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  ज़िंदगी का मज़ा माइक्रो में है

देवेश पथ सारिया आजकल ताइवान के एक विश्वविद्यालय में शोध कर रहे हैं। उनकी कविताएँ हम पढ़ते रहे हैं। यह उन्होंने ताइवान से वहाँ के जीवन को लेकर डायरीनुमा लिखकर भेजा है। आप भी पढ़ सकते हैं-

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साल 2020 का फरवरी महीना शुरू हुआ है। कुछ दिन पहले ही चीनी नववर्ष की सालाना छुट्टियां ख़त्म हुईं हैं। 2015 में ताइवान आया था।  तब यूनिवर्सिटी के पास ही मेरे प्रोफ़ेसर ने अपने पीएचडी स्टूडेंट की मदद से मेरे ताइवान पहुँचने से पहले ही मेरे लिए किराये का कमरा ढूंढ दिया था। यूनिवर्सिटी के मेन गेट के सामने वाली सड़क ग्वांगफू रोड कहलाती है। इसी से अंग्रेजी के ‘टी’ आकृति बनाती एक सड़क निकलती थी, जो कुछ दूरी के बाद दूसरी सड़क से जा मिलती थी जिसे ज्यांगोंग रोड कहते थे। सड़कों के इस जंक्शन पर बादामी रंग की ऊंची इमारतों का जाल था । इन्हीं इमारतों में से ग्यारहवें माले पर आने के बाद शुरू के ग्यारह महीने एक फ्लैट में मैं रहता था । महानगर में आप एक बड़े से जाल के एक तंतु में फंसी मकड़ी की तरह रहते हैं।

तब मैं नया-नया ही पीएचडी करके आया था और पीएचडी की एक आदत अब भी मेरे साथ थी। रात भर जगना और दिन में एक-दो बजे तक सोना। शोध का जो भी काम होता था, दोपहर बाद और रात में करता था। नया आया था तो यहां के माहौल में ढल रहा था। हमारी यूनिवर्सिटी में भारतीय विद्यार्थी भी कुछ संख्या में थे । ‌इनमें स जितने नये आये  थे, अभी हर बात में “अगर भारत होता तो…” कहकर परिस्थितियों, घटनाओं और क़ीमतों की तुलना भारत से करते थे । हर वस्तु का दाम ताइवान डॉलर से भारतीय रूपये में बदलकर देखते और वापस रख देते।  सब घर से कैलकुलेट करके निकले थे कि हर महीने कितने पैसे बचा लेंगे और यहां आकर लग रहा था कि घर से पैसे ना मंगाने पड़ जायें। एक आलू भी सोलह रूपये का मिलता था। मेरे उस पुराने कमरे से बाज़ार पास था। शहर के दोनों मुख्य सुपरमार्केट भी पास में ही थे। सब्जियों की एक मॉर्निंग मार्केट तो एकदम निकट थी, कमरे से लगभग 200 मीटर दूर। पर मैं तो आलसी और लेटलतीफ़ था। मैं जब तक उठता, सब्जी बेचने वाले सारे दुकानदार जा चुके होते। फ़िर ग्यारह महीने बाद मैंने वहां से कमरा छोड़कर यूनिवर्सिटी के साउथ गेट की तरफ कमरा ले लिया। उस कमरे को छोड़ने के कारणों पर कभी और विस्तार से लिखूंगा। नया कमरा जहां लिया, वह शहर का बाज़ार से दूर वाला हिस्सा था। मैंने अपनी मम्मी को फोन पर इस बारे में बताया तो उन्हें और आसानी से समझाने के लिए मैंने कहा, “ऐसा समझ लीजिए कि पहले मैं अपने राजगढ़ कस्बे के बस स्टैंड के पास वाली पॉश कॉलोनी में रहता था । अब मैं राजगढ़ के पिछले हिस्से की तरफ मांदरीन मोहल्ला में जा रहा हूं।” जब मैंने उन्हें बताया कि इस कमरे का किराया पहले जितना ही है तो उन्होंने कहा “बताओ, मांदरीन में रहबे के भी इतने पइसा।” अब उन्हें कैसे समझाता कि वह मांदरीन की तरह सुविधारहित मोहल्ला नहीं था। बस, मुख्य शहर और बाज़ार से यह दूसरी तरफ था। यह कमरा यूनिवर्सिटी के पास उतना ही था जितना पुराना कमरा था, पर अब आने का रास्ता ज़्यादा चढ़ाई भरा था।  अब सड़क किनारे लगे वृक्षों या अधिक जंगली से दिखने वाले  रास्तों से गुजरने के विकल्प थे। इस मोहल्ले में शहर के साइंस पार्क में काम करने वाले धनाढ्य परिवार रहते थे। आर्थिक दृष्टिकोण से यह हमारे राजगढ़ का मांदरीन मोहल्ला बिल्कुल नहीं था। यह बात मम्मी को बाद में समझ आ गयी जब वे ख़ुद ताइवान घूमने आईं ।

यह नया कमरा बड़ा था।  इसमें वे सब समस्याएँ भी नहीं थीं जो इससे पहले वाले कमरे में मुझे होती आईं थीं। 2016 के अगस्त से मैं यहीं रहता रहा । अब भी जबकि साल 2020 का पहला महीना गुज़र चुका है, यहीं रहता हूं। इसी कमरे पर आकर मैंने ताइवान के बदलते मौसम और तदनुसार आने वाले पत्तों और फूलों को ठीक से याद रखना शुरू किया।

बाओ शान रोड स्थित अपने नये कमरे से मैं सब्ज़ी और बाक़ी ग्रोसरी का सामान लेने मार्ट जाता था। एक सुपर मार्केट जहां एक ही छत  के नीचे सब कुछ मिलता था। आलसी व्यक्ति किसी काम को ना करने के सौ बहाने ढूंढ लेता है।  खाना, काम करना और सो जाना, इस नियमित दिनचर्या का ही परिणाम था कि  मेरा बीएमआई पैंतीस पार कर गया था।  बीएमआई वज़न का एक ऐसा पैमाना है जो लम्बाई और वज़न दोनों को लेकर बनाया गया है। बीएमआई का सीधा और आसान सूत्र है किलोग्राम में वज़न लेकर उसमें मीटर में अपनी ऊंचाई के वर्ग (स्क्वायर) से भाग दे दें।  इसका  18 से 25 के बीच होना सामान्य की श्रेणी में आता है ।  25 से ऊपर बीएमआई का व्यक्ति ओवरवेट और 30 से ऊपर का ओबीज़ माना जाता है । मेरा बीएमआई 35 से ऊपर जा चुका था। बढ़ा हुआ वज़न कई बीमारियां लेकर आता है जो आप एक समय तक नज़रअंदाज़ कर सकते हैं।  इस बढे हुए वज़न ने अपने असर का पैग़ाम एक दिन अचानक दिया जब सुबह की चाय के बाद कमजोरी सी लगने पर मैंने उसे लो ब्लड प्रेशर समझ लिया और उसके बाद दो गिलास नमकीन शिकंजी पी डाली। कुछ मिनट में पेट से कुछ तरंगे सी ऊपर को उठने लगीं।  मैंने सोचा कि  ब्लड प्रेशर कुछ बढ़ गया है।  दो-तीन घंटे तड़पने के बाद उबेर से टैक्सी बुक कर मैं हॉस्पिटल पहुंचा। डॉक्टर को मैंने वही बताया जो मुझे लग रहा था कि शायद ब्लड प्रेशर बढ़ गया है । जांच करने पर पाया कि ब्लड प्रेशर बहुत ज़्यादा नहीं, पर कुछ ज़्यादा था। डॉक्टर ने उसी के लिए दवा दी । अब सावधानी बरतते हुए खाना-पीना मैंने कम कर दिया। लगभग पंद्रह दिन बाद मुझे ताइवान से भारत जाना था।  दीपावली पर भारत आने के लिए पहले से फ्लाइट बुक करा राखी थी। भारत से पिछली छुट्टियां बिताकर ताइवान आये हुए मुझे आठ महीने हो गए थे।  वैसे भी दीपावली मेरा प्रिय त्यौहार रहा है, सो भारत चला आया।  भारत में भी दवाइयां लेने के बाद भी बेचैनी सी रहती थी।  ऐसा लगता था कि कुछ और समस्या है, कोई और रोग जिसके लक्षण कुछ पकड़ में नहीं आ रहे थे, ना ही कम हो रहे थे ‌। भारत में ही कुछ दिन बाद यह पता चला कि दरअसल मुझे पाचन तंत्र की बीमारी है। जयपुर के फोर्टिस अस्पताल में एंडोस्कोपी कराने से पता चला कि  मुझे एसिड रिफलक्स डिजीज है। इस बीमारी में पेट का अम्ल ऊपर एसोफैगस में चढ़ जाता है।  यह कभी-कभी श्वसन तंत्र को भी प्रभावित कर देता है। मेरे मामले में भी यह हो रहा था पर उस समय फोर्टिस में माइल्ड अस्थमा का भी अंदेशा प्रकट किया गया। दरअसल अस्थमा के स्पिरोमेट्री टैस्ट में आपकी फूँक मारने की क्षमता से लंग्स की कार्यक्षमता जांची जाती है। मैंने यह टैस्ट एंडोस्कोपी के बाद कराया और चूंकि एंडोस्कोपी के दौरान गले को सुन्न किया गया था, इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि मैं फूँक उतनी क्षमता से नहीं मार पाया और रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टर ने माइल्ड अस्थमा भी बताया। जो भी हो सांस लेने में तकलीफ़ हो रही थी।  उस पर दीपावली के दौरान पटाखों से हुआ भारत का प्रदूषण। हमारे पड़ोस के लोग चूल्हा जलाते थे। यहां तक कि हमारे कस्बे के कुछ सफाईकर्मी  कूड़े का निस्तारण करने की जगह उसे जला देते थे। उस धुंए से जो मेरी हालत होती थी, मैं जानता हूँ या मेरा ईश्वर। कितनी योजनाएं बनाई थीं मैंने भारत की यात्रा के लिए। बहुत से फोटो लेना चाहता था अपने नए कैमरे से। महाराज भर्तृहरि की तपोस्थली जाना चाहता था, जो हमारे तहसील से अधिक दूर नहीं है। पर यहां एक-एक सांस के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। यही कारण है कि अब मैं उन सब बीमारों का हाल कुछ बेहतर समझ सकता हूँ जो पेट या सांस की किसी भी बीमारी से जूझ रहे हैं।

भारत से ताइवान वापस आ जाना एक राहत की बात थी।  यहां धुंआ और प्रदूषण कम था।  यहां आकर भारत से लायी दवाइयां समाप्त हो जाने के बाद डॉक्टरों को दिखाना पड़ा।   यहां मेरा हेल्थ इंशोरेंस भी था जिस वजह से दवाइयों के पैसे नहीं लगने थे। यहां के सांस के डाक्टर ने हॉस्पिटल के रिकॉर्ड में मेरा पुराना चेस्ट एक्स-रे देखकर कहा कि उन्हें लगता है कि मुझे अस्थमा नहीं है। पुनः चेस्ट एक्स-रे और स्पिरोमेट्री टैस्ट कराया गया। दोबारा कराये गए स्पिरोमेट्री टैस्ट से यह बात साफ़ हुई कि अस्थमा नहीं है। पेट के डॉक्टर ने एसिड रिफ्लक्स की पुष्टि की। अस्थमा के सारे लक्षण एसिड रिफ्लक्स की वजह से ही हो रहे थे। डॉक्टर ने सीधी हिदायत दी कि अपनी लाइफस्टाइल बदलकर ही मैं इस बीमारी को काबू कर सकता था।  पहले मैं दिन में तीन गिलास भरके चाय पीता था।  अब किसी भी तरह का कैफ़ीन पूरी तरह बंद करना था। घी मेरा सबसे प्रिय खाद्य है, वह भी बंद। मीठा बंद क्योंकि वज़न भी कम करना था।  मैं खाने में कैलोरीज गिनने लगा था।  अब उन सब्ज़ियों से प्रेम करना था, जिनसे सारी उम्र नफरत की, जैसे लौकी, तुरई, जुकीनी। दाल और बैंगन की सब्ज़ी मुझे पहले से पसंद रही है। केला और सेब भी नियमित डाइट में शामिल हुए।  अब कच्ची-पकी सब्ज़ियां बहुत खानी थीं। यह भी तय हुआ कि वज़न कम करने को कुछ व्यायाम किया जाये। एसिड रिफ्लक्स में दौड़ना या भारी व्यायाम करना उल्टा पड़ सकता है तो सबसे मुफ़ीद लगा चलना। तो बस चलने लगा।  शुरुआत एक दिन में तीन किलोमीटर से की।  उससे एक महीने में जो वज़न कम हुआ, उतने से ब्लड प्रेशर सामान्य हो गया।  जो एड़ियां चलने पर दुखने लगती थीं, उनका दर्द गायब हो गया।  जब मेहनत का फायदा दिखने लगे तो आप और प्रयास करने को प्रेरित होते हैं।  अब धीरे-धीरे एक दिन में पहले चार, फिर पांच किलोमीटर पैदल चलने लगा।  फिलहाल एक दिन में कम से कम सात किलोमीटर चलने का नियम है जो कभी कभी दस, ग्यारह, बारह किलोमीटर भी हो जाता है।  जो आदमी सामने वाली गली तक जाना बोझ समझता था, एक महीने में लगभग पौने तीन सौ किलोमीटर पैदल चलने लगा।

मोटा भी तो बहुत हो गया था मैं । साढ़े पांच फीट के आदमी का 98 किलो वजन। एक डॉक्टर ने अपनी एग्जामिनेशन रिपोर्ट में मेरे लिए ओबीज़ शब्द का प्रयोग किया तो एहसास हुआ कि अरे, भीतर से ख़ुद को चुस्त समझने वाला मैं विशेषज्ञों की नज़र में एक थुलथुला आदमी हूँ। ऊपर से स्वयं को देखने पर हम समझते हैं कि अभी हम ठीक-ठाक ही हैं। मैं ख़ुद को समझाता था कि वज़न के सारे कांटे झूठ बोल रहे हैं और शरीर में जो बढ़ चुका है वह तो डेढ़ साल पहले जो जिम की थी उसकी वजह से बढ़ी हुई मांसपेशियां हैं। मैं फोटो नहीं खिंचाता था, आईने से नज़र चुराकर निकल जाता था।  मेरे बाहर के व्यक्ति का रूप  मेरे भीतर से बहुत अलग था।  समाज भी मोटे लोगों से भेदभाव करता है। नस्लवाद, रंगभेद की तरह इस विभेद पर कोई आवाज़ भी नहीं होती।  मोटे लोगों के बारे में लोगों को यह भ्रान्ति होती है कि वे बहुत ख़ुशमिजाज़ होते हैं और इसलिए उनसे वज़न के बारे में कुछ भी मज़ाक किया जा सकता है।  जबकि वे अपमान का घूंट पीकर इसे सहन कर रहे होते हैं। मैं भी सालों से यही कर रहा था। बहुत ज्यादा पढ़े लिखे लोग भी मेरी भावनाओं की कद्र किए बिना मेरा मज़ाक उड़ाते ही थे। बहरहाल, अब वही चर्बी चलने और सही खाने से कम हो रही है। फरवरी 2020 आते-आते मेरा वजन 98 से गटकर 76 किलो हो गया है। कुछ लोग अब देखने लगे हैं मेरी तरफ। मैं भी अब शीशा देखने लगा हूँ।

ज़िंदगी का मज़ा माइक्रो में है

किसी तेज़ रफ़्तार वाहन से

दृश्यों को धता बताते हुए

सर्र से निकल जाने पर

आप अनसुनी कर देते हैं

जीवन की थाप

फुटपाथ की हर टाइल पर

सड़क किनारे की हर रोड़ी पर

कम से कम एक बार

अपना पैर रख पाने की उपलब्धि

पाते हैं पैदल चलने वाले ही

वही चीन्ह पाते हैं उस चिड़िया को

जो नशेड़ी की तरह

गोते खाकर झूमती उड़ती है

वे कोशिश कर पाते हैं

नींब की निम्बोली को उछलकर छूने की

वे चख पाते हैं झाडी वाले बेर

घास में उगे फूल देख पाते हैं

उनकी आँखें माइक्रोस्कोप बन जाती हैं

जानती हैं हर तिनके का सम्मान करने का शऊर

वे फूलों को एक बार सूंघकर

तोड़े बिना आगे बढ़ जाते हैं

अगले पथिक के लिए

रास्ते का यौवन अक्षुण्ण छोड़ते  हुए

जब आप चलने लगते हैं तो आप उन तमाम दृश्यों को भी देखते हैं जो कि आपने इससे पहले नहीं देखे थे। मैं अब अपने आसपास के पेड़ों को पहचानने लगा हूँ।  घास उगने के ठीयों को भी। यदि जंगल वाले रास्ते से यूनिवर्सिटी जाओ तो पहले पेड़ों से घिरी हुई सुनसान जगह के पास एक टीन का बना ढांचा है जो ऐसा लगता है जैसे किसी डरावनी फिल्म की लोकेशन। कुछ बड़े पेड़ों के तनों के निचले हिस्से से कोई डाली फूट पड़ी है, कुछ पेड़ों से गोंद टपकता है,  कुछ पेड़ों की छाल हमेशा गीली रहती है और कुछ पर बेलें लिपटी हुई हैं। पेड़ों से लिपटी हुईं कुछ बेलों से डालियाँ एक माला की आकृति बनाती हुई लटकी रहती हैं, मानो प्रकृति ने हार बनाया हो उस जंगल के रास्ते से गुजरने वाले का अभिवादन करने के लिए । इस अभिवादन को स्वीकार कर आगे  चलो तो सुनसान में किसी देवता का मंदिर आता है। वहां रूककर कुछ देर मनन करता हूँ। उसके बाद एक लड़की का ढांचा है जिसमें बैठने की जगह है और मेज़ पर किसी बोर्ड गेम की गोटियां रखीं हैं।  छोटी-छोटी।  चौसर या शतरंज जैसा कुछ होगा , यहां का कोई स्थानीय खेल।  बाक़ायदा उस खेल को समर्पित कुछ साइनबोर्ड भी हैं जो खेल की चाल की विभिन्न स्थितियों को दर्शाते हैं। उन छोटी-छोटी गोटियों वाली मेज़ पर किसी छुट्टी वाले दिन छोटे बच्चे बैठे रहते हैं।  पर यह देखिये कि ना कोई शरारती बच्चा और ना ही कोई उपद्रवी युवा विद्यार्थी आज तक खेल की एक भी गोटी ले गया है। ये कीड़े हमारे दिमाग़ में कुलबुलाते हैं क्योंकि हम ऐसे माहौल में बड़े हुए हैं। मेरे कस्बे के स्कूल में बच्चे केमिस्ट्री लैब में लैब असिस्टेंट की नज़र बचाकर किसी भी केमिकल की बोतल में कोई दूसरा कैमिकल मिला देते थे। मुझे नहीं पता कि रसायनों से इतना ख़तरा होने के बावजूद ऐसी हरकत वे कैसे कर लेते थे।  संभव है, उन्होंने ज़रुरत की इतनी भर जानकारी होता ली हो कि कौनसे रसायनों को सामान्य ताप पर मिलाने पर कोई विस्फोटक अभिक्रिया नहीं होगी। जब सब गड्डमड्ड हो जाता था तो सही मूलक की पहचान बड़े से बड़ा प्रोफ़ेसर न कर पाये।

कनाडा में देखे मेपल्स के पेड़ भी हमारी यूनिवर्सिटी में हैं, पर वे एक ख़ास जगह अधिक हैं।  लड़कियों के हॉस्टल के सामने से जो रास्ता जाता है, वहाँ। हॉस्टल के सामने से गुजरने वाले स्वप्निल प्रेमियों के लिये मेंपल्स के पत्ते कभी शिद्दत, कभी टूटते सपनों का प्रतीक बनते होंगे। थोड़ा आगे चलकर बायें मुड़ने पर कुछ जटाओं वाले पेड़ हैं।  ये बरगद नहीं हैं, कुछ और हैं। एक पेड़ ऐसा है जैसे बाहें फैलाए खड़ा खड़ा हो। एक पेड़ की छाल ऐसी है जैसे उसे खाज की बीमारी हो गई हो।  इस पेड़ को मैं प्यार से सहला देता हूं। पेड़ को छू लेने से थोड़ी ना किसी को छूत की बीमारी फैलती है। कुछ पेड़ों से खुजली हो सकती है, पर यदि ऐसा पेड़ होता तो इसे यूनिवर्सिटी में इतना बड़ा होने ही ना देते। यदि होता भी तो यूनिवर्सिटी के उस हिस्से में, जहां जंगल है। घर से दूसरी तरफ साइंस पार्क की ओर निकल जाओ तो एक पेड़ ऐसा है, जो ज़मीन से बहुत दूर तक समान्तर रहते हुए अचानक ऊपर उठता है। उस पेड़ पर मैं कभी-कभी बैठ जाता हूँ और बचपन का किसी पेड़ पर चढ़ जाने का सपना दोबारा पूरा कर लेता हूँ । पैदल चलने लगो तो कुछ भी दुर्गम नहीं लगता। अब मैं यूनिवर्सिटी के जंगल वाले हिस्सों में भी पैदल जाने लगा हूँ। ऐसे ही एक दिन मैंने पाया कि यूनिवर्सिटी से शहर के 18 पीक्स माउंटेन के लिए रास्ता जाता है और उस रास्ते में एक बड़ी सी झील भी है।  अगर झील के पास से जाने वाली रहस्यमयी सी लगने वाली सीढ़ियां चढ़ लो तो ऊपर एक बड़ा सा हॉल है , चारों तरफ खुला हुआ, दीवारें नहीं हैं उसमें, महज़ खम्भे हैं। इसी हॉल के पास एक स्मारक सा है और उस स्मारक के सामने से दूसरी तरफ नीचे उतरो तो सफ़ेद फूलों वाले ‘प्लम ब्लॉसम’ के पेड़ हैं।  वसंत में खिलने वाला यह सफ़ेद फूल, चेरी ब्लॉसम की अपेक्षा दुर्लभ है। इसीलिए इन वृक्षों के पास जाने की अनुमति नहीं है। वहां कुछ कुत्ते ज़रूर बैठे रहते हैं। कुत्तों का आपस का ही इलाक़े का झगड़ा रहता है।  एक दिन मैं उन फूलों की तस्वीर लेने के लिए ज़रा सा पास चला गया था, तो भौंक-भौंककर भगा दिया कुत्तों ने। वैसे इस झील से सीढ़ियों की तरफ ना जाकर दूसरी तरफ जाओ तो जंगल सा आता है, जो लगता ही नहीं कि यूनिवर्सिटी का ही हिस्सा है। यहीं जंगल में मेज़ और दो कुर्सियां रखीं हैं कि चाय पैक करके ले आओ और यहाँ बैठकर चुस्कियां लो।  ताइवान की चाय भारत से अलग है और इन एशियाई देशों में इस तरह की चाय ही पी जाती है। साबूदाने से बनने वाली बबल टी ताइवान से ही आरम्भ हुई। इस जंगल में एक जगह बटरफ्लाई गार्डन है जहां तितलियां उड़ती हैं। केलों के गुच्छे हैं वहाँ और बहुत सारे फूल। हिबिस्कस की अलग-अलग क़िस्में। लगभग चार साल तक इस स्वर्ग से मैं अनजान रहा।  वैसे स्वर्ग की बात चली है तो बताता चलूं कि इस बटरफ्लाई गार्डन पर यूनिवर्सिटी की बिना दीवार की सीमा है जिसके दूसरी ओर क़ब्रें हैं। कुछ क़ब्रें यूनिवर्सिटी के डॉरमिटरी के पास भी हैं। पर इतनी सारी क़ब्रों के बाद भी भूतों की कोई अफवाह नहीं सुनी मैंने। अपना देश होता तो कुछ रोचक क़िस्से सुनने को मिलते।  अभी तक मेरी “यदि भारत होता तो…” सोचने की आदत नहीं गयी है।

हमारी यूनिवर्सिटी में एक नहीं, कई झीलें हैं। दिन में खाने के बाद घूमने निकलता हूँ, तो कभी-कभी यूनिवर्सिटी की सबसे बड़ी झील का पूरा चक्कर लगा लेता हूं। वहाँ से थोड़ा नीचे उतरकर एक लकड़ी की बैंच के पास एक आदमी हर रोज़ आता है और खड़ा रहकर बस अपने हाथ हिलाने की एक्सरसाइज करता है।  वह हर आने-जाने वाले से नमस्कार करता है। वीक डे में भी आता है वह। पता नहीं कोई शारीरिक समस्या है क्या उसे।  पता नहीं, कुछ भी।  एक दिन उसने मुझे मेरी स्वेट शर्ट देखकर बताया था कि न्यू यॉर्क को बिग एप्पल भी कहते हैं।  मुझे नहीं पता थी यह बात।  मुझे तो यह भी नहीं पता था कि मेरी स्वेट शर्ट पर न्यूयॉर्क लिखा है।  मैं उस स्वेट शर्ट को पहनकर बस नया स्वेटर खरीदने से बच रहा था ताकि वज़न कम होने पर उस हिसाब से कपडे खरीद सकूं। पूरी सर्दियाँ मैंने एक स्वेटर, एक जैकेट और दो स्वेट शर्ट में काट दीं। जब मैं डिनर के बाद रात को घूमने आता हूं तो यदा कदा लाइब्रेरी के बाहर बड़े से प्लेटफार्म पर मॉडर्न आर्ट का एक बड़ा सा पीस रखा है, वहीं बैठ जाता हूं। लकड़ी के उस प्लेटफार्म की सीढ़ियों के दोनों तरफ पौधे हैं, जिनमें रात को स्प्रिंकलर से पानी छोड़ दिया जाता है और बौछार के कुछ छींटें जब मुझ पर या मुझसे कुछ दूर पड़ते हैं तो ठण्ड में भी अच्छा लगता है।  वैसे इसी लाइब्रेरी की छत से कुछ वर्ष पूर्व कूदकर यूनिवर्सिटी के किसी विद्यार्थी ने आत्महत्या कर ली थी। तब मैं ताइवान में ही था और हमें एक ईमेल आया था कि किसी भी तरह का अवसाद होने पर काउन्सलिंग की सुविधा उपलब्ध है। जिन्हें हम भारत में विकसित देश कहते हैं, वहाँ के निवासी भी अपने हिस्से की समस्याओं से गुज़रते हैं।  अकेलापन, अवसाद, बचपन में हुए यौन उत्पीड़न के घाव, माता-पिता के झगडे या अलगाव इन्हीं में से कुछ उदाहरण हैं। मुझे नहीं पता कि लाइब्रेरी की छत से कूदकर जिसने ख़ुद को मार डाला,  वह लड़का था या लड़की।  मुझे नहीं पता कि वह किस तरफ से कूदा था, कहाँ गिरा होगा, इसलिए मेरे लिए कल्पना की सारी संभावनाएं खुली थीं।  कभी लगता है कि कहीं वह इसी जगह ना आकर गिरा हो जहां बैठा मैं बौछारों का आनंद ले रहा हूँ। रात के ग्यारह- बारह बजे अकेले बैठा यह सोचता हूँ तो मुझे डर नहीं लगता है । मैं उसकी आत्मा की शान्ति के लिए कुछ बुदबुदाता देता हूँ।

हमारी यूनिवर्सिटी का नाम नेशनल चिंग हुआ यूनिवर्सिटी है। इसके बिलकुल बगल में एक दूसरी यूनिवर्सिटी भी है- नेशनल चाओ तुंग यूनिवर्सिटी।  प्राकृतिक और कलात्मक सुंदरता दोनों में अपनी तरह की अलग-अलग है।  किसी दिन इनमें से कोई एक मेरी ज़्यादा प्रिय हो जाती है, किसी दिन दूसरी। दोनों ही यूनिवर्सिटी का ही कैंपस बहुत बड़ा है। आलीशान।  जहां हमारी यूनिवर्सिटी में जंगल, झील, घास के मैदान, खेल के मैदान और बटरफ्लाई गार्डन बिल्डिंगों से अलग हैं वहीं चाओ तुंग यूनिवर्सिटी (जिसे मैं पड़ोसी यूनिवर्सिटी कहता हूँ) में कई जगह बिल्डिंगों के बीच में ही मॉडर्न आर्ट के पीस रखे हैं। यहां रॉक आर्ट का भी कैम्पस को सजाने में भरपूर  प्रयोग किया गया है। रॉक आर्ट यानी चट्टानों को काटकर या उनके स्वाभाविक स्वरुप में ही,  उन्हें मॉडर्न आर्ट की तरह प्रस्तुत करना।  यहां खाने के कैफ़े भी ज़्यादा सुन्दर हैं, हालाँकि मेरे मित्र बताते हैं कि स्टूडेंट डॉरमिटरी हमारी यूनिवर्सिटी की बेहतर है। चाओ तुंग यूनिवर्सिटी के रास्ते ज़्यादा उलझे हुए हैं जैसे उस एक लड़की का फ़ोन जिसमें कोई भी एप्लीकेशन कहीं भी होती है, और मेरी यूनिवर्सिटी का कैंपस बहुत सुलझी हुई प्लानिंग के साथ बना है जैसे मेरा फ़ोन होता है- अलग-अलग तरह की एप्लीकेशन अलग-अलग व्यवस्थित की गईं। मुझे वह लड़की भी पसंद रही है, और उसके फ़ोन जैसी चाओ तुंग यूनिवर्सिटी भी।

2020 का फरवरी महीना, मेरे जन्म के महीने की शुरुआत।  चेरी ब्लॉसम शुरू हो चुका है, जापान में इसे सकुरा भी कहते हैं।  और मैं घर के बाहर लगे इन फूलों को देखता हूँ।

सड़क किनारे खड़ी कारें

सिर्फ वही सुन्दर दिखती हैं इस मौसम में

जिनके शीशे में दिख रही हो

सकुरा के फूलों की छाया

और सबसे सुन्दर ब्रांड नेम होता है

बोनट पर हवा से गिर गया कोई फूल

कारों का ब्रांडनेम और क़ीमत

व्यर्थ हो जाते हैं

इन फूलों के समक्ष

एक ही रास्ते पर चलने से आप बोर हो जाते हैं तो नए रास्ते तलाशने का सबब बना। इसी सिलसिले में याद आया कि सब्ज़ियों का मॉर्निंग मार्किट भी तो शहर में है। मेरा ही दोगलापन सामने आया और अब पूंजीवाद के खिलाफ पढ़ी बातों को याद कर ख़ून खौलने लगा और तय किया कि  सब्ज़ी  सुपरमार्केट से नहीं, ज़मीन पर बैठ बेचने वालों से ही लेनी हैं। हम क्रांतिकारी भी अपनी सुविधा के हिसाब से होते हैं। बहरहाल, जैसे भी हो, स्वार्थ से वशीभूत होकर ही सही, यह एक सही क़दम था।  सब्ज़ियां लेने जाने से बचपन की वह स्मृति लौट आयी जब मैं अपने कस्बे में सब्ज़ी लेने जाता था।  यह काम मैंने दस साल की उम्र से ही शुरू कर दिया था। मेरे कस्बे की सब्ज़ी वाली माइयाँ मुझे पहचानती थीं और मैं जानता था कि किसके पास क्या अच्छा मिलेगा और कौन मोलभाव कर सकती है। किससे शाम को भागते भूत की लंगोट की तरह बचा हुआ सारा पालक दो रूपए में माँगा जा सकता है। पर सब्ज़ी मंडी ठीक से गए पंद्रह साल हो चुके थे। यहां ताइवान में सब्ज़ियों का मोलभाव नहीं कर सकते थे, भाषा भी अड़चन थी ही।  मैं तो यहां के विक्रेताओं का बताया दाम भी नहीं समझ पाता था।  एक सब्ज़ी वाली दाम बताने के लिए उतने सिक्के अपने पास से उठा कर बता देती थी जितने उसे मुझसे मांगने होते। कई बार मॉर्निंग मार्केट जाने से यह पहचान में आ गया था कि  कौन सब्ज़ी वाला/वाली कौनसी सब्ज़ियां ताज़ी रखता है और कौन सही दाम लगाता है।

छोटे बाजारों से खरीदने का अपना एक अनुभव अलग अनुभव होता है। आपको पता होता है कि आपका पैसा एक छोटे दुकानदार की जेब में पैसा जा रहा है और बेचने वाले को पता होता है कि उसकी बेची सब्ज़ी किस रसोई को महका देगी। इससे एक व्यक्तिगत रिश्ता कायम होता है। यह दीगर बात है कि ताइवान के सुपर मार्केट में भी कुछ काम करने वालों के साथ मेरे अनुभव आत्मीय रहे हैं। इस मॉर्निंग मार्केट में सब्जी बेचने वाले या तो किसान थे या किसानों से सीधा संबंध रखते थे।  वे गाड़ी में भरकर सामान लाते, ज़मीन पर रख बेचते और गाड़ी में भरकर ही बची हुई सब्ज़ियां वापस ले जाते। मैं पहचान गया था कि इस मार्केट में घुसते ही जो सबसे शुरू में लड़का बैठता है, वह सब्जियां सस्ती देता है। हमारे राजगढ़ में शुरुआती सब्ज़ी वाले हमेशा मंहगी सब्ज़ी देते थे।  और लोग भी चालाक। वे पहले बैठने वाले से बस भाव पूछकर आगे निकल जाते, यह सोचकर कि आगे और सस्ती मिलेगी। ताइवान के इस मॉर्निंग मार्किट की दो बूढ़ी औरतें हमेशा ऊंचा दाम लगाती थीं। एक दिन दो-तीन सब्जियों का ढेर रखे बेचते हुए एक 84 साल के बुज़ुर्ग भी मिले। अपनी उम्र का सर्टिफिकेट मुझे दिखा रहे थे जो मैंडरिन भाषा में था और मुझे समझ नहीं आया। लोक का यही रंग है। एक दिन ऐसी उत्साही ख़रीददार औरत मिल गई जिसने मुझे जबरदस्ती एक सब्जी खरीदने को प्रेरित किया। वह कहती थी कि यह पत्ते वाली सब्ज़ी पेट के लिए बहुत अच्छी है। उस सब्जी को खाकर मेरा एसिड रिफ्लक्स बढ़ गया था। धीरे-धीरे सब्ज़ी वाले भी मुझे पहचानने लगे हैं। मुझे मैंडरिन के जो दो-तीन शब्द आते हैं, उन्हें सुनकर वे समझ लेते हैं कि मैं उनकी भाषा जानता हूँ और आगे बात करने लगते हैं। मैं उनसे ‘म्यो मैंडरिन, म्यो चाइनीज़’ कहकर यह बता देता हूँ कि मुझे नहीं आती उनकी भाषा।  फिर वो हंसकर आपस में कुछ कहते हैं और मुझसे फ़िर भी कुछ कहना जारी रखते हैं। मैं इसका जवाब उन्हें कभी-कभी अंग्रेजी में देता हूँ। कभी लगे कि उन्हें अंग्रेजी का कुछ नहीं समझ आ रहा तो हंसकर किसी हिंदी गीत के बोल कह देता हूँ। कुछ बातूनी सब्ज़ी वाले बिना मांगे सब्ज़ियों के साथ कुछ मिर्च गिफ्ट में डाल देते हैं। मैं आजकल मिर्च खाता नहीं तो किसी मित्र को दे देता हूँ उन्हें। सब्ज़ी वालों का प्यार हैं वे मिर्च, जिन्हें लेने से मना करना मुझे सही नहीं लगता।

अगर आप यह किस्सा अभी पढ़ रहे हैं तो आपको दिक्कत नहीं होगी समझने में क्योंकि कोरोनावायरस हाल ही में घटी घटना है। बरसों बाद लोग भूल चुके होंगे कि कोविड -19 नाम की भी कोई महामारी थी। अनुभूत को ही महत्वपूर्ण मानना और बीते हुए को ऐसा समझना जैसे वह कोई किवदंती रही हो, नए ख़ून की आदत होती है । विचारों के परिपक्व होने में समय लगता है कि जैसे सब बीत गया, वैसे ही हम बीत रहे हैं। किसी गुज़रे दौर के लोगों ने भी अपने बूढ़ा हो जाने या मर जाने की इतनी सहज कल्पना नहीं की होगी जितनी होनी चाहिए। सौ-डेढ़ सौ साल उपरांत आज का एक भी मनुष्य जीवित नहीं बचेगा। कैसा लगता है यह सोचने में।

ऐसे ही एक दिन मैं सब्ज़ी लेने निकला। यह उस दिन की बात है जब कोरोनावायरस ताइवान में भी दस्तक दे चुका था।  लगातार हाथ धोये जा रहे थे। शहर की सभी दुकानों से चेहरे पर लगाने के मास्क खत्म हो चुके थे। मेरे पास जो कुछ पहले से खरीदे हुए मास्क रखे थे, मैं उन्हीं में से एक को लगाकर निकला। पहले जिस मॉर्निंग मार्केट तक मैं दो सौ मीटर चलकर भी नहीं जाता था, अब वहीं तीन किलोमीटर चलकर पहुँच जाता था।  अब मेरे लिए पैदल चलना जैसे जीवन जीने की शर्त बन चुकी थी। स्वास्थ्यगत मजबूरी थी कि वजन घटाना ही था। वह घट भी रहा था, धीरे-धीरे।

मैं उस दिन निकला था कमरे से चेहरे पर मास्क और आंखों पर चश्मा लगाकर। सलीक़ा तो था नहीं कि मास्क या चश्मा ऐसे लगाऊं कि नाक से छूटी हुई सांस मास्क से टकराकर ऊपर चढ़कर चश्मे के शीशों पर ना जम जाए। जमकर वह पानी बन जाती है।

उस दिन की सब्जी खरीदने का काम खत्म करते-करते मेरा चश्मा पूरी तरह पानी से ढँक गया था। सब्जी मंडी के बिल्कुल दूसरे छोर पर जहां सब्जियों की दुकानें लगना बंद हो जाती हैं, वहां से थोड़ी दूर फलों की दुकान है। मैं उसी तरफ जा रहा था कि मैंने रास्ते में एक नया स्टाल देखा। एक औरत कुछ सूखी सी टहनियां मेज पर रखकर बैठी थी। मैं उत्सुकतावश रुक गया। शायद वह स्थानीय धर्म में पूजा पाठ से सम्बंधित कुछ लकड़ी थी। मैंने उससे पूछा कि वह क्या है तो वह मुझे अपनी भाषा में समझाने लगी। एक बार को मुझे भ्रम हुआ कि कहीं वह मुझे लोकल तो नहीं समझ रही। वैसे भी मेरे वज़न घटा लेने से  अब मैं इतना मोटा नहीं लगता था कि यहां का आदमी होने का भ्रम ना पाला जा सके। ‌ताइवानी हमसे अपेक्षाकृत फिट दीखते हैं। मेरे मुंह पर मास्क लगा ही था। मेरी आंखें भी चश्मे की धुंध से ढकी गई थीं जिनके  आकार से मेरी पहचान हो सकती थी। और सर्दियों में मैं इतना भी बाहर नहीं निकलता कि मेरी त्वचा बहुत सांवली हो जाए। मेरा अभिप्राय सिर्फ बाहरी आवरण देखकर किसी की ज़मीन का सन्दर्भ समझने से है। मैं नस्लभेद और रंगभेद के सख़्त ख़िलाफ़ हूँ और मानता हूँ कि हर रंग, हर व्यक्ति की अपनी अलग खूबसूरती है। बहरहाल, वह स्त्री जो मेरी ज़मीन की पहचान नहीं कर पायी थी, मुझे उन लकड़ियों के बारे में अपनी भाषा में समझा रही थी और मुझे समझ नहीं आ रहा था। अंततः, उसकी दुकान पर कुछ लिखकर रखे एक बोर्ड पर मैंने अपने फोन से ‘गूगल ट्रांसलेट फ्रॉम इमेज’ ऑन करके देखना शुरू  किया। अब तक वह समझ चुकी थी कि मैं कहीं बाहर का हूँ।  यह भी उसे समझ आ गया था कि मैं कुछ खरीदने वाला नहीं। दुकानदार में यह गुर तो होता ही है कि वह सच्चे ग्राहक और यूं ही टाइमपास करने आए आदमी में अंतर कर पाए। फिर भी उसने अपनी संस्कृति का परिचय देने के लिए और समझाने के लिए कि उसके पास क्या रखा है, मुझे एक प्रिंटेड कागज दिया। हम दोनों ने बहुत सम्मान से एक दूसरे को अलविदा कहा और मैंने देखा कि उसका दिया कागज़ भी मैंडरिन भाषा में था, यानी मुझे समझ नहीं आना था।  कुछ संभावना थी कि उस औरत की नज़र घूमती हुई जाते हुए मुझ पर दोबारा पद जाए। मैं नहीं चाहता था कि यदि ऐसा होता तो उसे वह कागज़ जेब के सुपुर्द किया दिखे या इग्नोर किया हुआ लगे।  मुझे उसके आतिथ्य, उसकी संस्कृति का मान रखना था। इसलिए मैंने अपने फोन पर ‘गूगल ट्रांसलेट फ्रॉम इमेज’ ऑन करने का बहाना सा करके फिर से कागज की तरफ फ़ोन टिका दिया और पढ़ने का स्वांग करते हुए अपनी दिशा में खोने लगा।‌

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