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शैलेंद्र शर्मा की कहानी ‘पश्चिम में उगते  पलाश’

शैलेन्द्र शर्मा पेशे से चिकित्सक हैं। एक जमाने में सारिका, धर्मयुग आदि प्रमुख पत्रिकाओं में इनकी कहानियाँ प्रकाशित हुई। एक जमाने बाद उन्होंने फिर से कहानी की दुनिया में वापसी की है। यह उनकी एक नई कहानी है-

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इस नमक की याद में

एक दिन मैं बहुत रोया

मेरे होंठों पर तुम्हारे चेहरे का नमक है

प्यार कितना भी फीका पड़ जाये

उसमें नमक की याद बनी रहती है

–राकेश रोहित

अखबार उठा कर देख लीजिये, मोबाइल क्रांति के बाद की ज़्यादातर प्रेम कहानियां, मिस्ड कॉल से शुरू होती हैं. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. फैक्ट्री जाने से पहले नाश्ता कर रहा था मैं. अम्माजी[आया] परोस रही थीं. सुमि रोज़ की तरह अपने कमरे में थी. अचानक फ़ोन की घंटी बजी. अनजाना  नंबर था. जब तक मैं उठाता, फ़ोन बंद हो गया. ज़्यादातर मैं अनजाने नंबर से कॉल नहीं लेता.

फैक्ट्री जाते हुए रास्ते में फिर कॉल आई. “हेलो”, उधर से आवाज़ आई. सच कहूं तो किसी लड़की की इतनी मीठी आवाज़ मैंने आज तक नहीं सुनी. क्या कोई अनजानी आवाज़ आपकी नसों में सरसराहट पैदा कर सकती है?

मेरे “हेलो,हेलो” के प्रत्युत्तर में वह आवाज़ खामोश हो गयी, मगर फ़ोन नहीं कटा. कुछ देर के इंतज़ार से झुंझलाकर मैंने फोन काट दिया.

तीसरी बार फ़ोन आया लंच ब्रेक के बाद. बोर्ड की मीटिंग ख़त्म हो चुकी थी. सारे मातहत कर्मचारी जा चुके थे. बस मैं और चपरासी अकेले थे. मैंने हाथ से चपरासी को बाहर जाने का इशारा किया.

“हेलो.”

“ह-हेलो.” कुछ झिझकते हुए वही मीठी आवाज़ थी.

“आप कौन हैं?”, उसने पूछा.

“कमाल है! फ़ोन आपने मिलाया है. आप बताइए, किससे बात करनी है?”

“आपकी आवाज़ बहुत अच्छी है.” यूं लगा, जैसे कोई तलवों को गुदगुदा रहा हो.

“यही बात मैं आपके लिए कह सकता हूँ…बल्कि,शायद इसीलिए मैंने फ़ोन काटा नहीं.”

उधर से फ़ोन काट दिया गया. मैं हतप्रभ था. यह मुझे क्या हो रहा था? मैं इतना तेज़-तर्रार, व्यवसाय की दुनिया का एक शातिर, कमीना नाम, एक उस उम्र के किशोर की तरह व्यवहार कर रहा था, जिसकी अभी मसें भीग रही हों. इस बार मैंने नंबर सेव कर लिया. लिखा बी. एफ. यानी बटरफ्लाई. यह वह संज्ञा थी, जिससे कॉलेज की ज़िन्दगी में, हम कुछ मनचले दोस्त, अपनी सहपाठिनी लड़कियों को पीठ पीछे बुलाते थे.

उसके बाद सारे काम निबटाये, शाम को एक डेलीगेशन से होटल में मिलना था. उसकी खानापूरी करते हुए मन बहुत बेचैन सा रहा. जैसे मैं उसके फ़ोन का इंतज़ार कर रहा था. एक-आध बार ख़याल आया, खुद फ़ोन मिलाऊँ, फिर थोड़ी शर्म-सी आई, इसलिए चुप रहा.

रात मैं पलंग पर अधलेटा-सा, लैपटॉप पर काम निबटा रहा था. सुमि बत्ती बुझा कर दूसरी तरफ मुंह करके सो रही थी, कि फिर फ़ोन बजा. वही थी. फ़ोन साइलेंट करके मैं किनारे का दरवाज़ा खोल कर टैरेस पर निकल आया.

“हेलो…जी, कहिये.”

“क्या कर रहे थे आप?”

“सोने की तैयारी.”

“आपके पास कोई है तो नहीं?”

“नहीं, मैं बाहर निकल  आया हूँ…सुमि, मतलब वाइफ अन्दर सो रही है?”

दूसरी ओर सन्नाटा-सा छा गया. अस्फुट-सी आवाज़ आई, “आप शादी-शुदा हैं?”

“जी. मेरे दो बच्चे भी हैं. दो बिटिया. बड़ी छः और छोटी चार साल की.”

“ओह…बहुत किस्मत वाले हैं आप…मेरा आपसे बात करना शायद गलत है.”

“नहीं,आप बोलिए. मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.”

“अच्छा तो मुझे भी बहुत लग रहा है. अच्छा चलिए, अपने बारे में कुछ बताइए.”

“क्या बताऊँ? एक फैक्ट्री चलाता हूँ पिस्टन-रिंग की. मॉडल टाउन में मेरा घर है. पत्नी और बच्चों का तो अभी बताया. बाकी बताने को ऐसा कुछ नहीं है. आप कौन हैं?”

“मैं…अकेली हूँ. समझिये निर्वासन भुगत रही हूं…जैसे किसी को श्राप देकर स्वर्ग से निकाल दिया गया हो. मन हो रहा है आपसे मिलूँ. ऐसा समझ लीजिये कि दोस्त ढूंढ रही हूँ…अच्छा यह बताइए, कि आपसे बात करने का सही समय क्या है.”

“मैं दस से आठ तक घर से बाहर रहता हूँ. उस समय कभी भी मिला लीजिये.”

*****

तीन चार दिनों तक वैसे ही फ़ोन आते रहे. जिन बातों का कोई मतलब नहीं होता, उन्हें करते हुए मन के आस-पास कुछ फड़फड़ाता रहता, शायद तितलियाँ. या कान में एक गुन-गुन की आवाज़ आती रहती. एक अजब-सा इंतज़ार रहता दिन भर. कई बार फ़ोन चेक करता कि कहीं फ़ोन न आया हो.

और फिर आया, बहुप्रतीक्षित मुलाकात का दिन. उसने कैंट बाज़ार की एक दुकान के आगे मिलने को कहा था. ड्राईवर की असमय छुट्टी करके मैं वहां पंहुचा. इधर-उधर ढूँढ रहा था, कि सहसा वह मुझे दिखी. उसने सब्ज़ रंग का लिबास पहना हुआ था. सांवले रंग में कितना आकर्षण हो सकता है, यह मैंने उसी दिन जाना. तीखी, बोलती हुई आँखें. प्रश्न करती हुईं, आपको आर-पार बेध दें, ऐसी आँखें. मैं संदेह की दृष्टि से देख रहा था. पहल उसी ने की. कार के खुले शीशे में से उसने प्रश्न किया, ”अनहद?”

“प्रिया?” कहकर मैंने कार का दरवाज़ा खोल दिया. मुझे याद है, सबसे पहली बात जो मैंने गौर की, वह थी उसकी आवाज़. जैसे दूर पहाड़ों पर चिनारों के बीच कहीं घंटियाँ बज रही हों. सुकून-सा तारी हो रहा हो..एक अनिर्वचनीय शांति.

“किधर चलना है?”

“आप बताइए.”

मैंने एक होटल की मशहूर कॉफ़ी शॉप का नाम लिया.

“दिमाग खराब है?”उसकी पेशानी पर बल पड़ गए, फिर भी मुस्कुराती रही.

“बायें हाथ पर मोड़ लीजिये.” फिर वह दिशायें बताती रही. कुछ देर बाद गाड़ी एक बहुमंजलीय आवासीय भवन के आगे रुकी.

गार्ड ने उसे देख कर गेट खोल दिया. लिफ्ट में सामान्य सी बातें करते हुए, वह मुझे ऊपर से नीचे तक घूरती रही, जैसे तौल रही हो. हालांकि मेरा बदन छरहरा ही कहा जायेगा, मगर मैं थोड़ा सचेत हो आया.

उसने अपने फ्लैट का दरवाज़ा खोला. आभिजात्य, और पैसे दोनों की बारिश हो रही थी. कुछ-कुछ मेरे घर जैसा ही था. स्वागत कक्ष में कुछ पल बैठ कर हम दोनों मौसम और अपने शहर के बारे में बातें करते रहे. फिर वह बोली, “आइये, कमरे में चलते हैं.” कमरे में घुसते ही मेरी नज़र मेज पर पड़ी, शमशेर बहादुर सिंह और केदारनाथ सिंह की दो कविता की किताबों पर गयी.

“अरे, आपको कविता का शौक है?” उसने मेरी तरह, जिस्म की बढती गर्मी के बावजूद, ठंडी, मुर्दा आँखों से मेरी और ताका. उन आँखों ने मुझसे कहा, “मेरी ज़िन्दगी, सदी की सबसे त्रासद कविता है.”

उसने पलंग पर मुझे हल्का सा धक्का दिया. मेरा सारा अस्तित्व झनझना रहा था. कान लाल हो आये थे. माथे से एड़ियों तक तेज़ चलता हुआ लाल रक्त धक्-धक् करता हुआ बढ़ा जा रहा था. गला सूख आया था. वह उसी गले पर अपनी अंगुलियाँ फिरा रही थी, जैसे कोई वाद्ययंत्र बजा रही हो. हमारी आँखें मुंदी जा रही थीं. हमारी मिट्टी कच्ची नहीं थी, जो कभी चाक पर चढ़ी ही न हो. मुझे तो बना कर अलग रख दिया गया था, और वह आधी  बनी हुई मूर्ति जैसी,  शायद ब्रह्माण्ड के आखिरी देवता का इंतज़ार कर रही थी, जिसके हाथों में कुम्हार या मूर्तिकारों जैसा कौशल था.

मेज़ पर रखी किताब से शमशेर  की पंक्तियाँ निकलकर कमरे की हवाओं में गूंजने लगी थीं.

हाँ/ तुम मुझे प्रेम करो/ जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं/ जिनमें वह फंसने नहीं आतीं/ जैसे हवाएं मेरे सीने से करती हैं/ जिसको वह गहराइयों तक दबा नहीं पातीं/ तुम मुझसे प्रेम करो/ जैसे मैं तुमसे करता हूँ…

*****

जाने कितनी देर बाद तंद्रा टूटी, तो मैंने देखा, बिस्तर पर मैं अकेला हूँ. मन और शरीर, दोनों शांत थे. जैसे पोर-पोर में ठंडी बूंदें जम गयी हों. अचानक ऐसा ख़याल आया, जिसके लिए मैं खुद को, अपनी संवेदनाओं को, और अपनी देह को, बाद में कभी माफ़ नहीं करने वाला था. वह ख्याल था…दो साल हो गए! दो साल हो गए …सुमि को प्यार किये !

करीब दो साल पहले की उस मनहूस रात को मैं कभी नहीं भूल सकता. बहुत गहरी नींद में था कि सुमि के बहुत तेज-तेज चिल्लाने से आँख खुली.

“अनहद, देखो क्या हो गया है? अनहद, उठो न!!” वह रोते हुए चिल्ला रही थी. मैं कच्ची  नींद से घबराया हुआ उठा.

“मैं खड़ी नहीं हो पा रही हूँ. मेरे पैरों को क्या हो गया है? मुझे बाथरूम जाना था. मेरे पैर हिल नहीं रहे हैं.” वह बदहवास-सी चीखे जा रही थी.

“अरे! ऐसे कैसे हो जायेगा. घबराओ नहीं. मैं ले चलता हूँ तुम्हें.”

कहकर मैंने उठ कर पलंग की दूसरी ओर से सुमि को सहारा देकर खड़ा किया. बमुश्किल खड़ी हो पायी वह. मुझे लगा कि अपने शरीर का सारा वज़न उसने मेरे ऊपर डाल दिया है. मैंने उसे चलाने की कोशिश की तो वह अशक्त-सी दोबारा बिस्तर पर लुढ़क गयी. मैं बहुत डर गया था और बदहवासी में भावशून्य हो गया था. केवल मशीनी गति से मेरा स्व चल रहा था. दिल बहुत तेज-तेज धड़क रहा था.

फिर डॉक्टर को फ़ोन, एम्बुलेंस, अस्पताल, गहन चिकित्सा कक्ष, सुईयां, ग्लूकोज की बोतलें, अस्पताल की फिनाईल और दवाओं की बेहोश कर देने वाली महक…और फिर, एक लम्बा इंतज़ार…

घंटे, दिन, और फिर करीब एक महीना. गहन चिकित्सा कक्ष से प्राइवेट कमरे में स्थानांतरण , और फिर घर वापसी.

पूरे दिन रहने वाली नर्स, और दिन में एक बार आकर मालिश और कसरत  करवाने वाला फिजियो. शुरू के दिनों की बेचैनी और चिंताएं. भविष्य के अजाने गर्भ में छुपे अनहोनी के रहस्य. क्या हो गया है मेरी सुमि को? क्या सुमि कभी अपने पैरों पर खड़ी होगी? और धीरे-धीरे अपनी और सुमि की नियति को स्वीकारते हमारे मन. दिनचर्या में धीरे-धीरे आती एक तटस्थता.

फिजियो अब एक दिन छोड़ कर आता. बच्चों के काम और खाना बनाने के लिए एक अम्मांजी रख ली गयीं, जो दिन भर सुमि को भी देखतीं. करवट दिलाना, तकिया ऊंचा करके बैठाना, और रोज़मर्रा की ज़रूरतें. बिस्तर की चादर और एडल्ट डायपर बदलने जैसे दुरूह कार्य.

“कहाँ खो गए?” वह कॉफ़ी की ट्रे लिए खड़ी थी. साथ में गर्म सैंडविच भी थे.

थोड़ी देर बाद मैंने कहा, “ओह, कितना खा गया मैं. अचानक ज़ोरों से भूख लग आई थी.”

“अभी बहुत मेहनत करी न तुमने.” वही खनकती हुई आवाज़. देखा, उसकी आँखें शरारत से हंस रही थीं. मेरे कान गर्म और लाल हो गए. कितना भी उद्दाम आवेग रहा हो, मैंने और सुमि  ने कभी इस तरह की बातें नहीं की थीं. हमारा प्यार अँधेरे में, और बिन बोले ही होता था.

वह मेरे सीने पर सिमट आई थी. एक अजब-सी खुशबू  थी उसके बालों में. शायद शैम्पू की, शायद कंडीशनर की, या शायद इंसानी जिस्म की. मुझपर नशा दोबारा हावी होने लगा था, और मैं दोबारा डूबने को तैयार था.

शाम को वापस लौटते हुए देखा, सोसाइटी का गार्ड गेट पर रजिस्टर में मेरा नाम लिख रहा है.

*****

उसके बाद के दिन तो जैसे बादलों पर लिखे गए थे, जिनके गर्भ में अमृत गीत गाती हुई देव कन्याएं

थीं, और वे इतने प्रसन्न थे, कि अब बरसे, कि तब बरसे.

शायद प्रेम करने का सही तरीका तो यह होता होगा कि मन पर लगी बाड़ को होंठों से हटा कर फिर देह की भीगी रेत पर अँगुलियों से निशान बनाये जायें, मगर यहाँ तो ऐसा झरना था, जिसका किसी जादूगर ने एक टेढ़ी मुस्कान के साथ, प्रवाह मोड़ दिया था, और पानी नीचे से ऊपर की और बह रहा था.

जिस प्रश्न को कई बार मेरी और से सीधे, या घुमाकर पूछे जाने के बावजूद वह टाल गयी थी, एक न एक दिन तो वह प्रश्न हम दोनों के बीच न टलने वाले एक ढीठ बच्चे की तरह खड़ा होना ही था.

“क्या तुम्हारे पति…तुम्हें प्यार नहीं करते?”

“एक अजीब-सी कहानी है यह अनहद, पता नहीं कैसे बताऊँ? तुम समझ भी पाओगे या नहीं.” और उसने नज़रें मुझ पर टिका दीं. उसके चेहरे पर पतझड़ में ज़मीन पर गिरे लाल-भूरे  पत्तों का रंग उतर आया था.

“क्या तुमने यही समझा अब तक मुझे?”

“नहीं, यह बात नहीं है. एक अजीब-सी कहानी है अनहद…कहाँ से शुरू करूं…मुंह चिढाती नियति का शोकगीत…यह समझ लो शादी के बाद एक-आध साल तो सब ठीक चला. फिर इनका मन दुनिया से उचटने लगा. कभी कहने लगते कि घर छोड़ दूंगा. कभी कहते संन्यास ले लूँगा. रुद्रपुर के पास  एक इनके गुरूजी का आश्रम है. विवाह के पहले भी वहां जाते थे. लेकिन तब इतना प्रभाव नहीं था. हालांकि कहते हैं, कि गुरूजी ने कभी नहीं कहा संन्यास के बारे में, लेकिन बस दुनिया से मन उचट गया है. और दुनिया में तो सबसे पहले मैं ही आती हूँ…”

वह एक फीकी-सी हंसी हंसी, जिसमें असंख्य रुदालियाँ माथे पर दुहत्थड मार कर विलाप कर रही थीं. उसके होंठ थरथराने को रोकने की कोशिश में टेढ़े हो आये.

“तो फिर आगे?” मैंने पूछा.

“आगे क्या? बड़ी मुश्किल से एक साल का वक़्त माँगा है, कि अगर उसके बाद भी तुम्हारा यही विचार रहा तो तुम चले जाना. मगर फिर, उन्होंने एक असंभव-सी शर्त रख दी.”

“क्या?”

“कि हमारे बेडरूम अलग रहेंगे.”

“माय गॉड.” मैं फुसफुसाया.

“आओ, तुम्हें दिखाऊं.” कहते हुए उसने मेरा हाथ पकड़ा और कमरे के बाहर ले गयी. उसके बेडरूम के बगल में एक और कमरा था.

 उसने दरवाज़ा खोला. बिलकुल उसके कमरे की प्रतिकृति. वैसा ही किंग-साइज़ पलंग. बस एक फर्क था. जहाँ प्रिया के कमरे में बड़ा-सा राजा रवि वर्मा का एक चित्र लगा था, वहीँ इस कमरे में दीवार पर एक बड़ा-सा क्लोज-अप फोटोग्राफ लगा था, एक सफ़ेद दाढ़ी और सफ़ेद केश वाले बाबा का. माथे पर त्रिपुंड. आँखों में से एक अलौकिक संतुष्टि वाली मुस्कराहट झांकती हुई. एक फर्क और था. प्रिया  के कमरे में एक ताज़ी खुशबू फैली रहती थी, मगर यहाँ एक निचाट सूनेपन की गंध थी.

“इस बेडरूम के दोनों तरफ बाथरूम है. बीच वाला बाथरूम मेरे कमरे में भी खुलता है. कितनी बार रातों को आहट होती है, और मुझे लगता है, शायद उसने मेरे कमरे में आने के लिए दरवाज़ा खोला है. मैं इंतज़ार करती रहती हूँ, कि शायद उसने मन बदल दिया हो…मगर कोई नहीं आता. कमरे में मेरी करवट की आहट  गूंजती रहती है, और पलंग पर मेरा मृत शरीर पड़ा रहता है, बेआवाज़, निस्पंद. वह ज़्यादातर फील्ड-वर्क में बाहर रहता है. घर पर मुश्किल से महीने में पांच दिन.”

हम दोनों बाहर निकल आये. कमरा बंद करते हुए उसने कहा, “यह पहले गेस्ट रूम था. अब इसमें एक गेस्ट रहता है, जो कभी मेरा पति था.”

*****

हमारी मुलाकातें अक्सर होने लगी थीं. मैं हालांकि थोड़ा बहुत शेरो-शायरी और कविताओं में रूचि रखता था, लेकिन फिर भी एक दुनियादार व्यापारी इंसान था, जो जोड़-घटाना, फायदा-नुकसान, और सीढ़ियां चढ़ने में माहिर था. प्रिया, दुनिया के दांव-पेंचों से इतर एक निर्दोष आत्मा थी, जो संशय के अरण्य में, दिग्भ्रमित, चकित हिरनी जैसी पटक दी गयी थी.

प्रिया के ड्राइंग-रूम और बालकनी में ढेरों पौधे थे. दूर से बिलकुल असली जैसे दिखाई देते थे. शुरू में तो छू कर देखना पड़ा कि असली हैं या नकली. मैंने कहा, “पौधे क्यों नहीं लगातीं तुम? गमलों में इतने अच्छे प्लांट्स लगाए जा सकते हैं.”

“नहीं, मुझे यह प्लांट्स पसंद हैं. ये मुझसे कुछ नहीं मांगते. न खाद-पानी, न देखभाल. रस गंध न सही, रूप रंग तो है.” उसने अपने जैसे उन बेजान पौधों को निहारते हुए कहा.

मुझे तुरंत सुमि का कहना याद आ गया, “हरियाली देखते ही दिमाग पर छाये कुहासे छंट जाते हैं.”

सुमि को बागबानी का बहुत शौक था. हमारे टेरेस पर एक बहुत सुंदर बगीचा था, जिसकी अक्सर तारीफें हुआ करती थीं. उसे टेरेस गार्डेन की श्रेणी में कई बार पुरस्कृत किया गया था.

मैंने प्रिया से कहा, “हम दोनों नर्सरी चलेंगे और बहुत सारे इनडोर प्लांट्स लायेंगे, तुम्हारे घर के लिए.”

“तुम क्या क्या बदलोगे अनहद. यहाँ तो सारा वजूद सन्नाटों से भरा है.क्या क्या बचा सकोगे तुम?  क्या इस रास्ता भूली, कंकड़-पत्थरों वाली कहानी को मुकम्मल कर पाओगे कभी?”

मैं चुप खड़ा रह गया था. बीच में एक चट्टान जैसा जीवन, उसके दूसरे पार डबडबायी आँखों वाली सुमि, और मेरे सिर और कन्धों पर तोड़ देने वाला भार. कभी कभी ऐसा महसूस होता है, कि आपको पानी के अन्दर कोई दोनों और से खींच रहा है. बाहर  निकलने का कोई रास्ता नहीं है, आपके नथुनों में पानी भरता आ रहा है, और आप मछली नहीं हैं.

उसने कहा था, “मैं अपने पति से कहती हूँ, भले आदमी, तुमको यह अक्ल चार साल पहले क्यों नहीं आ गयी, जब तुम अकेले इंसान थे. वह कहता है जीवन एक सतत खोज का नाम है. आपको  कहाँ पता होता है, कि नदी की धारा आपको कितना छोड़ेगी, कितना बहा ले जायेगी. मैं कहती हूँ तुमने तो नदी का मगरमच्छ बनकर मेरा और अपना दोनों का शिकार कर लिया. इस शिकार के चक्कर में घाट की अंगुलियाँ तुमसे छूट गयीं, और तुम बेखबर रहे.

और उधर, सुमि और मैं. वैसे तो हमारे बीच एक अबोला-सा ठंडापन था, लेकिन कभी-कभी रात के समय उसे करवट दिलानी होती, तो वह धीरे से मुझसे कहती, “अनहद, क्या तुम मेरे गले पर पीछे से प्यार कर सकते हो?”

मुझे वे पुराने दिन याद आ जाते, जब गर्दन के पीछे, धूप-छाँव वाले हिस्से पर प्यार करवाना उसे बहुत अच्छा लगा करता था. उन दिनों को याद करता हुआ, उसे पीछे से बांहों में भरने की कोशिश करता. तभी वह बेचारगी की आवाज़ निकालते हुए धीरे से कहती, “प्लीज़ अनहद, कमर पर से बांह हटा लो, यहाँ बहुत दर्द होता है. बस, गले पर पीछे से प्यार करो.”

और यही वह वक़्त होता, जब एक तीसरी गर्दन, हम दोनों के बीच आ कर लेट जाती. मैं सुमि के दप-दप करते हुए गोरे रंग के बरक्स उस सांवली देह पर प्यार के चिह्न छोड़ने लगता. वह समय मेरे लिए बहुत मुश्किल होता. मैं बहुत ख़याल रखता कि आधे नशे के हाल में कहीं मुझसे प्रिया का नाम न निकल जाए.

प्रिया ने धीरे-धीरे कमरे की काफी जगह घेर ली थी. इतनी, कि सुमि एक छोटे से कोने में सिमट गयी थी. घर से बाहर जितना भी समय होता, प्रिया मेरे साथ होती. फैक्ट्री में इंस्पेक्शन के दौरान, क्लाइंट से मुलाकात के दौरान, चैम्बर में काम करते हुए, मुझसे लिपटी रहती. बोर्ड मीटिंग्स में मेरी गोद में आ कर बैठ जाती. किसी औपचारिक मुलाकात में मैं कोई ड्रिंक अपने होंठों से लगाता, तो उसके होंठ भी छोटे बच्चे की तरह मचल कर उस ड्रिंक में आ लगते, और मेरे लिए बड़ी मुश्किल हो जाती. डर लगता, कहीं सामने वाला मेरे असामान्य व्यवहार को पकड़ न ले.

हमारी मुलाकातें हफ्ते में तीन चार दिन होतीं. एक ऐसे ही दिन, कमरे में हल्के प्रकाश में मैं लेटा हुआ था, और वह बैठी हुई मेरी अनावृत्त देह को निहारे जा रही थी. मेरे सौष्ठव को आँखों में भर कर उसने कहा था, “ऐसे ही खूबसूरत शरीर को देख कर, पहले-पहल जंगलों में किसी आदिम काल की स्त्री ने आसक्त हो कर अपने आप को सौंपा होगा. अपनी सारी शर्म को त्याग कर अपना अस्तित्व उस पुरुष के हवाले किया होगा, जैसे मैं तुम्हें इन्सानों के जंगल से चुराकर लायी हूँ.”

मैं हंसने लगा था, “कहाँ कहाँ से खोज के लाती हो तुम ऐसी बातें.”

“बातें नहीं, मेरे जीवन का सत्य है यह, एक ऐसा सत्य जो मैंने खुद ही खोजा है.”

“खोजा तो मैंने है तुम्हें.”

“बिलकुल गलत. याद करो वह पहली फ़ोन कॉल.”

और वाकई, झुरझुरी-सी महसूस होने लगी, उस पहले दिन को याद करके.

“खोजना तो मुझे ही था. ज़रुरत जो मेरी थी…तुम्हारा क्या?”

“मुझे भी तो…”

“न! तुम्हारे पास तो सब था अनहद…तुम कमी कैसे महसूस करते! तुम्हें तो फर्श पर ज़िन्दगी पड़ी मिली थी, तुमने उसे उठा कर गले से लगा लिया था.”

मैं क्या बताता उसे, रास्ते  में अचानक मिली एक झाड़ी के काँटों ने उस ज़िन्दगी को मेरी गर्दन से बिलकुल अलग खींच लिया था.

मैंने प्रिया से सुमि की बीमारी को, और सुमि से प्रिया के पूरे  वजूद को ही छुपा रखा  था. कितना नायाब  नमूना था मैं!

एक बार प्रिया ने कहा था, “अनहद, मैंने आकाश में खिले जवाकुसुम पर अपना दांव लगाया है, मुझे पता है, कभी वह फूल मेरे अंक में नहीं आ सकता, मुझे इल्म है कि एक न एक दिन तो यह भ्रम भी समाप्त होना है…किन्तु मैं जितना संभव हो उतने दिन इसी भ्रम में बिताना चाहती हूं…पी लेना चाहती हूं तुम्हारी किताब के एक-एक हर्फ को…”

“अरे तुम तो कविता करने लगीं,” उसके माथे को अपने होठों में समेटते हुए मैंने कहा था, “मैं यहां कहीं जाने के लिए नहीं आया हूँ.”

“क्या करोगे तुम अनहद, मैं कभी नहीं सोच सकती कि एक दिन तुम मुझे सौम्या जी के सामने ले जा कर खड़ा कर दो…इतनी निष्ठुर नहीं हूँ मैं.”

“वह दिन तो शायद कभी नहीं आएगा.”

“तो फिर बताओ, कितने दिन देते हो तुम इस लुका-छुपी वाले प्रेम को?”

“पूरा जीवन.”

“तो मुझे बताओ तो सही, कि कैसे ले जाओगे तुम मुझे इस जंगल से बाहर?”

सचमुच, मेरे पास कोई योजना नहीं थी, जिससे मैं सुमि को प्रिया से, और प्रिया को सुमि से बचा ले जा सकता, हालांकि मेरा अभीष्ट यही था, लेकिन कई बार किसी अज्ञात सुख की लालसा में आप उन रास्तों पर पैर डाल देते हैं, जिनका अंधेरा भी आपके कदमों को डिगा नहीं पाता…आपको खौफ नहीं होता कि आगे दलदल मिलेगी या हरी दूब.

तीन जिंदगियां, अपने-अपने हिस्से के चांद-सूरजों की मारी, अंधेरे में हाथ फैलाये ऐसे आगे बढ़ रही थी, जैसे बच्चे ‘डार्क रूम’ खेल रहे हों. मगर कोई कोई बच्चा यह न चाहता हो कि कोई दूसरा उससे टकरा जाए.

उस दिन इतवार था, शाम को कभी-कभी मैं व्हील चेयर पर बैठा कर सुमि को टेरेस पर ले आता था. उसका चेहरा चुगली कर रहा था कि उसके दिमाग में झंझावात चल रहा है. सामने डूबती हुई शाम के लाल टुकड़े, उसके चेहरे पर पड़ रहे थी.

“अनहद, मैं तुम्हारे किसी काम की नहीं रही…”

“पागल हो क्या…तुम सामने हो, मेरे लिये इतना ही बहुत है…” लरज़ते होंठों से कहते हुए मेरा दिल कानों में दस्तक दे रहा था.

“नहीं, सच्चाई से कब तक मुंह चुराया जा सकता है. कभी कभी सोचती हूँ कि तुमसे कहूं कि किसी और से प्यार कर लो…”

“जैसे बाज़ार में प्यार मिल रहा है न…अच्छा तुम बेकार की दिमाग की कवायद बंद कर दो.”

“क्या गलत है इसमें…एक रास्ता जब डेड-एंड पर आ गया हो, तो एक छोटी खिड़की तो खोली जा सकती है…लेकिन फिर सोचती हूँ, तुम्हें किसी और के साथ देख कर तो मैं वैसे ही मर जाऊंगी…इतना पसेसिव  बनाया है भगवान ने मुझे..” वह रोने लगी थी.

मैं उठ कर उसकी कुर्सी के पास आ गया था, और उसके कंधे को बांह से घेर लिया था, “शांत हो जाओ…तुम, मेरे दोनों बच्चे, और मेरा काम, यही बहुत है मेरे लिए…”

मैं बिलकुल गलत बोल रहा था…प्रिया  मेरे वजूद का चौथा कोना बन गयी थी, जो ज़रूरी हो  गया था.

एक ऐसा कोना, जिसे मैंने अपनी दुनिया की भारी-भरकम उपस्थिति से सबसे छुपा रखा था. लेकिन एक सच यह भी था कि दो तरह का जीवन जीने में मेरे टुकड़े-टुकड़े होते जा रहे थे.

मेरे बर्फ की तरह ठंडे आकाश में एक नहीं, दो-दो चांद थे, दोनों में दो अलग अलग सूरतें थी, दोनों ने मुझे बेतरह जकड़ा हुआ था, और देखो, मुझे यह बूझ ही नहीं रहा था कि मेरे चेहरे पर नूर, किस चांद का पड़ रहा है।

मैंने दोनों चांद अपनी दोनों हथेलियों में जकड़ लिए थे, और चांद की स्वभावगत शीतलता के उलट वे दहकते गोलों की तरह थे, और मेरी हथेलियां जलाना चाहते थे।

सच तो यह था कि मैं सुमि की हत्या का उत्सव मना रहा था, और खुश था। मगर क्या वाकई?

उसे कुछ भी नाम दे दूं, लेकिन पैदा तो यह जिस्म से ही हुआ था. मन भले ही सुकून से भरा हुआ था, लेकिन प्रिया के लिए प्यार में जिस्म हावी था.

सुमि के साथ तो देह गौण हो गयी थी. प्यार वायवीय हो गया था. सिर्फ जिस्मानी, या फिर सिर्फ रूहानी, ऐसे दोनों तरह के प्रेम में चुनाव करना बड़ा मुश्किल था।

*****

उस दिन अम्माजी को कुछ देर से आना था। सुबह के बच्चों के, और सुमि के काम मेरे जिम्मे थे। मेरे लिए ये काम सामान्य थे, क्योकि मेरी ज़िम्मेदारी कभी-कभी ही होती थी। बच्चों को स्कूल बस पर छोड़ने के बाद मैंने सुमि के सुबह के ज़रूरी काम निबटाये, और दोनों के लिए चाय और सिके हुए टोस्ट लेकर जैसे ही कमरे की ओर बढ़ा,  तभी मुझे अपने फ़ोन की घंटी सुनाई दी, जो कि गलती से सुमि के पलंग पर छूट गया था। मैं बैडरूम में घुसा तो मेरा फ़ोन उसके हाथ में था, जो उसने मेरी ओर बढ़ाया था, “तुम्हारा फ़ोन है.”

मैंने जैसे ही फ़ोन देखा, आकाश-पाताल सब नाचने लगे थे. फ़ोन प्रिया का ही था, जिसे सुमि ऑन करके सुन चुकी थी. और मेरी स्मार्टनेस भी मुझे बहुत मंहगी पड़ चुकी थी, क्योंकि प्रिया का नाम मैंने “एडवोकेट अस्थाना सर” के नाम से सेव कर रखा था. मैं बैडरूम से बाहर की ओर लपका, फ़ोन सुना.

” क्या ये सौम्या जी थीं ?”

“तुमको कितनी बार बोला कि दस बजे से पहले फ़ोन मत किया करो. क्या बोला तुमने?”

“बहुत गड़बड़ हो गई. हमेशा तुम ही फ़ोन उठाते हो. मैंने तो जानू बोला था.”

“बाप रे!” मैंने सिर पकड़ लिया था.

“यार, वेरी वेरी सॉरी…अब तुम कैसे संभालोगे…मुझे बहुत घबराहट हो रही है.”

फ़ोन जल्दी से ऑफ करके मैं सुमि के पास आया.

“वो…अस्थाना सर की सेक्रेटरी का फ़ोन था.”

“हम्म…” उसने सामान्य तरीके से सिर हिलाया. चुपचाप चाय पीती रही. मगर…मगर क्या मैंने उसकी आँखों की कोरों पर ठिठके बड़े-बड़े आंसू देखे थे? पता नहीं, मगर उसने मुझे बिल्कुल ऐसे ही महसूस कराया, जैसे फ़ोन सुना ही न हो.

 मेरे गले के निचले हिस्से में चाय का एक घूंट ठहर गया था, जो नीचे जाने का नाम ही नहीं ले रहा था.

फैक्ट्री में अपने चैम्बर में मैंने प्रिया को बहुत लताड़ लगाई थी. पूरे हफ्ते मैं उससे मिलने नहीं गया था. उसका नंबर भी मैंने दूसरे नाम से सेव कर लिया था.

रोज़ सोचता कि सुमि आज कुछ कहेगी, मगर वह सामान्य दिनों की तरह ही बर्ताव करती रही. मैं कितना चाहता रहा कि सुमि मुझपर चिल्लाए, मुझसे लड़े, इस बात को चीख-चीख कर कहे, कि वह मेरे साथ किसी और को नहीं बर्दाश्त कर सकती.

मगर सुमि, वैसे ही अखबार पढ़कर मेरे साथ रोज़ की घटनाओं की चर्चा कर रही थी. अम्मांजी को मेरे कपड़े निकालने, मेरे रुमाल, धूप के चश्मे देने का निर्देश दे रही थी. मेरी पसंद का खाना बनवा रही थी. वह वैसे ही रात को बच्चों को कहानी सुना कर उनके कमरे में भेज रही थी, उनके स्कूल के गृह कार्य को करने में, उनकी मदद कर रही थी. वह मुझे वैसे ही बता रही थी कि टी.वी. के धारावाहिक उसे बकवास लगते हैं. और आज उसने अपने पसंदीदा पुराने अभिनेता की फलानी मूवी देखी. वह माली को वैसे ही मौसमी फूलों के बीज लाने का निर्देश दे रही थी. वह उसे वैसे ही डांट रही थी कि चूंकि वह टेरेस पर इतना नियमित जा नहीं पाती, तो माली ने लापरवाही करनी शुरू कर दी है. वह उसी तरह इतवार के दिन मेरे सहारे से व्हील चेयर पर शाम को अपने बगीचे में बैठ रही थी.

सब कुछ वैसा ही था.

बस, दो बातें थीं.

एक तो उसने उस दिन की फ़ोन कॉल का कोई जिक्र नहीं किया था. लड़ना और शिकायत करने तो दूर की बात है.

दूसरे, उसने उसके बाद रात को कभी नहीं कहा कि, मेरी गर्दन पर पीछे से प्यार करो.

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6 comments

  1. GREAT STORY. BEAUTIFUL DESCRIPTION OF THE CONFLICT BETWEEN HUMAN NEEDS ON ONE HAND AND THE VALUES OF LONG TERM COMMITTED RELATIONSHIP ON THE OTHER. SELECTION OF WORDS WAS VERY APT. EMOTIONS ARE VERY WELL DESCRIBED. OVERALL VERY WELL WRITTEN STORY. COMMENDABLE EFFORT.

  2. GHAR WAPSI KE LIYE BADHAI-ACHCHHI KAHANI

  3. उत्कृष्ट कहानी । मनुष्यों के भावनात्मक संघर्ष का इतनी अच्छी तरह से व्यक्त करने के लिए शर्मा जी को मेरी बधाई।

  4. Shailendra Sharma

    बहुत शुक्रिया प्रिय मृदुल मेहरोत्रा जी

  5. Shailendra Sharma

    आदरणीय सुभाष पंत सर
    आपकी रचनायें पढ़ते-पढ़ते तो लिखने का ककहरा सीखा है। बहुत धन्यवाद। स्नेह बनाये रखें।

  6. Shailendra Sharma

    प्रिय T Rajneesh भाई
    आपका बहुत बहुत आभार

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