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  समाज और कविता दोनों जेंडर न्यूट्रल हों

स्त्रीवादी आलोचक रेखा सेठी की दो किताबें हाल में आई हैं ‘स्त्री कविता: पक्ष और परिप्रेक्ष्य’ तथा ‘स्त्री कविता: पहचान और द्वन्द्व’। जिनमें हिंदी की कवयित्रियों की चर्चा है और उनकी रचनाओं की आलोचना भी। यह एक शोधपरक दस्तावेज़ी काम है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इन किताबों की समीक्षा की है कविता भाटिया ने, जो दिल्ली विश्विद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं-

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स्त्री कविता यथार्थ व जीवन के सहज अनुभवों को अपनी कविता का विषय बनाती है। पितृसत्ता के अंतर्विरोधों और विसंगतियों के प्रति विद्रोहात्मक प्रतिक्रिया का स्वर उनकी कविता में सुना जा सकता है। साहित्य में स्त्री विमर्श व स्त्री की स्वाधीनता से जुड़े प्रश्न, उसकी चिन्ताएँ,  उसके स्वप्न महत्वपूर्ण विषय है। यह सच है स्त्री मुक्ति का प्रश्न, उसकी इच्छाएँ, पीड़ा व व्यथा एक भिन्न संसार रचती है।  इसी क्रम में प्राचीन काल से लेकर अब तक स्त्री कविता ने जागरण से लेकर स्त्री सशक्तिकरण की एक लंबी यात्रा तय की है। वह  केवल वस्तुस्थिति का नकार भर न होकर अपनी क्षमताओं को पहचानने , उसे विकसित करने और अपने को पुनः गढ़ने – यानि अपने स्व को फैलाकर पूरी सृष्टि को अपने में समेटने की कोशिश है। समकालीन हिंदी काव्य जगत में कवयित्रियाॅं स्त्री मन और अपने भाव जगत से जुड़ी अनुभूतियों को व्यक्त कर अपने साहित्यिक वितान का विस्तार कर रही हैं।

    समकालीन हिंदी कविता और जेण्डर की अवधारणा पर गहरी पकड़ रखने वाली सुप्रसिद्ध आलोचक रेखा सेठी ने अपने स्त्री विषयक शोधपरक अध्ययन- स्त्री कविता: पक्ष और परिप्रेक्ष्य तथा स्त्री कविता: पहचान और द्वन्द्व में स्त्री कवयित्रियों द्वारा अपनी रचनाओं में व्यक्त की गयी मनुष्य विरोधी स्थितियों, उनके भीतरी अंतद्र्वन्दों और उनकी छटपटाहट को चीन्हते हुए स्त्री को दमित बनाए रखने वाले जिम्मेदार कारकों की पड़ताल कर स्त्री के असंतोष एवं आक्रोश को बखूबी व्यक्त किया है। स्त्री कविता पर यह महत्वपूर्ण कार्य स्त्री के बैचेन मन के प्रश्नों का समाधान ढूॅंढने की छटपटाहट तथा आवश्यक जागरूकता उत्पन्न करने में सक्रिय भूमिका निभाता है। इस शोधपरक अध्ययन के आगे की कड़ी में तीसरी पुस्तक -स्त्री कविता: संवयन प्रस्तावित है। सामाजिक व्यवस्था के कू्रर शोषणतंत्र ने सबसे अधिक स्त्री और दलित को मुख्यधारा से हटा हाशिए पर धकेलने की कोशिश की है। इनमें भी सबसे जटिल व संशिलष्ट स्थिति स्त्री की है। ऐसे में शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था के विविध रूप , स्त्री की अनसुनी आवाज और उसकी पीड़ा और इन सबसे ऊपर उसका विद्रोह – इन सब दृष्टियों से स्त्री कविता विशेष अध्ययन की मांग करती है।

   ये आलोचनात्मक कृतियाँ प्रमुख स्त्री स्वरों को सामने लाती है जिनके माध्यम से लेखिका ने चिंतन की  एक नयी भूमि तैयार की है। यह शोधपरक अध्ययन दृष्टि स्त्री कविता के इतिहास व विभिन आंदोलनों का दस्तावेज भी है। ‘ स्त्री कविता: पहचान और द्वन्द्व ’  पुस्तक की लंबी भूमिका में अपने इस महत् कार्य को सामने लाने के बारे में लेखिका स्त्री कविता और उसकी पहचान के सवाल को अपने मन के द्वंद्व से जोड़ती है। यहाँ प्रश्न यह है कि क्या स्त्री कविता की रचना अपनी छिपी आकांक्षाओं और स्त्री विमर्श को सामने लाने के लिए ही करती है ? या स्त्री कविता को हमेशा इसी सीमित और तयशुदा एकांगी दृष्टिकोण से देखे जाने की पूर्व परम्परा को ही हम ढो रहे है। जबकि दिलोदिमाग की संकीर्णता के ढांचे को तोड़कर देखें तो स्पष्ट होता है कि प्रारंभ से लेकर अब तक की स्त्री कविता में परस्पर जुड़े हुए कई सरोकार है।

प्रारंभिक स्त्री कवयित्रियों में रामकुमारी देवी हो या प्रतापकुॅंवरि बाई, तोरन देवी शुक्ल ‘लली ’ अथवा सुभद्रा कुमारी चैहान इन सबने लैंगिक ध्रुवीकरण को तोड़ते हुए अपनी कविताओं में स्त्री के समान अधिकारों की मांग के साथ मातृभूमि की वंदना, देशानुराग, कृषक व मजदूर वर्ग के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किया। वहाॅं केवल घुटती हुई, आॅंसू बहाती स्त्री नहीं है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था से मुक्ति की आकांक्षा के साथ उनकी रचनाओं में परिवार, समाज, राष्ट्र की चिंताएॅं भी गहरे रूप में मौजूद है। हिंदी कविता के आरंभिक व मध्यकाल को याद करें तो पाते है कि पुरुष सत्ता के कुहासे में स्त्री रचनाशीलता सामने ही नहीं आ सकी तभी तो पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था के शोषक रूप को बेनकाब करती, स्त्री स्वतंत्रता को बाधित करती सामाजिक व धार्मिक संस्थाओं को चुनौती देती ‘एक अज्ञात हिंदू महिला’ की क्रांतिकारी दस्तावेज रचना ‘ सीमान्तनी उपदेश ’ समाज के पुरुष ठेकेदारों द्वारा दबा ली गयी अथवा अलक्षित कर दी गयी थी।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिल्विया वाल्बे मानती है कि पितृसत्ता सामाजिक संरचना की ऐसी व्यवस्था है जिसमें पुरुष महिला पर अपना प्रभुत्व जमाता है, उसका दमन करता है और उसका शोषण करता है। वह लिंग असमानता का मूल कारण इसी ‘ पैट्रियाकी ’ को मानती है। रेडिकल नारीवादी विचारक केट मिलेट ‘सेक्सुअल पाॅलिटिक्स ’ तथा शुल्मिथ फायरस्टोन ‘ द डायलेक्टिक आॅफ सेक्स ’ गर्दा लर्नर ‘ द क्रिएशन आॅफ पैट्रियार्की ’ में पितृसत्ता को केंद्रीय संरचना सिद्ध करती है और स्त्री की दोयम स्थिति को व्यवस्थागत मानती है।

 इससे इंकार नहीं कि स्त्री कविता में अपने ‘ स्वत्व ’ को पाने की कोशिश है तो स्वप्नों का मुक्त वातायन भी। यहाॅं पितृसत्ता की जकड़न से मुक्ति का उत्सव रचती स्त्री भी है जो ‘ स्त्री केवल स्त्री नहीं, मनुष्य भी है ’-की घोषणा करती दिखती है। लेखिका की स्थापना है कि हम स्त्री कविता कहते ही उसे लेकर बायस्ड क्यों हो जाते है ? वह मानती है कि समाज और कविता दोनों जेण्डर न्यूट्रल हो। यदि हम साहित्येतिहास को खंगाले तो पाते है कि ऐतिहासिक विकासक्रम में स्त्री की स्वायत्त पहचान बनने ही नहीं दी गयी। जीवन के अनेक क्षेत्रों मे लिंग असमानता के कारण पुरुष शक्तिशाली सर्वोपरि सत्ता बन गया और स्त्री इस शोषण की शिकार । पश्चिमी आलोचक मिल ने ‘ द सब्जेक्शन आफ विमेन ’ में स्त्री की सामाजिक स्थिति की गंभीरतापूर्वक पड़ताल करते हुए स्त्री-पुरुष के पूर्ण समानता के सिद्धांत को कायम किए जाने की वकालत की, सिद्धांत ऐसा जो न एक पक्ष को कानूनी सत्ता या सुविधा दे और न ही दूसरे को अशक्त बनाए।

  इस पुस्तक के 3 खंड है जिसके पहले भाग ‘ पाठ और संवाद ’ में 7 प्रमुख स्त्री कवयित्रियों गगन गिल, कात्यायनी, अनामिका, सविता सिंह, नीलेश रधुवंशी, निर्मला पुतुल और सुशीला टाकभौरे की एक-एक प्रमुख रचना को प्रस्तुत करते हुए लेखिका ने स्त्री कविता का आशय और उसकी पहचान, समाज के जेंडर्ड स्ट्रक्चर, स्त्री विमर्श और स्त्री कविता, स्त्री कविता में स्त्री की एक मनुष्य के तौर पर पहचाने जाने की जद्दोजहद, जेण्डर सेंसिटिव के बजाय जेण्डर न्यूट्रल समाज की जरूरत पर बल, तथा स्त्री के संश्लिष्ट अनुभव जैसे प्रासंगिक प्रश्नों को केंद्र में रखकर इन कवयित्रियों से साक्षात्कार लिए है।

इस संदर्भ में नीलेश रधुवंशी स्पष्ट कहती है कि ‘ कविता को फांकों में बदलने की जरूरत मुझे महसूस नहीं होती क्योंकि इससे हमारी दृष्टि तो विभाजित होगी ही, कविता की चुनौतियाॅं भी कमतर होगी। ’ कात्यायनी स्त्री की पहचान एक ‘ व्यक्ति ’ रूप में किए जाने की हिमायती है। वह इस बात पर भी बल देती है कि स्त्री का संधर्ष एक नागरिक की हैसियत से सभी संधर्षशील अस्मिताओं में अपना विलय कर देने में ही है। सुशीला टाकभौरे भी स्त्री कविता को केवल स्त्रीवादी नजरिए से देखे जाने का विरोध करती है। इन्हें पढ़ते हुए याद आता है जर्मेन ग्रीयर की पुस्तक  ‘ द फीमेल यूनिक ’ में इब्सन के डाॅल हाउस का नोरा-हैल्मर संवाद। जिसमें नोरा हैल्मर के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहती है कि-‘‘ मैं मानती हूॅं कि मैं सबसे पहले मनुष्य हूॅं….उतने ही जितने तुम हो, और हर सूरत में वह बनने की कोशिश तो करूंगी ही । ’’ ऐसे में  स्त्री कविता यथार्थ व जीवन के सहज अनुभवों को अपनी कविता का विषय बनाती है। यहाॅं अपने मन की गांठें खोलती स्त्री अपने तनावों से जूझती, अपने वजूद की तलाश करती दिखती है पर साथ ही यहाॅं पूरा समाज और जीवन भी समाया है। इन सातों कवयित्रियों में विचार , अनुभूति और चिंतन के स्तर पर समानता दिखती है। इस पुस्तक में संकलित साक्षात्कार तथा दूसरी पुस्तक में लेखिका द्वारा प्रस्तुत की गयी इन रचनाकारों की काव्य संवेदना, उनकी चिंतन भूमि, तथा सामाजिक यथार्थ को देखने का उनका दृष्टिबोध- दोनों को मिलाकर देखे जाने पर स्त्री कविता का एक विस्तृत फलक आकार लेता है।

 पुस्तक के दूसरे खंड ‘ कुछ और संवाद ’ शीर्षक के अंतर्गत कुछ अन्य समकालीन कवयित्रियों के स्त्री कविता की पहचान, स्त्री कविता और जेण्डर निरपेक्षता तथा स्त्री कविता-पाश्चात्य संदर्भ या भारतीय दृष्टि पर गंभीर चिवार संकलित किए गए है। जिनमें ‘ एक सामाजिक इकाई के तौर पर स्त्री की अपनी सशक्त पहचान के मुद्दे पर ’ गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है। पुस्तक के तीसरे व अंतिम खंड ‘ स्त्री कविता और पुरुष स्वर ’ में  समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण वरिष्ठ कवियों अशोक वाजपेयी, लीलाधर मंडलोई, मंगलेश डबराल आदि  नवोदित कवियों की रवना के साथ स्त्री कविता पर उनके सारगर्भित विचार साझा किए गए है। ये वे कवि है जिनकी काव्यदृष्टि समावेशी है , अर्थात उनकी कविताओं में स्त्री-पुरुष अलग अलग न होकर एक है।  पुरुष और स्त्री की समानता को एक मूलभूत मानवीय सिद्धांत मानते हुए  ‘ जेंडर न्यूट्रल ’ की बात सभी रचनाकारों ने स्वीकार की है। इन पुरुष रचनाकारों के स्वर ने स्त्री कविता संबंधी इस शोध अध्ययन को एक नया ठोस रूप दिया है। कवि लीलाधर मंडलोई खानों में बाॅंटकर कविता को देखने की परिपाटी से बिलकुल असहमत है तो कवि जीतेन्द्र श्रीवास्तव एक ऐसे समाज और परिवेश की कामना करते है जिसमें मूल्यांकन का आधार जाति, लिंग और धर्म न हो। युवा कवि अच्युतानंद मिश्र समय की मांग के अनुसार जेण्डर न्यूट्रल के लक्ष्य को पाने की बात करते है और मानते है कि जिसके लिए अभी संक्रमण और संघर्ष की लंबी यात्रा तय करनी शेष है।

  ‘ स्त्री कविता: पक्ष और परिप्रेक्ष्य ’ में लेखिका स्त्री कविता के स्वप्न और सरोकारों पर बात करते हुए सात स्त्री कवयित्रियों की रचनाशीलता के विस्तृत कैनवास और उनकी  चिंताओं को उकेरते हुए कहती है कि- ‘‘ सामाजिक समता के सवालों और लैंगिक दृष्टि से उसके परिवर्तनशील समीकरणों को स्त्री साहित्य में रेखांकित कर पाना इस साहित्य को पढ़ने की पहली शर्त है।’’  वह स्त्री कविता को स्त्री विमर्श के चश्में से न देखकर व्यापक धरातल पर उनका मूल्यांकन करती है। गगन गिल की कविता मानव अस्तित्व के गंभीर प्रश्नों को संबोधित है तो कात्यायनी की कविता गहरे अर्थों में राजनीतिक कविताएँ है। उनकी व्यापक दृष्टि स्त्री को केवल स्त्री न मान उसे एक स्वाधीन स्वायत्त नागरिक ही मानती है।

वह अनामिका और सविता सिंह की कविता में मानव मुक्ति का व्यापक कैनवास देख पाती है तो नीलेश की कविता सामाजिक शोषण के रूपों को उजागर करती है। निर्मला पुतुल और सुशीला टाकभौरे की कविताएँ भी व्यापक सामाजिक बिंब को दर्शाती है। इसी संदर्भ में लेखिका  कवयित्रियों द्वारा उठाए गए नवीन विषयों पर भी चर्चा करती है। फिर चाहे वह अनुपम सिंह की समलैंगिकता पर आधारित कविता हो अथवा कात्यायनी और गगन गिल की राजनीतिकपरक कविताएँ। निर्मला पुतुल जल, जंगल और जमीन के क्षय को लेकर गंभीर है। इस पुस्तक में पश्चिमी व भारतीय स्त्री संघर्ष के इतिहास के बीसवीं सदी से लेकर  वर्तमान समय तक के सभी पहलुओं को प्रस्तुत किया गया है तो स्त्री कविता का व्यापक इतिहास वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल व समकालीन स्त्री कविता के विविध आयामों से पाठकों को परिचित कराता है।

 स्त्री अस्मिता के सवालों से जूझते इस वर्तमान जटिल समय में ये आलोचनात्मक द्वय पुस्तकें निश्चित ही स्वागत योग्य है उम्मीद है इनके द्वारा स्त्री कविता के माध्यम से साहित्य व जेण्डर के संबंध को समझते हुए मूल्यांकन की एक नयी राह खुलेगी जो हमारे मानवीय अनुभवों को समृद्ध करेगी।

 

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