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सुरेंद्र मोहन पाठक की आत्मकथा ‘निंदक नियरे राखिए’ का एक अंश

सुरेंद्र मोहन पाठक की आत्मकथा का तीसरा खंड ‘निंदक नियरे राखिए’ हाल में ही प्रकाशित हुआ है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक के एक अंश का आनंद लीजिए-

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यहाँ मैं पिछले साठ साल से चले आ रहे पुरानी दिल्ली के अनोखे संडे बुक बाजार का जिक्र करना चाहता हूँ जो भारत में तो अनोखा, बाकमाल है ही, मुमकिन है एशिया में—या दुनिया में भी—ऐसे बुक बाजार की कोई मिसाल न हो। शुरुआत में ये बुक बाजार जामा मस्जिद के करीब के—अब बन्द हो चुके—जगत सिनेमा से लेकर एडवर्ड पार्क—अब सुभाष पार्क—की नुक्कड़ तक, यानी दरियागंज, नेताजी सुभाष मार्ग के उस ओर के क्रॉसिंग के सिग्नल तक, सड़क की दोनों ओर लगता था, फिर फैलता, पसरता दाएँ घूमकर दिल्ली गेट तक, फिर और दाएँ घूमकर आसफ अली रोड पर डिलाइट सिनेमा तक पहुँच गया था। जब ऐसा हुआ था तो जगत सिनेमा वाला शुरुआती सेगमेंट बन्द हो गया था और बाजार की हदूद डिलाइट सिनेमा से लेकर सुभाष पार्क के चौराहे तक सड़क की एक ही तरफ—गोलचा सिनेमा की तरफ—कायम हो गई थीं।

पुस्तक प्रेमियों में वो बाजार इतना पॉपुलर था—अब भी है—कि हर इतवार को, कोई भी मौसम हो, वहाँ मेले जैसा माहौल होता था। बरसात के मौसम में भी कितने ही ग्राहक और पटड़ी वाले बरसात बन्द होने का इन्तजार करते पाए जाते थे। केवल दो मर्तबा, छब्बीस जनवरी और पन्द्रह अगस्त को, वो बाजार बन्द होता था भले ही वो दोनों सरकारी त्योहार इतवार को न हों। छब्बीस जनवरी को उस रूट से परेड ने गुजरता होता था और पन्द्रह अगस्त को उधर से ही गुजरकर प्रधानमंत्री लाल किला पहुँचते थे, ध्वजारोहन की रस्म पूरी करते थे और किले की प्राचीर से कौम से मुखातिब होते थे। लिहाजा पहले ही बुक बाजार की हाकर्स यूनियन को खबर कर दी जाती थी कि उन दोनों सरकारी त्योहारों के पहले इतवार को बाजार नहीं लगेगा। चौदह अगस्त और पच्चीस जनवरी की शाम को तो सुभाष मार्ग की दुकानें, शोरूम्स जबरन बन्द करा दिए जाते थे और दुकानों के तालों को सील लगा दी जाती थी जो त्योहार गुजर जाने के बाद भी अगर उस रोज टूटी पाई जाती थी तो दुकान के मालिक के लिए वो सिक्योरिटी ब्रीच का गम्भीर मसला बन जाता था।

उस बुक बाजार की मशहूरी से मुब्तला कई ऐसे हॉकर जिनका किताबों से कोई लेना-देना नहीं था, खासतौर से सर्दियों में गर्म कपड़ों की, जींस, टी-शर्ट्स वगैरह की रेहड़ियाँ लगाने लगे थे, लेकिन उनका वो हंगामा बावजूद पुलिस की शह के सुभाष पार्क के चौक और गोलचा सिनेमा तक भी सीमित रहता था। किताबों वाले उन रेहड़ियों से असुविधा तो महसूस करते थे लेकिन संडे बुक बाजार में रेहड़ी वालों की घुसपैठ पर उनकी पेश नहीं चलती थी। फिर ग्राहक भी ऐसे कमिटिड थे कि हर हाल में पहुँचते थे, दूर-दूर से आते थे, कारों पर आते थे पर पहुँचते थे।

कई बार उस बुक बाजार पर क्लोजर का संकट आया—दो-तीन बार बन्द भी हुआ—क्योंकि कभी लोकल लीडर को वो चुभने लगा, कभी दरियागंज थाने का थानाध्यक्ष नाराज हो गया तो कभी वैसे ही उस बाजार को इलाके की हफ्तावरी जनरल न्यूसेंस करार दिया गया। जब पहली बार वो नौबत आई तो हाॅकरों ने उसका इतना तीव्र विरोध किया कि वो मीडिया की निगाह का भी मरकज बना और दिल्ली से प्रकाशित होने वाले तमाम अखबारों ने उस सिलसिले में लीड स्टोरीज़ छापीं। यहाँ तक कि खुशवन्त सिंह और अनिल धारकर जैसे नामचीन लेखकों और पत्रकारों ने उस बन्दी का प्रबल विरोध किया, बाकायदा उस बुक बाजार को आइकॉनिक बुक बाजार बताया जिसको बन्द किया जाना प्रशासन की नादानी थी और पुस्तक प्रेमियों का बड़ा नुकसान था।

नतीजतन बाजार फिर चालू हो गया।

लेकिन गौरतलब बात है कि वो संडे बाजार तब भी बन्द न हुआ जबकि ऐन सुभाष मार्ग पर प्रस्तावित मेट्रो रूट का महीनों टनल वर्क चालू रहा।

तीन बार यूँ बाजार बन्द हुआ, बन्दी की कोई साफ वजह किसी की समझ में न आई लेकिन खुसर-पुसर यही रही कि किसी को—क्या पता किसको, जबकि सबको पता था—खटक रहा था। एक बार तो खुद उस निर्वाचन क्षेत्र का संसद सदस्य दखलअन्दाज हुआ तो वो बाजार खुला।

आखिरी बार—हाल ही में सन् 2019 के उत्तरार्ध में ही सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से बन्द हुआ तो किसी की पेश न चली। हाॅकरों की यूनियन ने भी तीव्र विरोध किया तो उन्हें कोई वैकल्पिक जगह दी जाने का आश्वासन मिला।

वैकल्पिक जगह रामलीला मैदान था, जिसे हॉकरों की यूनियन ने रिजैक्ट
कर दिया।

अब वो बाजार आसफ अली रोड पर डिलाइट सिनेमा के सामने के महिला पार्क में लगता है और हॉकर्स उस नयी जगह से खुश हैं।

उस बुक बाजार का मैं नियमित पैट्रन था, हर इतवार को मैं वहाँ जाता था और ढेर पुरानी, दुर्लभ, अनुपलब्ध पुस्तकें खरीदकर लाता था।

एक बार को करतब हुआ।

बल्कि चमत्कार हुआ।

मुझे वहाँ पटड़ी पर से स्ट्रेंट मैगजीन के सौ साल—रिपीट, सौ साल—पुराने अंक मिले। और ये वो अंक थे जिनमें से हर एक में सर आर्थर कॉनन डायल के फिक्शन हीरो शरलॉक होम्ज की मूल कथा छपी थी। खुद बेचने वाले दुकानदार को उनके दुर्लभ होने की न कोई समझ थी न कद्र थी।

सीरियल वाइज छब्बीस इशू मुझे पाँच-पाँच रुपये में मिले।

यहाँ ये बात भी काबिलेजिक्र है कि उस बाजार के सारे ही हॉकर अल्पशिक्षा प्राप्त कबाड़िए नहीं हैं। पिछले दस-बारह सालों में मैंने देखा था कि कुछ हॉकर किताब की अहमियत को समझने लग गए थे और अपनी समझ को किसी खास किताब को रेयर बताकर बाकायदा कैश करते थे। मैंने एक बार खुद एडगर वॉलेस का एक नावल—ओरिजिनल कीमत 25 सैंट। तब के डॉलर रेट के मुताबिक दो रुपये—खरीदने की कोशिश की तो उसने अस्सी रुपये माँगे। वजह पूछी तो बोला, रेयर बुक थी। मैंने कहा, मेरे पास एडगर वालेस के ऐसे पन्द्रह नावल थे, वो चालीस-चालीस रुपये में ले ले।

जवाब में उसने नावल मेरे हाथ से लगभग छीना और वापिस पटड़ी पर लगी किताबों में रख दिया।

उसे यकीन जो था कि अस्सी रुपये देने वाला कोई ग्राहक देर-सवेर जरूर आएगा।

पटड़ी पर सबसे ज्यादा सेल या पायरेटिड नावलों की थी या फर्नीचर, फैशन डिजाइनिंग की बड़ी-बड़ी काफी टेबल बुक्स की थी या कम्प्यूटर सम्बन्धी पुस्तकों और डिक्शनरीज़ वगैरह की थी। एक बार एक स्पैनिश ग्राहक ने मेरे सामने मेरे एक हॉकर दोस्त से आयरन ग्रिल वर्क की एक किताब मुँह माँगे दामों पर खरीदी—इतने ज्यादा दामों पर कि कोई लोकल ग्राहक एक-चौथाई भी न देता—और फिर भी सन्तुष्ट था और कहता था—“आई गॉट ए गुड डील।”

फिर उसने पूछा कि ऐसी और किताबें थीं तो जवाब मिला कि थीं तो सही लेकिन मुख्तलिफ नहीं थीं, एक ही किताब की कई कॉपियाँ थीं।

उसने तमाम की तमाम—कोई दो दर्जन—खरीद लीं।

मैंने हैरानी जाहिर की तो बोला—“वुई डोंट गैट सच बुक्स इन स्पेन।”

कभी ऐसे नावल पटड़ी पर दिखाई देते थे जो साफ किसी पुस्तक प्रेमी का पर्सनल कलैक्शन जान पड़ते थे। एक बार जब ऐसे नावल पटड़ी पर मुझे दिखाई दिए थे तो मैंने पाया था कि वो 40-50 के दशक के वो नावल थे, जिनके तमाम के तमाम लेखक मेरी खास पसन्द के थे, जैसे अर्ल स्टेनले गार्डनर, एडगर वालेस, जान डिक्सन कैर, विक्टर गन, पीटर चीनी, वर्कले ग्रे, ई.सी.आर. लोराक, एलरी-क्वीन वगैरह।

मैं जो किताब उठाता था मेरी पसन्द की निकलती थी यूँ चौवालीस किताबें मेरी निगाह कर मरकज बनी तो धड़कते दिल से मैंने कीमत पूछी—धड़कते दिल से इसलिए क्योंकि सब किताबें पसन्द करता देखकर वो मेरे से अन्धाधुंध पैसे माँग सकता था।

अप्रत्याशित जवाब मिला—“बाउजी सुबह पटड़ी लगाते वक्त एक जना डेढ़ सौ किताबें बेचकर गया था, जो मैंने पाँच-पाँच रुपये में उससे खरीदी थीं और दस-दस रुपये में बेच रहा हूँ।”

“सब ऐसी ही?”

“हाँ।”

मेरा दिल चाहा कि जो खरीद ले गया था—या ले गए थे—मैं दौड़कर उनके पीछे जाऊँ और जैसे-तैसे किताबें खुद कब्जाऊँ।

मैंने उसे चार सौ चालीस रुपये दिए और यूँ उन किताबों को समेटा जैसे कोई खजाना मिल गया था जो मेरे से छिन सकता था।

वैसी डेढ़ सौ!

एक सौ छ: वैसी किताबें मेरे हाथ से निकल गईं क्योंकि मैं वहाँ दोपहर को—दो घंटा लेट—पहुँचा।

उस बाजार का ये भी जहूरा था कि चंडीगढ़, शिमला, मसूरी तक से बुक सैलर्स उस संडे बुक बाजार से लॉट में किताबें खरीदने दिल्ली आते थे।

एक बार उसी बाजार के दिल्ली गेट वाले सिरे पर टैलीफोन एक्सचेंज के सामने आपके खादिम के 15-20 रुपये कीमत के पुराने नावल सौ-डेढ़ सौ रुपये तक में बिकते देखे।

मैं फैसला न कर सका मुझे खुश होना चाहिए था या ब्लैक के रेट्स पर रोष प्रकट करना चाहिए था।

उस हॉकर ने ही—जो कि मुझे पहचान गया था—मुझे बताया कि सन् 65 और 70 के बीच में छपे मेरे एक-एक, दो-दो रुपये के नावल हजार-हजार रुपये में बेच चुका था और मेरे प्रथम प्रकाशित उपन्यास ‘पुराने गुनाह नये गुनहगार’, जिसके मूल संस्करण की कीमत बारह आने थी, को बोली लगवा चुका था, जो आखिर सवा तीन हजार रुपये तक पहुँची थी।

ताकीद है कि विदेशों में एंटीक का दर्जा रखने वाले प्रसिद्ध लेखकों के रेयर एडीशन 70-80 हजार डॉलर (पाँच-साढ़े पाँच लाख रुपये) में बिक चुके थे। मूल संस्करण की कोई प्रति लेखक द्वारा हस्ताक्षरित भी हो तो कहना ही क्या!

फिर भी कहा जाता है कि भारत में, दुनिया में, किताब की—प्रिंट मीडिया की—कद्र घट रही है।

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लेखक : सुरेन्द्र मोहन पाठक

पुस्तक : निंदक नियरे राखिए

सेगमेंट : आत्मकथा

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन

भाषा : हिंदी

बाईंडिंग : पेपरबैक

मूल्य : 299/-

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