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बदलते समय के सांस्कृतिक क्षरण की दो कहानियां

कथाकार-उपन्यासकार संतोष दीक्षित ने इस लेख में रेणु जी की कहानी ‘रसप्रिया’ और मनोज रुपड़ा की कहानी ‘साज़-नासाज़’ के बहाने सांस्कृतिक क्षरण को रेखांकित किया है। एक अच्छा लेख-

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 ‘रसप्रिया’ रेणु की प्रारंभिक कहानियों में से है। इसका मर्म रेणु के ही नहीं, हिंदी के सम्पूर्ण कथा साहित्य तक फैला है– एक कलाकार का संघर्ष। यह एक ऐसा विषय है जिसके अनेक उदाहरण विश्व साहित्य में बिखरे पड़े हैं। चित्रकारों, नर्तकों, संगीतज्ञों, लेखकों, कलाकारों के जीवन पर बहुतेरे उपन्यास, कहानियां, जीवनियाँ इत्यादि विश्व साहित्य में मौजूद हैं। कला और साहित्य की दुनिया का एक प्राचीन संघर्ष होने के साथ साथ आधुनिक विमर्श का भी यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। कारण कि बदलते समय के साथ कलाकारों के संघर्ष का स्वरुप भी बदलता रहा है। प्रोदयोगिकी के विकास के साथ साथ शोषण के नए औजार भी विकसित होते रहते हैं। इस कारण बदलते समय के साथ साथ सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण के नए नए आयाम भी हमारे विमर्श में शामिल होते हुए एक कसक या टीस पैदा करते रहते हैं। यहाँ बात मैं बहुत ही सीमित सन्दर्भ में केवल दो कहानियों का हवाला देते हुए और उनके तुलनात्मक अध्ययन के साथ करना चाहता हूँ। रेणु की रसप्रिया के साथ तुलनात्मक अध्ययन के लिए चुनी गई कहानी है मनोज रूपड़ा की ‘साज नासाज’। चूँकि यह वर्ष महान कथा शिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म शताब्दी वर्ष है सो उनकी और उनकी कहानी रसप्रिया के साथ ही मैं अपनी बात की शुरुआत करता हूँ–

रेणु की  आंचलिक कथाओं में उनके क्षेत्र के ग्रामांचलों की तमाम धड़कनें  कैद हैं। उनकी कहानी रसप्रिया में मृदंग के ध्वन्यात्मक बोलों के जरिये एक खास प्रकार की लय और लोच पैदा की गई है। इसमें और भी बहुत कुछ है। यहाँ बिदापत नाच और रसपिरिया की लोकप्रियता समाप्त होते जाने की सांस्कृतिक चिंता व्यक्त की गई है। मृदंग नामक वाद्य के रसिकों की गुण ग्राहकता में कमी पर चिंता है। कुल मिलाकर बिदापत गान के लुप्त  होते जाने की उस परम्परा की और संकेत है जो परंपरा मिथिलांचल के इस क्षेत्र को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और रचनात्मक बनाती है। इसके साथ ही इसमें अन्तर्निहित एक प्रेम कथा है जिससे गुंथा है एक कलाकार, एक मृदंगिया के चरित्र का अंतर्विरोध भी।

रसप्रिया में उठाई गई समस्या अपने स्थूल रूप में तो अंचल विशेष की है, लेकिन अपनी सूक्ष्मता में यह सर्वव्यापी है। इस कहानी में गहराई से पैठते हुए मुझे अचानक मनोज रूपड़ा की कहानी ‘साज़ नासाज़’ की याद हो आई। यह दोनों ही कहानियां दो अलग अलग साजों के नासाज़ और साजिंदों के तबाह होने की कहानी है। रसप्रिया के मृदंगिया के दाहिने हाथ की टेढ़ी ऊँगली मृदंग पर बैठती ही नहीं, मृदंग भला क्या बजा पायेगा? अतिरिक्त गांजा भांग के सेवन से गले की आवाज़ विकृत हो गई है। किन्तु मृदंग बजाते समय विद्यापति की पदावली गाने की चेष्टा वह अवश्य करेगा। फूटी भाती से जैसी आवाज़ निकलती है, वैसी ही आवाज़– सों–य सों–य।

साज़ नासाज़ का बूढा सेक्सोफोन वादक भी शराब के नशे में जर्जर हो चुका है। वह जैसी अराजक जिंदगी जी रहा है, इसमें कुछ भी उसके नियंत्रण में नहीं है। अब वह सेक्सोफोन नहीं बजाता, सेक्सोफोन ही उसे बजने लगता है। यह कला के आस्वाद और अभ्यास का सबसे आखिरी और मर्मान्तक क्षण होता है। जैसे किसी पुराने नशेड़ी को नशा अपनी गिरफ्त में लेकर मृत्यु द्वार की और खींचता है। वह बूढा स्वीकारता है कि मेरी फूँक में अब पहले जैसी शिफत नहीं रही। मुझे अब सांस लेने में तकलीफ होती है। मैं जितनी तेजी से सांस छोड़ता हूँ उतनी तेजी से ले नहीं पाता। लेकिन इन दोनों कलाकारों की पहली आस्था अपने वाद्य और अपनी कला को समर्पित है।

दोनों ही कहानियां दुनिया के तेजी से बदलने की कहानियां हैं। कोई भी बदलाव खासकर पूंजीवाद के इस दौर में इतना सामान्य नहीं होता। यह तय करता है कि नए ज़माने में क्या रहेगा और क्या छूट जायेगा। इसमें सबसे अधिक खतरा सांस्कृतिक क्षरण का होता है। यह एक इतिहास के अंत होने का सिलसिला है जहाँ कई चीजे  हमेशा हमेशा के लिए इतिहास में दफ्न हो जाती हैं। रेणु लिखते हैं– “दो साल बाद वह इस इलाके में आया है। दुनिया तेजी से बदल रही है।” आगे समय के इस बदलाव को रेखांकित करते हुए वह लिखते हैं – “जेठ की चढ़ती दोपहरी में खेतों में काम करनेवाले भी अब गीत नहीं गाते… पांच साल पहले तक लोगों के दिल में हुलास बाकी था। वे गाने लगते थे – विरहा , चांचर, लगनी। रिमझिम वर्षा में बारहमासा, चिलचिलाती धूप में विरहा, चांचर और लगनी।

साज़ नासाज़ भी तेजी से बदलते वक़्त की कथा है। एक ऐसा वक़्त जहाँ फिल्म संगीत में विभिन्न साज़ और उनके सिद्ध साजिंदों की कद्र लगातार समाप्त होती जा रही थी। इसी पीढ़ी ने आज़ादी के बाद के आत्मीय ‘मन’ की गहराइयां व उचाइयां नापी थीं। इन्हीं बेसुरे, पियक्कड़ों ने भावनाओं के सभी तार छेड़कर और सांस के साथ सांस मिलाकर अपने युग की धड़कनों को एक लय दी थी।

बाद में एक यंत्र के आते ही इन उस्तादों की कला के दीपक का तेल सूखने लगा। धीरे धीरे इन्हें काम मिलना कम होता गया। साज़ नासाज़ का वह बूढ़ा सेक्सोफोन वादक नैरेटर से पूछता है –

“तुम इसे जानते हो?”

“हाँ। …यह एक जापानी सिन्थेसाइजर है!”

…”नहीं; “– उसने ऊँची आवाज़ में कहा – “यह एक तानाशाह है। हत्यारा है । इसी की वज़ह से दास बाबू और फ्रांसिस की जान गई। …यही हम सब की बदहाली का एकमात्र जिम्मेवार है।”

रेणु के यहाँ मिरदंगिया की ऐसी बदहाली का जिम्मेवार यदि कुछ है तो मेले में लगने वाला  थियेटर का नाच । यद्यपि कि इस कहानी में इसका सीधा संकेत नहीं। लेकिन रेणु के पाठक इसे जानते हैं। इसी नाच के सस्ते जादू ने लील लिया बिदापत के ‘मूलगेन’ नटुआ के नाच को। जब वह अपनी बोली मिथिलाम में ‘जनम अवधि हम रूप निहारल’ गाता तो वे निहाल हो जाते। वे यानी मैथिल ब्राह्मण, कायस्थों और राजपूतों के यहाँ विदापत वालों की बड़ी इज्ज़त होती थी।

साज़ नासाज़ कहानी में उल्लेख है कि इस बदलते समय में अब इज्ज़त उन जैसे कलाकारों के चालाक शागिर्द नितिन मेहता जैसे नकली कम्पोजरों की थी जो विदेशी एल्बमों से धुन लिफ्ट करता था और उसमे राजस्थान का चोली घाघरा, भोजपुरी की कामुक ठुमरी, गुजरात का गरबा और पंजाब के भांगड़े को बहुत भोंडे और अश्लील ढंग से मिलाकर एक कॉकटेल तैयार करता था। डांसिंग फ्लोरों पर अब ऐसे ही गीतों का जलवा था। यहाँ भी फूहड़ बार डांस का जिक्र है जिसके लिए म्यूजिक ने अपनी दिशा बदल दी ।

कोई भी लेखक अपने आप में स्वयं एक साजिंदा होता है। वह अपने ज़माने के एक नए संगीत को रचता है। इसीलिए तो वह स्त्रष्टा कहलाता है। वह इस बदलते संसार के बरक्स अपना एक प्रतिसंसार रचता है। रसप्रिया के इस प्रति संसार में ‘मोहना’ है, जबकि साज़ नासाज़ में वह नैरेटर, जो बूढ़े सेक्सोफोन वादक को इसके लिए प्रेरित करता है। धूल में पड़े कीमती पत्थर को देख जैसे जौहरी की आँख में एक नई चमक झिलमिला उठती है – अपरूप–रूप। कुछ ऐसा ही एहसास सेक्सोफोन वादक उस बूढ़े को पहली दफ़ा सुनते हुए नैरेटर के मन में उमगता है और वह बेसाख्ता कह उठता है – “शायद ही कोई भारतीय इतना परफेक्ट बजाता हो!”

दोनों ही कहानी के शिल्प में काफी फर्क है। मिरदंगिया को मोहना जैसे लड़की मुहां लड़के की हमेशा तलाश रहती है। ऐसे ही लड़कों की खोज में उसकी ज़िन्दगी के अधिकांश दिन बीते हैं। मोहना मिरदंगिया से अप्रत्यक्ष रूप से परिचित है। उसके किस्से सुन रखे हैं अपनी माँ से। तभी तो पूछता है – “तुम्हारी ऊँगली रसपिरिया बजाते टेढ़ी हुई है न?” मिरदंगिया के चौंकने पर वह उसे और भी चौंकाता है– “डायन ने बान मारकर तुम्हारी ऊँगली टेढ़ी कर दी है।” और इसके बाद तो जैसे परकाष्ठा। …इस्स$…! मोहना उसे दूर से करैला कहकर चिढाता है। उसके मुंह से यह सब सुनकर मिरदंगिया को अपने गुरु की बाल विधवा बेटी ‘रमपतिया’ की याद हो आती है। उसी रमपतिया की, जिसकी जिंदगी बरबाद कर वह भाग खड़ा हुआ था। और इस लड़के की आँख नंदू बाबू से कितनी मिलती है?

इस कथा के अन्दर एक अवांतर कथा है । ठीक कोसी के धार की तरह यह अवांतर कथा भी कथा के मुख्य धारा से निःसृत होती हुई पुनः उसी धारा मे मिल जाती है।

साज़ नासाज़ का नैरेटर बूढ़े के लिए नितांत अजनबी है। बूढा सोचता है यह कौन है जो चिपका चला आ रहा है? दोनों ही कथाओं की स्थितियां और भाव अलग होने के बावजूद इसमें एक बड़ी और महत्वपूर्ण समानता है।कलाकार की कला, उसके मनोभावों और व्यक्तित्व के प्रति मोहना और नैरेटर का अद्भुत खिंचाव है। यह खिंचाव कला के प्रति एक नैसर्गिक लगाव और समर्पण के कारण ही है। मोहना अगर रसप्रिया के प्रति गहरी आसक्ति रखता है तो साज़ नासाज़ का नैरेटर सेक्सोफोन के प्रति।

साज़ नासाज़ का बूढ़ा नैरेटर से पूछता है– मेरे साथ क्यों?

“मुझे संगीत से प्यार है। खासतौर पर ‘पेटेक्स’ का मैं मुरीद हूँ ।”

कला के प्रति यह परस्पर लगाव ही मोहना को मृदंगिया से इस कदर जोड़ देता है कि वह उसका दिया आम और मुढ़ी खाता है। नकद पैसे भी रख लेता है चुपचाप।

साज़ नासाज़ का बूढा सेक्सोफोन वादक भी नैरेटर से निस्संकोच पैसे मांगता है। ऐसा करते हुए न उसके अन्दर कोई झिझक रहती है, न आँखों में लालच। यह सहज सम्मान और प्रेम एक दूसरे के कला सम्बन्धी रुझान और परस्पर सम्मान भाव से ही विकसित होता है। यह एक गुणी और गुण ग्राहक के बीच का सहज दुर्निवार आकर्षण है।

इन दोनों ही कहानियों में जो सबसे बड़ी समानता है, वह यह कि दोनों ही कहानियां एक महान आशावाद के साथ समाप्त होती है। मिरदंगिया तय कर लेता है कि वह अब केवल निर्गुण गाकर जीवन गुजार देगा। यह उसका कला परिदृश्य से बाहर जाना है। उसका वानप्रस्थ है। सुसंगत, तर्कपूर्ण वानप्रस्थ।  कारण कि इस परिदृश्य के पीछे मौजूद है मोहना का सुरीला कंठ और रसपिरिया गाने में उसकी सिद्धि। इसे सुनकर मिरदंगिया भावादेश में नाचने लगता है । कमाल! कमाल! किससे सीखे? कौन गुरु?

वह संतुष्ट है अब। यह संतुष्टि उसी प्रकार की है जैसे एक शीर्ष कलाकार को किसी प्रतिभाशाली युवा की कृति को देखकर होती है। वह जान जाता है कि एक नया रत्न आ चुका है और अब यह धरती वीर विहीन होने वाली नहीं।

साज नासाज़ के कथानक की स्थिति भिन्न है। बूढा सेक्सोफोन वादक एक अराजक जीवन जीने को अभिशप्त है। यह अराजकता उसे धीरे-धीरे उसी ओर ले जा रही है, जिस रास्ते उसके तमाम साथी साजिंदे, एक-एक कर अपने जीवन को छोड़, जा चुके हैं। वह बचा है क्योंकि उसे अपने वाद्य से, अपनी कला से, अत्यधिक प्यार है। अचेतावस्था में भी उसका हाथ अपने वाद्य यंत्र वाले बैग को थामे रहता है। जैसे रेणु का पंचकौड़ी अपने मृदंग के साथ भटकता रहता है।

साज़ नासाज़ का नैरेटर उसकी अराजक स्थिति को ताड़ लेता है। वह उसकी खिल्ली उड़ाता है। वह उस बूढ़े की आत्मा पर पड़ी अज्ञानता की गर्द और उसके जिस्म पर पड़े चिथड़ों का मजाक उड़ाते हुए उसे उसकी यूटोपियायी स्थिति से बाहर आने में मदद करता है ।वह उसे अराजक उनींदी और स्वप्नजीवी  अवस्था से बाहर निकाल यथार्थ की खुरदरी जमीन पर खड़ा कर देता है। आखिरी व्यंगात्मक प्रहार के रूप में वह उसके सबसे बड़े कलात्मक खोट की और इशारा करते हुए पूछता है कि तुममें  भारतीयता कहाँ है? भारतीयता यानी उस विदेशी वाद्य यंत्र और विदेशी धुनों के बीच उसके स्वयं की निजता? उसकी अपनी बारीकी की जमीन! यह प्रश्न जहाँ नैरेटर के कला सम्बन्धी ज्ञान की महत्तम ऊंचाई को दर्शाता है, वहीं उस बूढ़े सेक्सोफोन वादक के मर्म को हिलाकर रख देता है। उसे अपनी जड़ों का अहसास होने लगता है। वह जान जाता है कि उसकी मंजिल दरअसल किस और है? जैसे नैरेटर को भी यकीन है कि वह अब बिना किसी सहारे के अपने घर तक पहुँच सकता है!

इन दोनों ही कहानियों की तुलना करते हुए समय के उस लंबे अंतराल को भी महसूस करना होगा, जो इन दोनों कहानियों के बीच है। तकरीबन आधी शताब्दी के आसपास का अंतराल। इस अंतराल के बीच भावनाएं वही हैं, द्वंद्व  वही हैं, अंतर्विरोध वही है लेकिन समय का सच, इसे अभिव्यक्त करने का सलीका वही नहीं है। मृदंग और सेक्सोफोन जैसे वाद्य यंत्रों के बहाने हम समय के उस अंतराल के बीच के वैश्विक प्रभाव को भी आंक सकते हैं। कहानी अब ठेठ गंवई अंचल से निकलकर महानगरों में चक्करघिन्नी खा रही है। नैरेटर यहां भी ग्रामीण पृष्ठभूमि का ही है, लेकिन बाजारवाद और आर्थिक विकास के साथ-साथ उसकी कला संबंधी अवधारणाएँ भी काफी विकसित हुई हैं। अब कला संबंधी औपनिवेशिक धारणाएं हम पर थोपी नहीं जा रही, हम उसे मित्र भाव से ग्रहण कर रहे हैं और वह हमारी बहस के केंद्र में भी है।

रेणु एक सिद्धहस्त कथाकार के रूप में मान्य हैं। उनकी यह कथा काफी सहज, प्राकृतिक एवं निर्दोष हैं। यहां बात से बात को बढ़ाते हुए कथा कहने की बहु प्रचलित टेक्निक जरूर है लेकिन रेणु इसका इस्तेमाल अछूते ढंग से करते हैं। उनकी शैली सबसे अलहदा है। मनोज रूपड़ा भी अपनी इस कहानी में एक सिद्धहस्त कथाकार की तरह अपने उलझे हुए कथ्य से कुछ इस तरह लिपटते हैं कि ‘चाल’ में बंद एक चुप्पे और चिड़चिडे किस्म के कलाकार के जीवन का रेशा रेशा उधेड़ कर रख देते हैं। और यह सब वह इतने स्वाभाविक और उत्तेजक ढंग से करते हैं कि एक कलाकार के साथ पूरी तरह गुंथकर स्वयं भी एक कलाकार बन जाते हैं।

इन दोनों ही कहानियों में अपने अपने समय के सांस्कृतिक क्षरण को बहुत बारीकी और अलग-अलग टेक्निक से दर्शाया गया है। लेकिन इन दोनों ही कहानियों का अभीष्ट एक है और दोनों ही कहानियां अलग-अलग रास्तों से किसी एक मंजिल तक पहुंचने का एहसास कराती हैं।

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