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‘न हन्यते’ और ‘बंगाल नाइट्स’: एक शरीर दो आत्मा

निधि अग्रवाल

मैत्रेयी देवी के उपन्यास ‘न हन्यते’ और मीरचा इल्याडे के उपन्यास ‘बंगाल नाइट्स’ के बारे में एक बार राजेंद्र यादव ने हंस के संपादकीय में लिखा था। किस तरह पहले बंगाल नाइट्स लिखा गया और बाद में उसके जवाब में न हन्यते। निधि अग्रवाल के इस लेख से यह पता चला कि ‘हम दिल दे चुके सनम’ फ़िल्म भी इन्हीं दो उपन्यासों पर आधारित थी। इन दोनों उपन्यासों की जो कथा है उसकी भी अपनी कथा है। उपन्यास की कथा और उसके पीछे की कथा को जानने के लिए यह दिलचस्प लेख पढ़िए। लेख लिखने वाली निधि अग्रवाल पेशे से चिकित्सक हैं। दो दिलचस्प किताबों पर एक दिलचस्प लेख पढ़िए- जानकी पुल।

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          न जायते म्रियते वा कदाचि

          न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः

          अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

                                                                                             न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

भीष्म साहनी कहते हैं- “स्त्री पुरुष संबंधों में कुछ भी तो स्पष्ट नहीं होता, कुछ भी तर्कसंगत नहीं होता, भावनाओं के संसार के अपने नियम हैं या शायद कोई भी नियम नहीं।”

स्त्री और पुरुष के इस अपरिभाषित संसार की एक ही कहानी जब भी दो कलम से पढ़ती हूँ तब एक शाश्वत नियम अनावृत होता है। जहां स्त्री प्रणय कथा कहते अस्वीकृत प्रेम में भी श्रद्धा बना कर चलती है, वहीं पुरुष लेखक की कलम स्वीकृत प्रेम का मान भी कायम नहीं रख पाती।

1999 में आई हिंदी फिल्म  ‘हम दिल दे चुके सनम’ देखने के उपरांत जाना कि यह फिल्म ‘बंगाल नाइट्स’ और ‘न हन्यते’ नामक उपन्यासों पर आधारित है। ‘बंगाल नाइट्स’ की नायिका मैत्रेयी कोई काल्पनिक किरदार नहीं थी। वह जीती जागती सांस लेती एक 16-17 साल की अबोध युवती थी और उसके नायक एलेन और कोई नहीं उपन्यास के लेखक मीरचा इल्याडे (Mircea Eliade) स्वयं ही थे।

1930 में भारत प्रवास में मैत्रेयी से हुए उनके प्रेम पर उन्होनें 1933 में “Maitreyi” नाम से रोमानियन भाषा में उपन्यास लिखा। अन्य भाषाओं में हुए अनुवादों में फ्रेंच अनुवाद “La Nuit Bengali” सबसे अधिक चर्चित हुआ।

उपन्यास लिखते हुए मीरचा बड़ी सहजता से अपने किरदार का नाम बदल लेते हैं लेकिन नायिका को वास्तविक नाम ही देते हैं। शायद इसके पीछे कारण यह रहा होगा कि जब उपन्यास लिखा गया तब तक नियति के क्रूर हस्तक्षेप से इस प्रेम कथा के दोनों किरदारों के बीच कई सरहदों का फासला आ चुका था। भारत के बंगाल में जन्मी इस प्रेम कथा का नायक यूरोप का एक प्रसिद्ध लेखक बन चुका था तथापि एक स्त्री की अस्मिता और निजता का यह उल्लंघन मुझे इसलिए भी दुखदायी लगता है क्योंकि उपन्यास में एक अन्य स्त्री के विषय में बात करते हुए  मीरचा, नाम उजागर करने में अपनी असमर्थता जताते हैं क्योंकि वह बंगाल का एक चर्चित और सम्मानित नाम थी। मैत्रेयी का नाम न बदलने की भावनात्मक विकलता को वह शायद व्यवहारिकता की पैरहन  यह सोचकर ओढ़ा देते हैं कि सुदूर भारत तक यह किताब नहीं पहुंच पाएगी लेकिन हमारी प्रतिबद्धता… हमारी जवाबदेही किसी अन्य के नहीं, हमारी अपनी अंतरात्मा के प्रति होती है।

मीरचा: व्हाई आर यू अफ्रेड टू मेक मी एंग्री.

मैत्रेयी: बिकॉज़ यू आर आवर गेस्ट।अ गेस्ट इस सेंड बाय गॉड.

 मीरचा: इफ़ द गेस्ट इस विकिड वन?

मैत्रेयी: गॉड कॉल्स हिम बैक

मीरचा: व्हिच गॉड

मैत्रेयी: हिज गॉड

विलग होने के बयालीस साल बाद मैत्रेयी को भारत  आए मीरचा के एक मित्र द्वारा यह ज्ञात होता है कि मीरचा ने उन दोनों के प्रेम को दुनिया के समक्ष उजागर करते हुए कल्पना के चटकीले रंग भरने की भी खूब स्वतंत्रता ली है और प्रेमिल अनुभूतियों के इस निर्लज्ज चीरहरण से  मैत्रेयी की आत्मा  चीत्कार उठती है। वह कहती हैं-

‘आई एम प्रिपेयर टू एक्सेप्ट अनप्लेज़ेंट ट्रुथ बट व्हाई शुड आई विक्टिम ऑफ अनप्लेज़ेंट लाई.’

दूसरी ओर अपनी छोटी सी खूबसूरत बगिया के नष्ट हो जाने का डर भी उन्हें सताने लगता है और उनका यह सत्य आधारहीन नहीं है। भारतीय समाज की यह मानसिकता आज भी यथावत कायम है। अपने घर-परिवार के लिए पूर्ण समर्पित स्त्री का समूचा अस्तित्व व मान, सन्देह की एक चिंगारी से भस्म हो सकता है। वह कहती हैं कि यद्यपि अपराध को बीस साल हो जाने पर एक कातिल भी दोषमुक्त हो जाता है किंतु प्रेम में पड़ी स्त्री को यह सहूलियत नहीं दी गई है। वह लिखती हैं-

‘माई रियल लाइफ विल बिकम अ शैडो, बट समवन हु इस नोबडी टू मी, हूम आई मेट फ़ॉर अ ब्रीफ व्हाइल इन द लांग जर्नी ऑफ लाइफ.. माई नेम शैल रिटेन टाईड विथ देट टोटल स्ट्रेंजर, इवन आफ्टर माई डेथ.’

मैत्रेयी देवी ने अपना पक्ष “न हन्यते” के रूप में 1974 में बंगला में लिखा। दोनों उपन्यासों का अंग्रेजी रूपांतरण  “Bengal Nights” और “It does not die” के नाम से 1994 में यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो प्रेस द्वारा किया गया।

बंगाल नाइट्स की कहानी मीरचा के भारत छोड़ने के साथ ही खत्म हो जाती है लेकिन ‘न हन्यते’ का सबसे खूबसूरत किरदार मीरचा की रिक्तता भरने के लिए ही आता है और कहानी की मुख्य धारा में शामिल न होते हुए भी असली हीरो बन जाता है। मैत्रेयी के पति द्वारा जो सहयोग व संबल मैत्रेयी को मिलता है दरअसल वह ही प्रेम के सच्चे स्वरूप को परिभाषित करता है। जहां विश्वास है, मान है और स्नेह भी है।

‘न हन्यते’ की सबसे खूबसूरत और अचंभित करने वाली बात यह है कि एक उपन्यास जो  झूठे आरोप का खंडन करने के लिए लिखा गया वह कटुता की नदी के जल को स्पर्श तो करता है पर उसमें डूबता नहीं। मीरचा के झूठ जब भी उन्हें आहत करते हैं वह विगत कई मधुर स्मृतियों का लेप उन पर लगा देती हैं। अपने सुलगते हुए आहत मन से लिखते हुए भी मैत्रेयी कहीं पर भी स्वयं को देवी बनाने अथवा मीरचा को खलनायक के रूप में दिखाने का किंचित भी प्रयास नहीं करतीं। वह बड़ी ही ईमानदारी और कोमलता से प्रेम के मृदुल पलों को शब्दों में पिरोती चलती हैं। यूँ लगता है जैसे सागर में विलीन हो चुकी एक नदी उल्टी दिशा चल, बयालीस सालों को लांघ कर पुनः अपने उद्गम पर जा खड़ी हुई हो और उसी सहजता और सरलता के साथ वह एक बार फिर मधुर कलकल  संगीत उत्पन्न करती बह चली हो।

एक पाठक के रूप में यह मैंने अक्सर देखा है कि प्रेमिल पलों में कोमल हुआ पुरुष भी प्रेम का वर्णन करते हुए दंभी हो जाया करता है और कथा कहते हुए वह स्वयं को एक अबोध बालक के रूप में यूँ प्रस्तुत करता है ज्यों उसे किसी मायावी स्त्री द्वारा सम्मोहित किया गया हो जिस कारण वह उसका अनुसरण भर करता चला जबकि सत्य यह है कि स्त्रियां प्रेम में दैहिक आकर्षण नहीं बल्कि एक साथी… एक संरक्षक तलाशा करती हैं। बहुधा वह अपने प्रांगण में सानन्द विचरण कर रही होती हैं जब पुरुष  सच्ची-झूठी वेदना ओढ़ उनकी दया हासिल कर लेता है या स्नेहवर्षा कर उनका मन उलझा लेता है।

मीरचा की कृतघ्नता केवल एक प्रेमी के रूप में ही नहीं मानवीय सम्बन्धों  के प्रति भी मुझे अखरती है। प्रथम दृष्टि में हम भले ही वाह्य सुंदरता से प्रभावित होते हैं लेकिन अनवरत स्नेह और शुभेच्छा, लोक द्वारा स्थापित मानकों की कुरूपता में भी हमारे लगाव का लावण्य भर देता हैं। मैत्रेयी के पिता जो मीरचा के बीमार होने पर उन्हें अपने घर में स्थान देते हैं, कार्यस्थल पर भी मदद करते हैं और एक पिता की तरह उन्हें स्नेह देते हैं, मीरचा कैसे स्वयं को उस अनुराग से पृथक खड़ा कर एक अनजान  दृष्टा की भांति एक वेदनीय हिकारत से उनका वर्णन करते हैं, यह अचंभित करता है।

व्हाट अ ड्रीडफुल मैन!, सेड हेरोल्ड एस सून एस मिस्टर सेन लेफ्ट.

हालांकि आगे हेरोल्ड के इस कथन से असहमति जता वह स्वयं को इस आरोप से मुक्त करने का प्रयास भी करते हैं किंतु इस कुरूपता का जिस निर्ममता से वर्णन हर बार नरेंद्र सेन के लिए किया जाता है उससे प्रतीत होता है कि चालीस साल बीतने के बाद भी वह कुरूपता उतनी ही तीक्ष्णता से मीरचा के अवचेतन में या सम्भवतः चेतन में ही दर्ज है। यह कुरूपता शारीरिक से अधिक वैचारिक भी हो सकती है और इसकी स्वीकरोक्ति कुछ यूं होती है-

आई हैव ओनली अ वेग मेमोरी, नॉट ओनली बिकॉज़ द इवेंट्स आर लांग पास्ट बट आल्सो बिकॉज़ द वायलेंस ऑफ द इनन्यूमरेबल इमोशन्स व्हिच वर लेटर टू ओवरव्हेलम मी हेस न्यूट्रेलाइज्ड द फर्स्ट फीलिंग.

मीरचा को अपने घर मेहमान बनाने की नरेंद्र की इच्छा को भी सन्देह से देखा जाता है। मीरचा के दोस्त कहते हैं कि सम्भवतः वह अपनी बेटी का विवाह तुम्हारे साथ करना चाहते हैं। यह कितना दुखद है कि समाज सदा यूँ ही संर्कीण रहा और सहज स्नेह भी संशय का पात्र बना दिया गया। एक स्थान पर मीरचा लिखते हैं –

‘माई कॉर्वाडिस टूक ओवर। आई बिगेन टू मॉक नरेंद्र सेन एंड मैत्रेयी विथ देम.’

यह हमारी कायरता ही तो होती है जब हम भीड़ द्वारा स्वीकार लिए जाने के लोभ में उनके अनुकूल आचरण करने लगते हैं चाहे वह आचरण हमारे अपने सिद्धांतों के प्रतिकूल ही क्यों न हो।

यहां जिस ईमानदारी से मीरचा अपनी कायरता को स्वीकारते हैं और शायद दुखी भी होते हैं वह ईमानदारी मैत्रेयी के साथ बिताए पलों का वर्णन करते लुप्त हो जाती है। हालांकि एक सत्य यह भी है कि मैत्रेयी और मीरचा दोनों के ही उपन्यासों से परे एक तीसरा सत्य उन पलों में दर्ज हो, काल की परतों में एकरूप हो चुका है। अब उसका असल सत्यापन असम्भव है किंतु अपने प्रिय की स्मृतियों को मूर्त रूप देते, उसके मान को बचाये रखना दरसल प्रेम में निष्ठा को बनाये रखना होता है।

यह देखना सुखद है कि वक्त की धूप में भी मैत्रेयी की मां द्वारा मीरचा को दिए गए स्नेह के रंग चटक बने रहते हैं। वह लिखते हैं-

आई हैव नेवर फेल्ट अ फिलियल डिवोशन सो प्योर सो सूथिंग एस आई फील टुवर्ड्स मिसेज सेन.

दोनों ही उपन्यासों को पढ़कर यह सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि मैत्रेयी के पिता द्वारा उन्हें काफी आजादी दी गई थी। वह कम आयु से ही लेखन करने लगी थीं और उनके पिता उन्हें साहित्यिक गोष्ठियों व परिचर्चा में ले जाया करते थे। घर आए मेहमानों से भी वह उनका परिचय कराते थे। यह साहित्य ही था जिसने मैत्रेयी और मीरचा की निकटता बढ़ाई। साहित्य चर्चा करते हुए मैत्रेयी जिस आत्मीयता से रॉबी ठाकुर(टैगोर) का नाम लेती थीं, वह मीरचा को उद्वेलित करता था। यह प्रेम से उपजी ईर्ष्या थी या प्रतिद्वंदिता से स्वामित्व की चाह लिए उपजा प्रेम। इसका निर्धारण सम्भव न होने पर भी कहीं-कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि मैत्रेयी और मीरचा का प्रेम अनुरागजनित न होकर  विपरीत लिंग और अपरिचित संस्कृति के प्रति  जिज्ञासाजनित अधिक था।

मैत्रेयी: आई वुड लाइक टू बी ओल्ड लाइक रॉबी ठाकुर.

मीरचा: हु इस रॉबी ठाकुर?

मैत्रेयी:  टैगोर। आई वुड लाइक टू बी एस ओल्ड एज ही। वेन वन इस ओल्ड, वन लव्स मोर एंड सफर्स लेस.

मीरचा: हाऊ कैन अ लिटिल गर्ल लाइक यू लव ऐन ओल्ड मैन ऑफ सेवेंटी?

मैत्रेयी: व्हाई? डस अ पर्सन बिकम अनवरर्थि ऑफ लव जस्ट बिकॉज़ ही इस ओल्ड?’

टैगोर के प्रति मीरचा का यह द्वेष बढ़ता ही जाता है और वीभत्स रूप में सामने आता है। एक सत्तर वर्षीय बुजुर्ग कवि  के लिए मैत्रेयी के प्रेम से चकित मीरचा अगर आज क्षण भर के लिए भी आ सकें तब  वह यह जानकर निश्चय ही अपरिमित आश्चर्य से भर जाएंगे कि आज नब्बे वर्ष पश्चात भी साहित्य अनुरागी भारतीय लड़कियां टैगोर का नाम उसी आत्मीयता और श्रद्धा से लेती हैं और यह अपरिभाषित अनुराग क्योंकर स्वतः ही उपज जाता है, इसकी एक बानगी देते मैत्रेयी लिखती हैं कि टैगोर को अपनी कविताएं मुझसे सुनना पसंद था और मुझे प्रोत्साहित करने के लिए वह कहते कि तुमने मेरी कविताएं मुझसे भी बेहतर पढ़ी हैं। मैं जानती हूं कि यह केवल मुझे प्रसन्न करने के लिए कहा गया था तब भी मेरा हृदय एक परम संतुष्टि से भर जाता।

‘आई रिसिव सो मच फ्रॉम हिम. इट इस अ बेनेडिक्शन जस्ट टू बी नियर हिम.’

मुझे लगता है कि सामने वाले को अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ही श्रेष्ठ महसूस करवाना ही टैगोर  के  सम्मोहन को परिभाषित करता है।

मीरचा के उपन्यास के अनुसार मैत्रेयी उनके गोरे रंग और प्रबुद्धता से अभिभूत थीं। वहीं वह स्वयं भी न केवल मैत्रेयी के सौंदर्य बल्कि कम उम्र में ही साहित्यिक  परिपक्वता से अचंभित थे।भारत में रहते हुए लिखी गई मीरचा की डायरी के अनुसार वह स्वयं भी इस रिश्ते के लिए वैसे ही असमंजस में थे जितना कि इस उपन्यास के जरिए विश्लेषण करता पाठक।

शी राइट्स मी पोयम्स एंड रिसाइट्स पोएट्री टू मी आल द डे लांग. आई डू नॉट लव हर आई एडमायर हर.

आई वास फैसिनेटिड बाय मैत्रेयी’ स करैक्टर, बिविचड़ बाय द मिस्ट्री देट सीमड टू इंवेलप हर.

शी इस द मोस्ट गिफ्टेड एंड ऐंजीमेटिक ऑफ आल द गर्ल्स आई हैव नोन सो फार।

इट इस नॉट सो सिंपल। आई लव हर, आई लव हर वाईडली एंड आई एम फ्राईटेंट ऑफ हर.

आई वास ऑन द पॉइंट ऑफ आसकिंग मैत्रेयी अबाउट मैरिज. आई थिंक अबाउट इट आल द टाइम.

आई कैन ईजिली लिव विदआउट मैत्रेयी.

इसी प्रेम के विभिन्न सोपानों की अनुभूति मैत्रेयी यूँ करती हैं-

  • देयर आर सो मेनी पीपल इन द रूम. आई रियलाइज इट इस पॉसिपल टू बी अलोन इन अ क्राउड.

आई हैव नेवर डिस्कसड आल दिस विद हिम… नॉट इवन हाऊ मच आई लव हिम, बीकॉस आई एम नॉट श्योर ऑफ माईसेल्फ.

ही बिकमस अ लिटिल क्रुएल व्हेन ही इस जेलेस एंड दैट्स व्हाट ऐन्चन्ट्स मी. इस इट कोकरटी?

साबी(चाबु) इस सिक. ही सीट्स क्वाइटली नीयर हर बेड एंड स्मूथस हर हेयर. आई फील स्ट्रांग सैटिस्फक्शन देट ही हेस बीकम वन ऑफ अस

आई एम सर्टेन अवर मैरिज इस इम्पॉसिबल. आई एम आल्सो सर्टेन आई वोंट बी ऐबल टू बीयर सेपरेशन फ्रॉम हिम

मीरचा  जानते थे कि भारतीय परिवेश उनके देश जैसा मुक्त नहीं है। वह स्वीकारते हैं कि आरम्भ में मैत्रेयी से मिलते हुए वह एक निश्चित दूरी बनाए रखने का इसी कारण प्रयास भी करते थे। इस सांस्कृतिक भिन्नता का बोध होते हुए भी जिस प्रकार के रंग उन्होंने मैत्रेयी के श्याम तन में भर दिए, अगर वह अक्षरशः सत्य हो तब भी उनका अनावृत न होना ही उचित प्रतीत होता है किन्तु वह इस रिश्ते का पूरा दोष मैत्रेयी के ही कंधों पर रख देते हैं। वह लिखते हैं-

सिनेमा विथ मैत्रेयी एंड अदर्स, शी ऑटोमैटिकली लुक द सीट नेक्स्ट टू मी

शी कमस टू माई रूम विदआउट प्रेटेक्सट, एंड इस ऑलवेज प्रोवोकैटिव ओर मालिसियस।

मीरचा के उपन्यास की समाप्ति पर आपके पास अंत में बचता है- एक भ्रमित प्रेमी जो प्रेमिका के अनेकों विकल संदेशों के पश्चात भी उसे कोई सन्देश … कोई सांत्वना नहीं भेजता। पुरुष देह को आतुर, आत्ममुग्ध, एक  नाबालिक लड़की जो न प्रेम का मान रखती है न अपने परिवार की प्रतिष्ठा का और अंत में निराश हो स्वयं को एक फल विक्रेता को सौंप देती है।  एक बंगाली प्रतिष्ठित परिवार जो एक विदेशी को अपने स्नेहजाल में फंसा उसे अपना दत्तक पुत्र बनाना चाहता है ताकि उसके साथ विदेश जा सके।

जैसे-जैसे उपन्यास आगे बढ़ता है आप प्रत्येक पात्र से नफरत करने लगते हैं। घर की चारदीवारी से लेकर बाहर तक हर ओर चमकती कामलोलुप आंखे विचलित करने लगती हैं। प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थ का पुतला बन जाता है और यहां तक कि गुरुदेव के लिए बना श्रद्धा- स्तम्भ भी भरभरा कर गिरने को आतुर हो जाता है।

इस पूरे उपन्यास में जो अंत तक नहीं बदलता वह है चाबु के लिए मीरचा का निष्कलुष स्नेह। चाबु जो मैत्रेयी की छोटी बहन है…. चाबु जो एक वटवृक्ष के तले मुरझाती जाती है….. चाबु जो अपने ही लोक में विचरण करती है…. चाबु जो मैत्रेयी को मिलती तवज्जों से खुद को उपेक्षित महसूस कर आहत होती है और चाबु जो मीरचा के कलकत्ता छोड़कर जाने वाले दिन ही दम तोड़ देती है।

इस नैराश्य से मुक्ति के लिए आवश्यक हो जाता है बंगाल नाइट्स के पश्चात ‘इट डज नॉट डाई’ को पढ़ना। मीरचा के उपन्यास में किरदार जहां एक निश्चित सांचे में ढाल दिए गए हैं, वहीं मैत्रेयी की कलम ने सम्बन्धों का द्वंद भली भांति उकेरा है। इसका एक कारण दोनों उपन्यासों के बीच की समय अवधि भी है। उम्र के साथ हमारा  दृष्टिकोण निश्चित ही परिपक्व होता है। हालाकिं मैं मानती हूं कि उम्र से अधिक महत्व यहां लेखन और रिश्तों के प्रति ईमानदारी का भी है। यह उपन्यास लिखते हुए मैत्रेयी ने एक लंबे समय बाद कलम उठाई थी और यह उपन्यास केवल एक प्रेम कथा भर नहीं है। इसमें अपने अधिकारों से पदच्युत होती स्त्री की विकल चुप्पी है….. प्रेम और परिवार दोनों से आसहीन स्त्री के मृत मन की कशमकश है….. विश्वास टूटने पर आत्मा भेदती किरचनें है और इन  दारुण कथाओं के नेपथ्य में बजता रबिन्द्र संगीत है।

दोनों उपन्यासों की कथा की तुलना करूँ तो मीरचा के सन्यासी होने के प्रसंग को जहां मैत्रेयी ने प्रमुखता से लिखा है वहीं मीरचा न इसका कहीं उल्लेख नहीं किया।  मीरचा के उपन्यास में नरेंद्र दास के चरित्र पर कहीं कोई संदेह प्रकट न किये जाने पर भी  ‘न हन्यते’ में इसकी स्पष्ट उद्घोषणा निश्चित ही अपनी मां की स्थिति से विक्षुब्ध एक बेटी का आक्रोश है।

पिता की बीमारी पर भी न पिघलने वाली मैत्रेयी अपनी विदा के समय उनके गले लग रो पड़ती हैं और इन सारे मतभेदों के पश्चात भी जब वह खुद को जीवन के झंझावतों के मध्य अकेला पाती हैं तब कहती हैं-

‘इफ़ फादर वास अलाइव, आई वुड हैव टॉट देट मैन अ लेसन.’

अपने पिता के जीवन में अन्य स्त्री रमा के प्रवेश से वह अपनी माँ की स्थिति के लिए दुखी भी होती हैं और उन्हें उनकी इस स्थिति का दोषी भी पाती हैं-

‘मदर अटेंडेड टू हर नीड्स ऐस शी डज  टू अवर्स. आई एम नॉट अवर्स टू हर क्लोज़ अटैचमेंट टू फादर, ओन्ली आई फील ग्रैजुअली मदर्स प्लेस इन दिस हाउस इज गेटिंग डिस्टर्बड. आई फील अशेम्ड आफ हर वीकनेस.’

वह अपनी माँ से कहती हैं-

‘यू हैव नो करेज टू फेस द ट्रुथ यू आर टू बी ब्लेम्ड मोर देन एनीबॉडी एल्स.’

हालांकि मैं उनकी माँ को दोषी इसलिए नहीं मानती क्योकिं किसी भी रिश्तें की अस्थिरता का दोषी रुकने वाला नहीं , जाने वाला ही होता है।

‘आई नो देट  रमा’ स लव इस नॉट प्योर- इन द गोल्ड ऑफ लव देयर ओफन इज द एलॉय ऑफ सेलफिशनेस’

सच्ची प्रेम को परिभाषित करते हुए वह लिखती हैं –

‘इट फिल्स वन्स वर्ल्ड विद लाइट एंड फ्रेगरेंस एंड मेक्स डियर ऑल देट वास अनप्लेज़ेंट बिफोर.’

इस प्रेम ने मैत्रेयी के परिवार से उनका सामाजिक मान भी अवश्य ही छीना। उनका विवाह उनसे चौदह वर्ष बड़े पुरुष के साथ तय होने पर भी वह बिना एक झलक देखे ही ‘हाँ’ कह देती हैं। उनके घर की हवा में तैरते तनाव को इस कथन में महसूस किया जा सकता है –

‘एटलीस्ट आई हैव रीच्ड द डोर थ्रू व्हिच आई कैन एस्केप फ्रॉम दिस हाउस.’

चाबु जो मीरचा के उपन्यास में जल्द ही दम तोड़ देती है उसे मैत्रेयी के उपन्यास में सावी के रूप में जिंदा पा कर खुशी होती है। उस बच्ची के लिए स्नेह रखते हुए भी मैत्रेयी कहीं न कहीं उसे दोष देती ही हैं-

‘ओ दीदी,आई बेग यू नॉट टू मैरी हेयर- आई डिड नॉट लाइक हिम एट आल.

आई स्माइलड एंड थॉट बट यू ड्राइव अवे हुम एवर आई लाइक.’

दरअसल अपने हर दुख के लिए हम  एक चेहरा तलाशते हैं जिसे कुसूरवार ठहरा सकें… जिसे दोष दे… दंडित कर ‘कुछ कर पाने की’ संतुष्टि पा सकें लेकिन तमाम जद्दोजहद के पश्चात जीवन का शाश्वत सत्य यही है कि

‘यू कैन नॉट इरेस एनीथिंग फ्रॉम लाइफ.’

आश्चर्यजनक रूप से जो व्यक्ति इस कड़वाहट, इस कशमकश की बलि चढ़ सकता था वह अपनी सरलता से मैत्रेयी का सबसे बड़ा संबल बन जाता है। उनके सरल व्यक्तित्व और विनोदी स्वभाव से वह अपनी कम किन्तु सशक्त उपस्थिति में भी पाठक के मन में श्रद्धा जगा देते हैं तो कोई आश्चर्य नहीं क्योकिं गुरुदेव ने भी उनसे प्रभावित हो अपनी एक कविता उन्हें समर्पित की थी। मीरचा से मिलने जाते हुए जब मैत्रेयी भावुक हो कर अपने पति से कहती हैं कि आपने सदा मुझे स्वतंत्रता दी तब वह कहते हैं-

‘योर फ्रीडम इज योर बर्थराइट’

नियति किस प्रकार प्रतिभाओं को मौन ही निगल जाया करती है ,मैत्रेयी का जीवन इसका भी उदाहरण है। एक लड़की जिसका पहला कविता संग्रह सोलह साल की उम्र में आ जाता है जो कलकत्ता के साहित्यिक समाज का अभिन्न अंग थी वह लिखना छोड़ देती है। जो उन्हें लिखने का स्पार्क दे सके ऊर्जा का वह छोटा कण भी नियति उन्हें सुलभ नहीं कराती। जहां मीरचा अनवरत लिख पुरुस्कार और नाम कमाते रहे वहीं मैत्रेयी के अंतर्मन को इस प्रेम की जड़ों के अवशेषों ने बुरी तरह शिकंजे में जकड़े रखा।

विवाह के पश्चात कलिम्पोंग के समीप , कम आबादी वाले किसी दूरस्थ गांव का सौंदर्य भी उन्हें प्रशांति न दे उन्हें और अधिक अकेला महसूस कराता है। वह लिखती हैं कि दिन ज्यों बस स्वयं को दोहरा रहे हैं। सम्भवतः लोग इस पर हँसे कि मेरे दुख का कारण यहां कवि की नई कविता पर बात करने के लिए मेरे पास किसी का भी न होना है। मुझे लगता है साहित्य और कला से जुड़ा हर व्यक्ति साहित्य- क्षुधा की इस अदम्य लालसा को समझ सकता है।

इस बीहड़ में उनके आत्मसाक्षात्कार का स्त्रोत बनते हैं- गुरुदेव। जो तीन साल में चार बार उन्हें आतिथ्य का अवसर देते हैं। मैत्रेयी और गुरुदेव के कई खूबसूरत संवाद आप इस उपन्यास में पाएंगे। जिन्हें पढ़कर आप भी उसी ट्रांस का अनुभव करेंगे जो मैत्रेयी उनके सानिध्य में किया करती थीं।

” आई विल डू व्हाटएवर यू वांट मी टू”,गुरुदेव सेड.

द वर्ड्स बीगन टू डांस बीटिंग रिदम विद द वेव्स ऑफ द सेवन सीस. माई बॉडी एंड माइंड आर सूथेड़, आई स्मेल द परफ्यूम ऑफ सांदल पेस्ट. व्हाट मोर इस देयर टू आस्क फॉर?

आई व्हिस्पर, माई आइस क्लोज्ड, “अलाओ मी टू स्टे नीयर यू”.

मीरचा जहां दैहिक आकर्षण में उलझ कर रह गए। वहीं मैत्रेयी अपने उपन्यास में प्रेम के दैहिक प्रारूप का खंडन करते हुए इसे विभिन्न प्रारूपों में सहज ही चित्रित कर देती हैं। मीरचा के उपन्यास में हम यह भाव मैत्रेयी के इस कथन में देखते हैं-

‘सोल नोज मेनी वेज़ टू लव.’

प्रेम में कल्पना की मिलावट उन्हें आहत भी करती है। इस विषय को पुनः प्रकाश में न लाने की सलाह देते जब उनकी सखी कहती है कि इससे और कीचड़ उछल सकता है, मैत्रेयी कहती हैं-

‘इन द इनोसेंट हार्ट ऑफ सेवेनटीन ईयर देयर वास नो  डर्ट। फ़िल्थ इस क्रिएटेड बाय देट मैन इन हिज इमेजिनेशन.’

और केवल इसी के स्पष्टीकरण के लिए वह एक अंतिम मुलाकात भी मीरचा से करती हैं।

मैत्रेयी:  मीरचा आई एम टेलिंग यु फैंटेसी इस ब्यूटीफुल एंड ट्रुथ इस मोर ब्यूटीफुल बट हाफ ट्रुथ इस टेरीबल. योर बुक इस नाईटमेयर फ़ॉर मी.

मीरचा: व्हाट डू यू वांट फ्रॉम मी?

मैत्रेयी: आई वांट पीस फ्रॉम यू.

मीरचा: हाऊ कैन आई गिव यू पीस व्हेन आई हैव नो पीस इन मी.

यह प्रसंग पढ़ते हुए मुझे मैत्रेयी किसी नन सरीखी लगती हैं। अपने गुनहगार के प्रति कोई द्वेष नहीं…..कोई कटुता नहीं। मात्र शांति की तलाश। स्वाभाविक है कि मीरचा की किताब में इस मुलाकात का कोई जिक्र नहीं है किन्तु मुझे ऐसा लगता है कि इस आत्मीय मुलाकात के पश्चात कुछ शांति तो उन्हें अवश्य ही मिल गई होगी और एक बार फिर मीरचा ने अपनी डायरी में लिखा होगा-

‘फ़ॉर एन इंस्टेंट आई हैड द इम्प्रैशन देट आई वास सिटींग अपोज़िट अ सेंट.’

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(दोनों उपन्यासों का अंग्रेजी अनुवाद आप Internet Archive पर पढ़ सकते हैं)

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लेखिका के विषय में:

गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)  में जन्म. बचपन से पढने और लिखने में रुचि. एम बी बी एस के बाद पैथोलॉजी में परास्नातक की शिक्षा. वर्तमान में झांसी (उत्तर प्रदेश ) में निजी रूप से कार्यरत.

कविताएँ, कहनियाँ और सामाजिक विषयों पर ब्लॉग आदि का लेखन.

आकाशवाणी के छतरपुर (मध्य प्रदेश) केंद्र से रचनाओं का पाठ, “लमही”, “देस हरियाणा”, “अहा! जिन्दगी”, “मुक्तांचल”, “अभिनव इमरोज़”, “कला वसुधा” और “कथाक्रम” आदि पत्रिकाओं में  कहानियों/कविताओं का प्रकाशन. स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं तथा डिजिटल मीडिया में रचनाओं का नियमित प्रकाशन.

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Dr Nidhi Agarwal

ई-मेल:  nidhiagarwal78.jhansi@gmail.com

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One comment

  1. I hade read both the books in bengali . Moitreyee Devi’s father also was a famous philosophy professor _ Surendranath Dasgupta the author of 3 volumed 750 paged each ” A History of Indian Philosophy ” .

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