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‘काजल लगाना भूलना’ का मर्म

व्योमेश शुक्ल समकालीन हिंदी कविता का जाना पहचाना नाम है। हाल में उनका कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है ‘काजल लगाना भूलना’राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह पर यह लम्बी टिप्पणी की है बीएचयू के शोध छात्र मानवेंद्र प्रताप सिंह ने-

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व्योमेश शुक्ल का हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह ‘काजल लगाना भूलना’ उनका दूसरा कविता संग्रह है,इससे पूर्व उनका एक संग्रह ‘फिर भी कुछ लोग’ नाम से प्रकशित हो चुका है जिसने उस दौर में पाठकों और आलोचकों का ध्यान आकर्षित किया और व्योमेश शुक्ल की कविताओं पर गंभीर बातचीत हुई.इस नए संग्रह की अधिकांश कवितायें संग्रह से पूर्व विभिन्न ब्लोग्स और पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं.प्रकाशन के अवसर पर इनमे से कई कविताओं पर चर्चा के साथ खूब वाद-विवाद भी हुए हैं.व्योमेश शुक्ल ने अपने कविता संग्रह के आरम्भ में ही अपनी कविताओं को लेकर हुए विवाद की थोड़ी सी जानकारी दी है और ये कवितताएँ गद्य हैं या पद्य विवाद के संदर्भ में अपनी यह टिप्पणी  दर्ज की है कि ‘दरअसल मुझे खुद भी नहीं पता कि ये सभी कविताएं कविता हैं या गद्य’।हिंदी की दुनिया में विवाद कोई नयी बात नहीं है, हिंदी का आधुनिक मानस वाद-विवाद और सम्वाद से निर्मित हुआ है।हिंदी की आधुनिक कविता और उसकी समझ को लेकर कई संवादी विवाद हिंदी में हुए हैं इस विवाद को भी उसी सिलसिले में देखना उचित होगा. देखा जाये तो पद्य-गद्य लेखन की दो प्रविधियाँ हैं जिनमे समान रुप से कविकर्म संभव और रुचिकर है. कविता करना मनुष्य की नैसर्गिक भाव-वृत्ति है यह अपने आप में एक ऐसी बात है जो आधुनिक युग के तमाम राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक दबावों के बीच कविता को मनुष्य मात्र का संगी बनाये हुए है।भाव में ही वह प्रबल वेग है जो छंद-शिल्प और विधाओं का अतिक्रमण कर कलागत बंदिशों को तोड़ सके।समकालीन हिंदी कविता ने अपनी आधुनिक काव्य परम्परा से संवाद करते हुए ये काम बखूबी किया है।निराला से शुरू करें तो यह परम्परा बिल्कुल अभी के कवि व्योमेश शुक्ल तक चली आती है।इसे ऐसे समझें कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ठीक ही कहा था कि” ज्यों -ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी दूसरी ओर कवि कर्म कठिन होता जाएगा।”अब इस कठिनाई को कुछ लोगो ने मृत्यु तक समझ लिया और मारे उत्साह के उत्तरआधुनिक विचारों के प्रभाव में कविता के अंत तक कि घोषणा कर दी।कोई कठिनाई या चुनौती मनुष्य मात्र की जिजीविषा का परीक्षण करती चलती है,कवि मनुष्य जीवन का भावात्मक प्रतिनधि होने के नाते अग्रिम पंक्ति में खड़ा होकर इन सांस्कृतिक-सामाजिक कठिनाइयों से संघर्ष करता है और कविता के रूप में अपनी सांस्कृतिक नैसर्गिकता की रक्षा और संवर्धन करता है।ग़ालिब ने कहा है न “जी खुश हुआ है राह को पुरखार देखकर”। यानी कि सांस्कृतिक और भाषाई मोर्चे पर कोई कठिनाई या चुनौती हर्ष की बात होती है न कि विषाद या मृत्युबोध की।और वह कुछ नई रचनात्मकता उत्पादित करती है।कविता के सम्बंध में एक बात और समझ लेनी चाहिए कि कविता एक ऐसी विधा है जो अनुसंधानों और विचार संसार में निर्मित परिभाषाओं से उत्प्रेरित और उद्बुद्ध नहीं होती,बहुधा तो वह इनके प्रति निस्संग भाव रखती है।वह अनुभवों और आस्वाद पर भरोसा करती चलती है।इसलिए वह आगे-आगे चलती है पीछे से शास्त्र गढ़े जाते हैं।

व्योमेश शुक्ल ने अपनी कविताओं के लिए जो शिल्प रचा है वह अपेक्षाकृत नया है और गद्य की तरह लिखा गया है।परन्तु अपने अभिप्रायों और अर्थनिर्माण में कविता की विशेषता लिए हुए।हिंदी में कविता के विषय वैविध्य और नए-नए विमर्शों ने काव्य-वस्तु की एक वृहत्तर आकाशगंगा तैयार की है जिसके भीतर शिल्प का संघर्ष प्रायःअनदेखा और उपेक्षित रह जाता है मानो वह कोई वायवीय वस्तु हो।मुक्तिबोध की कविता कविता ‘मुझे कदम-कदम पर’ की एक  पंक्ति देखें- जीवन मे आज के/लेखक की कठिनाई यह नहीं कि/कमी है विषयों की/वरन आधिक्य उनका ही/उसको सताता है” शिल्प का सँघर्ष अनिवार्यतः एक रचनात्मक संघर्ष है और उसका सम्बन्ध भी काव्य-वस्तु की तरह ही वृत्तियों और विचार की जटिलताओं से निर्मित चुनौतियों से जुड़ा हुआ होता है।वह कोई सनसनी फैलाने या पाठक को चौकाने का स्थूल प्रयास नहीं है,उसका अनिवार्य सम्बन्ध जीवन के राग -रंग ,वृहत्तर जटिल होते परिप्रेक्ष्य की समझ और भावात्मक-वैचारिक संघर्ष से जुड़ा हुआ है।व्योमेश शुक्ल हिंदी के उन युवा कवियों में अग्रणी हैं जिन्होंने आगे बढ़कर ,जोखिम उठाते हुए इस चुनौती को स्वीकार किया है।व्योमेश शुक्ल की गद्य माफिक कविताओं में यह सहज ही देखा जा सकता है।गद्य की तरह सुसम्बद्ध रूप में लिखित कविता में कवि के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती होती है लय की।हिंदी में सामान्य पाठक या आलोचक को ऐसे शिल्प में लिखी गयी कविता में सबसे पहले जो चीज खटकती है वह है लय।वह संरचना को देखकर अपनी जड़ अभिरुचियों और आस्वाद के कारण यह समझ बैठता है कि ऐसी कविताओं में कोई लयबद्धता या कवितापन सम्भव नहीं है।ऐसी समझ हमें अपनी परम्परागत काव्य रुचि के प्रति रक्षणशीलता के कारण मिलती है।ऐसी ही एक रूढ़ रुचि है अनिवार्यतः  तुक में लय की खोज और इसके बाहर लयात्मकता की संभावना से इनकार।इन कविताओं में संरचनागत सुसम्बद्धता,गत्यातमकता और काव्यमर्म मिलकर लय का निर्माण करते हैं।

साफ झूठ शीर्षक कविता देखें-

शिकायतें वक्त से भी तेज गुज़र रही हैं

खुद को तुम्हारी मुस्कराहट से बदलती हुईं

उनकी फेहरिस्त में कई शब्द आ गए हैं,कई गैर शब्द

आगामी शिकायतों का संगीत

उन्हें लिखना स्वरलिपियाँ लिखना

और कोई चुपके-चुपके लगा रहता है कि अपनी महान हिंदी भाषा मे कुछ वाक्य लिख ले।

अरे महोदय,कितना पेट्रोल और पसीना बहता है ये सब करने में-उसका हिसाब लिखने में मन लगाओ,यही कर्तव्य है और तुम इसी के लायक भी हो।उनके कमरे में खिड़की खोलने से क्या फायदा?अपने खत्म होते अनुभवों पर भरोसा रखो।तकाझाँकी जैसी चालाकियाँ कुछ समय बाद शोभा देंगी।अभी तो तुम्हारे साफ़ झूठ में भी उसकी सच्ची हँसी की आहट है।

व्योमेश शुक्ल अपेक्षाकृत नए काव्य रूप-शिल्प की रचना करते है और इस नवता के साथ जोखिम अनिवार्य रूप से सम्बद्ध है। हम उल्लेख कर चुके हैं कि कवि ने अपनी भूमिका में अपनी कविताओं के गद्य या कविता होने को लेकर ‘सबद’ वेब पत्रिका में हुई बहसों का जिक्र किया है।उन बहसों से गुजरने के बाद यह लगता है कि वे अपर्याप्त हैं,इन कविताओं और इनके आस्वाद से जुड़ी मुश्किलों पर और तफसील से बात होनी चाहिए थी।वे बहसें स्थूल रूप में गद्य और कविता के सवालों पर ही केंद्रित हैं जहाँ तक मैं देख-समझ पाया।मूल समस्या आस्वाद-बोध की है,गद्य और कविता की बहस इस मूल समस्या का सहउत्पाद मात्र होना चाहिए।इस संबंध में एक सरलीकृत समझ हमें देखने को प्रायः ही मिल जाती है वह यह कि पाठक या आलोचक अपनी आस्वाद की परंपरागत रुचियों के प्रति रक्षणशील और आग्रही रहते हुए अपनी सीमा को ही कवि या कविता की सीमा मान लेना चाहता है और इसके लिए भरपूर प्रयत्न करता है।जिसके फलस्वरूप वह कविता में कुछ ऐसा ढूंढता है जो उसके बने-बनाये निकषों पर खरा उतरे।हिंदी में इस समस्या का हल आचार्य शुक्ल जैसे आलोचक ने बहुत पहले ही करने का प्रयास किया है वह इस तरह की उन्होंने विषय प्रवेश के माध्यम से हर कवि का प्रकृत निरीक्षण कर उसके काव्य मर्म को समझने का प्रयास किया और निकष तय किये जिससे उस कवि का समुचित और श्रेष्ठ मूल्यांकन हो सके।नई कविता के दौर में हम देखें तो यह मुश्किल हिंदी के दो श्रेष्ठतम कवियों मुक्तिबोध और शमशेर के साथ पेश की गयी कि ये समझ में नहीं आते और जो ढेर सारे कारण बताए गए उनका सार यह था की समस्या भाषा और शिल्प के स्तर पर है।आज भी हिंदी एकेडमिया में यह सहज ही देखा- सुना जाता है।यानी कि हम देखें तो विषय-प्रवेश यानी टेक्स्ट में प्रवेश करने की कठिनाइयों के सामने हथियार डालकर बहस भाषा और शिल्प पर केंद्रित कर देने का रिवाज नया नहीं है बल्कि यह सुविधावादी रोग हिंदी में काफी कुछ पुराना हो चला है।

        भाषा और शिल्प को हमेशा विचार के लिए दोयम दर्जे की वस्तु क्यों मान लिया गया?अगर इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाए तो हिंदी आलोचना की सीमा बहुत-कुछ स्पष्ट हो सकेगी और कविता के विस्तृत इलाके में पुनर्पाठ की संभावना विकसित होगी,कई नए सूत्र और और विचार-विमर्श के नए दरीचे खुलेंगे।यह समस्या यहीं तक सीमित रहती तो थोड़ी कम ही सही भली बात होती,अपनी भाषा-शिल्प और कलागत रूढ़ मान्यताओं की स्थापना और संवर्द्धन के लिए इन विचारों को दार्शनिक और वैचारिक आधार देने का प्रयास हुआ जो हिंदी की आलोचना और  वैचारिकी में कलावाद के नाम से जाना गया।कलावाद पद अपनी वस्तुगत सच्चाइयों से रूबरू होने के अर्थ में कम आरोप के रूप में हिंदी में ज्यादा प्रचारित और ग्रहण किया गया।हिंदी के कुछ खास कवियों के लिए जिनके यहां भाषा-शिल्प और कला का आग्रह थोड़ा ज्यादा मिलता है, उसे आग्रह कहना ठीक नही बल्कि वह सचेत प्रयत्न हैं जो संवेदना और जटिलतम वस्तु संसार की अभिव्यक्ति  के प्रयासों के रूप में ही निर्मित हुए हैं कि कविताओं को दोयम दर्जे की साबित करने के लिए ये महनीय प्रयास किये जाते हुये देखा गया है।हिंदी के सामान्य पाठकों और विद्यार्थियों में यह भावना सहज ही देखी जा सकती है।कलावाद का आरोप एक ऐसे मूल्य के रूप में विकसित किया गया जिससे विरोधियों को एकबारगी खारिज किया जा सके।यह समझ लेना चहिए की हिंदी में कलावाद अपने शास्त्रीय संदर्भो में प्रायः नहीं आया है।घनीभूत संवेदनाओं की अभिव्यक्ति और उस सिलसिले से शब्द और अर्थ के पारम्परिक सम्बंधों के बाहर जहाँ अभिप्रायों को कवियों ने व्यक्त किया और आलोचकों ने लक्ष्य किया वहां आसानी से कलावाद को आरोप की तरह प्रस्तुत कर दिया गया है।

   व्योमेश शुक्ल के यहां भी ये मुश्किलें पेश आ सकती हैं।सबद की बहसों की अपर्याप्तता की ओर इसीलिए संकेत किया गया है कि वहां इन प्रश्नों पर विचार नहीं किया गया।इन रूढ़ियों से मुक्त हुए बिना व्योमेश शुक्ल की कविताओं में विषय और वस्तु प्रवेश सम्भव नहीं है।व्योमेश शुक्ल ने हिंदी में खासी लोकप्रियता अर्जित कर चुकीं राजनैतिक कविताएँ भी लिखी हैं जिन्हें समझना मुश्किल नहीं है,वे कविताओं के भीतर वस्तु-सत्य का पता तो दे देती हैं लेकिन अपने कहन के कारण एक आगे बढ़ी हुयी संघनित काव्य रुचि की मांग करती हैं।जिसके बिना उसके वास्तविक अभिप्रायो तक नहीं पहुँचा जा सकता है और अर्थग्रहण में भी समस्या पेश आ सकती है।

‘एक दिन’ शीर्षक कविता देखें-

वृहस्पतिवार -तुम काजल लगा के नहीं आयी थी(उस दिन अपनी पेशी के दौरान नरेंद्र मोदी ने कई झूठ बोले और कई धमकियाँ दीं।)

या ‘एक और दिन’शीर्षक कविता-

शुक्रवार-फिर नहीं।(आज सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस महानुभाव ने तमाम गुज़रिशों के बावजूद मोदी के साथ मंच शेयर किया।)

‘होना था’ कविता का एक अंश-

(यह पूरी कविता एक बड़े कैनवास की कविता है जिसकी चर्चा प्रसंगानुकूल की जाएगी,यहाँ प्रस्तुत सन्दर्भ के लिए उसका एक अंश पढ़ें।)

भले ही माफिया डॉन को देना पड़े,अठारह की उम्र में बीजेपी के खिलाफ तुम्हारा पहला वोट होना था।

अपना वोट बीजेपी की नहीं देंगे कि वरीयता होना था।कुछ-कुछ विनोद कुमार शुक्ल होना था।कुछ तुम्हारा कुछ अपना कुछ विनोद जी का आदिवास होना था।

कभी- कभी मुझे बोलना था तुम्हारे मुँह से।तुम्हारा वाक्यविन्यास होना था।ऐन इसी सोहराबुद्दीनी मुहूर्त में गुजरात का कांग्रेसी राज्यपाल होना था।रोज-रोज़ मोदी के खिलाफ कानूनी तरीके से लिखा गया बहुत सुंदर राजकीय निबन्ध होना था।एक अभिनव केंद्र-राज्य संबध होना था।

मिर्ज़ा ग़ालिब के मशहूर शेर का मिसरा है-डुबोया मुझको होने ने,न होता मैं तो क्या होता।

इस एक वाक्य में ग़ालिब ने एक ही तरह की संवेदना के दो संवेगों के माध्यम से अपना अभिप्रायःस्पष्ट किया है।ऐसा ही कुछ व्योमेश शुक्ल की लगभग कविताओं में देखने को मिल जाता है।मसलन ‘कुछ हो सकता है तो कुछ भी हो सकता है’ शीर्षक कविता देखें-

जब कुछ भी हो सकता है तो तुम भी कुछ भूल सकती हो।तुम जानबूझकर या भूल से भी भूल सकती हो काजल लागना।यों उस महान क्रिया का जन्म होता है,जिसका नाम है काजल लगाना भूलना।

एक और कवितांश देखें- ‘या शायद’ शीर्षक कविता से।

कुछ भी हो सकता है तो कुछ नहीं भी हो सकता है।उनको देखने के लिए उनकी ओर देखना पड़ सकता है और यह तो अक्सर होता है कि उनको देखने के लिए उनकी ओर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

यह उलझन दूर तक जा सकती है और यह उलझन बीच में ही खत्म हो सकती है।

व्योमेश शुक्ल की कविताएँ एक नागरिक-कलाकार की कविताएं हैं।वे रंगकर्म से गहरे जुड़े हुए हैं।एक नागरिक के नाते उनकी राजनैतिक चेतना बनती और बनती चलती है और दूसरी ओर उनकी कला-जगत की विचार यात्रा में

साहित्य से बाहर की कला-प्रक्रिया भी खूब जमने पाती है।ये जो परस्पर सहचर अथवा विरोधी संवेगों का कोलाज आप देख रहे हैं इसका एक कारण उनका रंगकर्म है और दूसरा एक बेचैन नागरिक मन जो शायद ही कभी विचारहीन होकर सुस्त पड़ता हो।बाहर से काव्य-रूप देखकर कई बार यह लगता है कि ये संवेग और संवेदन व्यक्ति-मन के भीतर  चीन्हे-अनचीन्हे कई विचार सूत्रों की तीव्रतम आवाजाही से ही निर्मित होते हैं लेकिन जैसे ही आप काव्य की वस्तुमत्ता से जुड़ते हैं आप पाएंगे कि एक सचेत नागरिक बोध और एक आधुनिक कल्पनाशील- जटिल व्यक्ति मन की अंतःक्रिया से ये कविताएँ संभव हुई है

व्योमेश शुक्ल अपनी कविताओं में नवउदारवाद के बाद तेजी से पसरे सार्वजिनक उपक्रमों के निजीकरण,पब्लिक सेक्टर की दिन ब दिन खराब होती हालत और उसके कारणों की गंभीर पड़ताल करने वाले व्यख्याकार के रूप में भी सामने आते हैं।व्याख्याकार इसलिए कि वे ख़ुद को इन सवालों की वैचारिक परिधि में खड़ा करते हैं और उनसे जूझते हुए अपना पक्ष निर्मित करते हैं।वे किसी सरलीकृत फ़ॉर्मूलाइज्ड काव्य रूप से काम नहीं चलाते जहां कुछ तफसीलें व्यक्तकर किसी समस्या को प्रस्तुत किया जाता है या हद से हद आगे बढ़कर किसी ट्रैजिडी को साकार कर दिया जाता है।हम देखते हैं कि ऐसी कविताओं में दीर्घकालिक प्रभावशील तनाव नहीं मिलता फलस्वरूप वे पाठक के लिए कोई नया सवाल नहीं खड़ा कर पाती न ही कवि की ओर से किसी नई संवेदना का प्रस्ताव।इसे ऐसे समझिए कि जो समस्याएं आज और गहराई एवम विस्तार से सामने आ खड़ी हों और उसके लिए आपको पूर्वज कवियों की ओर बार-बार दौड़ लगानी पड़ें तो इसे रचंनशीलता के लिए कोई अच्छी और उत्साहजनक स्थिति नहीं कह सकते।हिंदी के परिदृश्य में कुछ युवा कवियों के प्रयत्न आपको जरूर दिख जाएंगे पर प्रायः अनुकरण और सरलीकरण की प्रवृति दिखाई देगी।घटनाप्रधान कविताओं का समूहगान सहज ही देखा जा सकता है।मैंने पहले भी कहा है है  कि व्योमेश शुक्ल कला के इलाके में किस तरह नए जोखिम उठाते हैं और चुनौतियाँ स्वीकार करते हैं।यहाँ भी व्योमेश शुक्ल से उम्मीद की जा सकती है।वे राजनैतिक और अपने समकाल को संबोधित करती परम्परा से रूढ़ अभिधामूलक प्रयत्नों में भी अपने कलागत वैशिष्ट्य के कारण कुछ नई संवेदनाओं को रच जाते हैं।सहित्य के क्षेत्र में कला की विशिष्ट भूमिका और महत्व आगे बढ़ी हुई संवेदना को रचने और समझने में ही है।यह ही किसी कवि का अपनी काव्य परम्परा में कुछ जोड़ना कहा जाता है और यही साहित्य इतिहास में उसकी  उपस्थिति का बायस बनता है।इस सिलसिले में हम व्योमेश शुक्ल की बहुचर्चित कविता ‘पों’ को पढ़ सकते हैं और मैं इस कविता को निःसंकोच व्योमेश शुक्ल की एक प्रतिनिधि और जरूरी कविता कहूँगा।यह कविता सन 2000 में बंद हो गए एक कारखाने और उसके भीतर से उठती सायरन की आवाज को केंद्र बनाकर लिखी गई है जो अपने समकाल की सभ्यतागत समीक्षा कर डालती है।शुरुआत की पंक्तियां देखें और फिर बात करते चलते हैं।

‘सुनिए उस कारखाने के सायरन की आवाज जो सन 2000 में ही बंद हो गया रोजाना 8 बजे,1 बजे ,2बजे,5 बजे धिन धिन धा धमक-धमक मेघ बजे’

यहां थोड़ा ठकरकर सन 2000 पर विचार करना जरूरी है।13 अक्टूबर 1999 को अटल जी के नेतृत्व वाली राजग गठबंधन की सरकार बनी,जिसने विनिवेश की गतिविधियों को तेज किया और बाकायदा 10 दिसम्बर 1999 को विनिवेश विभाग का गठन किया गया और 6 सितंबर 2001 को विनिवेश मंत्रालय का बनाकर अरुण शौरी को उसका मंत्री बनाया गया।इन बातों से प्रायः पाठक परिचित होंगे।ऐसा बताया गया कि इस विनिवेश मंत्रालय को सार्वजनिक क्षेत्र की घाटे वाली कंपनियों की हिस्सेदारी बेचकर मुनाफा अर्जित करने के लिए बनाया गया है।हालांकि बाद में कई कंपनियों की पूरी हिस्सेदारी बेची गयी और कई लाभकारी इकाइयों को भी बेच दिया गया।यह नरसिम्हा राव की सरकार द्धारा अपनायी गयी आर्थिक-औद्योगिक नितियों का ही विस्तार था,जिसे अटल सरकार ने तेज गति से बढ़ाया।और जो आज अपने पूरी तरह खुलकर जारी है। व्योमेश शुक्ल ने अपनी कई कविताओं में इस परिघटना और इसके परिणामस्वरूप बन रहे नए सत्ता और नागरिक चरित्र को प्रामाणिकता के साथ दर्ज किया है।किस तरह से ट्रेड यूनियनें समाप्त की गईं या उन्हें फैक्ट्री मालिकों और हुक्मरानों द्वारा कमजोर करके एक उन्हें एक दलाल भर की हैसियत में ही रखा गया।और इन सबके साथ कैसे एक दुनिया बदल रही थी,कैसे एक संस्कृति ढह रही थी ये व्योमेश शुक्ल की कई कविताओं की चिंता में प्रमुख है।इस पूरी परिघटना ने किस तरह प्रतिरोध और संघर्ष की जमीनी और वास्तविक संस्कृति को नष्ट कर बाजार प्रायोजित प्रतिरोधी मुद्राओं को गढ़ा और सर्वस्वीकृत बना दिया।किसी भी शासकवर्गीय शक्ति के लिए जनता का सापेक्षिक सांस्कृतिक अनूकूलन जरूरी है यह इन परिघटनाओं से समझा जा सकता है।बाजार की जनजीवन में पहुँच की शक्ति इस काम को आसान बना देती है।दुनिया भर की बात छोड़ भी दें तो पिछली दो शताब्दियों में हिंदी समाज के भीतर ही बाजार की भूमिका का अध्ययन बहुत कुछ साफ कर देगा।बाजार सिर्फ वस्तु का नहीं संस्कृति का भी उत्पादन करता है ये कहने की बात नहीं वह ।आपको जस का तस नहीं रहने देता बहुत कुछ बदल देता है।केदार जी की ‘दाने’ शीर्षक कविता में मंडी जाने के प्रसंग में दाने कहते हैं-

जाएंगे तो फिर लौटकर नहीं आयेंगे

जाते-जाते

कहते जाते हैं दाने

अगर आये भी

तो तुम हमें पहचान नहीं पाओगे

अपनी अंतिम चिट्ठी में

लिख भेजते हैं दाने।

व्योमेश शुक्ल इस सांस्कृतिक संकट और नई बौद्धिक और रजनीतिक और आर्थिक इजारेदारी को समझते हैं और उसे लक्ष्य भी करते हैं कैसे वे नागरिक जीवन को तहस-नहस कर डालती हैं।वे सायरन की आवाज के प्रतीक के माध्यम से बहुत कुछ सच्चा और मार्मिक रचते हैं।पंक्तियाँ देखें।

‘सायरन की आवाज न हुई ,ब्लैकहोल हो गया।बहुत सी चीजों का अंत हो जाता है उस आवाज की शुरआत में-पिता,पंचवर्षीय योजना,पब्लिक सेक्टर समूह,प्रोविडेंट फंड,ट्रेड यूनियन और हड़ताल-सब-सायरन के बजने की शुरुआत के बिंदु पर ही धड़ाम से पूरे हो जाते हैं।’

हम अपने समय की टकराहट के स्वरों में उपजे संघर्ष और प्रतिरोध के स्वरों की पहचान तो कर लेते हैं लेकिन इसी प्रक्रिया से उपजे दुःख और अवसाद के प्रति प्रायः हम निसंग हो जाते हैं।यही वह कारण है जो हमें करुणा और हमारी स्मृति से हमें काट देता हैं।बिना करुणा और स्मृति के दुख और अवसाद का कोई सामूहिक जातीय और रास्ट्रीय रूप बनान संभव नहीं है।फलस्वरूप हमारा प्रतिरोध और सँघर्ष बहुधा अधूरा रह जाता है।हमारा निजी अवसाद चाहे बहुत भला न हो पर उसकी सामूहिक शक्ति मुक्तिपथ का रास्ता खोल सकती है।हमें अवसाद के गढ़ें हुए स्टिरियोटाइप से भी मुक्त होने की जरूरत है।

“दिक्कत है कि लोग सायरन की आवज सुनना नहीं चाहते,नए लोग तो शायद सायरन की आवाज पहचानते भी न हों सायरन बजता है और वे उसकी आवाज को हॉर्न,शोर,ध्वनि प्रदूषण और न जाने क्या-क्या समझते रहते हैं।”

सायरन यहाँ उस संस्कृति की और संस्कृतिजीवी-श्रमजीवी मनुष्य की ही चीख है जो नए नागरिक को कहीं से बेचैन नहीं करती बल्कि परेशान जरूर करती है क्योंकि वह उसे असुविधाजनक लगती है,उसके जीवन मे खलल पैदा करती है।कई बार तो वह जान समझ कर भी मासूमियत के साथ नजरअंदाज कर देता है।इसलिए मैं हमेशा यह समझता हूँ की बड़े क्रन्तिकारी बदलावों की बात तो छोड़ ही दीजिये लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर भी किसी बुनियादी परिवर्तनकामी धक्के के लिए’आदर्श-नागरिक बोध’किसी काम का नहीं है।बल्कि अपनी तमाम दलीलों के बावजूद यह यथास्थितिवाद के पक्ष में मतदान ही है।

“नाक,कान ,गले के डॉक्टर ने मुझसे कहा कि तुम्हारे कान का पर्दा पीछे चिपक गया है और ढंग से लहरा नहीं पा रहा है-इसकी वजह से तुम्हें बहुत- सी आवाजें सुनाई नहीं देंगी तो मैंने उनसे कहा कि मुझे तो सायरन की आवाज़ बिल्कुल साफ़ सुनाई देती है-रोजाना 8 बजे,1 बजे,2 बजे,तो वह मुस्कुराए जैसे मेरा मन रखने के लिए कह रहें हों कि हाँ”

समर्थ कवि परम्परा और स्मृतिअन्वेषी होता है और इसके बिना कोई समर्थ राजनीतिक कविता रचना ज़रा मुश्किल है।बयान,मुद्राएँ तो सम्भव हैं पर किसी राजनीतिक विडम्बना का चित्रण और उसकी सापेक्षिक व्यख्या संभव नहीं है।मुक्तिबोध और अंधेरे में इसके बड़े उदाहरण हैं।बहरहाल व्योमेश शुक्ल की ये पंक्तियां देखें।सायरन के बजने का यह समय मजदूर के काम करने के 8 घण्टों का विभाजन है।यह प्रतीक जो बार-बार कविता में आता है,सार्वजनिक उद्यमशीलता,सामूहिकता,आधुनिक मन की समावेशिता और श्रम संस्कृति का आर्तनाद है।जिसे व्योमेश शुक्ल ने ठीक से समझा है।

“कभी-कभी धुएँ और राख और पानी और बालू में से उठती है आवाज़।वह आदमी सुनाई दे जाता है जो इस दुनियां में है ही नहीं, कभी-कभी मृत पूर्वज बोलते हैं हमारे मुहँ से।वैसे ही सायरन बजता है,रोज़ाना 8 बजे,1 बजे,2 बजे,5 बजे।”

व्योमेश शुक्ल इस नई बनती प्रतिसंस्कृति को समझते हुए उसके चाल-चरित्र और बोध का एक खाका भी खींचते हैं कि किस तरह यह सायरन की आवाज जो कि वस्तुतः एक आर्तनाद है की जगह इस नए समाज में नहीं है और यह है भी तो नए समाज की ध्वनियों ने उसकी जगह कुछ ऐसे ली है कि वह पसंद की जाती है।वह लोकप्रिय और कल्याणकारी रूप लेकर आई है।जिसे ग़ालिब ने कहा था-‘नगमा बन जाये हैं वाँ गर नाला मेरा जाए है।’

“जहां कारखना था वहाँ अब एक होटलनुमा पब्लिक स्कूल है स्कूल में प्रतिदिन समय-समय पर घण्टे बजते हैं लेकिन सायरन की आवाज के साथ नहीं बजते”

व्योमेश शुक्ल प्रायःअपनी राजनैतिक कविताओं में नेहरुयुगीन मॉडल की चर्चा करते हैं।पों कविता में जिस तरह नई आर्थिक नीतियों और नवउदारवाद से पैदा हुई त्रासदी का आख्यान दर्ज है वह पब्लिक सेक्टर के बर्बाद होते जाने की त्रासद कथा भी कहती चलती है।इस पहलू पर व्योमेश शुक्ल ने अपनी दूसरी कविताओं में भी काफी-कुछ कहा है जिसकी चर्चा हम प्रसंग के साथ करते चलेंगे। पहले हम एक और बात पर विचार करेंगे कि आज़ाद हिंदुस्तान के लिए संघर्ष के अंतर्विरोध और उसकी सीमाओं की पड़ताल उस तरह से मुखर रूप में हिंदी कविता में नहीं आयी है,जिसकी गाहे-बगाहे अपेक्षा की जाती है और कई बार तो उसे आरोप की शक्ल में हिंदी के कवियों पर चस्पा किया जाता है।अलबत्ता नेहरू युग से मोहभंग और तत्कालीन सत्ता की आलोचना निर्मम रूप में बाद के हिंदी कवियों ने की है,जिसके एक बड़े प्रतिनिधि कवि धूमिल हैं।जिसे हिंदी में जोर-शोर से चिंहित किया गया और उन कविताओं से राजनीतिक सत्ता की आलोचना का काम लिया गया।लेकिन यह सवाल अनुत्तरित ही रहा कि धूमिल जैसे तमाम कवियों का क्षोभ तत्कालीन सरकार की नीतियों से तो है लेकिन उनमें मूल्यों के क्षरण को लेकर कोई अवसाद या पीड़ा क्यों नही दिखाई देती।अब इस पूरे सिलसिले में जो मुश्किल पैदा होती है वह यह कि स्मृति की संवेदनशीलता के सहारे नेहरू युग,उनकी आर्थिक नीतियों और पब्लिक सेक्टर के विकास को देखने की कोशिश हिंदी कविता में न के बराबर दिखाई देती है।हम सत्ता की प्रयोजित संस्कृति को अपने प्रतिरोधी चरित्र का भी इस कदर हिस्सा बना चुके हैं कि हम मुख़ालफ़त और प्रतिरोध को भी सत्य की ऊपरी सतह की तरह ही पेश कर अपने साहित्यिक कर्म की इतिश्री कर लेते हैं जिसका एक रूप हमें आज़ादी के बाद से ही दिखाई देने लगता है।इससे और कुछ हो न हो अपने इतिहास,संस्कृति और परम्परा के मजबूत पहलू और उसके अंतर्विरोध हमारी विचार परिधि से धीरे-धीरे विलुप्त होते जाते हैं और हम उसके पीछे स्मृति और सत्य की आंतरिक परतों को इतिहास-चक्र के भरोसे छोड़ देते हैं।जो कालांतर में जनविरोधी सत्ताओं द्वारा अपने ढंग से आसानी से बिना किसी गंभीर चुनौती एवं कठिनाई का सामना किये बिना अनुकूलित कर ली जाती हैं।व्योमेश शुक्ल ने अपनी कविताओं में इस अभाव को दूर किया है।वे पूरी सजगता से उस दौर में प्रवेश करते हैं और और उनके साथ होती है स्मृति की संवेदनशीलता।हिंदुस्तान का राष्ट्रीय आंदोलन हमारी निकटतम सामूहिक स्मृति है जिसने बड़े पैमाने पर हमारे राष्ट्रीय चरित्र को गढ़ा है।लेकिन नई व्यवस्था ने सबसे तेज उसी का शिकार किया है और यह यूँ ही नहीं है इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्य जो आज भी क्रूर और जनविरोधी सत्ता के लिए असुविधाजनक स्थिति पैदा कर सकते हैं।इसकी पड़ताल करनी हो तो सिर्फ दूरदर्शन के प्रसारण का सिलसिलेवार अध्ययन कर लिया जाए तो स्थिति बहुत साफ हो जाएगी।हिंदुस्तान की संविधान सभा और आज़ाद हिंदुस्तान की नेहरू सरकार वह आखिरी मजबूत समाज- समय है जहाँ राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्य अपने अधिकतम लक्षण और चरित्र के साथ उपस्थित हैं।व्योमेश शुक्ल की एक लंबी कविता ‘जस्ट टियर्स’ का यह अंश देखें-

“मैं नेहरू के ज़माने का बाँध होता तो राष्ट्र की संपत्ति होता।मेरे बनने में सबकी दिलचस्पी होती।पंद्रह दिन पर पंत जी और महीना पूरा होने पर पंडित जी मेरा जायजा लेने आते।मैं बहुत से लोगो को विस्थापित कर देता और बहुत सी मछलियों को संस्थापित, लेकिन विस्थापितों के लिए रोने में मुझे जस्ट टियर्स की ज़रूरत नहीं पड़ती*****************मेरे भीतर बहुत सा पानी होता और बहुत-सी बिजली और बहुत-सी नौकरी और बहुत से फाटक और बहुत सी कर्मठता और बहुत-सी ट्रेड यूनियनें और बहुत-सी हड़ताल और बहुत सी गिरफ्तारी और बहुत सी नाफरमानी।”

व्योमेश शुक्ल की लंबी कविता ‘जस्ट टियर्स’ हिंदुस्तान की राजनीति और उसकी संस्कृति के महाआख्यान की कविता है। जस्ट टियर्स एक आईड्राप का नाम है,जो डॉक्टर्स आंखों की सफाई के लिए लिखा करते हैं।वह एक मशीनी सभ्यता की जरूरत से पैदा हुआ बाजारू उत्पाद है।जिसे कृत्रिम लुब्रिकेशन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।व्योमेश लुब्रिकेशन की निरंतर होती हुई कमी और उसकी पूर्ति के लिए जस्ट टियर्स के माध्यम से एक शसक्त केंद्रीय रूपक गढ़ते हैं जो इस कविता का केंद्रीय नाभिक बनकर सामने आता है।यह दो के बीच मे तीसरे की उपस्थिति की जरूरत और तीसरे की अनुपस्थिति से उत्पन्न त्रासद स्थिति का सारगर्भित रूपक है।

“लुब्रिकेशन कम हो गया था।हर चीज दूसरी चीज से रगड़ खा रही थी।माँ के घुटनों की तरह।हर पहले और हर दूसरे के बीच तीसरे तत्व का अभाव था।पलक झपकाने में भी बड़ा घर्षण था।लोग एकटक देखते रह जाते थे।यह देखने की मजबूरी थी।****************अब आंखों और पलकों के बीच की चीज गायब थी तो रोना मुश्किल हो गया।लोग रोने के लिए घबरा गए।बाँधों,घड़ियालों और दलालों को भी दिक्कत हो गई।डॉक्टर पेड़ के अजीब के पड़ोस में बैठकर लुब्रिकेशन की दवा लिखने लगे।दवाई का नाम था-जस्ट टियर्स।”

कविता के आरम्भिक हिस्सो में भी यह ‘पेड़ का अजीब’पद आया है।इस कविता में यह पद और जगहों पर भी आता है।हम जिस वस्तु से अपरिचित होते हैं या जो अनुभव हमारे बोध का हिस्सा नहीं होता है हम उसे सामान्य स्थितियों में अजीब कह लिया करते हैं।पेड़ का अजीब इस पूरी कविता में एक ऐसी जटिल स्मृति या जीवन बोध का स्वरूप है जो हमारे साथ मौजूद तो है पर जिससे हम प्रायः पलायन कर जाना चाहते हैं।उसकी व्याख्या और विश्लेषण हमारे सुचारू रूप से गतिमान मध्यवर्गीय जीवन को असुविधाजनक स्थिति में ला सकता है।पेड़ का अजीब उन अनुत्तरित और अब अछूते  से सवालों का प्रतीक है जो हमारी सामूहिक चेतना से विस्मृत हो चला है या की गायब कर दिया गया है।इसे पों कविता में नियमित अंतराल से बजने वाले घण्टों की ध्वनि से भी समझा जा सकता है जो सबको सुनाई नहीं देती।वह न डॉक्टर को सुनाई देती है न रमेश को।परन्तु वह वाचक को लगातार सुनाई देती है।पों कविता में वाचक अपने दोस्त से कविता के शुरू में कहता है कि” आइए तो मिलकर पता लगाया जाय कि वह आवाज आती कहाँ से है” और यह प्रश्न आखीर तक कविता में मौजूद है बल्कि आखिर में यह सवाल और संघनित रूप से सामने आता है-“आइए यार,तो ढूंढा जाय कि सायरन की आवाज़ कहाँ से आती है और हम लोग कहाँ हैं?” बहरहाल जस्ट टियर्स कविता का यह आरम्भिक अंश देखिए-

“जिला अस्पताल के बाहर एक पेड़ था और मरीज को उसका नाम नहीं मालूम था।वसंत में उसका यौवन और उसकी खिली हुईं आपत्तियां नहीं मालूम थीं।**********एक दिन एक लड़की ने मुझसे पूछा कि तुमने अस्पताल के बाहर वाले पेड़ का अजीब देखा है तो मैंने कहा की हा।यह देखने का साझा था।”

हम पहले भी कह चुके हैं कि जस्ट टियर्स यांत्रिक सभ्यता का उत्पाद है और वह जिस जन संस्कृति की जगह लेने को आतुर है या ले रहा है उस जन संस्कृति के संदर्भ में व्योमेश शुक्ल कविता में कोई बयान नहीं देते बल्कि जीवनानुभव के माध्यम से उसे स्पष्ट करते हैं।और जनजीवन की सामूहिकता और परस्परता के अवमूल्यन की तरफ इशारा करते हैं।आप देखेंगे कि किस तरह किस तरह बाजार के ऐसे कृत्रिम उत्पादों के बीच एक सहसम्बन्ध निर्मित हो रहा है जो कि वास्तविक रूप से मनुष्य जीवन के बीच होना चाहिए जिसका अभाव अब प्रायः ही देखा जाता है।यांत्रिक-कृत्रिम उत्पादों के सहसम्बन्ध का विस्तार हमारी राजनीति और हमारी चेतना तक विस्तृत है।बाजार हमारी नैसर्गिक वृत्तियों को ही माध्यम बनाता है, धीरे-धीरे वही मुनष्य को अपनी सच्चाई मालूम पड़ने लगती है और वह उन सब का सहज स्वीकार कर लेता है।

“जस्ट टियर्स।यह जस्ट फिट का कुछ लगता था।फूफा के लड़के का दोस्त टाइप कुछ।जस्ट फिट और जस्ट टियर्स के बीच कुछ था जो हर पहले और हर दूसरे के बीच के तीसरे तत्व की तरह आजकल नहीं था,जैसे जस्ट फिट नाम की दुकान के ऊपर रहने वाले इंसान और जस्ट टियर्स नाम की दवाई बेचने वाले इंसान के बीच कुछ था जो आजकल नहीं था।”

व्योमेश शुक्ल कविता अपनी इस कविता में बाजार के पूंजीपरस्त जिस मॉडल की आलोचना करते हैं वह जैसा कि हमने पहले भी कहा है वह हमारी नैसर्गिक और श्रम-साधना पूर्वक अर्जित संस्कृति के भीतर से ही प्रवेश करता है।यह वह इलाका है जहाँ से वह अपनी विश्वसनीयता और स्वीकार्यता निर्मित कर सकता है।कविता में उल्लिखित तीसरे जरूरी तत्व के रूप में लुब्रिकेशन के रूप में हमारे जनजीवन और संस्कृति में प्रवेश करता है और उसका हिस्सा बन जाता है।

“जर्जर पांडुलिपियाँ एकदूसरे से रगड़ खाकर टूट रहीं थीं।महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘सरस्वती’ की पांडुलिपियों का बंटाधार हो गया।भारतेन्दु की ‘कवितावर्धिनी सभा’ और ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ की फाइलें पहले ही ठिकानें लग गयीं थीं।आचार्य रामचंद्र शुक्ल-सम्पादित ‘हिंदी शब्द सागर को ‘सभा’ के ठेकेदारों ने गैरक़ानूनी तरीके से,पैसा लेकर ‘डिपार्टमेन्ट ऑफ एजुकेशन’,यूनाइटेड स्टेट्स की ‘साउथ एशियन डिक्शनरीज़’ नाम की वेबसाइट को बेच दिया है।यानी अब वह शब्दसागर बनारस में नहीं है अमेरिका में है”

कविता के इस अंश की अगली पंक्तियों में व्योमेश शुक्ल ने उस तीसरे तत्व की शिनाख्त की है जो पूंजीपरस्त बाजार के सहारे अपने लोककल्याणकारी रूप में हमारे सामने आता है और अपना बनकर नए सांस्कृतिक और सभ्यतागत उत्पाद का लोभ और मोह प्रस्तुत कर अपनी ही परम्पराओं और उपलब्धियों के प्रति  वह मनुष्य और एक भरे-पूरे समाज को कुंठित कर उसकी उपेक्षा करने में सफल होता है।इस पूरी परीयोजना का सबसे बड़ा नेता और झंडबरदार अमरीका है।जिसने दुनिया भर में लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर सबसे ज्यादा खून बहाया है और उसकी आड़ में मुनाफ़ाखोरी को बेलगाम अंजाम दिया है।राजनीतिक साम्राज्यवाद के दौर में यह नारा थोड़ा बदला हुआ था उस ज़माने में साम्राज्यवादी ताकतों ने दुनिया के तमाम मुल्कों में सभ्य बनाने की मुहिम चलाई थी।यहीं वह लुब्रिकेशन भी दिखाई देगा जहां उसे नहीं होना चाहिए था।जिस साम्राज्यवाद और उसकी लूट से मुक्ति के लिए दुनिया भर में बड़े संघर्ष हुए और तमाम मुल्कों ने अपनी -अपनी राजनैतिक और सांस्कृतिक लड़ाई लड़ी उसे इस नए वैश्विक पूंजीवादी लूट-खसोट का सामना करना पड़ा।यहां उस लुब्रिकेशन के रूप में अपनी सांस्कृतिक विरासत को एका में ढालने वाले और समृद्ध करने वाले राष्ट्रीय आंदोलन और तद्जनित राजनैतिक-सामाजिक लोकतंत्र और लोकतांत्रिक विचारों को होना चाहिए था पर अफसोसनाक है कि उस लुब्रिकेशन के रूप में,दो के बीच उस तीसरे तत्व के रूप में अमरीका और उसकी सक्रिय पूंजी के सहारे आर्थिक उपनिवेश के विचार और महाअभियान ने वह जगह ले रखी है।

“लेकिन जैसा कि अमेरिकीकरण के हर आयाम के बारे में सच है,उसमें कुछ न कुछ मज़ा ज़रूर होता है,वह शब्दसागर भी इंटरनेट पर लगभग मुफ़्त देखा जा सकता है।ठीक है कि पिछले पचास सालों में यह डिक्शनरी एक बार भी अपडेट नहीं हुई है,होगी भी नहीं, लेकिन अब कम से कम देखी तो जा सकती है।एक मज़ा और भी है।इस बार पहले और दूसरे के बीच तीसरा तत्व है।हमारे और शब्दसागर के बीच अमेरिका है।और क्या तो लुब्रिकेशन है।”

हिंदुस्तान का लोकतंत्र जनता की अर्जित संपत्ति है।जो कि महनीय प्रयासों से अर्जित की गयी है।इसके साथ जो दो महत्वपूर्ण उपलब्धियां जुड़ी हुई हैं वह यह कि आसन्न संकट के प्रति संघर्ष और और दूसरी यह कि  शोषण के पारम्परिक संस्थाओं और इकाइयों की मुख़ालफ़त।छायावाद पर विचार करते हुए इस पर नामवर जी ने खूब ठीक से लिखा है।1857 को हिंदी नवजागरण का प्रथम चरण माना जाता है और उसका विकास भारतेन्दु और द्विवेदी युग तक सम्भव हुआ दिखाया जाता है।राष्ट्रीय अंदोलन की सीमाओं और उपलब्धियों को प्रश्नांकित करने के लिए प्रायः 1857 को एक मूल्य की तरह प्रस्तुत करने का प्रस्ताव भी हिंदी में देखा सुना गया है।हिंदी नवजागरण की धारा का अक्षुण्ण और अखण्ड मूल्यांकन न होना इस समस्या को जन्म देता है।1947 की आज़ादी के साथ ही नवजागरण का काम हिंदी जगत में पूरा मान लिया गया और उस पर तीखे और नासमझी से भरे आरोप तब लगने शुरू हुए जब नेहरू युग से मोहभंग की कविताएं हिंदी में लिखी जानी शुरू हुईं जो लोकतंत्र विरोध की सपाट और नासमझ बयानबाजी तक जाती हैं।नेहरू की आड़ में जिस तरह से लोकतंत्र पर हमले किये गए और राष्ट्रीय आंदोलन की उपलब्धियों को कमतर आंकने की जो प्रवृत्ति चल पड़ी उसने हिंदुस्तान के साहित्यिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य में फ़ासीवादी विचारों के लिए खाद-पानी का काम किया इसमें कोई सन्देह नहीं।व्योमेश शुक्ल जैसे युवा कवि यदि इन बातों की शिनाख्त कर रहे हैं तो ऐसे कविकर्म को मूल्यवान समझना चाहिए।प्रतिकार और प्रतिरोध की सम्यक विचारवान संस्कृति लंबे समय तक सभ्यता विमर्श करने वाली सांस्कृतिक बहसों की देन हैं जो राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं और संस्कृतिजीवीयों का प्रमुख दाय है। व्योमेश शुक्ल की विवेच्य कविता का यह अंश देखें-

“लुब्रिकेशन प्रतिकार की तरह कम हो गया था।मैं प्रतिकार की सही दिशा और उसका ठीक समय होना चाहने लगा।मैं प्रतिकार पढ़ना चाहने लगा तो मेरे अध्यापक ने मुझसे कहा कि पहले तुम्हें नकली प्रतिकार से चिढ़ना सीखना होगा।उन्होंने खाँसते-खाँसते कहा कि जिस बात से लोकतंत्र में तुम्हारा भरोसा कम होता हो वह अराजनीतिक बातें होनी चाहिए फिर उन्होंने कहा कि आंदोलन यदि लोकतंत्र को मजबूत नहीं बनाता तो वह व्यक्तिवाद और पाखण्ड है और फिर उन्होंने कहा कि अत्याचारी का कहना मत मानो”

जैसा कि पहले भी चर्चा की गई है कि किस तरह राष्ट्रीय आंदोलन की स्मृति हमारी सामूहिकता और लोकतांत्रिक सभ्यतागत विमर्शों की वास्तविक स्मृति है और वह धीरे-धीरे क्षरित हो रही है।यहाँ शिक्षक को गांधी की तरह भी समझ सकते हैं और वह वाक्य तो बार-बार दुहराया ही जाना चाहिए कि अत्याचारी का कहना मत मानो।

व्योमेश शुक्ल की एक और महत्वपूर्ण कविता है”जैसे वैसे”।यह कविता इसलिए महत्वपूर्ण है कि इस कविता में व्योमेश शुक्ल ने बिम्बविधान के लक्षणों का रूपांतरण ‘तफसील’ के रूप में किया है।इसे समझने के लिए शमशेर की कविता ‘वह सलोना जिस्म’ को याद कर सकते हैं।जिसमे शमशेर ने अनुभूति को व्यक्त करने के लिए बिम्बों का सघन कोलाज रचा है।व्योमेश शुक्ल ने अपनी कविता के पहले  हिस्से में कुछ सघन मंतव्य व्यक्त किये हैं और दूसरे हिस्से, जिसे पहले के सापेक्ष समझने का प्रस्ताव  है में कुछ-कुछ अमूर्तन का विधान रचा है।यानी कि यहाँ परम्परा से चली आ रही अभिव्यक्ति और अर्थग्रहण की चेष्टाओं को उलट दिया गया है।और ऐसा करने के पीछे व्योमेश शुक्ल जीवन के अनुभूत सत्य का रूपान्तरित वैचारिक समाधान भी प्रस्तुत करते हैं।यह अपने आप मे दुर्लभ है।ऐसा प्रयोग समकालीन हिंदी कविता में मेरे देखे से तो कहीं नहीं ही मिलता।कभी-कभी सत्य को जानने के लिए दृश्य को सीधे नहीं आड़े देखना होता है।तीसरे पैरा की पंक्तियां देखें-

मूल परछाइयों से ही जन्म लेते हैं

निग़ाह से जन्म लेते हैं दृश्य।

सपने में पानी बरसता है तो लगता है नींद में बरस रहा है

और सुबह कोई किसी से पूछता है…

कल पानी बरसा था?

इस संग्रह की एक और उल्लेखनीय कविता है ‘सड़क’ यह कविता स्मृतियों का सघन दस्तावेज है और उसके नष्ट होते जाने की दारुण यातना झेल रहे कवि का आत्मवक्तव्य।यह पीड़ा का प्रलाप नहीं है,स्मृति प्रलाप होती भी नहीं वह बीते यथार्थ का सहज प्रामाणिक दस्तावेज़ होती हैं।वे सायास चयनित खण्ड यथार्थ नहीं होती बल्कि  संवेदना की निरंतरता का अन्वेषण और उनसे संवाद का बायस होती हैं।ग़ालिब ने भी लिखा है –

सब कहाँ कुछ लाला ओ गुल में नुमायां हो गयीं

ख़ाक में क्या सूरते होंगी की पिन्हां हो गयीं

व्योमेश शुक्ल लिखते हैं-

बिल्कुल अभी के अनुभव जीवाश्म बनते हैं,झांकते हैं सड़क के आईने में से

लोग देखते हैं अपनी बीती हुईं शक्लें

कभी पत्ता,कभी पींक,कभी गोबर

इस बात के मरणधर्मा प्रमाण कि कभी थे

यह संग्रह हिंदी साहित्य और कविता की प्रौढ़ता का दस्तावेज कहा जा सकता है वह इस अर्थ में कि इसने विधागत वैशिष्ट्य को बनाये रखते हुए लेखन प्रविधियों की आवाजाही और सहसम्बन्ध को संभव  बनाया है। इस संग्रह के बहाने आप हिंदी में कुछ नया और मौलिक होने के साक्षी बन सकेंगे।आप समझ सकेंगे कि कविता में शिल्प का संघर्ष कितना महत्वपूर्ण है और यह आधुनिक मनोरचना के लिए कितना अनुकूल और ज़रूरी है.यह संग्रह कविता दर कविता आपको अपने अनूठेपन के कारण आकर्षित करता है,कहीं कहन की विशिष्ट शैली और वस्तु जगत एवं शिल्प की परस्परता यानी कि वस्तु संसार के अनुभवगत लक्षण शिल्प में भी देखे जा सकते हैं।शिल्प भी किस तरह जीवन-सत्य की ही छाया या एक हद तक प्रतिरूप है,इसका सहज उद्घाटन इस संग्रह की कविताओं में देखा जा सकता है।शमशेर की माफ़िक जहाँ अमूर्तन,एक तरफ टेक्निक है और दूसरी तरफ काव्य वस्तु के रूप में भी उपस्थित है.

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2 comments

  1. विवेक निराला

    कवि व्योमेश शुक्ल और उनके कविता-संग्रह पर डूब कर लिखने वाले मानवेन्द्र -दोनों को खूब बधाई। बढ़िया समीक्षा।

  2. रजनीश कुमार

    बहुत अच्छा लेख है ।

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