात तो हम बाद में करेंगे। पहले आपस की बातचीत तो तय कर लें। परिचय तो हुआ नहीं। कम्युनिकेशन तो हुई नहीं। शादी की प्रपोजल इतनी जल्दी तुम कर रहे हो। ये नदी है। इसके पार मेरा घर है। जब तुम मुझे आमंत्रित करोगे तो मैं आऊँगी और जब मैं तुम्हें आमंत्रित करूंगी तो तुम आओगे। और जब तुम आमंत्रित करो और मैं न चाहूँ तो मैं जिद कर सकती हूँ कि नहीं आऊँगी। तो जब मेरी मर्जी होगी और तुम्हारी मर्जी होगी तब हम इकट्ठे रहेंगे।’ वो रूढ़िवादी आदमी था उसने कहा ये शादी थोड़े–ही है। वह खुश नहीं हुआ। मगर ऐसे हो सकता है। कहानी में ये बात नहीं हुई। ऐसे भी दो लोग रह सकते हैं कि वो अपने घर में रहे। जब वे एक–दूसरे को आमंत्रित करना चाहें तो करें।’

इमरोज कहते हैं ‘जब दो आदमी एक दूसरे को स्ट्रांगली पसंद करते हैं तो वे एक दूसरे की उपस्थित से आनंदित होते हैं। सिर्फ शरीर ही एन्ज्वाय नहीं करते। लेकिन जब आप दूसरे की उपस्थिति एन्ज्वाय नहीं करेंगे तो एक दूसरे को डिस्टर्ब ही करेंगे।’

एम्बेसी में पहले वे अमृता के साथ जाया करते थे। ‘किसी भी दूतावास में जाएं सबका एक ही रूल है। आपको अलग व्यक्ति के साथ बैठना है। ऐसे ही वे मुझे अमृता के पास नहीं बैठने देते थे। वो उधर और हम इधर बैठते। मुझे किसी और की औरत के साथ बिठाया–अमृता को किसी और मर्द के साथ बिठाया।’ ‘फिर क्या किया आपने?’ ‘कुछ नहीं। अब दूसरे की औरत से क्या बात करें? न उसे जानते हैं, न पहचानते हैं। कभी कहो मौसम अच्छा है, तो कभी कुछ।’ (हंसते हैं) दूतावासों के डाइनिंग टेबुल पर इसी तरह होता है नाम लिखा रहता है। लगता है कि अपनी औरत में उनकी रूचि कम हो गई है तो दूसरी औरत के साथ बैठे हैं। हालांकि दोनों भीड़–भाड़ से अलग ही रहना पसंद करते हैं। इसलिए न तो वे दावतें करते हैं और न ही किसी को आमंत्रित ही करते हैं। सामान्यता वे किसी के यहाँ जाना भी पसंद नहीं करते। देर रात तक पार्टी अटेंड करना, ये सब दोनों ही पसंद नहीं करते।

अमृता पार्लियामेंट जाना ही नहीं चाहती थी। जब उनको मनोनीत किया गया तो उन्होंने कहा कि मैं राजनीतिज्ञ नहीं हूँ। इमरोज बताते हैं, ‘6 साल हुए, इन्हें पार्लियामेंट जाना था। इन्होंने कहा मैं ड्राइवर के साथ जाने वाली नहीं। आप ही लेके जाओ, आप ही लेके आओ। गाड़ी है मगर वो ड्राइवर की गाड़ी में नहीं बैठती। उन्हें लगता है कि ड्राईवर रखो तो ये बात भी ध्यान में रखो कि ड्राइवर सुन रहा है। तो क्या बात करोगे? हर बात तो ड्राइवर के सुनने वाली नहीं होती। तो मैं उतनी देर पार्लियामेंट के बाहर रहता पार्किंग में और उसकी किताब पढ़ता। 6 साल तक मैं यही करता रहा। जब फ्रेंच दूतावास से इनको बुलावा आता–तो कार्ड पर सिर्फ इन्हीं का नाम लिखा होता, मुझे तो वे नहीं जानते थे। मैं उनसे कहता आप ही अंदर जाओ, मुझे तो उन्होंने आमंत्रित किया नहीं हैं, मैं नहीं जानेवाला। मैं अपना खाना साथ लेकर जाता, बाहर बगीचे में गाड़ी पार्क करता, बत्ती जलाकर खाना खाता। और वो अंदर खाना खा रही होतीं। 6–7 ऐसी पार्टियों के बाद जब उन्होंने मुझे देखा तो पूछा कि ये भी आए थे। फिर मेरा भी नाम कार्ड में आने लगा और मैं भी अंदर जाने लगा। मेरे लिए ये दिक्कत नहीं थी कि मैं भी जाँऊ या मुझे भी आमंत्रित किया जाता। छोटी–छोटी बात पर यदि झगड़ा करना हो तो झगड़ा बना लो। मैं बाहर में इंज्वाय कर रहा हूँ। मैं अपनी मर्जी से, पंसद से खाना बनाकर ले आया और खाया तो इसमें क्या दिक्कत है। मुश्किलें सामान्यत: — हम खुद ही पैदा करते हैं।’

वे कहते हैं ‘आर्टिस्ट की आय बहुत थोड़ी है। और आजकल तो पेंटिग ही ऐसी बन रही है कि कौन आदमी घर में लेकर जाएगा उसे। क्या सुबह उठकर देखी जा सकती ऐसी पेंटिग? ये जो मॉडर्न आर्ट है! ऐसा लगता है मॉडर्न आर्ट को देखकर, कि इन कलाकारों ने कभी कोई खुशी देखी ही नहीं। आपने इतनी उदासी कहाँ देखी? आपने जिंदगी में खुशी भी तो देखी होगी? खुशी तो कहीं नहीं दिखाती ये पेंटिंग्स। भई एक लिमिट है। देखी है वो मर्डर स्टोरी! जिंदगी से अगर ली है, तो जिंदगी में सिर्फ मर्डर तो नहीं है न! जिंदगी में तो खुशी भी, गम भी। मगर वो उसका स्टाईल ही हो गया है (मॉर्डन आर्ट का)। मैं तो ये कहता हूँ कि ये पंटिंग जो है, जितने भी आर्ट्स हैं–ये सब रास्ते हैं। ये मंजिल नहीं है। मंजिल तो जिंदगी है। हम जिंदगी खूबसूरत जीना चाहते हैं। किसी ने कहा है ‘कभी ऐसा वक्त आएगा जब सब आर्ट खत्म हो जाएंगे। सिर्फ जिंदगी आर्ट होगी। ये एक खुशफहमी है।’

अमृता के विषय में लम्बी बातचीत करने के बाद जब इमरोज से मैंने उन दोनों की तस्वीरें मांगी, थोड़ी देर बाद ही वे खाकी लिफाफे में कुछ पुरानी तस्वीरें ले आए थे। उन्हें देखने के बाद मैं तस्वीरों को वापस लिफाफे में डालते समय उन्हें सहारा देने के लिए लाए गए उस हार्ड बोर्ड को रखना भूल गई। इमरोज ने तुरंत मेरे हाथों से लिफाफा लिया और खुद उन तस्वीरों को लिफाफे में डालने लगे। ‘किसी भी काम को करने का प्रोपर तरीका होना चाहिए। चीजें खराब हो जाती हैं ऐसे।’ लग रहा था जैसे अमृता से जुड़ी हुई हर चीज को उन्हीं लिफाफों की तरह ऐसे सहेज लेना चाहते हैं कि उनमें कभी कोई सिलवट न पड़ने पाए। जबकि वहीं उनके द्वारा बनाई गई पेंटिंग पर धूल की परतें जमी थीं…।

 

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About Amrut Ranjan

कूपरटीनो हाई स्कूल, कैलिफ़ोर्निया में पढ़ रहे अमृत कविता और लघु निबंध लिखते हैं। इनकी ज़्यादातर रचनाएँ जानकीपुल पर छपी हैं।

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