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अर्चना लार्क की कुछ कविताएँ

आज युवा कवयित्री अर्चना लार्क की कविताएँ पढ़िए। कुछ अनछुए विषय, अनछुए भाव कविता में ले आना भी उपलब्धि होती है। इतनी कविताएँ लिखी जा रही हैं उनमें अलग से पहचानी जाने वाली कविताएँ हैं अर्चना लार्क की- मॉडरेटर

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राख हो चुकी लड़की
 
शब्द शून्य हो रहे
आवाज़ कमज़ोर है
समाज खो चुका है अपनी भाषा
माहौल में एक लड़की की सिसकी है
राख हो चुकी एक लड़की हवा में तैर रही है
एक लड़की जिसने आज ही दुनिया को अलविदा कहा
प्यारी लड़की तुम और तुम जैसी बहुत सी
अंत तक बनी रहेंगी अपनी आवाज़ में अपनी राख में
 
प्यारी लड़कियों 
तुम लिखो, तुम बोलो, तुम खुल कर जियो
तुम्हारे डायरी के पन्ने किसी कोने में
आंसुओं से भीगने के लिए नहीं हैं
एक दिन मिल कर दुनिया को
बेफ़िक्र विचरने लायक बना जाएँगी लड़कियाँ
तारीख़ बदल जाए, सूरज पूरब से पश्चिम हो जाए
लड़कियाँ इसी तरह खिलती रहेंगी
वे दुख को परे धकेल देंगी
और हसेंगी वह हंसी
जिससे शर्मशार होता रहा है यह ताकतवर समाज
आज इन्हीं आवाज़ों से रोशन है सारा जहान
वे लहरा रहीं परचम
वे कमसिन भी हैं और विद्रोह का बिगुल भी
वे अपने होने का उत्सव हैं
 
धरती का चक्कर
 
 
धरती का एक चक्कर लगा कर लौटी हूँ
एक कोने से दूसरे कोने तक बीच के रास्ते
छवियाँ साथ चलती रही हैं
एक कपड़े का घर ओस से भीगा हुआ
बच्चे जन्म और मृत्यु के बीच हैं
जिनकी मां माइनस तापमान से जूझती मर चुकी है
घास-फूस-कपड़े के कई घर किसी और के सिपुर्द हो चुके हैं
रात जितनी अँधेरी है उससे ज्यादा अँधेरी दिख रही है
 
कुछ दूरी पर एक परिवार
जिसने अनगिनत रिश्तों को अपमानित किया है
घर का लड़का सुदूर यात्राओं पर है
और माँ को अपने सूरज के लिए
किसी चाँद की तलाश में है
 
थोड़ी दूर खड़ी एक बस में भगदड़ मची है
एक लड़की जो निर्वस्त्र कर दी गई है
सड़क पर पीठ के बल पडी हुई बेहोश है
एकाएक सारी दुनिया नंगी हो गई है
 
धरती का एक चक्कर लगा लौट आई हूँ
एक लड़की ने
प्रेम की दुनिया बसाने की ख़ातिर एक प्रस्ताव रखा है
मुहल्ले में उसका नाम शूपर्णखा पड़ गया है
 
सोचती हूँ अगर कुछ लौट कर आता है
तो पहले उन बच्चों माँ लौट कर आये
उनके लिए एक घर आये और खाने को रोटी आये
लड़की को उसका प्रेम मिले
जिसमें वो एक संसार बसा सके
मुझे थकने के बाद एक अच्छी नींद मिल सके
कुछ शब्द मिलें जिनके भीतर दुनिया सुंदर लगे I
 
 
 
युद्ध के बाद की शांति
 
पृथ्वी सुबक रही थी
खून के धब्बे पछीटे जा रहे थे
न्याय व्यवस्था की चाल डगमग थी
युद्ध के बीच शांति खोजते हुए
हम घर से घाट उतार दिए गए थे
 
वह वसंत जिसमें सपने रंगीन दिखाई दिए थे
बचा था सिर्फ स्याह रंग में
खून के धब्बे मिटाए जा चुके थे
पता नहीं क्या था
जिसकी कीमत चुकानी पड़ रही थी
 
चुकाना महँगा पड़ा था
हर किसी की बोली लग रही थी
हर चीज़ की क़ीमत आंक दी गयी थी
हम कुछ भी चुका नहीं पा रहे थे
 
सपने में रोज़ एक बच्चा दिखता था
जो समुद्र के किनारे औंधे मुंह पड़ा था
एक बच्चा खाने को कुछ माँग रहा था
तमाम बच्चे अपनों से मिलने के लिए
मिन्नतें कर रहे थे
उसे युद्ध के बाद की शांति कहा जाता था
 
दो खरगोश थे उनकी आंखें फूट गईं थीं
एक नौजवान अपनी बच्ची से कह रहा था
मुझ जैसी मत बनना
मज़बूत बनना मेरी बच्ची
 
यह वह वक्त था
जब प्रेमियों ने धोखा देना सीख लिया था
खाप पंचायतें बढ़ती जा रही थीं
 
उस दिन मेरी फोटोग्राफी को पुरस्कार मिला था
मेरी गिरफ्तारी सुनिश्चित हो चुकी थी
मैंने कहा यह कोई सपना नहीं
मेरे होने की कीमत है जिसे मुझे चुकाना है.
 
 
कलाकार
 
कलाकार जब लिखता है प्यार
तो कितनी ही कटूक्तियों से दो चार हुआ रहता है
जब वह लिखता है आज़ादी
तो जानता है उनके कैसे-कैसे फरमान हैं
जिनसे मुक्ति की कोशिश है कला
वह सुनता है धार्मिक नारों के बीच बजबजाती हुई
उनकी आवाज़
उनके थूथन की सड़न को धोने में काम आता है उसका प्यार
 
 
कलाकार होता जाता है ईश्वर का दूसरा नाम
हर बार
वह जानता है प्यार ही है जो बचता है ज़रा सा भीतर
लोगों की मुस्कानों में तेवर में
उदास होता जाता है कलाकार रोज़-ब-रोज़
हर किसी के भीतर मरता रहता है एक ईश्वर.
 
स्त्री की आवाज़
 
जब तुम जनेऊ लपेट रहे थे
कुछ दूर एक सुंदर बच्चा अपने होने की गवाही दे रहा था
जब मन्त्रों की बौछार के बीच
तुम भाग्य का ठप्पा लगा रहे थे
कुछ दूर वह बच्चा संघर्ष का पहला पाठ पढ़ रहा था
जब तुम अपने नाकारापन पर गंगाजल छिड़क रहे थे
और उस बच्चे को हर कहीं रोक रहे थे
तुम्हारी मूर्खता तुम्हारी चोटी की तरह लहरा रही थी
तुम उसकी बुद्धि को पहचानाने से इनकार करते रहे
वह कोई था एकलव्य या उसका वंशज रोहित वेमुला
 
 
तुमने कहा वे चहांरदीवारी के अंदर नहीं आ सकते
अपने स्वार्थ से समय को सिद्ध करते हुए
तुमने उन्हें अपनी थालियों से दूर रखा
कुर्सी पर विराजमान तुम
उन्हें अपने पैरों के पास बिठाने को क्रांति समझते रहे
तुम स्त्रियों को कभी राख तो कभी पत्थर बनाते चलते रहे
तुम्हारा पुरुषत्व उन पर गुर्राता रहा
फिर एक दिन तुमने कहा कि घर ही ख़ाली कर दो!
तुम्हारे खड़ाऊँ तुम्हारी धोती तुम्हारा अंगौछा जनेऊ
मस्तक पर उभरा हुआ चंदन तुम्हारा भोजन
सब उनका श्रम है
तुम नंगे हो अपनी जाति अपने प्रतीकों अपने धर्म के भीतर
‘तुम विधर्मी सब गद्दार हो’ कहने वाले तुम
ज़रा नज़रें घुमा कर देखो एक लंबी कतार है
सौंदर्य से भरा हुआ एक ‘शाहीन बाग़’
सुनो वे आँखे तुमसे क्या कह रही हैं?
मैंने अभी-अभी सुना- ‘हिटलर गो बैक’
और सबसे ऊँची आवाज़ उस स्त्री की है
जिसे तुम अपने शास्त्रों के खौलते हुए तेल में
डुबोते रहे थे बार-बार.
अंधापन फैल चुका है
 
हम कितनी जल्दी में हैं नष्ट होने को आतुर
हुंकारते सींग मारते घुसे जा रहे मनमाने
कीचड़ हो गए विचार बिक गए चौथे खम्भे से
शब्दों के सौदागरों की राय है
कि मनुष्य न बचे रहें
 
बेशक मंदी छाई हुई हो
लेकिन झंडा ऊंचा है
झंडाबरदार अँधेरे में तीर चलाते
सम्मोहन के खतरनाक पड़ाव के पार हैं
उनकी मृत्यु भी अब स्थगित है
 
सुना है अंधापन फैल चुका है इलाक़े में
बहरेपन ने दस्तक दी है
रिश्तों और विचारों का मातम मन रहा
 
सच भरभराकर गिर गया है
‘हाँ’ को बरी
और ‘ना’ को नज़रबंद किया गया है
अक्षर और शब्द हड़ताल पर हैं
जागो आगे तुम्हारा भी नम्बर आएगा.
 
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7 comments

  1. सुरेश कुमार

    बेहतरीन और प्रभावशाली कविताएँ ! कवयित्री को बधाई ! आप ऐतिहासिक काम कर रहे हैं . आप को भी बधाई !

  2. A. Charumati Ramdas

    बहुत सुन्दर!

  3. बेहतरीन कविताएं हैं। ऐसी सर्जनात्मकता के लिए बहुत शुभकामनाएं ।

  4. बहुत बेहतरीन कविता।आपको अनन्त शुभकामनाएं।आप सदैव यूँही लिखती रहें।

  5. बहुत सुंदर कविताएँ।बधाई अर्चना💐

  6. सत्या शर्मा ' कीर्ति '

    अद्भुत कविताएँ
    बहुत – बहुत बधाई

  7. डॉ0 मुकेश

    बहुत खूब

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