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गौरव सोलंकी की तीन कविताएँ

गौरव सोलंकी को हम उनकी कहानियों के लिए जानते हैं, आर्टिकल 15 जैसी सामाजिक सरोकार से जुड़ी फ़िल्म के लेखक के रूप में जानते हैं, लेकिन वे बहुत अच्छे कवि भी हैं। उनकी लगभग हर कविता में एक प्रसंग होता है और अंतर्निहित गीतात्मकता, जो समक़ालीन कविता में बहुत दुर्लभ गुण है। मुझे कई बार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताएँ याद आ जाती हैं जिनके बारे में कभी मनोहर श्याम जोशी ने कहा था कि समक़ालीन कविता में कविताई केवल सर्वेश्वर के पास थी बाक़ी कवि तो बस कविताएँ लिख रहे थे। फ़िलहाल आप तीन कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर
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1
मैं उसके जिस्म में गुंथा हुआ था
 
मैं उसके जिस्म में गुंथा हुआ था
तब भी उसने कहा कि वो मुझे अच्छी तरह नहीं जानती
 
यह पुलिस की एफ़ आई आर में लिखा है
और आप कभी भी उधर से गुज़रें तो चैक कर सकते हैं
 
उसके बाद कई दिन तक मैंने सोचा कि किसी पतंग के साथ कट जाऊं
और मेरी याद में कोई सभा भी न हो
लेकिन यह बहुत हताशा भरी बात थी
इसलिए मैंने जताया कि मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता
 
हमारे कई दोस्त साझे थे
और ज़िन्दा रहने के लिए ज़रूरी था
कि मैं उनकी हत्या कर दूं
पर यह भी मुमकिन नहीं हो सका जज़्बाती कारणों से
 
इसलिए मैंने ख़ुद को बेहतर इंसान की तरह पेश किया
और ख़ुद को एक खिड़की के आकार में काटा
जैसे देखा जा सकता हो मेरे आर-पार
 
यह एक साज़िश थी
और इससे मुझे बहुत कुछ हासिल भी हुआ
सिवा अपने जिस्म के
जो कई हिस्सों में कटकर उसके पास पड़ा था
 
मैं रूह की बात नहीं करूंगा यहां
क्योंकि इतनी हैसियत नहीं होती कविताओं की
 
 
2
कितने दिन हुए कि मेरे और तुम्हारे बीच कुछ भी नहीं बचा
 
 
 
कितने दिन हुए
कि मेरे और तुम्हारे बीच एक भी रात नहीं बीती
 
 
मैंने इस बीच पता लगाया कि यह धरती कब ख़त्म होगी
और मेरे पड़ोसी बूढ़े को वो क्या पता है जो उसकी आंख में चमकता है
बारिश के कुछ देर बाद तक इतना पानी रहता है फूल पर कि तितलियां फिसल सकती हैं
मैंने छज्जे पर से लटककर देखा कि जगह बदलो तो हिलता है क्या चांद,
नहीं हिला
 
 
मैं कई चीज़ों में नाकामयाब हुआ जान
नौकरी से निकाला गया 18 तारीख़ को
25 तक मैंने ख़ुश रहने का दिखावा किया सबके सामने और फिर लड़खड़ा कर गिर गया
 
एक दिन तो लगा मुझे कि मैं मामूली मौत मर जाऊंगा
फिर मैं शराब पीने लगा एक-दो या तीन हफ़्ते तक रोज़ाना
 
फिर एक पड़ोसी ने कहा कि आप दिखाई नहीं देते
तो मैंने दिखाई देने की कोशिश की
मेंरे पास कुछ सेल्फ़ियां हैं उन दिनों की,
लेकिन तुम्हें नहीं भेजूंगा, डरो मत
 
 
मैं तुम्हें उस सपने के बारे में बताना चाहता था
जिसमें मैं नाव पर था अकेला
और तुम गोलियां चला रही थी
पर मैं अगर फ़ोन करता भी तो तुम उठाती नहीं
इसलिए मैं लिखकर रखने लगा सारे सपने
कि बाद में किसी को ज़रूरत पड़े अगर
 
 
पूरे महीने तुम ऐसे याद आती रही
जैसे अँधेरे में माँ याद आती थी बेहतर दिनों में
 
 
कितने दिन हुए
कि मेरे और तुम्हारे बीच कुछ भी नहीं बचा
 
मैं चादर से बादल बनाना सीख रहा हूं
मुझे चमेली के फूल दिखने लगे हैं हवा में
मुझे बिच्छुओं पर यक़ीन होने लगा है आख़िर
और मैंने एक दर्ज़ी से अपनी छत के फटने का हिसाब माँगा है
 
लेकिन पहाड़ जो टूटा है,
उसके बारे में किसी को कुछ भी नहीं बता सकता मैं
वरना हम उन लोगों में बदल जाएंगे
जिनसे नफ़रत करते रहे हैं हम
 
जिन्हें ख़राब कहती थी तुम
जिन्हें मैं कहता था कि कमज़ोर हैं
 
 
3
मैं कहां पहुंचकर मैसेज करता उसे?
 
हम डूबने से तुरंत पहले
बचाते रहे अक्सर एक-दूसरे को
वैसे हमने ही धकेला एक-दूसरे को पानी में
जब भी बस चला
 
 
बहुत आख़िर तक तो
हमने ज़िंदा रहने का इतना अभ्यास कर लिया था
कि उसने मेरा नाम लेकर कहा
कि अब तो तुम्हें मारा ही नहीं जा सकता
 
 
उसके देखने में चाँद आधा और एक नया सा उस्तरा था
उसके कहने के ढंग में थी दरवाज़ा खुलने की आवाज़ और अंगड़ाई की खनक
उन दिनों जब वो मेरे पास सोती थी
 
 
तो चारों और दीवारें खिंच आती थीं
और एक घर बन जाता था ख़ाली मैदानों, रेलगाड़ियों और जंगलों में भी
 
फिर आख़िरी दिनों में
मेरी छाती पर सर रखते हुए उसने कहा
कि यह घर नहीं अब,
कोई मैदान, रेलगाड़ी या जंगल है
 
आख़िरी चीख थी ये, एक अपशकुन था
पर हमने ज़िंदा रहने का इतना अभ्यास कर लिया था
कि मैं उसके साथ आख़िरी बार खाना खाते हुए भी हँसा
 
और जैसे यह कोई आम विदा हो अगली सुबह तक के लिए,
मेरे गले लगते हुए उसने कहा
कि पहुंचकर मैसेज करना और सो जाना वक़्त से
 
उसके अंगूठे और उंगली के बीच एक तिल था
वहीं था मेरा घर
मैं कहां पहुंचकर मैसेज करता उसे?
 
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2 comments

  1. सच में बिल्कुल अलग कलेवर की अद्भुत कविताएं हैं

    गहरी टीस की तरह मन में उतरती जाती हैं
    पंक्ति दर पंक्ति

  2. आख़री कविता कुछ ठीक ठीक जान पड़ती है , नहीं तो कुछ खास नहीं हैं कविताएँ जैसा कि विश्लेषण देकर मन में चित्र गढ़ा गया था। लगता है प्रभात जी ने अच्छी कविताएँ पढ़ीं नहीं हैं।

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