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यू. आर. अनंतमूर्ति के प्रसिद्ध उपन्यास ‘घटश्राद्ध’ का एक अंश

यू. आर. अनंतमूर्ति के प्रसिद्ध उपन्यास ‘घटश्राद्ध’ का एक अंश पढ़िए। आजकल प्रिंट किताबों को मँगवाना मुश्किल हो गया है लेकिन राजकमल से प्रकाशित इस उपन्यास को किंडल पर ईबुक में पढ़ सकते हैं। फ़िलहाल यहाँ अंश पढ़िए- मॉडरेटर

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अभी अँधेरा ही था। मैं आँखें मलता हुआ आँगन में आया तो देखा कि हाथ में पोटली उठाए शेषगिरी उडुप कहीं जाने को तैयार खड़े थे। मुझे देखकर बोले, “कुडुमल्लिगे गया तो तुम्हारे माता-पिता से मिलूँगा।” माँ-बाप का जिक्र आते ही यह सोचकर दुख हुआ कि यदि गाँव में होता तो मैं अब तक अपनी माँ की साड़ी ओढ़कर, उन्हीं के साथ सोया होता। माँ बाद में जगाकर, मुँह धुलवाकर पीने को कॉफ़ी देती। बाड़ लांघने से पहले एक बार खड़े होकर शेषगिरि उडुप ने अपनी बेटी को पुकारा, “यमुना!” सिर पर लाल साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए यमुना दरवाज़े पर आ खड़ी हुई। शेषगिरि उडुप बाड़ का कट्टर बंद करते हुए बोले, “तो मैं जा रहा हूँ, समझी? बच्चों पर निगाह रखना। नदी में बहुत देर तक मत तैरने देना। गोकर्ण में यज्ञ-पूरा करके उद्यावर जाऊँगा। आने में तीन महीने लग सकते हैं। बच्चे रोज पाठ कंठस्थ करते रहें। उपाध्याय जी को मैंने सारी बातें समझा दी हैं।”

अपने पिताजी से उम्र में बड़े शेषगिरि उडुप को देखकर मुझे डर लगता था, लेकिन अपनी माँ से छोटी यमुना-दी से मेरी घनिष्ठता थी। उडुप जी की पीठ मुड़ते ही मैं यमुना-दी से अपने घर जाने की जिद करने लगा।

“अरे चुप हो जा, भैया! मुँह धोकर तुलसी तोड़कर ले आ ” यह कहकर वे भीतर चली गईं। उनके भीतर जाते ही विश्वनाथ शास्त्री और गणेश उठ आए। शेषगिरि उडुप की आकृति ज्यों ही ओझल हुई, त्यों ही मुझे रोता खड़ा देखकर वे हँस पड़े। उनके साथ मैं कुएँ पर मुँह धोने चला गया। शास्त्री ने पूछा, “क्या बात है, रे डरपोक?” गणेश गागर को कुएँ में सर्र से छोड़ते हुए बोला, “अरे शास्त्री, यह तो मूर्ख है। उपनयन से पहली वाली रात ‘जाँघ चीरकर उसमें मेढक भर देते हैं,’ कहकर मजाक किया था तो यह रोने बैठ गया था।”

यह कहकर वह घड़े में पानी भरते हुए हँस पड़ा। मैं रोता हुआ रसोईघर में पहुंचा। “अबे पानी खींचकर देंगे! आ जा!” कहकर उन्होंने पीछे से आवाज़ दी।

यमुना-दी दही बिलो रही थी। उसका चेहरा रुआंसा-सा था । दो-दो बार पुकारने । पर उन्होंने मेरी ओर मुड़कर देखा और कहा, “जाने दे। तू उनके साथ तुलसी लाने मत जाना। मैं ही तेरा मुँह धुला देती हूँ।” इस तरह उन्होंने मुझे तसल्ली दी।

मुँह धुलने के बाद मैं अकेला ही टोकरी लेकर पूर्व दिशा की ओर चल पड़ा। रास्ते में उगे तुंबे के फूल तोड़े। मैं अब भी छोटा हूँ, नाटा हूँ-यह जताने के लिए शास्त्री यह कहकर मजाक उड़ाता, “तुंबे के पौधे से सीढ़ी लगाता हूँ।”

शास्त्री मुझसे उम्र में बड़ा था। वैसे दिखता भी बहुत बड़ा था। उसके माँ-बाप नहीं थे। मेरी तरह उडुप जी के यहाँ वेद पढ़ता था। उसकी एक आँख छोटी और दूसरी बड़ी थी। इसलिए गणेश उसका ‘शुक्लाचारी’ कहकर मजाक़ उडाता था। दोनों की जोड़ी थी। मैं ही अलग था। टोकरी लेकर मैं गोपाल जोयिस के घर पहुँचा। वहाँ बेलपत्र का पेड़ था। उसकी पत्तियाँ तोड़ने के लिए गोपाल जोयिस की बहिन गोदावरम्मा से लग्गी माँगी। गोदावरम्मा भी यमुना-दी की तरह छुआछूत मानने वाली स्त्री थीं। लेकिन यमुना -दी उनसे बहुत छोटी थी। वे गोरी और सुडौल थीं। माँ से भी अच्छी दिखती थीं। यमुना-दी की शादी के कुछ ही दिन बाद उनका पति साँप काटने से मर गया था। शेषगिरि उडुप की पत्नी के मरने के बाद उनकी देखभाल

करने के लिए कोई-न-कोई चाहिए, इसलिए यमुना-दी अपने पिता के साथ रहने लगीं। यह बात गणेश ने मुझे बताई थी। गणेश उडुप जी का दूर का रिश्तेदार था। हाथ में लग्गी लेकर जब मैं उछल-उछलकर बेल पत्र-तोड़ रहा था, तभी गोदावरम्मा का स्वर सुनाई दिया, “छोड़, मैं तोड़कर देती हूं।” उन्होंने बेल-पत्र तोड़कर मुझे दिए। बाद में वे भी तुलसी तोड़ने लगीं। तब उन्होंने पूछा, “क्यों रे, उडुप जी गोकर्ण चले गए क्या?” मैंने ‘जी हाँ’ कहा। बाद में उन्होंने पूछा, “यमुना-दी कैसी हैं?”

मैं बोला, “अच्छी हैं।”

उस पर वो बोली, “दो-तीन दिनों से मन्दिर नहीं आ रही हैं।”

मैं बोला, “इस बारे में मुझे मालूम नहीं है।”

“मालूम नहीं के माने क्या रे ? क्या वह लेटी नहीं रहती? उडुप जी ने कुछ भी नहीं कहा?”

मैंने कहा, “परसों यह कहकर लेट गई थीं कि सिर में चक्कर आते हैं। उडुप जी ने उसकी औषधि दी। बस इतना ही, और कुछ भी नहीं।”

“ओह, यह बात है,” कहकर गोदावरम्मा हँस पड़ी। भीतर जाते हुए गोपाल जोयिस से हँसकर बोली, “सुना भाई, यमुना को बुखार नहीं है, पर तिल्ली बढ़ गई है। बेचारी।”

अपने घर से लौटते समय अग्नि-कार्य के लिए अश्वत्थ वृक्ष की सूखी समिधाएँ पेड़ के पास से चुनकर लेता गया। यमुना-दी मेरी ही प्रतीक्षा कर रही थीं। “कितनी देर लगा दी रे! उपाध्याय जी प्रतीक्षा कर रहे हैं,’  कहकर कुएँ से जल्दी-जल्दी दो-तीन गागर पानी खींचकर उन्होंने मेरे सिर पर डाला और कहा, “जा जल्दी, जाकर बैठ।” गीली धोती निचोड़कर उसी से अपनी लम्बी चोटी पोंछकर मैंने उसमें एक गाँठ लगा दी और चोटी को यों ही लटकने दिया। गीले कपड़ों में ही भीतर भाग कर गया। यमुना-दी से शुद्ध जगह पूछकर कपड़े सूखने को डाले। अंगवस्त्र माँगा और एक को पहनकर और दूसरे को ओढ़कर पंचपात्र लेकर चल पड़ा।

“ऐ, कौपीन पहना कि नहीं?” कहकर यमुना-दी ने उसकी याद दिलाई। मैं कौपीन पहनना भूल गया था। उन्होंने हँसकर मेरी चाँदी की करधनी में कौपीन खोंस दी और हँसती हुई बोली, “अब जा।”

उपाध्याय के मुँह और सारे शरीर पर माता के दाग़ थे उन्होंने डाँटा, “इतनी देर क्यों लगा दी?” उडुप जी ने मुझे कभी नहीं डाँटा था। “अब तक जप के मन्त्र तुमने नहीं सीखे,” कहकर फिर डाँटते हुए उन्होंने जप कराया। मुझे डांट पड़ते देखकर वहीं बैठे जप करते शास्त्री को खुशी हुई। उसने हँसकर अपनी एकमात्र आँख से गणेश की ओर देखा। जप के बाद मैंने अग्नि-कार्य किए। उसके बाद उपाध्याय की पूजा के लिए मन्दिर जाते हुए बोले, “मांड पीने के बाद जरा चन्दन घिसकर देना।”

भीतर पंक्ति में पत्तलें बिछी थीं। हम तीनों दौड़कर वहाँ जा बैठे। यमुना-दी ने चावल की कनी से बनाया माँड परोसा और नारियल का तेल डालकर साथ में मिर्ची का अचार भी दिया। यदि नारियल ज़्यादा होते तो नारियल की खीर बनती। हमने माँड को जरा आवाज करते हुए सुड़-सुड़ करके पीया। शास्त्री और गणेश बाहर चले गए। मैं घर पर ही रह गया।

यमुना-दी ने बताया, “आज तुम सब लोगों का भोजन साहूकार के घर पर है।” मुझे यह सुनकर खुशी हुई कि पूजा के बाद भोजन के साथ खीर मिलेगी। साथ में दक्षिणा भी मिलेगी। उपनयन से पहले केवल एक पाई मिला करती थी अब एक आना मिलने लगा था यह खुशी की बात थी। लेकिन नर-बानर वाला खेल नहीं खेल सकते, कुत्ते पर पत्थर फेंकना मना था, चड्डी नहीं पहन सकते। भोजन के लिए बैठने पर बात करने की भी मनाही थी। इन बातों का बुरा भी लगता था। फिर भी उपनयन के बाद से पत्तल के पास रखे पंचपात्र में इकन्नी पड़ते देखकर खुशी होती। यमुना-दी के पास छेदवाला एक डिब्बा था। दक्षिणा में आए सारे पैसे मैं उसी में डाल देता था। यमुना-दी ने कह रखा था कि घर जाते समय ले जाना और

घरवालों को दे देना। ‘माँ को देना,’ इस पर शास्त्री तो मुझे कंजूस कहता था।

यमुना-दी ने पूछा, “नाणी, तू सुबह देर करके क्यों आया? बेकार में उपाध्याय जी से डाँट खाई।”

मैंने गोदावरम्मा के घर बेल-पत्र लाने के लिए जाने और वहाँ उनके साथ हुई सारी बातें उनसे कहीं तो उनका मुँह उतर गया। उन्होंने जोर देकर पूछा, “क्या-क्या बात हुई, रे?” मैंने बताया, “कोई बुखार-बुखार में तिल्ली बढ़ने की बात कहकर आपस में हँस रहे थे।” यह सुनकर यमुना-दी पल्लू से मुँह ढाँपकर रो पड़ीं।

वे बोली, “कोई और पूछे तो कह देना कि बुखार आता है।” यमुना-दी मौका मिलने पर लेटी रहती थी। उन्होंने मन्दिर जाना भी बन्द का दिया था। इसलिए मैंने सोचा, बुखार हो सकता है। दोपहर हो गई तो मैं जप करने बैठ गया। मन्दिर में पूजा के बाद यमुना-दी के अलावा हम सबने साहूकार के घर जमकर भोजन किया। उनकी माँ का श्राद्ध था। भोजन के बाद उपाध्याय जी ने हमें बुलाकर कहा, “आज मैं नहीं आ सकता। तुम अपने-आप पाठ याद कर लेना। शास्त्री, जरा ध्यान रखना। लड़का पाठ ठीक से याद करे।” यह कहकर उन्होंने मुझे शास्त्री के हवाले कर दिया। भोजन के बाद प्रतिदिन दोपहर को मुझे श्री-सूक्त-पुरुष-सूक्त जैसे मन्त्र, उडुप जी तकली पर जनेऊ का सूत तैयार करते समय याद कराते थे। दूर बैठकर यमुना-दी मन्दिर के लिए बत्तियाँ बटती थीं। उडुप जी के घर में रहते हुए यह क्रम एक दिन भी नहीं टूटा था। लेकिन उस दिन उससे छुट्टी मिल रही थी। इसलिए मुझे बड़ी खुशी हुई

शास्त्री ने मुझे बुलाकर कहा, “अच्छा, जरा पुरुष-सूक्त सुनाओ।” वह मुझसे ज्यादा समय से वहाँ पढ़ रहा था। ‘सांड जैसा है’,  कहकर यमुना-दी उसे डाँटा करती थीं। मैं मुँह लटकाकर उसके सामने खड़ा हो गया। वह बोला, “खैर, यह सब जाने दे। पहले अपने प्रवर गोत्र ठीक से सुना।” गणेश हँस रहा था। मैं ‘अंगीरस, अंबरीश, यौवनाश्व त्रयासोर्स्य प्रवरान्वित, अंगीरस गोत्र, अश्वलायन सूत्र ऋक्षाकाधायी नारायण शमन, कह ही रहा था कि उसने कहा, “अच्छा, ज़रा खड़ा होकर, कान पकड़कर ठीक तरह से बोल।” मैंने फिर वह सब दुहराकर कहा, “अहं भो अभिवादये ।” उसने फिर आदेश दिया, “अच्छा, नमस्कार करो।” मैंने नमस्कार किया। फिर वह बोला, “जैसा मैं कहता हूँ, वैसा ही किया तो आगे पाठ नहीं होगा” मुझे बड़ी खशी हई। उसके “अब फूट” कहते ही मैं यमुना-दी के पास भागा।

यमुना-दी खाना परोसकर पत्तल के सामने बैठी थी चावल के साथ आम का अचार परोस रखा था। लेकिन ऐसा नहीं लगा कि उन्होंने एक कौर भी मुँह में रखा हो। मैं वहाँ जाकर बैठा। उसके बाद नाम के लिए उन्होंने चार कौर खाए और बाकी सारा का सारा खाना घूरे पर फेंक आईं। मैनें पूछा, ‘क्यों दीदी,ऐसा क्यों किया/’ मुझे मालूम था कि उन्हें आम का अचार बहुत अच्छा लगता है। “पता नहीं क्यों, आज खाने को मन नहीं है,” कहकर उन्होंने एक लम्बी सांस ली। मैंने दक्षिणा के पैसे उनके हाथ पर रखे। वे उसे छेदवाले डिब्बे में डालते हुए बोली, “शास्त्री से जाकर कहो कि शिवपुर जाकर एक सेर सूखी मिर्च और एक सेर धनिया ले आए।”

मैं शास्त्री को ढूँढता हुआ साहूकार के घर तक पहुँच गया। उनके नौकर ने बताया कि वह छत पर है।

ऊपर जाकर देखा तो दरी बिछी थी। साहूकार के बेटा रंगण्णा, अग्रहार के दो युवक और शास्त्री बैठे थे। पत्ते हाथों में जोड़कर उन्हें छिपाते हुए ये ताश खेल रहे दे। गणेश बैठा उन्हें देख रहा था। मैं भी उन्हें देखता हुआ खड़ा हो गया। ‘एक्का, गल्ला, बादशाह, बेगम’ कहते हुए ये दरी के बीच पत्तों को फेंकते और फिर एक-दूसरे के मुँह को देखते। “इस खेल का नाम क्या है?” मेरे यह पूछने पर गणेश ने बताया कि यह ताश का खेल है। यमुना-दी की बात मैंने शास्त्री से कही। “शिवपूजा के बीच भालू आ गया,” कहकर उसने गुस्से में पत्ते गणेश के हाथों में थमा दिए और उठ खड़ा हुआ। “में ताश खेल रहा था, यह बात तूने मुँह से निकाली

तो तेरे सारे दाँत तोड़ देंगे, समझे!” कहकर डाँटते हुए मेरे साथ बाहर आया।

उसने मुझसे अपने साथ शिवपुर चलने को कहा। मैं बोला, “यमुना-दी से पूछना पड़ेगा।” उसने फिर डाँटते हुए कहा, “अरे, एकदम से लड़की मत बन।” मेरी भी इच्छा शिवपुर जाने की थी। इसलिए मैं उसके साथ चल पड़ा। अग्रहार लांघने के बाद एक तालाब आता था। उसके बाद बड़े-से जंगल में एक छोटा-सा मन्दिर। उसी रास्ते पर हम चलते गए। कुछ दूर जाने के बाद सीधा रास्ता छोड़कर उसने कोई और रास्ता पकड़ लिया और कहा, “आओ मेरे साथ।”

वहाँ एक बड़ा पेड़ था। उस पेड़ में एक आदमकद खोखल थी। शास्त्री ने उसके अन्दर हाथ घुसेड़ा। मैं बड़े कुतूहल से देखता हुआ खड़ा रहा। भीतर से कुछ निकाला और मुट्ठी में छिपाते हुए उसने मुझसे पूछा, “बताओ, मेरे हाथ में क्या है?” “मुझे नहीं मालूम” कहने पर उसने मुट्ठी खोलकर दिखाई। मुटूठी में बीड़ी का बंडल था। दुबारा हाथ डालकर उसने दियासलाई की डिब्बी निकाली। उसके इशारा करने पर मैं बैठ गया। उसने पूछा, “मालूम है, नाक से धुआं कैसे निकलता है? कितना अच्छा लगता है।” यह कहते हुए उसने नाक से धुयाँ  निकालकर दिखाया। फिर जोर डालते हुए मुझसे कहा, “तुम भी पीओ।” मुँह बाकर उसकी तरफ देखते हुए मैंने घबराकर कहा, “नहीं।”

उसने कहा, “यमुना-दी से कभी नहीं कहना। किसी की शिकायत नहीं करनी चाहिए।”

मैंने कहा, “ठीक है।”

“तुम्हारे कहने से भी मैं नहीं डरता, समझे मुझे क्या यमुना-दी की करतूतें नहीं मालूम। अब उन्होंने मुझे डांटा तो मैं सारी पोल खोल दूँगा। बिल्ली आँखें मूँदकर कब तक दूध पीती रहेगी?”

शास्त्री की बातें मेरी समझ में नहीं आईं, पर सुनकर हर लगा। ऐसा लगा कि यमुना-दी को बताए बिना मुझे इसके साथ नहीं आना चाहिए था। गोपाल कमती की दुकान से उसने सामान खरीदा। शिवपुर की पहाड़ी से उतरते समय शास्त्री बोला, “वापस लौटते समय दूसरे रास्ते से चलते हैं नदी किनारे से।” मुझे मना करने में भी डर लगा शास्त्री की कानी आँख और उसके घातक पैने ताने याद आते ही उसके द्वारा खींची हुई लकीर लाँघने का साहस मुझमें नहीं था। लौटते समय रास्ते में कहने लगा, “अब मैं तुम्हें एक तमाशा दिखाता हूँ। तुम्हें यह देखकर खुद पता चल जाएगा। पहले से बताकर मैं क्यों बदनाम होऊँ?”

हम काफी दूर चलकर एक उजाड़ अग्रहार में पहुँचे। अग्रहार नदी के किनारे से जरा ऊपर की तरफ़ पड़ता था। उसका नाम का होटल। एक बार पहले भी मैं यमुना-दी के साथ लकड़ी बीनने वहाँ तक गया था। सारे घर गिरे हुए थे। मकानों की केवल टूटी दीवारें और नीवें ही बची थीं। वहाँ जैनियों की पुरानी बस्ती रही थी। मूर्तिहीन मन्दिर में चमगादड़ उड़ रहे थे। यमुना-दी ने बताया कि पुराने जमाने में यहाँ लोग बसते थे। अब यह गाँव उजड़ गया है। मुझे डर लग रहा था कि वहाँ कहीं भूत न हों। “डरपोक कहीं का!” कहकर शास्त्री हँस पड़ा। फिर मुझे साथ लेकर दबे पाँव आगे बढ़ा। छोटी-सी एक दीवार के पास रुक गया और मुझे दीवार में बनी दरार में से देखने को कहा। वह खुद एक दूसरी दरार के पास जाकर खड़ा

हो गया।

कुछ देर बाद एक आदमी को ऊपर जाते हुए देखकर मुझे डर लगने लगा मैंने कहा, “चलो, चलें।” शास्त्री ने डाँटकर कहा, “तुम्हें भी कुछ पता होना चाहिए। ऐसे ही सदा बेवकूफ बने रहोगे! तुम तो शुकमुनि के अवतार हो।”

मैं डरा हुआ उस तरफ़ देखता खड़ा रहा। लाँगदार धोती और कमीज पहने एक आदमी आ रहा था। उसने अंग्रेजी काट के बाल बना रखे थे। उस आदमी को मैंने पहचान लिया। तब मेरा डर जरा कम हुआ। उसे मैं रोज देखा करता था। वह उडुप जी के घर के पास वाले स्कूल में पढ़ाता था। वह तुमकूर से आया था और अब शिवपुरी में रहता था। रोज साइकिल पर आता था। रामनवमी को अपने मन्दिर में हारमोनियम बजाया था। देखने में लम्बा, पतला और शहरी-सा लगता था। मैंने कहा, “अब चलो।” शास्त्री ने थोड़ी देर और रुकने को कहा। जब मैं दरार में से देख रहा था तो अचानक मुझे एक सांप दिखाई दिया। डर के मारे मेरे मुँह से निकला. “सॉप!”

“जरा चुप रहो” कहते हुए शास्त्री ने मुझे डांटा। कुछ देर बाद बड़ी-बड़ी मूंछों वाला एक और आदमी वहाँ आया। मुझे पता नहीं चला कि वह कौन है ये दोनों कुछ देर तक बातें करते रहे।

वहाँ साँप दिख जाने के कारण में वहाँ से तुरन्त निकल जाना चाहता था। बड़ा डर लग रहा था मुझे। शायद शास्त्री भी दरार में से देखते-देखते ऊब गया होगा। “चलो, तुम तो एकदम डरपोक हो,” कहते हुए वह झुककर दवे पाँव चलता हुआ मुझे गाड़ी वाले रास्ते तक ले आया। वहाँ से सीधे घर पहुँचने में देर हो गई। यमुना-दी ऊबी हुई बैठी थीं। मैंने उन्हें दुकान पर जाने की बात ही डरते-डरते बताई। उजड़े अग्रहार जाना, वहाँ दरार में से झाँकना, सांप का दिखना जैसी बातें बताने का फैसला नहीं हुआ। हमने स्नान किया और संध्या करने बैठे। बाद में खाना खाया। यमुना-दी ने मट्ठे में सत्तू घोलकर पीया।

रात को मैं, शास्त्री और गणेश वरामदे में बिस्तर बिछाकर सोए। यमुना-दी बीच वाले कमरे में सोई। उस रात हमारे साथ सोने वाले उइप जी नहीं थे। शाम को उस उजाड़ अग्रहार से होकर आए थे। वहाँ साँप दिखाई दिया था, इसलिए मुझे डर के मारे बहुत देर से नींद आई। यमुना-दी के पास जाकर सोऊँगा, कहता तो शास्त्री डरपोक कहकर मेरा मजाक उड़ाता, इसलिए मैं बरामदे में सोया था। डर लग रहा था, इसलिए नींद आने में बड़ी देर लगी । माँ और पिताजी की भी याद आई। मेरे पास लेटा शास्त्री धीरे से मेरे ऊपर हाथ रखकर पास सरक आया। उसके मुँह से वीड़ी की बदबू आ रही थी, जो मुझे असहनीय लगी। उसने मेरी धोती खोलकर

मेरे कौपीन पर हाथ रखा। मैं झट से उठकर सीधा यमुना-दी के पास जाकर लेट गया। उन्हें नींद नहीं आई थी। मैंने कहा, “डर लग रहा है।” “ठीक है, मेरे पास ही सो जा,” कहते हुए उन्होंने अपनी साड़ी मुझे ओढ़ा दी।

कुछ समय बाद मेरी आँखें भारी होने लगीं। तभी ऐसा लगा कि घर में कोई चल-फिर रहा है। घबराकर मेरी आँख खुल गई। भूत होगा, यह सोचकर में काँप उठा। यमुना-दी ने मुझे कसकर अपने से लिपटा लिया। बाद में पिछवाड़े के दरवाज़े पर किसी के आने की आहट हुई। ऐसा लगा कि किसी ने दरवाजा खटखटाया है। मैंने यमुना-दी को और जोर से पकड़ लिया। फिर ऐसा लगा कि कोई धीरे-धीरे आवाज दे रहा है। “दरवाजा, दरवाजा खोलो।” अँधेरे में इस तरह चोरक़दमों से घर का चक्कर लगाने वाला कहीं ब्रह्म-राक्षस न हो-यह सोचकर मैं और घबरा गया। यमुना-दी उठीं। मैंने उनका हाथ पकड़कर उन्हें रोका । लेकिन वे उठकर चली गई। मैं भी उनके हाथ उठकर चलने लगा कि उन्होंने कहा, “तू मत आ। भूत हो सकता है। दरवाजे पर झाड़ू रखकर आती हूँ ताकि वह भीतर न आ सके।”

वह मुझे कमरे के बीच में लेटा छोड़कर चली गई। मैं रोता हुआ उनकी प्रतीक्षा करता रहा। यमुना-दी पिछवाड़े के दरवाज़े तक गईं, पर उन्होंने दरवाजा नहीं खोला। अगर दरवाजा खुलता तो ‘खर’ की-सी कर्कश आवाज जरूर होती। वे किसी से कह रही थीं, “जाइए, जाइए। यहाँ नहीं आया कीजिए।” यह कहकर लौट आईं। उन्हें देखकर मुझे और डर लगा। ये ब्रह्मराक्षस से बात करके आई थीं। उन्होंने मुझे अपने पास खींचकर सुला लिया। मुझे बहुत देर बाद नींद आई।

सूर्योदय से पहले नींद खुली। स्नान के लिए गगरी उठाकर कुएँ के पास जाते हुए मुझे डर लगा। मैंने यमुना-दी को आवाज देकर अपने पास बुला लिया। मुझे यह सोचकर और डर लगा कि यदि शास्त्री को इस बात का पता चल गया तो यह मेरा और मजाक उड़ाएगा। जब मैं अकेला डलिया लेकर वेल-पत्र, तुलसी और फूल लाने के लिए निकला तो शास्त्री भी यह कहकर मेरे साथ हो लिया, “मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।” मना करने में भी मुझे डर लग रहा था। लेकिन रात को ब्रह्म-राक्षस के घर में चक्कर लगाने और पहले दिन सांप भी देखने की घटनाओं के कारण अकेले जाने में डर लग रहा था।

रास्ते में शास्त्री ने पूछा, “ब्रह्म-राक्षस ने यमुना-दी से क्या कहा?”

मैंने कहा, “मुझे नहीं मालूम।”

उसने फिर से पूछा, “यमुना-दी उठकर गई थीं। उन्होंने कुछ बताया नहीं?”

“मत आओ, चले जाओ, चले जाओ कहा था। दरवाज़े पर झाड़ू रखकर आई थीं।”

“ये ब्रह्म-राक्षस है कौन, पता है कुछ? तुझे अभी तक पता नहीं चला। यह तो बिल्ली के आँख मूँदकर दूध पीने के समान है। चलो, छोड़ो। एक-न-एक दिन पता चल जाएगा तुझे। यमुना-दी को मैं फूटी आँख नहीं सुहाता। तुझे छिपाकर सूजी के लड्डू, कोडबले (नमकीन पकवान) देती हैं न?”

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ? इसलिए चुप रहा। बेल-पत्र लाने जब हम गोदावरम्मा के घर पहुंचे तो उन्होंने पूछा, “यमुना-दी कैसी है ?”

मैंने कहा, “यमुना-दी को बुखार आता है। यह सच है।”

“बुखार-सुखार कुछ नहीं आता। कल रात को एक ब्रह्म-राक्षस घर का चक्कर काट रहा था। पिछवाड़े आकर उसने दरवाजा भी खटखटाया था।” शास्त्री ने अपनी कानी आँख मारते हुए गोदावरम्मा से कहा। गोदावरम्मा सारी बातें कुरेद-कुरेदकर पूछने लगीं।

बेलपत्र तोड़ चुकने के बाद शास्त्री ने मुझे कहा, “ए भृगु, सुब्रह्मण्य चल, मन्दिर से चंपा के फूल तोड़कर लाएँ।”

हम एक खेत लाँघकर गए और चंपा के फूल तोड़े। तब शास्त्री ने मुझसे कहा, “सुब्रह्मण्य भगवान को तो बिना नहाए-धोए छू सकता है? तुझमें इतनी हिम्मत है?”

मैंने सुन रखा था कि सुब्रह्मण्य भगवान के मन्दिर में अशौच हो जाए तो सांप दिखाई देते हैं। मैंने कहा, “न बाबा, न।”

इस पर शास्त्री ने कहा, “इसलिए तो तुझे छोकरी, डरपोक भृग कहते हैं। कैसा डरपोक है! घर चक्कर काटने वाले को ब्रह्म-राक्षस कहा तो झट से मान गया। यह देख, मैं छूकर आता हूँ।”

वह सीधा मन्दिर के भीतर गया और उसने भगवान की मूर्ति को छू दिया। मुझे शर्म लगी और डर भी। “तू भी छू ले,” यह कहकर उसने मुझे खींचा और मूर्ति से मेरे हाथ छूआ दिए। बाद में हँसते हुए कहने लगा, “मेरे हाथ में गरुड़ का तिल है। इसलिए मैंने निडर होकर छुआ। तुझे जरूर सांप आकर काटेगा।”

यह कहते हुए वह नाचने लगा। मैं रोने लगा “मेरे कहने के मुताबिक चलोगे तो कुछ भी नहीं होगा। मैं ध्यान रखूगा कि तुझे साँप नहीं काटे यमुना-दी के बारे में मैंने जो कुछ कहा है, वह उन्हें मत बताना अगर तुमने बताया तो मैं भी यह बता दूंगा कि तुमने अशौच में जाकर भगवान की मूर्ति को छुआ है।”

मैं आँसू पोंछता हुआ घर आया। यमुना-दी के पूछने पर मैं डर के मारे चुप रहा। उन्होंने शास्त्री से बुलाकर कहा, “तुझे रोटियाँ लग गई हैं!” फिर उसे खूब डॉटा। मैं सारा दिन शास्त्री के पास नहीं गया। बैठे-खड़े यह सोचकर डरता रहा कि कहीं सांप ना आ जाए। गायत्री मन्त्र का जप करता घूमता रहा। उस रात ब्रह्म-राक्षस चक्कर लगाने नहीं आया। उस दिन से मैं शास्त्री से नहीं मिला। वह जब भी मिलता अपनी कानी आँख की तीखी नजर से देखकर डॉटता, “अगर तुमने यमुना-दी को बताया तो तुझे साँप आकर काटेगा।” मगर मैं उससे बात ही नहीं करता था यमुना-दी जहाँ जातीं, उनके साथ-साथ लगा रहता। शास्त्री और गणेश साहूकार के बेटे रंगण्णा के साथ गुपचुप बातें करते रहते।

एक दिन यमुना-दी ने कहा, “आओ, चलें जंगल में से जलावन ले आएँ।” हम दोनों उसी उजाड़ अग्रहार में पहुंचे। दूर से मुझे डर लगने लगा। मैं वहीं बैठकर रोने लगा। “वहाँ साँप है। नहीं आऊँगा,” कहकर मैंने जिद्द की। उन्होंने डॉटा, मिन्नत की, लेकिन मैं नहीं माना। वे बड़बड़ाते हुई मेरे साथ घर लौट आई।

एक दिन बेल-पत्र लाने मैं गोदावरम्मा के घर गया। गोदावरम्मा ने मुझे देखकर कहा, “आओ, भीतर चलें। फिर मेरी पीठ पर हाथ रखकर भीतर ले गई। रसोई में बिठाकर पीने को कॉफ़ी दी। कॉफ़ी पीने से मैंने इन्कार किया। उन्होंने कहा, “कभी-कभी पी लेनी चाहिए।” कॉफ़ी देखकर मुझे भी पीने की बड़ी इच्छा हो रही थी। इसलिए कॉफ़ी पीने लगा। गोदावरम्मा हँसती हुई बोली, “तुम तो बड़े अच्छे बच्चे हो। नेम-निष्ठा का पालन करते हो। दूसरे लड़कों जैसे नहीं हो। आज के लड़के किसी की बात सुनते हैं कोई? सबने पूजा-पाठ करना कभी का छोड़ दिया है। हवन आदि तो बिलकुल ही बन्द हो गए हैं। अब इस साहूकार के बेटे रंगण्णा को ही देखो। साँड की तरह बढ़ रहा है। उमर भी क्या कोई कम है? मूंछ आने लगी हैं।” फिर वह मेरी प्रशंसा करने लगीं। उठते समय उन्होंने मुझसे पूछा, “क्यों रे, क्या यमुना- दी मन्दिर नहीं जाती? बिस्तर से भी नहीं उठती क्या?”

मैंने कहा, “नहीं।”

उन्होंने पूछा, “तो तुम सबके लिए खाना कौन पकाता है ? उड्प जी भी घर में नहीं है। वह ब्रह्म-राक्षस क्या आजकल भी घर का चक्कर लगाता है?”

मैंने कहा कि उस दिन के बाद से वह नहीं दिखाई दिया।

फिर उन्होंने पूछा, “क्यों रे, यमुना-दी को उल्टी-उल्टी होती है क्या? कहते हैं, ऐसे ज्वर हड्डी बुखार में उल्टियां बहुत होती हैं। परसों मैंने उसे दवाई लेने के लिए कहा था। कुछ ले रही है क्या?” मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहूँ? तेजी से क़दम रखता हुआ मैं वहाँ से चल पड़ा। घर पहुंचा। सारी बातें यमुना-दी को बताई। उन्होंने जो-जो सवाल मुझसे किए मैंने उन सबका जवाब दिया। यमुना-दी मेरी बातें सुनकर घबराहट के मारे जमीन पर बैठ गई। उनकी आँखों में आँसू भर आए उन्होंने कहा, “तुम आगे से उस तरफ़ कभी मत जाना।”

उस दिन दोपहर को गणेश के पिता तिप्पशास्त्री, होरणी से हमारे गाँव आए। यमुना-दी के बात करने पर भी वे उनसे बोले नहीं। यमुना-दी का बनाया शरबत भी नहीं छुआ।

“गणेश, तू अपनी चटाई और कपड़े बाँध ले,” यह कहकर वे उसे अपने साथ लेकर चले गए। बाद में यमुना-दी बैठकर बहुत देर तक रोती रहीं। उस दिन भोजन करके मैं जब हाथ धोने के लिए पिछवाड़े गया तो ऐसा लगा कि वल्ली पर कोई पाँव धरता हुआ चला आ रहा है। मैं डर के मारे चीख पड़ा, “यमुना-दी-दी!” यमुना-दी और शास्त्री दौड़े आए। एक आदमी भागता हुआ दिखाई दिया।

“इस ब्रह्म-राक्षस का क्या करें?” कहकर शास्त्री ने यमुना-दी की ओर देखा। यमुना-दी ने उसे डाँटते हुए कहा, “तू चुप रह! तुझे बोलने की ज़रूरत नहीं।” फिर गणेश के पिताजी भी आकर उसे ले गए। “मेरे पिताजी आकर मुझे क्यों नहीं ले जाते?” यह कहकर मैं रात-भर रोता रहा। यमुना-दी मुझे गले लगाकर बिलख-बिलख कर रोई, “तू मुझे छोड़कर कभी मत जाना।”

यमुना-दी अब चारों पहर घर में ही रहने लगी थीं। एक दिन शाम की गोदावरम्मा ने दरवाजा खटखटाया तो यमुना-दी ने मुझसे कहलवा दिया कि घर में नहीं हैं। दोपहर को हमें वेद पढ़ाने के बाद उपाध्याय जी जाने के लिए उठे। यमुना-दी ने उन्हें शरबत लाकर दिया। उन्होंने नहीं पिया। “मुझे नहीं चाहिए,” कह कर वे चले गए। यमुना-दी सारा दिन कोने में बैठी सोचती और रोती रहीं।

एक दिन दोपहर को उपाध्याय जी ने हम सबको जल्दी-जल्दी से वेद-पाठ का अध्ययन कराया। उसके बाद वे चले गए। शास्त्री रंगण्णा से गप्पे लगाने चला गया। घर में मैं और यमुना-दी ही रह गए थे तभी पुरंगी नाम की एक कोंकणी स्त्री ने पिछवाड़े के दरवाजे पर आकर आवाज दी, “बहन जी!” फिर वह उनसे बातचीत करने लगी। फिर अचानक बीच में बोली, “बहन जी, आजकल आप बहुत सुन्दर दिखने लगी हैं। गोल-गोल मोटी होती जा रही हैं। क्या बात है?” यह सुनते ही यमुना-दी ने बातें करना एकदम बन्द कर दिया और उठकर भीतर चली गई। बाद में वे बाहर नहीं आई। पुट्टरंगी देर तक इन्तजार करने के बाद यह कहते हुए चली गई, “क्या बात है? बहन जी को गुस्सा आ गया क्या?”

उस रात यमुना-दी ने मुझे अपने पास सुलाया और बहुत देर तक रोती रहीं। बाद में उन्होंने साड़ी की गाँठ खोली और उसे जरा नीचे सरकाकर अपने पेट पर मेरा गाल रखवाकर पूछा, “नाणी, तुझे कुछ सुनाई देता है?” उनके कोमल और ठंडे पेट पर गाल रखना मुझे अच्छा लगा। माँ की याद आने लगी। यमुना-दी का रोना देखकर मुझे भी रोना आने लगा। बाद में उन्होंने मेरे मुँह को अपने स्तनों से लगा दिया और मेरी पीठ पर हाथ फेरते हए कहने लगीं, “तू मुझे छोड़कर मत जाना, समझे?” मुझे उस दिन बड़े आराम की नींद आई।

उससे दूसरे दिन उपाध्याय जी ने हमें जप-पाठ नहीं कराया। वे वेद पढ़ाने के लिए भी नहीं आए। मन्दिर आए, पूजा समाप्त करके वहीं से चले गए। बाद में वे घर की तरफ़ फटके तक नहीं। त्रिकाल-स्नान और संध्या-वन्दना से छुट्टी मिलने की मुझे बड़ी खुशी हुई।\

एक दिन मुझे तुलसी-दल और बेल-पत्र लाने जाना था। शास्त्री लौटा ही नहीं था। वह साहूकार के घर में ही रहने लगा था। मेरा चेहरा देखते ही वे दोनों मुझे दूर से ही चिढ़ाया करते थे।

उन दिनों मझे यमुना-दी घर से बाहर नहीं जाने देती थीं। मुझे बड़ा गुस्सा आता था। खिड़की से बाहर देखता हुआ बैठा रहा करता। काना शास्त्री रंगण्णा के साथ गप्पे मारता और मौज मनाता था। वह प्राथमिक शाला के लड़कों के साथ बन्दर का खेल खेला करते। कभी लटू चलता। खूब ऊधम मचा रहा था वह भी। हमारे घर पर आदमी की कौन कहे, बच्चे तक की छाया नहीं पड़ती थी। मैंने और यमुना-दी ने इसी प्रकार घर में रहते हुए एक सप्ताह बिताया। यह सोच-सोचकर रोना आता कि पिताजी आकर मुझे घर क्यों नहीं ले जाते? यमुना-दी का चेहरा देखते ही मुझे गुस्सा आने लगता। मैं गुस्सा करता तो वे आँखों में ऑँसू भरकर विलाप करते हए कहीं, “मुझे छोड़कर मत जईयो!”

एक दिन जब यमुना-दी मुझे मनाने आई तो मैंने उसके पेट पर लातें मारी। बाद में अपनी गलती के लिए उनसे माफी भी माँगी। उस रात पूरा अग्रहार सोया पड़ा था तो यमुना-दी मुझे जगाकर अपने साथ मन्दिर ले गई। वहाँ भगवान के सामने दीया जलाकर वे देर तक आँखें बन्द किए बैठी रहीं और भगवान को प्रणाम करके, मुझे लेकर घर लौटीं।

उस दोपहर मैं अकेला खिड़की के पास बैठा था। यमुना-दी पर मुझे बड़ा गुस्सा आ रहा था। पिताजी मुझे घर क्यों नहीं ले जा रहे हैं, यही सोच रहा था। घर की याद करके रोना आ रहा था बाहर लड़कियाँ लँगड़ी टाँग खेल रही थीं। तभी रंगण्णा के साथ शास्त्री गली में आया और हाथ के इशारे से उसने मुझे बाहर बुलाया। मैंने सिर हिलाकर कहा कि मैं नहीं आता। उसने कहा, “आ, जरा घूम आएँ।” मेरी बाहर जाने की इच्छा हुई।

“यमुना-दी से पूछकर आता हूँ,” मैंने कहा। उसने कहा, “यमुना-दी घर में नहीं हैं। तू चला आ।”

मैं भीतर गया तो देखकर आश्चर्य हुआ कि दीदी वहाँ नहीं थीं। मैं बाहर आकर उनके साथ हो लिया। रंगण्णा और शास्त्री के साथ अग्रहार के तीन जवान और थे, जो उस दिन उनके पास ताश खेल रहे थे। तालाब के पास से गुजरते समय मुझे डर लगा कि वे कहीं मुझे फिर से उस उजाड़ अग्रहार की ओर न ले जाएँ। “मैं नहीं जाता,” कहकर मैंने जिद्द की। पर शास्त्री नहीं माना मुझे खींचकर अपने साथ ले गया।

“तेरे पिताजी ने तुझे ले जाने के लिए पत्र लिख दिया है, रे! उससे पहले तुझे एक तमाशा दिखाते हैं।” मेरा हाथ पकड़कर शास्त्री ने मुझसे यह बात बड़े प्यार से कही। मैं डरकर कि

वे कहीं डरपोक कहकर मेरा मज़ाक न उड़ाएँ, मैं उसके साथ चलता रहा। रास्ते-भर सुब्रह्मण्य भगवान को छूकर भ्रष्ट करने, साँप देखने, ब्रह्मराक्षस द्वारा घर के चक्कर काटने की घटनाएँ याद करके डरता रहा। लग्गी जैसे लम्बे रंगण्णा को देखकर मुझे अपने पिताजी से भी ज्यादा डर लगता था। जंगल में बहुत लम्बे रास्ते से चलते हुए हमने उस उजाड़ अग्रहार में एक छोर

से प्रवेश किया। नदी के पानी बहने की आवाज वहाँ सुनाई दे रही थी। शास्त्री धीरे से बोला, “यहाँ से तुम लोग मेरे पीछे-पीछे धीरे-धीरे चले आओ।” वह आगे और हम पीछे चले। एकदम चुपचाप बिना किसी आहट के। थोड़ी देर बाद मैं और शास्त्री उसी छोटी दीवार के पीछे पहुँचे, जहाँ हमने पहले छिपकर देखा था। मैं और शास्त्री उसी दरार में से झाँकने लगे। हमारे साथ के बाकी चारों लड़के लम्बे थे, वे सटकर दीवार पर सिर टिकाकर देखने लगे। साँप की याद आते ही मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। मैंने कहा, “शास्त्री, वह देख, सामने साँप दिखाई दे रहा है।”

हमसे जरा दूर यमुना-दी हमारी और पीठ करके एक चट्टान पर दोनों हवेलियों पर ठुड्डी टिकाए बैठी थीं। मुझे यह सोचकर आश्चर्य हुआ कि वे घर से इतनी दूर आकर यहाँ अकेली क्यों बैठी हैं? इन्हें क्या डर नहीं लगता? क्या इन्हें यह नहीं मालूम कि यहां सांप है? कुछ देर बाद यमुना-दी उठ खड़ी हुई। दीवार पर से झाँकने वाले लड़के झटके से नीचे बैठ गए। यमुना-दी किसी को ढूंढ़ती हुई हमारी तरफ़ ही आने लगीं। मैंने कहना चाहा, ‘यमुना-दी, हम सब यहाँ हैं। छिपकर तुम्हें देख रहे हैं, यहाँ एक साँप भी है।‘ लेकिन मेरा मुँह खुलने से पहले

ही शास्त्री ने उस पर हाथ रख दिया। रंगण्णा ने अपनी नाक पर उँगली रखकर मुझे डराया। मैं चुप हो गया।

अचानक यमुना-दी ठिठकी और उस दीवार की ओर टिकटिकी लगाकर देखने लगीं। शास्त्री साँस रोककर बैठ गया और उसने मेरे मुँह पर एक हाथ रखे रखा। यमुना-दी पल्लू से आँसू पोंछते हुए अंधी की तरह पाव रखते हुए फिर उसी चट्टान पर जा बैठ गई जहाँ पहले बैठी थीं। मैं बैठे-बैठे ऊबने लगा। साहूकार का बेटा रंगण्णा और दूसरे लड़के भी खड़े खड़े थककर नीचे बैठ गए। एक लड़के ने शास्त्री के कान में कहा कि कुछ दिखाई दे तो उन्हें भी बताना। रंगण्णा ने सिगरेट सुलगाई। दूसरी सिगरेट शास्त्री को दी। शास्त्री ने मुझसे कहा, “अब थोड़ी देर में यहाँ ब्रह्मराक्षस आएगा। तू अपनी आँखों से देख लेना।” यह सुनकर मुझे बड़ा डर लगा इसी तरह कुछ समय और बीता। मैं ऊब गया। धीरे-धीरे संध्या होने लगी। मुझे अपने माँ-बाप की याद आने लगी। मैं सोच रहा था कि न जाने कैसे लोगों के हाथ पड़ गया हूँ मैं! मैं सही-सलामत घर पहुँच पाऊँगा भी या नहीं? मैंने शास्त्री से लौटने को कहा। “जाना है तो तू अकेला चला जा। रास्ते में तुझे साँप जरूर मिलेगा। मेरे हाथ में तो गरुड़ का तिल है, यह

तुझे पहले ही पता है।” यह कहकर वह हंसने लगा। मैं चुप हो गया। थोड़ी देर बाद दूर से एक आदमी आता दिखाई दिया। वह पतला और लम्बा था। उसने लॉगदार धोती पहन रखी थी। अंग्रेजी काट के बाल थे। पास आने पर पता चला कि यह वही आदमी है, जो हमने पहली बार यहाँ छिपकर देखा था। साइकिल पर रोज शिवपुर से हमारे गाँव आता है। उस गेहुँए रंग वाले शहरी का नाम मुझे मालूम नहीं था। शास्त्री ने चुटकी बजाकर कहा, “ब्रह्मराक्षस आ गया।” बठे हुए लड़के उठ खड़े हुए और उन्होंने छोटी दीवार पर से झाँकना शुरू किया।

यह यमुना-दी के पास, हमारी ओर पीठ करके बैठ गया। मुझे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। “देख-देख, अच्छी तरह देख,” कहते हुए शास्त्री ने मुझे कोहनी चुभाई। उसने यमना-दी से कुछ कहा। वह एकदम कॉप उठी। उसने उनका हाथ पकड़ा। वे उसके हाथ को झटककर दूर हट गई।

शास्त्री ने सीटी बजाते हुए सिगरेट सुलगाई और भौहें चढ़ाकर मेरी ओर देखा। तभी दरार में से देखते हुए मुझे एक साँप धीरे-धीरे रेंगता हुआ दिखाई दिया। मेरे मुँह से निकला, “सांप!” सबने उस ओर देखा। “पानी का साँप होगा,” कहकर उन्होंने मुझसे चुप रहने को कहा। मैं चीखना चाहता था। रंगण्णा ने एक चपत जमा कर मेरा मुँह बन्द कर दिया। शास्त्री ने कहा, “रोना मत । आगे बड़ा मज़ा आएगा। थोड़ी देर ठहर जा।” मैं चुप हो गया। मैं गाल मलता हुआ चुपचाप बैठा रहा। सॉप बिना किसी आहट के यमुना-दी के बैठने की जगह की ओर जा रहा था। जिस तरफ़ से साँप आ रहा था, उधर उनकी पीठ थी। उन्होंने उस तरफ़ मुड़कर नहीं देखा, साँप बल खाता, शाम की रोशनी चमकाता हुआ, जगह-जगह सूँघता हुआ आगे बढ़ रहा था। शास्त्री ने फिर कहा, पानी का सांप है। डर मत। उसकी तरफ़ मत देख। अपने-आप चला

जाएगा। उन दोनों का मजा देख । साँप बाई ओर मुड़ा। मैंने सोचा कि शायद वह यमुना-दी की ओर नहीं जाएगा। पर वह फिर बाईं ओर मुड़ गया। हमारे साथ आए एक लड़के ने कहा, “इस रांड की वजह से भगवान का अशौच हो गया है। इसीलिए यह साँप यहाँ आया है।” सबने हामी में सिर हिलाया। सुब्रह्मण्य भगवान को अशौच में छूने की बात याद करके मैं काँप उठा। मैंने अपने चारों ओर देखा। रंगण्णा ने कहा, “अगर भगवान ने ही यह साँप भेजा है तो वह उसे ज़रूर काटेगा। यही उसकी सज़ा है।“

साँप कुंडली मारकर बैठ गया और अपना फन फैलाकर चारों ओर देखने लगा। तब सबके मुँह से एकसाथ निकला, “अरे यह तो नाग है।” मैं उठ खड़ा हुआ। शास्त्री ने मुझे खींचकर बिठाया। सांप और चट्टान की ओर रेंगने लगा। वह आदमी यमुना-दी से बातें किए जा रहा था। लेकिन वे अपना चेहरा हाथों में छिपाकर बैठी थीं। उसने उनके पास जाकर उनके कंधे पर हाथ रखा। यमुना-दी ने फिर से हाथ झटक दिया। इस बार वे उठकर खड़ी हो गई। दीवार के ऊपर से झाँकने वाले सब लड़के नीचे बैठ गए। यह देख मेरा मन जरा हलका हुआ कि अब यमुना-दी अपनी ओर आते साँप को देख लेंगी। लेकिन उनकी निगाह उसकी तरफ़

नहीं थी। वे फिर से उसके पास बैठ गई। मुझे इतना डर लगा कि रोना आ गया। सांप उस पत्थर की तरफ़ ही जा रहा था, जिस पर वे बैठे थे। ‘सुब्रह्मण्य’ कहते हुए मैंने आँखें मूंद ली और भगवान से प्रार्थना करने लगा पत्थर के पास पहुँचे साँप ने अपने मुँह से पत्थर को कई बार छू-छूकर देखा। मैं कॉप रहा था। शास्त्री ने मेरा हाथ पकड़कर कहा, “यह उसके अपराध की सज़ा है।” सांप पत्थर के नीचे घुस गया। यमुना-दी और वह, दोनों पाँव लटकाए बैठे थे।

यह सोचते ही कि इस स्थित में साँप उन्हें काट सकता है, मेरे रोंगटे खड़े हो गए। पत्थर के नीचे साँप के लिए शायद काफ़ी जगह नहीं रही होगी। इसलिए वह फिर से बाहर आ गया। बादल से बाहर आए सूर्य के प्रकाश में साँप चमचमा रहा था।

उस आदमी ने फिर से कुछ कहते हुए यमुना-दी के कंधे पर हाथ रखा। मैंने सोचा, इस बार भी यमुना-दी गुस्से से फिर से उसका हाथ झटक देंगी, उनकी निगाह पत्थर को अपने मुँह से छू-छूकर देखते हुए सांप की तरफ़ चली जाएगी। यह अच्छा रहेगा। यह सोचते हुए मैंने एक लम्बी साँस छोड़ी, लेकिन जैसा सोचा था वैसा नहीं हुआ। यमुना-दी उठकर खड़ी नहीं हुई। उससे सटकर रोने लगीं। उसने उन्हें अपनी बाँहों में समेट लिया। वह उसकी गोद में सिर रखकर बैठ गई। मैं अपना हाथ छुड़ाकर आगे की तरफ कूद पड़ा। रंगण्णा और शास्त्री मुझे

पकड़ने के लिए लपके। लेकिन इससे पहले ही मैं उनकी ओर चीखता हुआ भागा, “साँप है, साँप, यमुना-दी।” यमुना-दी उठ खड़ी हुई। वे घबराकर दस कदम पीछे हटीं और दीन स्थिति में खड़ी हो गई। छोटी दीवार के पीछे खड़े सभी लड़के कूद-कूदकर भाग गए। यमुना-दी के साथ का वह आदमी उन्हें देखते ही अपनी धोती सँभालकर विपरीत दिशा की ओर भागा। मैंने भागते हुए वहीं पड़ा एक पत्थर उठाया और अपनी पूरी शक्ति से बड़े पत्थर की ओर जाते साँप की ओर फेंका । डर के मारे मैं पसीना पसीना हो गया था। दौड़ता हुआ मैं यमुना-दी के पास पहुंचा और उनके पेट पर मुँह रखकर उन्हें जोर से कस लिया। बाद में एक और पत्थर उठाकर साँप की ओर फेंका।

साँप सर्र से पत्थर के ऊपर से उतरने लगा अपने लम्बे शरीर को खींचता और लहराता हुआ, बल खाता, फस्-फस् करता हुआ हमारी तरफ़ भागा। यमुना-दी का हाथ पकड़कर उन्हें अपने साथ घसीटता हुआ मैं थोड़ी दूर तक भागा। यमुना-दी थककर रुक गई और वहीं ज़मीन पर धप से बैठ गई। मैं पसीने से भीग गया था। आँखों के सामने अँधेरा छा गया था। मैं यमुना-दी के पास बैठा और थोड़ी देर सुस्ताकर मैंने आँखें खोलकर देखा। साँप हमारे सामने वाली बांबी में अपना सिर घुसा रहा था। धीरे-धीरे उसने अपने पूरे लम्बे शरीर को भीतर खींच लिया। अन्त में केवल उसकी पतली-सी पूँछ ही बाहर रह गई। फिर धीरे-धीरे वह भी अदृश्य हो गई। मैं टिकटिकी लगाकर उधर ही देख रहा था। तब उस निर्जीव उजाड़ अग्रहार में मैं, यमुना-दी और बाँबी के अँधेरे में अदृश्य मार खाया जिन्दा और गुस्से में भरा साँप रह गए थे। मैंने दीदी का हाथ पकड़कर उठाया। उन्हें साथ लेकर पिछवाड़े के दरवाज़े से घर पहुँचा। मेरे पाँव टूट रहे थे। साहसिक काम मेरे द्वारा हुआ है, इस भाव के कारण घर पहुँचने तक मैं नहीं रोया। सारे दरवाजों की चिटकनियाँ चढ़ाकर घर के बीच में आया। वहाँ यमुना-दी फ़र्श पर लोट रही थीं। वे इस तरह कराह रही थीं, जैसे मर रही हों। मैं चुपचाप खड़ा हो गया। सारे दरवाज़े बन्द कर देने से घर में अँधेरा छा गया था। अँधेरे में यमुना-दी दिखाई नहीं दे रही थीं केवल उनके कराहने और तड़पने की आवाज सुनाई दे रही थी। मैं ऐसे ही बहुत देर तक एक कोने में खड़ा रहा।

कराहना बंद करके यमुना-दी ने मुझे अपने पास बुलाया। अँधेरे में टटोलता हुआ मैं उनके पास आया। उन्होंने मुझे अपने हाथों से कस लिया। तब मुझे लगा कि वे पूरी तरह से नग्न हैं। मेरे चेहरे को उन्होंने अपने पेट से सटाते हुए कहा, “हाय-हाय, जल रहा है, जल रहा है।” फिर वे जोर से रो उठीं। उभरे हए कोमल पेट से सटा मेरा चेहरा पसीने से तर हो गया। साँस लेना दूभर होने लगा “अरे मुझे छोड़िए, छोड़िए,” कहते हुए मैंने मुश्किल से अपने को छुड़ाया। यमुना-दी भी चुप हो गई। निश्चल होकर वे चित लेट गई।

मैं कुछ देर तक वैसे ही बैठा रहा। लग रहा था कि मुझे भी गणेश की तरह यहाँ से चले जाना चाहिए था। यमुना-दी मर जाएँ तो अच्छा है। तब मैं अपने घर जा सकता हूँ। लेकिन तभी यह भी डर लगा कि कहीं मर ही न गई हों। “यमुना-दी, यमुना-दी!” मैंने ज़ोर से आवाज़ दी। उत्तर नहीं मिला। डरकर मैंने कहा, “यमुना-दी दी, मुझे भूख लगी है।” कहकर मैं रोने लगा। यमुना-दी उठीं और साड़ी पहनकर रसोई में चली गई। मेरे लिए ठाछ में सत्तू घोलकर दिया। मैंने पूछा, “आप नहीं लोगी?” “तू खा ले” कहकर वे अंधेरे में बैठ गई। अंधेरे में सत्तू खाते-खाते मुझे रोना आ गया। “रोते नहीं,” कहते हुए उन्होंने मुझे प्यार किया।

अचानक आँखें खुली तो देखा कि में बिस्तर पर अकेला हूँ। ऊपर चद्दर ओढ़ाई गई थी। हाथ से टटोलकर देखा कि यमुना-दी पास नहीं हैं। मैं डर के मारे उठ बैठा और मैंने यमुना-दी को जोर से आवाज दी। पिछवाड़े जाकर देखा वे वहाँ भी नहीं थीं। कुएँ की जगत के पास खड़ा होकर में रोने लगा। यह सोचकर गुस्सा भी आया कि मुझे बिस्तर पर सुलाकर यमुना-दी कहाँ चल गई है । दूर एक घर के ओसारे में लालटेन के चारों ओर बैठे कुछ लोग बातें कर रहे थे। यह समझ में नहीं आ रहा या कि इस समय क्या बजा होगा? आधी रात है, सुबह हो रही है या शाम के बाद अभी रात शुरू होने वाली है-कुछ पता नहीं चल रहा था। मैंने आकाश की ओर देखा। वहाँ केवल नक्षत्र चमकते हुए दिखाई दे रहे थे। पूजा-पाठ किए बहुत दिन हो गए थे। इसलिए मुझे तिथि, वार, आदि का कोई बोध नहीं रहा था। अमावस्या की रात हो सकती है, यह सोचकर डर तगा। ब्रह्म-राक्षस की याद हो आई। यह गन्दी यमुना-दी कहाँ चली गई, कहते हुए मेने उन्हें शाप दिया। “मुझे छोड़कर चली गई,” यह कहता और रोता हुआ मैं कुएँ की जगत से पीठ लगाकर खड़ा हो गया। पिछवाड़े दूर से किसी के ‘माँ जी’ कहकर पुकारने का स्वर सुनाई दिया। मैं चौक पड़ा। ऐसा लगा कि कोई ‘माँ जी-माँ जी’ कहकर जोर

से आवाज़ दे रहा है।

मैंने पूछा, “कौन है?” तभी बाड़ के पास से आवाज आई “मैं हूँ, महाराज, कटीर। क्या आज मेरे लिए भिक्षा नहीं?”

मैंने कहा, “अरे कबीर, यहाँ आ रे।”

उसने कहा, “मैं वहाँ नहीं आ सकता।”

मैंने ही उसके पास जाकर कहा, “माँ जी घर में नहीं हैं। तू मेरे साथ चल।”

मैंने सोचा कि यमुना-दी नदी के पास वाले उसी उजाड़ अग्रहार में गई होगी। वे सब

फिर वहाँ आएंगे।

कटीर मेरे आगे-आगे चला। जंगल में चुपचाप चलते हुए मुझे डर लग रहा था, इसलिए मैंने कटीर से बातें करना शुरू किया और सारे दिन में जो-जो कुछ घटित हुआ था, उसे जोर-जोर से बोलकर बताया। लेकिन ऐसा नहीं लगा कि उसे मेरी बात समझ में आ रही है। वह चुपचाप आगे चल रहा था। हम तालाब के पास पहुँचे। वहाँ उसी की जाति के कछ चमार मशाल की रोशनी में मछलियाँ पकड़ रहे थे। उनसे एक मशाल मांग कर उसने कहा, “इधर भीतर से भी एक रास्ता है। आइए।”

घनी और छोटी-छोटी कँटीली झाड़ियों के बीच वाले रास्ते से बह मुझे ले चला। कुछ दूर चलने के बाद मुझे और डर लगने लगा। कटीर अपने-आप गाने लगा। वह काफ़ी आगे चल रहा था इसलिए मुझे रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। कई जगह तो हमें पेट के बल रेंगना पड़ा। कटीर एकदम झुककर चलते समय हुष-हुष कहता जा रहा था। तभी सर-सर की आवाज़ हुई, वैसी ही जैसे किसी सरकने वाली चीज़ के भागने की होती है।

“वापस चलो, कटीर,” कहते हुए मैंने रोना शुरू कर दिया। उसने कहा, “अब पहुँच ही गए हैं।” रास्ता कुछ समतल था मैंने कहा, “कटीर, मेरा हाथ पकड़ लो।” “यह कैसे हो सकता है, महाराज? मैं चमार हूँ,” यह कहकर वह और दूर सरक गया और मशाल पीछे की ओर करके खड़ा हो गया। मात्र कौपीन धारण किए, उसके काले लम्बे नग्न शरीर को देखकर मुझे और डर लगा। बिखरे बालों वाले उस विकट व्यक्ति में मुझे चैले वाले भूत का रूप नज़र आने लगा।

मैंने पूछा, “कटीर, तुम कटीर ही हो न?”

“जी हाँ महाराज,” उसने कहा।

मैंने दौड़कर उसे छूने का यत्न किया। वह मशाल जमीन पर फेंककर भाग निकला। मैंने मशाल उठाई और रोने लगा। उसने लौटकर कहा, “आप आगे-आगे चलिए।” तब मुझे ऐसा लगा कि मैं मशाल के प्रकाश के छोटे-से वृत्त के बीच में खड़ा हूँ और मुझे जंगल में चारों तरफ़ ऐसे विचित्र प्रकार के प्राणी और भूताकार छायाएँ अपने हाथ फैलाकर अपनी ओर

बुला रहे हैं। ऐसा भी लगा कि जहाँ पॉव रखता हूँ, वहाँ साँप है। मैं मृत्युंजय मन्त्र का जप करता हुआ आगे चला। अचानक सारा भय जाता रहा। घने अँधेरे को पार करने के बाद जरा प्रकाश दिखाई दिया। पेड़-पौधे भी नज़र आने लगे तब लगा कि मुझे डरना नहीं चाहिए। यमुना-दी को बचाने का भार मेरे ऊपर है। मैं लड़की नहीं हूँ। उपनयन-संस्कार में गायत्री मन्त्र का पाठ मुझे कराया जा चुका है। अब मैं बड़ा हो गया हूँ। मुझमें धैर्य लौट आया। कटीर अपने-आप गाता हुआ मेरे पीछे आ रहा था।

बाँबी के पास आकर देखा तो वहाँ अकेली यमुना-दी बाँबी के भीतर हाथ रखे बैठी थीं। यह दृश्य देखकर भी मुझे भय नहीं हुआ। लगा कि यमुना-दी मर गई हैं। अब क्या करें? दूसरे ही क्षण सारा शरीर कांप उठा। मैंने कहा, “कटीर, यमुना-दी को जगा।” वह अपनी जगह से हिला नहीं। मुझे याद आया कि इस बाँबी में चोट खाया साँप है और माँ के कहे अनुसार साँप बारह वर्ष बीत जाने पर भी दुश्मन को नहीं भूलता। मैं एकदम घबरा उठा। चारों ओर मशाल घुमाई और फिर अपने पाँव की ओर देखा। एक लम्बी लकड़ी यमुना-दी को चुभोई। वे उठकर खड़ी हो गई और कहने लगीं, “तू यहाँ से चला जा।” मैंने कहा, “मैं नहीं जाऊँगा। आप मेरे साथ चलिए।” वे बिना कुछ कहे हमारे साथ चल पड़ी। कटीर कुछ भी नहीं बोला। अग्रहार तक साथ आकर और हमें घर पहुँचाकर वह गीत गुनगुनाता हुआ चला गया।

यमुना-दी कुछ देर तक कुछ नहीं बोलीं । चुपचाप बैठी रहीं। फिर मुझको कोसने लगीं, “मरने क्यों नहीं दिया रे?” मैं चुपचाप बैठा रहा। थोड़ी देर बाद मैंने कहा, “मुझे नींद आ रही है।  लिए, सोएँ।” उन्होंने कहा, “कहीं जाना है मुझे। तू मेरे साथ चल।” सुनकर मुझे गुस्सा आया। में रोने लगा। उन्होंने फिर से कहा, “तू मेरे साथ चल।” मैंने कहा, “मैं नहीं चलता, मुझे मेरी माँ के पास भेज दो।” उन्होंने फिर से कहा, “जहाँ चलना है, वह जगह उतनी दूर नहीं। मेरे साथ चल।” मैनें कहा, “मेरे पाँव में दर्द हो रहा है। कुछ कीजिए।” उन्होंने मुझे गले से लगाया और फिर नारियल का तेल लगाकर मेरे पाँचों को मला। “अब तू सो जा,” यह कहकर

वे उठ खड़ी हुई और अकेली चलने को हुई। मुझे वहाँ अकेले रहने में डर लगा। मैं भी उनके साथ हो लिया। घने अँधेरे में सारा अग्रहार भांय भायं कर रहा था। नाम को भी कोई आदमी

नहीं दिखाई दे रहा था। रास्ते में हम दो ही चले जा रहे थे। पास के गन्ने के खेत से गीदड़ के बोलने की आवाज सुनाई दी। मैं काँप उठा। यमुना-दी ने मेरा हाथ जोर से पकड़ लिया।

“अगर उस उजाड़ अग्रहार जा रही हो तो मैं नहीं आता,” कहकर मैं फिर रोने लगा तो उन्होंने कहा, “अपनी कसम, वहाँ नहीं जाना है।” मेरे पूछने पर कि फिर कहाँ जाना है, वे बोली, “वहाँ एक का घर है। किसी से यह नहीं कहना कि हम वहाँ गए थे। कल मेरे पिताजी भी आकर पूछे तो भी कह देना, मुझे कुछ मालूम नहीं और फिर चुप हो जाना।”

मैंने हामी भर दी। हम दोनों बहुत दूर तक बैलगाड़ी वाले रास्ते पर चलते रहे। बाद में एक पगडंडी पकड़कर एक टीले से उतरे। खेतों के साथ-साथ काफ़ी दूर चलने के बाद अंत में एक घर में पहुंचे उस घर में दीया जल रहा था। रोज़ साइकिल पर आने वाला स्कूल-मास्टर वहीं

था। मैं यह सोचकर डरा कि वह फिर से यमुना-दी के कंधे पर हाथ रखेगा। उसने यमुना-दी को देखकर गुस्से से पूछा, “इतनी देर क्यों हो गई? मैं कितनी देर तक तुम्हारा इंतज़ार करता रहा हूँ। अँधेरा होते ही आने को नहीं कहा था?” यमुना-दी कुछ नहीं बोली। उस आदमी ने किसी को आवाज लगाई और यमुना-दी को साथ लेकर भीतर चला गया। मैं बाहर बैठ गया।

वह घर ब्राह्मणों के घर जैसा नहीं लग रहा था। इसलिए मुझे असहनीय लगा । इस तरह के घर में मैं पहली बार आया था। स्नान के बाद में शूद्रों के लड़कों से बात तक नहीं करता था। मुझे वहाँ बैठे रहने में एक प्रकार की घबराहट हुई। ऑगन में मुर्गियों का दबडा था । घर के बाहर स्नान का हंडा रखा था । ओसारे में आकर परबू पिच्च यूक गया जूड़ा । जुदा बांधे, धोती पहने और दुपट्टा ओढ़े बैठे मुझे यह सोचकर बड़ा दुख हो रहा था कि यहाँ कहाँ आ गया । यमुना-जी की वजह से यह सब कुछ हो रहा है। सोचने लगा कि पिताजी को आने

दो। सब मिलकर सबक सिखाएंगे। किसी ने आँगन में आकर प्रभु को आवाज दी । बाद में ओसारे के पास आकर उसी ने कहा, “अरे यह क्या! भट्ट के यहां कैसे?”

बाद में दीया लेकर बाहर आए प्रभु को मैंने पहचान लिया। उस छोटी दीवार की दरार में से मैंने पहली बार उसी को देखा था वह बड़ी-बड़ी मूँछों वाला लंबा-चौड़ा आदमी था। उसने सिर्फ एक चड्डी पहन रखी थी। गरदन के चारों और कुछ बांध रखा था। प्रभु ने आंगन में रखे एक बड़े मटके से कोई खट्टी बदबू वाली चीज उँडेलकर उस आदमी को दी। भीतर से एक स्त्री ने एक पत्ते पर कोई दुर्गंध वाली चीज लाकर दी। कुडमल्लिगे से आगे वाले बाजार में कन्नड़ प्रदेश से आने वाली गाड़ियों में ऐसी बदबूदार चीजें आया करती थीं । वह मछली की बदबू थी। मुझे यह बदबू बड़ी असह्य लगी। वह आँगन में ही वैठकर खाने-पीने लगा। फिर गाता हुआ आगन में झूमने लगा। तब मुझे पता लगा कि परबू ने जो चीज़ उँडेलकर दी थी, वह शराब थी। आँगन में बैठकर पीने वाला यह आदमी कहीं मेरे ऊपर न गिर जाए, यह सोचकर मुझे डर लगा। “भट्ट जी, पूजा वाले भट्ट जी…ही-ही-ही!” कहते हुए वह हँस पड़ा। मैं उठकर खड़ा हो गया और भीतर की तरफ भागा।

वहाँ यमुना-दी नंगी लेटी हुई थीं। केवल पेशाब करने की जगह ढैँकी थी । पेट पर गोबर रखकर उस पर दीया जलाकर रखा हुआ था । मैं उन्हें देखता हुआ काफ़ी देर खड़ा रहा। तभी परवू ने उस पर धीरे से एक परात ढँककर कहा, “ऐसे ही छोड़ दीजिए, ताकि खींच ले।” यमुना-दी के चारों ओर पर, एक स्त्री और वह आदमी बैठा था । दोनों हाथों को चटाई पर फैलाकर, आँखें बंद करके लेटी हुई यमुना-दी को देखकर मुझे लगा। उनके शरीर पर कपड़ा न देखकर मैंने अपनी चादर उनके शरीर पर फैला दी। प्रभु ने मेरी ओर देखा।। मैंने रोते हुए कहा, “यमुना-दी दी, चलिए, घर चलें मुझे नींद आ रही है ।.. मुझे डर लग रहा है…चलिए।” लेकिन यमुना-दी ने आँखें नहीं खोलीं। वह ‘आदमी’ मुझे खींचकर एक तरफ़ ले गया। उस औरत ने पीक भरे मुँह से परबू से कोंकणी भाषा में कुछ कहा और फिर जाकर पीक थूक आई। उसके माथे पर कुमकुम नहीं था। लेकिन सिर पर घने बाल बिखरे थे। परबू उस ‘आदमी’ को बाहर ले गया। मैं भी बाहर आ गया। परबू कह रहा था, “मैं सब सँभाले लेता हूँ। अब आप जाइए।” उस ‘आदमी’ ने जेब से पैसे निकालकर उसे देते हुए उसके कान में धीरे से

कहा, “मुझे अभी साइकिल से कुडुमल्लिगे चले जाना है। वहाँ से आगे बस पकड़कर चला जाऊँगा। उसके मुँह से कुडुमल्लिगे शब्द निकलते ही मुझमें अपने घर जाने की इच्छा बलवती हुई और मुझे रोना आ गया। बाद में जब वह ‘आदमी’ साइकिल लेकर चल पड़ा, तो उसने परबू के कान में कहा, “यह सब बातें तुम तक ही रहें।”

“मैं भी चलूँ तुम्हारे साथ?” मैंने उससे कहा लेकिन मेरी बात की ओर ज़रा भी ध्यान न दिया और वहाँ से चला गया। आंगन में बैठकर पीने वाला आदमी फिर से हँसने और गाने लगा। भीतर यमुना-दी कराह रही थीं। “ओह हो भट्ट जी,” कहते हुए वह चीखने लगा। परबू

ने उसे डाँटा । मुझे रोते देखकर मुझसे चुप रहने को कहा। भीतर कराहती यमुना-दी

से मैंने बाहर से ही चीखकर कहा, “यमुना-दी, मैं जाना चाहता हूँ।” परवू ने मुझे धमकाया। तभी आगन में और एक स्वर सुनाई दिया। वह स्वर कटीर का था । वह स्वर सुनकर मेरी जान में जान आई। मैंने जोर से आवाज़ लगाई, “कटीर! परबू ने हाथ उठाकर मुझे इस तरह धमकाया, जैसे मारेगा। मैं चुपचाप बैठ गया। कुछ देर बार कटीर ने अपने-आप गाना और बकना शुरू कर दिया। मैंने आवाज़ दी, “ए कटीर!” कटीर उठकर मेरे पास आया और कहने लगा, “ज़रा थोड़ी और डालिए!” तब मैंने कहा, “ए कटीर, मैं हूँ।” यह सुनकर उसने कहा, “कौन?” फिर लड़खड़ाता हुआ बाहर चला गया। कटीर ने भी ऐसा किया, यह सोचकर मुझे और व्यथा हुई। कई बार बताने पर भी वह मुझे पहचान नहीं सका। तभी भीतर से यमुना-दी की ‘हाय-हाय’ सुनाई दी। मैं बाहर से चीखा, “यमुना-दी…यमुना-दी, मैं यहीं हूँ। आओ चलें।” फिर रोने लगा। परबू बाहर आया और बोला, “सो जा यहीं, सुबह चले जाना।” फिर उसने कटोरा लाकर मेरे सामने रखते हुए कहा, “ले, पी ले।” मैंने कहा, “नहीं।” “यह शराब नहीं, दूध है,” कहते हुए वह हँस पड़ा। मुझे विश्वास नहीं हुआ। मैं रोता हुआ वहीं बैठा रहा।

जब मेरी नींद खुली तो सुबह हो गई थी। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या समय है, सुबह हुए कितनी देर हो गई है, मैं कहाँ हूँ, यहाँ कैसे आ गया घटनाओं के क्रम को याद करने का प्रयास किया। एक दिन जनेऊ के बाद कुडुमल्लिगे से एक बैलगाड़ी में माँ सुबह के समय उडुप जी के घर मंत्र-जाप सीखने के लिए छोड़ने आई थी। अपना घर छोड़कर गाड़ी में बैठकर मैं यहाँ आ गया था। यह सोचकर मुझे रोना आने लगा। जहाँ देखो वहाँ मुर्गे-मुर्गियाँ, शराब की खट्टी बदबू आ रही थी। आँखें मलता हुआ ओसारे में ही मेरी उमर का एक लड़का बैठा था। उसके बाल अंग्रेजी काट के थे। उसने एक गन्दी-सी कमीज़ और चड्डी पहन रखी थी। मुझे चादर ओढ़े और जूड़ा बांध बैठा देखकर उसने मजाक किया, “वाह री चोटी, वाह री धोती!” मेरी समझ में नहीं आया कि क्या करूँ! सिर नीचा करके बैठ गया। पिछली रात जिस स्त्री को मैंने देखा था उसने उस लड़के से कोंकणी भाषा में कुछ कहा। वह लड़का आँगन में उतरकर एक मुर्गी को पकड़ने भागा। मुर्गी कोंक कुकू करती हुई इधर-उधर भागने लगे पंख फड़फड़ाती हुई वह इधर-उधर बच रही थी। अन्त में उसने उसे पकड़ ही लिया और उसे भीतर ले गया। कुछ देर बाद बड़े जोरों से पंख फड़फड़ाने की आवाज़ आई, जैसे उसे मारा जा रहा हो। निस्तब्धता छा गई। मैं बुरी तरह से काँप उठा। मेंने एक बार ज़ोर से पुकारा, “यमुना-दी, यमुना-दी, अब घर चलो।” फिर वहीं चुपचाप बैठ गया।

तभी यमुना-दी दीवार पकड़कर टटोलती हुई बाहर आई। उनका मुँह निस्तेज पड़ गया था। मैं जाकर उनसे लिपट गया। वे रोने लगीं परबू ने उनसे कहा, “और थोड़ा देर ठहर जाओ। ज़रा सुस्ताकर जाना।” लेकिन यमुना-दी ने मेरा हाथ थाम लिया और कहा, “आओ, चलें।” ठीक उसी समय वहाँ लम्बा-सा चोगा पहने एक दाढ़ी वाला आदमी आया। उससे परबू ने कोंकणी में कुछ कहा और उसे भीतर ले गया। हम दोनों धीरे से आँगन में उतरे। वह आदमी भीतर से पत्तों में एक लाल-लाल लोथड़ा-सा बाँधकर बाहर आया। पत्तों से बाहर तक दिखाई देनेवाले लाल लोथड़े को देखकर मुझे और यमुना-दी को उबकाई-सी आने लगी। दोनों ने मुँह फेर लिया। बाहर आकर वह यमुना-दी के पास आया और उनसे ठहरने के लिए कहा। फिर धीरे-धीरे साफ़ स्वर में कहने लगा, “भगवान पापियों की रक्षा करता है। आपको तो डरना नहीं चाहिए।” यमुना-दी डर के मारे कांपने लगीं। वह हमारे और क़रीब आ गया और कहने लगा “डरिए नहीं। आपके अग्रहार के लोग आपको बाहर निकाल देंगे। लेकिन आप हमारे दाता पर विश्वास करें वह आपकी रक्षा करेगा। मेरे साथ गिरजाघर चलिए। वहाँ हम आपकी रक्षा करेंगे।”

कहीं यमुना-दी उसके साथ न चल पड़े, यह सोचकर मैं परेशान हो उठा। परन्तु यमुना-दी ने उस दाढ़ी वाले की तरफ़ भयभीत दृष्टि से देखा। फिर सिर का पूरा पल्लू खींचकर, बिना कुछ कहे वे मेरे साथ चलने लगीं।

उसने फिर कहा, “आपके पत्थर के देवता के पास पत्थर का दिल है। लेकिन हमारे भगवान ईसा मसीह अपने पर विश्वास करने वालों की रक्षा करता है। मेरी बात मानकर गिरजाघर चलिए।” यमुना-दी और मैं तेजी से चल पड़े। परबू और वह व्यक्ति कोंकणी में बातें कर

रहे थे, जो दूर तक सुनाई दे रही थीं। मुझे इस बात की खुशी थी कि मैं फिर से घर जा रहा हूँ। मेरा उत्साह बढ़ गया। यमुना-दी हॉफती-कराहती चल रही थीं। उनकी मैली लाल धोती पर खून दिखाई दिया तो में फिर घबराया। मैंने कहा, “यमुना-दी, आपकी साड़ी पर पीछे खून

लगा है।” वे वहीं ढह गई। में भी उनके साथ बैठ गया। मैंने उन्हें आगे बढ़कर पकड़ लिया। उन्होंने अपनी बन्द आँखें खोलीं। मैंने कहा, “उठिए, घर चलें।” उन्होंने एक लम्बी सांस ली और कहा, “मुझसे नहीं होगा, भैया! तू अकेला चला जा” मैंने उनका हाथ पकड़कर कहा, “उठिए,” मैंने जिद की। उन्होंने कहा, “मुझे प्यास लग रही है। मुझसे नहीं होगा। तू चला जा।”

मैंने कहा, “आपके बिना मैं नहीं जाऊँगा।” उन्होंने पूछा, “घर अब कितना दूर है?” तभी मुझे दूर से अग्रहार के ब्राह्मणों के साथ शास्त्री और रंगण्णा आते हए दिखाई दिए। मैंने रोते हुए कहा, “यमुना-दी, वे सब आ रहे हैं। जल्दी से उठो। आपको मैं अपने घर ले जाऊँगा, यमुना-दी।” लेकिन वे नहीं उठीं। धीरे-से साँस लेकर बोली, आने दो उन्हें, मैं उठकर नहीं चल सकती। जो चाहे आकर देख ले। मैं यहीं…।” मैंने यमुना-दी के शरीर को हिलाया और जिद करते हुए कहने लगा, “आपको चलना ही पड़ेगा।” उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ फेरा। वे सब आकर हमें घेरकर खड़े हो गए। शास्त्री ने मुझे अलग खींचा। मैंने उसे मारा। उसके हाथ पर जोर से काट खाया। रोते हुए यमुना-दी को आवाज दी। उनकी तरफ़ उन्होंने नहीं देखा। पता नहीं, उनका ध्यान किस ओर था। उनकी आँखों में आँसू भर आए थे और वे उनके गालों पर लढकने लगे थे।

पिताजी आए और मुझे घर ले गए। मुझे बड़ी खुशी हुई। घर पहुँचने पर मुझे दूसरा जनेऊ पहनाया गया और पंचगव्य से शुद्ध किया गया। माँ के पूछने पर मैंने उन्हें सबकुछ बता दिया। माँ के मुँह से निकला, “सत्यानाशी रंडी गर्भिणी ही क्यों हुई?” मुझे यह सोचकर आश्चर्य हुआ कि माँ गर्भिणी हो सकती है, लेकिन यमना-दी के गर्भिणी होने पर इतना बखेड़ा क्यों? कुछ दिनों में खबर आई कि उडुप जी ने यमुना-दी के जीवित रहते हुए भी उनका श्राद्ध कर दिया है और उसे जाति से बाहर कर दिया है। पिताजी और माँ उडुप जी की प्रशंसा करते हुए कहने लगे, “उडुप जी कितने अच्छे हैं। फिर यमुना-दी को कोसते हुए कहा, “नीति भ्रष्ट लड़की!” कुछ दिनों बाद हमारे घर उडुप जी के विवाह के अक्षत आए। पिताजी से सुना कि बूढ़े उडुप जी ने एक छोटी उम्र की लड़की के साथ वेदी पर बैठकर कैसे आरती उतरवाई, यह सुनकर मेरे मुँह से निकला, “छी-छी!” पिताजी बोले, “ऐसा कहता है रे!” माँ बोली, “जब वह नीतिभ्रष्ट हो गई है तो क्या? उडुप जी को अपना घर चलाने, रोटी पकाने के लिए कोई तो चाहिए। कुछ भी हो, ज़माना बहुत बिगड़ गया है।”

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