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मृणाल पाण्डे की कथा ‘राजा की खोपड़ी उर्फ अग्रे किं किं भविष्यति?’        

प्रसिद्ध लेखिका, संपादक मृणाल पाण्डे आजकल प्रत्येक सप्ताह एक बोध कथा लिख रही हैं जो बच्चों को न सुनाने लायक़ हैं। यह आठवीं कड़ी है। इन पारम्परिक बोधकथाओं को पढ़ते हुए समकालीन समाज की विडंबनाओं का तीखा बोध होता है। जैसे यह कहानी देखिए इनमें किस भविष्य की आहट है-

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बच्चों को न सुनाने लायक बालकथा-8

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एक गांव में एक बहुत विद्वान् ज्योतिषी रहता था।बडा ही शांतसुभाव, सुशील और खानदानी तौर से गरीब।वजह यह, कि उसके पुरखे भी अपनी किताबों की दुनिया में ही डूबे रहनेवाले गरीब थे।

खैर! जैसा कि गरीबों में अक्सर होता है, ज्योतिषी की एक झगड़ालू  पत्नी थी।और उसके अक्लमंद होते हुए भी अनियमित शिक्षकोंवाली गांव की शाला में पढने को मजबूर दो बेटे भी मां की ही तरह ज्योतिषी से नाखुश रहते थे।पत्नी हमेशा से ऐसी नहीं थी,पर शादी के बाद लगातार अपनी गरीबी और बेटों की पढाई लिखाई पर मायकेवालों के ताने सुन सुन कर वह अपने वर्तमान और अपने बेटों के भविष्य को लेकर पति को मौके बेमौके खरी खोटी सुनाती रहती थी।मां की बड़बड़ाहट सुन सुन कर बड़े हुए बेटे भी बाप से कटे कटे रहते।

एक बार बाहर गांव से ज्योतिषी को किसी बहुत बडे मंदिर के निर्माण के भूमिपूजन की सही साइत निकालने के लिये न्योता आया।परिवार खुश हुआ जब घर पर ही चिंतन मनन करनेवाले ज्योतिषी महाराज काँख में पोथी पत्रा दबा के निकल पड़े।

‘अपने काम की एवज में उन लोगन से जरा देखभाल के अच्छा सा सीधा मांग लाइयो’, कह कर पत्नी ने किवाड़ बंद किये।भीतर से पिता को जाते देख रहे बेटे बोले, तू समझती है के पिताजी मुंह खोल के कुछ भी मांगेगे?

माँ ने एक लंबी उसांस भर कर सिर हिला कर कहा, ‘ना। पर कहनो तौ मोर धरम थोई।’

फिर वह बाहर जा कर गोबर थापने लगी।

मंदिर बनवानेवाला गाँव पुराना तीरथ था और पास में वाके और ज्योतिषी जी के गाँव के पास एक, बड़ी जो है सो एक नामी नदी बहती थी।बताया जाता था पुराने समय में उधर रिषियन देवतन को वास भी रहा हैगा।

चलो, ज्योतिषी की पत्नी ने अपने आप से कहा, जिजमान लोग तौ खाते पीते हैंगे।और कुछ नहीं तो कम से कम शाम की रोटी लायक अनाज और एकाध जोड़ी कपड़े और छाता तो उनसे इस बार मिल ही जायेगा।हे ईश्वर तू ही तारणहार’, कह कर उसने हाथ धोये और पुरानी पिचकी गगरी उठा कर पानी लाने चली गई।

साइत विचारते, पुजारियों से जिरह करते, सामग्री की फेहरिस्त बनवाते  ज्योतिषी को शाम हो गई।गाँव वालन से जो कुछ दान दक्षिणा मिली उसे देखे बिना आशीर्वचन कहि के, आदतन अपने फटे झोले में सब सामान समेट लयो और सूरज डूबे से पहिले घर को चल पड़े।

जल्दी की वजह ये, कि उन दोनो गाँवों के बीच रास्ते में नदी के किनारे एक मसान भी पड़ता था।वहाँ एक बहुतै पुरानो पीपल को पेड़ हतो।कहते थे उस पर एक किसी मुनकट्टा भूत का बासा था जो कभी कभार वहाँ से गुज़रते लोगन को रोक के कहतो, ‘ला मेरा मुंड!’

भुतहा पेड़ देख कर ज्योतिषी महाराज का मन छन भर को पीपल पात की तरह डर से डोला, तौ उन्ने उसे हाथ जोडे और इष्ट देव को याद किया।अचानक उनको वहाँ पीपल की जड़ों के बीच मिट्टी में लथपथ खोपड़िया पड़ी नज़र आई।उनको लगी कि शायद हाल में जब नदी चढी हुई थी तौ कहीं से ये खोपड़ी नदी की धार में बह कर आई हो और पानी उतरने पर पीपल की जड़ों में अटकी रह गई हो।जो हो, जिस बेचारे की हो, वे ही क्यों न जलांजलि देके उसे नदी में प्रवाहित कर दें।फिर न जाने क्यों उनके मन ने कहा, कि खोपड़िया तौ नदी माता ही यहाँ धर दीन है, तनी देख तौ मूरख है किसकी ?

ज्योतिषी को अपने पुरखों से जातकों के ललाट पर विधाता की लिखी लिपि पढ सकने का एक दुर्लभ ज्ञान हासिल था।सो उसने पास जा कर आस्तीन से तनिक पोंछ कर खोपड़ी को ऊठा कर पास जलती चिता की रोशनी में ललाट लिपि पढनी शुरू की।

यह क्या? खोपड़ी  के ललाट पर विधाता की लिखी लिपि की कुल्ल दो तीन लाइनें ही पढ कर वह चौंक पडा।यह तो किसी ऐसे वैसे नहीं, पुराने वक्त के एक बहुत प्रसिद्ध योद्धा की खोपड़ी थी, जिसका राजपाट सात नदियों, चौदह भुवनों तक फैला हुआ था।इस ललाट की इबारत तो ठीक से पढनी ही होगी,ज्योतिषी ने सोचा।और फिर खोपड़ी  को नदी के पानी में धो पोंछ कर ज्योतिषी ने अपने जिजमान से अभी अभी मिले कोरे रेशमी गमछे में सादर लपेट कर खूब एहतियात से अपनी थैली में डाल लिया |

घर पहुंचा तो दोनों बच्चे और पत्नी आदतन दरवाज़े पर ही उसकी वापसी के इंतज़ार में खडे थे।

‘क्या क्या मिला सीधे में वहाँ से?’ पत्नी ने पूछा।बच्चों ने टटोलने को हाथ बढाया कि कछु मिठाइयाँ भी मिलीं हैं क्या? सबके सवाल टालते हुए ज्योतिषी ने पहले थैली से गमछे में लपेटी खोपड़ी निकाली और उनको थैला थमा कर यह कहता हुआ अपने पूजा पाठ के कमरे में घुस गया, कि वे लोग खाने के लिये उसकी प्रतीक्षा न करें, वह खा कर आया है।

पत्नी ने बेटों को देख कर कहा, चलो फिर।इनका के? कोई किताब लेके रात भर दिया जलाके पढेंगे।तेल जल्दी खतम होगा तो क्या इनके पुरखों के पिरेत देंगे? सोचा था कि एक रेशमी गमछा मिला तो अपने लिये सलूका सिल लूंगी, उसमें जाने का लपेट लाये हैं।

भडास निकाल कर पत्नी और बच्चे शेष थैली टटोल कर चीज़ बस्त धरने के बाद अपनी रूखी सूखी खाने में लग गये।

ज्योतिषी आतशी शीशा लगा कर रातभर राजखोपड़ी  के ललाट पर विधाता के लिखे राजा के जीवन की कथा बाँचता रहा।

अहा, कैसे कैसे तो उतार चढाव, कैसे अद्भुत रहस्य उकेर रखे थे विधाता की कलम ने! कैसा रहा होगा वैसा जीवन! ज्योतिषी ने उसांस भर कर सोचा। अंत का एक वाक्य लेकिन ज्योतिषी के पल्ले भी नहीं पडा जहाँ विधाता ने लिखा था:  ‘अग्रे किं किं भविष्यति?’ यानी इसके आगे और भी जाने क्या क्या होना है!

दयालु ज्योतिषी ने सोचा, हो न हो, यही उस मुनकट्टा भूत की खोपड़ी  है जिसकी तलाश में उसका पिरेत जो है सो पीपल पर बासा डाले पड़ा है।कल से पितृपक्ष शुरू हो रहा है।सर्व पितृ अमावास्या के दिन इस बेचारे के मुंड़ का ठीक से तर्पण कर करा के इसे नदी में विसर्जित कर दूंगा तो अंत: उस बेचारे की प्रेतमुक्ति हो जायेगी।मेरा ध्यान उस पेड़ की ओर दिला कर शायद दयामय विधाता ने इसी तरफ इशारा भी किया हो।

अगली सुबह जब ज्योतिषी अपने पूजा पाठ के कमरे से बाहर आया तो उसकी आंखें गुड़हल के फूल की तरह लाल लाल थीं, जैसे रात भर न सोया हो! चुपचाप उसने गमछा उठाया और नहाने के लिये तालाब को चलने को उद्धत हुआ।

‘सुन,’ उसने पत्नी से कहा,’ मेरे पूजा कक्ष के आले में एक बहुत कीमती चीज़ मेरे गमछे में लिपटी हुई धरी है।उसको न तू हाथ लगईयो न बालकन को उधर जाने दीजो।बस हलके हाथन से साफ सफाई भर कर दीजो।’

यह कह कर पति तो निकल गया, पर पत्नी की अंतड़ियाँ  कुलबुलाने लगीं।

कीमती चीज़ माने? हो सकता है कुछ सोना चाँदी मिला हो जिसे यह मुझसे छुपाना चाहता हो? कहीं कछु और चक्कर तो नाँय है? मरद जात! अरे जब मुनि रिषी भी भ्रष्ट हो चुके हों तौ किसका भरोसा? यह सोच कर जब उसके बच्चे पाठशाला में थे, उसने इधर उधर ताक कर झाडू से पूजाघर की सफाई शुरू की। आले पर एक वह अजीब गोलाकार चीज़ थी ज्योतिषी के नये गमछे में लिपटी हुई, जो पति ने उसे झोला देने से पहिले निकार लई थी।उसकी उत्सुकता रोके न रुकी तो उसने भीतर से कुंड़ी  लगाई और गमछा हटाया।

यह क्या? गमछे में तो किसी मुर्दे की खोपड़ी धरी थी।

क्या मसान साध कर आया होगा उसका पति?

लेकिन काहे? वह तो तंत्र मंत्र और काले जादू टोने, वामाचार इन सबके खिलाफ था वरना मूंठ मारण या वशीकरण से और कईयों की तरह अब तक लाखों का मालिक बन चुका होता!

हो न हो यह खोपड़ी उसकी किसी गुप्त प्रेमिका की होगी जो चल बसी।कर्कशा ने तय किया।उसी अफसोस में मेरे मरद ने न रात को खाना खाया, न सोया।रात भर खोपडिया के साथ बैठा रहा।

हुंह! मेरी बला! सौतन मर गई तौ मेरा पिंड छूटा।पत्नी ने सोचा और उस नामुराद खोपड़ी को, जैसी वह लपेटी गई थी, ठीक उसी तरह लपेट कर वापिस आले पर धर दिया। कमरा साफ कर दरवज्जे को उसने ओढा तो दिया पर मन ही मन वह पति पर और उस खोपड़िया पर कुढती रही।

ज्योतिषी भी अपनी वजह से दिन रात उसी खोपड़ी  के बारे में सोचता रहता।न वह ठीक से सोता, न खाता।न बच्चों से बतियाता।कभी अचानक उठ कर कमरे के किवाड़ मूंद लेता और देर देर भीतर बैठा रहता।

एक दिन पत्नी ने बच्चों से कहा तनिक ताक झाँक करें, कि भीतर होता क्या है? बच्चे खबर लाये कि बाबा किसी खोपडिया को हाथ में लिये आतशी शीशे से उसे बडे ध्यान से देख रहे हैं और बुदबुदाये जा रहे हैं |

पत्नी का थमा पारा फिर क्रमश: चढ चला।

आखिर एक दिन जब बेटे घर पर थे और उनका बाप कर्मकांड के सिलसिले में बाहर गांव गया हुआ था, पत्नी ने वह खोपड़ी बाहर निकाली और उस पर थूक कर अपने बेटों को गेंद कह कर खेलने के लिये दे दी।

बेटे तुरत हो हो कर भागे और आंगन में उसे मिट्टी में लथेडते लतियाते खेल में मगन हो गये। खोपड़ी को उनकी लात खाते देख कर पत्नी की छाती कुछ ठंड़ी  हुई।

पर पुरानी खोपड़ी बेचारी कितनी देर लतियाई जा सकती थी, आखिरकार कई टुकडों में फूट गई।

‘अम्मा, गेंद तो फूट गई’, बड़ा बेटा चिल्लाया तो पत्नी बाहर आई और खोपड़ी के टुकडे बटोर कर बुदबुदाती हुई उनको एक चीथडे में बाँध कर पोटली दरवज्जे के बाहिर धर आई।जा सुसरी, अब ना दलियो सुहागन की छाती पे मूंग!

शाम को ज्योतिषी लौटे तो दरवज्जे पर धरी वह अजीब पोटली देख कर चौंके।खोला तो उसमें खोपड़ी के टुकडे।समझ गये कि यह किसका किया धरा है।

‘अरी गंवार औरत, क्या इससे लडकों ने गेंद खेली है?’ उन्होने गुस्से से पत्नी से पूछा, तो वह भरी भराई दुनाली बंदूक की तरह फट पड़ी।बोली, ‘मुझे मूर्खा समझते हो? अपनी प्रेमिका की खोपड़ी पूजाघर में लाके इतने दिन उसे अपवित्र करते रहे, तौ भी तुम पंडित के पंडित और मैं गंवार? हाँ हाँ मैने उस पर थूका भी और फिर दे दी उस कुलटा की खोपड़ी  अपने बेटों को गेंद बना कर लतियाने को!’

ज्योतिषी पल भर सकते में हो रहा।फिर खुद से बोला, ‘सही लिखा विधाता ने, कि अग्रे किं किं भविष्यति? हाय रे महायोद्धा, तूने जाने भी क्या क्या न देखा! ठीक कहा है कि औरत का चरित्र और पुरुष का भाग्य तौ विधाता भी नहीं जानते।हम मानुख किस गिनती में आते हैं?

‘चलो सब जनी भीतर।आज मैं सोने से पहले तुम तीनों को एक कथा सुनाता हूं जो इस खोपड़ी  से जुड़ी  है’, वह बोला।सब चुपचाप भीतर हो लिये।

उस रात ज्योतिषी ने अपने परिवार को जो भाग्य कथा उसने ललाट पर विधाता की लिपि में बांची थी, जस की तस सुनानी शुरू की:

यह ललाट, विधाता कहते हैं उस जातक का है, जो बड़ा होकर एक साथ महावीर, महाक्रूर और महा अन्यायी होगा।जातक विश्व में परम प्रतापी योद्धा राजा वीरेंद्र जू देव के नाम से दिगदिगंत तक अपनी वीरता, क्रूरता और अन्याय के लिये याद रखा जायेगा।

स्वभाववश यह एकाकी रहेगा, न इसका कोई सच्चा मित्र होगा न शत्रु।उसकी इकलौती प्यास होगी साम दाम दंड भेद जैसे भी हो, अपने सारे शत्रुओं का सर्वनाश करके संपूर्ण शक्ति पा लेने की।एक समय आयेगा भी जब सारी शक्ति इसके हाथों में होगी।सूरज इसकी करै रसोई, समंदर इसकी धोती धोई, चांद इसका मशालची होगा और पवन इसके द्वार पर झाडू लगायेगा।बाहर यह हर पल एक ऐसे सुरक्षा कवच से घिरा रहेगा जिसका भेद सुर नर मुनि तक नहीं कर सकैं।हर बार लडाई में जाते हुए यह यम को अपनी पाटी पर बाँध जायेगा ताकि हर युद्ध में यही जीत कर लौटे इसके दुश्मन नहीं।

प्रौढ़ होने तक इसकी टक्कर का देश भर में न कोई योद्धा बचेगा, न ही सारी परजा को भेड़ों की तरह हांकनेवाला नृपति।सारे देश उसकी कठोर ताड़ना और अन्याय के डंडे से थर थर काँपेंगे।प्रसिद्ध हो जायेगा कि, ‘चंद्र टरै, सुरज टरै, टरै जगत व्योपार, पर राजा वीरेंद्र को घटै न नाम, न अन्याय- अत्याचार!’

परंतु ऐसा महाबली अपने ही महल में अपने ही पुत्र और अपनी रखैल के हाथों मारा जायेगा।

कारण यह, कि इस परम निष्ठुर जातक के भाग्य में प्रौढावस्था में सारा  संयम भुला कर एक अपरूप सुंदरी राजनर्तकी के प्रति आकर्षित होना लिखा है।आकर्षण इतना गहरा होगा कि राजा राजनर्तकी को तो राजमहल में रख लेगा और अपने पुत्र की माता, राजमहिषी को बेबुनियाद लांछन लगा कर उसके बाप के घर पठा देगा।

पर यही नर्तकी होगी जो बाद को उसके अंत का कारण बनेगी जिसे रणक्षेत्र में बडे बडे योद्धा भी न हरा सके।

इसके अंत की पटकथा इस तरह बनेगी कि कुट्टनी की पुत्री राजनर्तकी बुढाते राजा वीरेंद्र को तो रिझायेगी ही, लेकिन उसके पुत्र सुरेंद्र पर अपने रूप का पांसा फेंक कर उसे भी मोहित कर लेगी।यह युवक अपनी माता के देशनिकाले से अपने पिता के प्रति शत्रुता भाव रखता आया होगा, और नर्तकी उसको कंधे पर सिर रख कर अपना दु:ख सुनाने को कह कर धीमे धीमे उसके साथ भी गुप्त प्रेम व्यापार शुरू कर देगी।

कुछ समय बाद प्रेमविवश राजा वीरेंद्र नर्तकी के जन्मदिन पर उसे भेंट में देने के लिये एक अनमोल रत्नजटित कमरपेटी बनवायेगा।पर वह गहना ऐन समय पर गायब हो जायेगा।और एक दिन वह देखेगा कि वही कमरपेटी नर्तकी की कमर की शोभा बढा रही है।‘तुझे यह किसने दी?’ पूछने पर नर्तकी हंस कर महायोद्धा वीरेंद्र से कहेगी, ‘यह तो मुझे युवराज ने दी है।आप दें कि युवराज, क्या अंतर पडना है? बंधना इसे मेरी ही कमर पर था न?

इस पर बिफर कर जब परमप्रतापी राजा वीरेंद्र जब उसे मारने को अपनी प्रसिद्ध तलवार उठाने जायेगा, तो उसका अपना पुत्र अचानक खंभे के पीछे से बाहर आ कर उसे उसी तलवार से यह कहते हुए मार डालेगा कि ‘तूने मेरी माता को देश निकाला दिया, अब मेरी प्रेमिका को मारना चाहता है?’

इसके बाद दोनों प्रेमी उस महायोद्धा की लाश को घसीट कर उसकी छाती पर पत्थर बाँध कर महल की छत से रातोंरात नदी में डुबो देंगे।और फिर उसकी खोपड़ी को दूर भंवर में फेंक कर सुख से महल के भीतर लौट जायेंगे।

कई सदी बाद जब इसका शरीर सड़ गल गया होगा, तो भारी बाढ आयेगी।और उसमें बहता हुआ राजा वीरेंद्र का कटा हुआ मुंड एक पेड़ की जडों में अटका रह जायेगा।

इसके बाद विधाता ने अंत में रहस्यमय वाक्य लिखा था, ‘अग्रे किं किं भविष्यति? देखो अब आगे और क्या क्या होता है?’

कथा सुना कर ज्योतिषी बोले यही होना था जो हुआ।अभिशप्त खोपड़ी  की कपाल क्रिया तो तुम्हारे पुत्रों ने लातों से कर ही दी है, अब यही हो सकता है कि कल सर्वपितृ अमावास्या को इस मुंड के अवशेषों को गंगाजल से धोकर कर मैं इसका विधिवत् तर्पण कर दूं।अब कभी मुझ पर शक मत करना |’

अगले दिन पूरे परिवार ने शर्मिंदा हो कर ज्योतिषी के बताये अनुसार मुंड के टुकडों को पवित्र जल से धोया, हाथ जोड़ कर क्षमा मांगी और ज्योतिषी उसे रेशमी गमछे में लपेट कर अस्थि विसर्जन को ले चले।

पर यह क्या? ज्योतिषी शमशान पहुंचने को ही थे, तभी जाने कहाँ से एक चील आई और झपट्टा मार कर वह पोटली भी ले उड़ी।

खाली हाथ घर वापिस आकर ज्योतिषी ने अपने दोनो बेटों और पत्नी को बुलाया और चील का किस्सा बता कर उनसे पूछा, अब बोलो कि बोलो इस विचित्र कथा से किसने क्या सीखा?

बडा लडका बोला, ‘यही कि ससुर कितना ही बडा योद्धा फोद्धा हो, कभी न कभी मर ही जाता है।और फिर निडरता से उसकी खोपड़िया को लतियाया जा सकता है।’

‘तू फौज में भरती होने की तैयारी कर!’ ज्योतिषी ने उससे कहा।

छोटा बेटा बोला, ‘जातक का जीवन अंत में जाकर ललाट लिपि से ही नहीं उसके कर्मों से चालित होगा यह जाननेवाले विधाता उसके कर्मफलों के लिये हाशिये पर जगह छोड़ कर लिखते हैं, अग्रे किं किं भविष्यति?’

ज्योतिषी प्रसन्न हो कर बोले, तुझे तो मैं स्वयं ज्योतिष सिखाऊंगा।’

फिर ज्योतिषी पत्नी की तरफ देखने लगे।

पत्नी बोली, ‘साफ कहूं तौ वे कितने ही कर्कश और बूढे हों तब भी एक मंजे हुए संगीतकार का गाना और पुरानी पत्नी का बड़बड़ाना विद्वानों को निरंतर सुनते रहना चाहिये।

न जाने कब कैसा मोती हाथ लग जायेगी?’

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3 comments

  1. कहानी कहीं भी बोझिल नहीं लगती।
    भाषा पात्रों के चरित्र का सुंदर चित्रण करती है

  2. कहानी कहीं भी बोझिल नहीं लगती
    भाषा पात्रों का का चरित्रों को हमारे समक्ष खड़ा कर देती है।
    सुंदर

  3. hahaha

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